योगासन

Yogasan Part 3 | Yoga for High Blood Pressure | Yoga for Weight Loss

yog3

 

 

सर्वांगासन

सर्वांगासन जैसाकि इसके नाम से ही पता चलता है की शरीर के सम्पूर्ण अंगों का आसन ही सर्वांगासन है|  यह पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रभाव शरीर पर सदैव बनाये रखता है क्योंकि इस आसन के दौरान कई महत्वपूर्ण अंगों और ग्रन्थियों पर भार व दबाव पड़ता है जिससे से रक्त का प्रवाह विपरीत दिशा में होने लगता है | सर्वांगासन से शरीर के उन अंगों में रक्त संचार बढ़ जाता है जिनमें सामान्य स्थिति में रक्त संचार कम रहता है |

Sarvangasana

विधि :  दरी या चद्दर पर पीठ के बल लेट जाएँ और अपने दोनों हाथों को कमर के दोनों तरफ और हथेलियों को नीचे की तरफ करके  जमीन पर  उन्हें अगल बगल रखें | दोनों हथेलियों से जमीन को दबाएँ और दोनों पैर एक साथ धीरे धीरे ऊपर की ओर उठायें ,घुटनों पर उन्हें मोड़ें और पीछे की ओर इस प्रकार झुकाएं कि ठुड्डी  छाती को स्पर्श करने लगे |

अपनी दोनों कुहनियों को जमीन पर टिकाकर हाथों से पीठ को ऊपर उठने में  सहारा दें | अब धीरे धीरे एवं सावधानी से अपने शरीर को उल्टा खड़ा करें और उसे सीधा रखें | इस दौरान  दोनों पंजे आपस में मिले हुए एवं पैरों की उंगलिया आसमान की ओर तनी रहें | अपनी शरीर को इस प्रकार ऊपर की ओर उठायें कि सम्पूर्ण शरीर सिर के पिछले भाग ,गर्दन ,कंधों और कुहनियों पर आधारित हो जाएँ |

अपने पृष्ठ भाग को सीधा करें ताकि ठुड्डी छाती को स्पर्श करने लगे | यथासम्भव रुकने के बाद शरीर को जमीन पर लाने के पहले  सर्वप्रथम पैरों को घुटने से मोड़ें एवं घुटने नीचे करें और उन्हें यथासम्भव सिर के निकट ले आयें | अंततः अपने दोनों हाथों को जमीन पर रखें और उन पर अपने को इस प्रकार आधारित करें कि सिर पर शरीर का पिछला भाग अर्थात पीठ जमीन पर आ जाये | जब आपकी पीठ का निचला भाग जमीन पर हो तब पैरों को आकाश की ओर कीजिये और धीरे धीरे उन्हें जमीन पर ले आइये |

अब आप मानसिक दृष्टि से शरीर की मांसपेशियों को तनावरहित और ढीली कर दें एवं दो- तीन मिनट तक शवासन में लेट जाएँ |

लाभ : योग का अतिउत्तम सिद्धांत है कि विपरीतिकरन द्व्रारा शरीर को विश्राम दिया जाये एवं रक्त संचार अच्छी प्रकार से हो |  यह आसन गले की ग्रन्थियों को प्रभावित कर वजन नियंत्रित करने में सहायक होता है तथा आँखों एवं मस्तिष्क की शक्ति विकसित करता है |

यह दमा ,धडकन ,श्वस्नोदाह एवं सिर दर्द में राहत देता है और स्वर को मुखरित करता है | यह आसन पाचन क्रिया शुद्ध करता है तथा श्वास और यौन ग्रन्थियों को सक्रिय और विकसित करता है | हर्निया की रोकथाम करके पैरों और अन्य तनाव पूर्ण अंगों को आराम देता है |

यह आसन मेरुदंड एवं स्नायुओं की जड़ों में पर्याप्त रक्त का संचालन करता है तथा मानसिक शक्ति प्रज्ज्वलित कर  कुंडलिनी शक्ति जागृत करने में सहायक होता है | यह मेरुदंड को अत्यधिक लचीला बना देता है और यकृत की कार्य प्रणाली में सुधार लाता है | यह आसन स्वप्नदोष -निरोधक एवं ब्रह्मचर्य पालन में सहायक माना जाता है |

शरीर में रक्त की वृद्धि कर यह रक्त शोधक का कार्य भी करता है | यह आसन अनेक महत्वपूर्ण अंगों और ग्रन्थियों को उनकी पूर्व स्थिति में लाने में सहायक होता है | इस आसन से सुस्ती दूर हो जाती है और यह हारमोंस को संतुलित भी करता है |

सावधानी : उक्त रक्त चाप ,हृदयरोग एवं गर्दन कि पीड़ा में यह आसन कदापि न करें | इस आसन में पैर उठने के पूर्व सिर और कुहनियों कि स्थिति को भलीभांति ठीक कर लें |

पैरों को सदैव धीरे धीरे ही उठायें व नीचे लायें | इससे पेट की मांसपेशियों को ठीक रखने में मदद मिलती है | सम्पूर्ण गतिविधियाँ नियंत्रण,गम्भीरता और संतुलन के साथ पूरी की जाएँ तथा ध्यान विशुद्धि चक्र पर रहे|

 

पवनमुक्तासन

शरीर में स्थित पवन (वायु) यह आसन करने से मुक्त होता है। इसलिए इसे पवनमुक्तासन कहा जाता है।

ध्यान मणिपुर चक्र में। श्वास पहले पूरक फिर कुम्भक और रेचक।

Pawanmuktasana

विधि : भूमि पर बिछे हुए आसन पर चित्त होकर लेट जायें। पूरक करके फेफड़ों में श्वास भर लें। अब किसी भी एक पैर को घुटने से मोड़ दें। दोनों हाथों की अंगुलियों को परस्पर मिलाकर उसके द्वारा मोड़े हुए घुटनों को पकड़कर पेट के साथ लगा दें। फिर सिर को ऊपर उठाकर मोड़े हुए घुटनों पर नाक लगाएं। दूसरा पैर ज़मीन पर सीधा रहे। इस क्रिया के दौरान श्वास को रोककर कुम्भक चालू रखें। सिर और मोड़ा हुआ पैर भूमि पर पूर्ववत् रखने के बाद ही रेचक करें। दोनों पैरों को बारी-बारी से मोड़कर यह क्रिया करें। दोनों पैर एक साथ मोड़कर भी यह आसन हो सकता है।

लाभ : पवनमुक्तासन के नियमित अभ्यास से पेट की चरबी कम होती है। पेट की वायु नष्ट होकर पेट विकार रहित बनता है। कब्ज दूर होता है। पेट में अफारा हो तो इस आसन से लाभ होता है। प्रातःकाल में शौचक्रिया ठीक से न होती हो तो थोड़ा पानी पीकर यह आसन 15-20 बार करने से शौच खुलकर होगा।

इस आसन से स्मरणशक्ति बढ़ती है। बौद्धिक कार्य करने वाले डॉक्टर, वकील, साहित्यकार, विद्यार्थी तथा बैठकर प्रवृत्ति करने वाले मुनीम, व्यापारी आदि लोगों को नियमित रूप से पवनमुक्तासन करना चाहिए।

 

हलासन

यह आसन उनके लिए बहुत कारगर है जो लम्बे समय तक बैठते हैं और जिन्हें posture संबंधी समस्या है। ये थायराइड ग्रंथि, पैराथायराइड ग्रंथि, फेफड़ों और पेट के अंगों को उत्तेजित करता है जिससे रक्त का प्रवाह सर और चेहरों की और तेज़ हो जाता है जिससे पाचन प्रक्रिया में सुधार होता है और हारमों का स्तर नियंत्रण में रहता है।

Halasana

विधि : फर्श पर चित होकर लेट जाएं। अपनी बांहों को बगल में रखें और घुटनों को मोड़ लें ताकि आपका तलवा फर्श को छूए। अब धीरे धीरे अपनी पुष्टिका से पैरों को उठाएं। पैर उठाते वक्त अपने हाथों को पुष्टिका पर रखकर शरीर को सपोर्ट करें। अब धीरे धीर अपने पैरों को पुष्टिका के पास से मोड़ें और सर के पीछे ले जाकर पंजों को फर्श तक ले जाने की कोशिश करें। और हाथों को बिलकुल सीधा रखें ताकि वो फर्श के संपर्क में रहे। ऊपर जाते हुए सांस छोड़ें। लेटने वाली मुद्रा में वापस लौटने के लिए पैरों को वापस लाते हुए सांस लें। एकदम से नीचे न आएं।

सावधानिया :  यदि आप लिवर, उच्च रक्तचाप, डायरिया संबंधी समस्याओं से गुज़र रहे हैं, मासिक धर्म चल रहा हो या गर्दन में चोट लगी हो तो यह आसन न करें।

 

सेतुबंधासन

यह आसन न सिर्फ रक्तचाप को नियंत्रित रखता है बल्कि मानसिक शान्ति देता है और पाचनतंत्र को ठीक करता है। गर्दन और रीढ़ की स्ट्रेचिंग के साथ-साथ यह आसन मासिक धर्म के सिम्पटम से भी निजात दिलाता है।

Setubandhasana

विधि :  चटाई पर चित होकर लेट जाएं। अब सांस छोड़ते हुए पैरों के बल ऊपर की ओर उठें। अपने शरीर को इस तरह उठाएं कि आपकी गर्दन और सर फर्श पर ही रहे और शरीर का बाकी हिस्सा हवा में। ज़्यादा सपोर्ट के लिए आप हाथों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। अगर आपमें लचीलापन है तो अतिरिक्त स्ट्रेचिंग के लिए आप अपनी उँगलियों को ऊपर उठी पीठ के पीछे भी ले जा सकते हैं। अपने कम्फर्ट का ध्यान रखते हुए इस आसन को पूरा करें।

सावधानी :  अगर आपकी गर्दन या पीठ में चोट लगी हो तो यह आसन न करें।

 

उत्तान पादासन

Uttanpadasana

विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनों हथेलियों को जांघों के साथ भूमि पर स्पर्श करने दें। दोनों पैरों के घुटनों, एड़ियों और अंगूठों को आपस में सटाए रखें और टांगें तानकर रखें।

अब श्वास भरते हुए दोनों पैरों को मिलाते हुए धीमी गति से भूमि से करीब डेढ़ फुट ऊपर उठाएं अर्थात करीब 45 डिग्री कोण बनने तक ऊंचे उठाकर रखें। फिर श्वास जितनी देर आसानी से रोक सकें उतनी देर तक पैर ऊपर रखें।

फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पांव नीचे लाकर बहुत धीरे से भूमि पर रख दें और शरीर को ढीला छोड़कर शवासन करें।

अवधि : इस आसन का प्रात: और संध्या को खाली पेट यथाशक्ति अभ्यास करें। जब आप श्वास को छाती में एक मिनट से दो तीन मिनट तक रोकने का अभ्यास कर लेंगे तब आपका आसन सिद्ध हो जाएगा।

लाभ  : इसके अभ्यास से पेट और छाती का थुलथुलापन, पेडू का भद्दापन दूर हो जाता है। पेट के स्नायुओं को बड़ा बल मिलता है जिससे कद बढ़ता है। इसे कहते रहने से पेट कद्दू की तरह कभी बड़ा नहीं हो सकता।

यह आसन पेट का मोटापा दूर करने के अतिरिक्त पेट की आंतें सुदृढ़ कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है। इस आसन के नियमित अभ्यास से गैस और अपच का नाश होता है। पुराने से पुराना कब्ज का रोग दूर होता है और खूब भूख लगती है। उदर संबंधी अनेक रोक नष्ट होते हैं। नाभि केंद्र जो बहत्तर हजार नाड़ियों का केंद्र है। उसे ठीक करने के लिए उत्तान पादासन सर्वश्रेष्ठ है। इसके अभ्यास द्वारा नाभि मंडल स्वत: ही ठीक हो जाता है।

यदि नाभि जगह से हट गई हो तो गिरी हुई धरण पांच मिनट उत्तान पादासन करने से अपने सही स्थान पर आ जाती है।

सावधानी : जब कमर में दर्द तथा मांसपेशियों में ऐंठन की शिकायत हो, उस समय इस आसन का अभ्यास नहीं करें। गर्भावस्था के दौरान महिलाएं अभ्यास न करें।

इस आसन को स्त्री पुरुष समान रूप से कर सकते हैं। छह सात वर्ष के बालक-बालिकाएं भी इसे कर सकते हैं। यह बहुत आसान आसन है एवं अधिक लाभदायक है। करने की शर्त यह कि आपको पेट और कमर में किसी प्रकार का कोई गंभीर रोग न हो। यदि ऐसा है तो किसी योग चिकित्सक से पूछकर करें।

 

कटिपिण्डमर्दनासन

इस आसन में कटिप्रदेश (कमर के पास वाले भाग) में स्थित पिण्ड अर्थात मूत्रपिण्ड का मर्दन होता है, इससे यह आसन कटिपिण्डमर्दनासन कहलाता है।

ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र में। श्वास पूरक और कुम्भक।

Katipindmardnasana

विधि : बिछे हुए कम्बल पर पीठ के बल चित्त होकर लेट जायें। दोनों हाथों को आमने-सामने फैला दें। मुट्ठियाँ बन्द रखें। दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर खड़े कर दें। पैर के तलवे ज़मीन से लगे रहें। दोनों पैरों के बीच इतना अन्तर रखें कि घुटनों को ज़मीन पर झुकाने से एक पैर का घुटना दूसरे पैर की एड़ी को लगें... सिर दायीं ओर मुड़े तो दोनों घुटने दाहिनी ओर ज़मीन को लगें। इस प्रकार 15-20 बार क्रिया करें। इस प्रकार दोनों पैरों को एक साथ रखकर भी क्रिया करें।

लाभ : जिसको पथरी की तकलीफ हो उसे आश्रम (संत श्री आसारामजी आश्रम, साबरमति, अमदावाद-5) से बिना मूल्य मिलती काली भस्म करीब डेढ़ ग्राम, भोजन से आधा घण्टा पूर्व और भोजन के बाद एक गिलास पानी के साथ लेना चाहिए और यह आसन भूखे पेट ठीक ढंग से करना चाहिए। इससे पथरी के दर्द में लाभ होता है। पथरी टुकड़े-टुकड़े होकर मूत्र के द्वारा बाहर निकलने लगती है। मूत्रविकार दूर होता है। कमर दर्द, साइटिका, रीढ़ की हड्डी की जकड़न, उदासीनता, निराशा, डायाबिटीजं, नपुंसकता, गैस, पैर की गाँठ इत्यादि रोगों में शीघ्र लाभ होता है। नाभि स्थान से च्युत हो जाती हो तो पुनः अपने स्थान में आ जाती है कब्ज का रोगी सुबह शौच जाने से पहले उषःपान करके यह आसन करे तो चमत्कारिक लाभ होता है। श्वास को अन्दर भर के पेट को फुलाकर यह आसन करने से कब्ज जल्दी दूर होता है।

सावधानी :  मासिक धर्म के समय एवं गर्भावस्था में स्त्रियाँ यह आसन न करें।

 

शवासन

शव का अर्थ होता है मुर्दा अर्थात अपने शरीर को मुर्दे समान बना लेने के कारण ही इस आसन को शवासन कहा जाता है। यह पीठ के बल लेटकर किया जाता है और इससे शारीरिक तथा मानसिक शांति मिलती है।

Shavasana

विधि : पीठ के बल लेटकर दोनों पैरों में ज्यादा से ज्यादा अंतर रखते है। पैरों के पंजे बाहर और एडि़याँ अंदर की ओर रखते हैं। दोनों हाथों को शरीर से लगभग छह इंच की दूरी पर रखते हैं। हाथों की अंगुलियाँ मुड़ी हुई, गर्दन सीधी रहती है। आँखें बंद रखते हैं।

शवासन में सबसे पहले पैर के अँगूठे से लेकर स‍िर तक का भाग ढीला छोड़ देते हैं। पूरा शरीर ढीला छोड़ने के बाद सबसे पहले मन को श्वास-प्रश्वास के ऊपर लगाते हैं और हम मन के द्वारा यह महसूस करते हैं कि दोनों नासिकाओं से श्‍वास अंदर जा रही है तथा बाहर आ रही है। जब श्वास अंदर जाती है तब नासिका के अग्र में हलकी-सी ठंडक महसूस होती है और जब हम श्वास बाहर छोड़ते हैं तब हमें गरमाहट की अनुभूति होती हैं। इस गर्माहट व ठंडक को अनुभव करें।

इस तरह नासाग्रस से क्रमश: सीने तथा नाभि पर ध्यान केंद्रित करें। मन में उल्टी गिनती गिनते जाएँ। 100 से लेकर 1 तक। यदि गलती हो जाए तो फिर से 100 से शुरू करें। ध्यान रहे क‍ि आपका ध्यान सिर्फ शरीर से लगा हुआ होना चाहिए, मन में चल रहे विचारों पर नहीं। इसके लिए साँसों की गहराई को महसूस करें।

लाभ : श्वास की स्थिति में हमारा मन शरीर से जुड़ा हुआ रहता है, जिससे क‍ि शरीर में किसी प्रकार के बाहरी विचार उत्पन्न नहीं होते। इस कारण से हमारा मन पूर्णत: आरामदायक स्थिति में होता हैं, तब शरीर स्वत: ही शांति का अनुभव करता है। आंतरिक अंग सभी तनाव से मुक्त हो जाते हैं, जिससे कि रक्त संचार सुचारु रूप से प्रवाहित होने लगता है।

और जब रक्त सुचारु रूप से चलता है तो शारीरिक और मानसिक तनाव घटता है। खासकर जिन लोगों को उच्च रक्तचाप और अनिद्रा की शिकायत है, ऐसे मरीजों को शवासन अधिक लाभदायक है।

सावधानी : आँखें बंद रखना चाहिए। हाथ को शरीर से छह इंच की दूरी पर व पैरों में एक से डेढ़ फीट की दूरी रखें। शरीर को ढीला छोड़ देना चाहिए। श्वास की स्थिति में शरीर को हिलाना नहीं चाहिए।

 

सुप्त-वज्रासन

सुप्त का अर्थ होता है सोया हुआ अर्थात वज्रासन की स्थिति में सोया हुआ। इस आसन में पीठ के बल लेटना पड़ता है, इसिलिए इस आसन को सुप्त-वज्रासन कहते है, जबकि वज्रासन बैठकर किया जाता है।

Supta Vajrasana

विधि : दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाते है, दोनों पैर मिले हुए, हाथ बगल में, कमर सीधी और दृष्टि सामने। अब वज्रासन की स्थिति में बैठ जाते है। वज्रासन में बैठने के बाद दोनों पैरों में पीछे इतना अंतर रखते है कि नितंब जमीन से लग जाए तब धीरे-धीरे दोनों कुहनियों का सहारा लेकर जमीन पर लेट जाते है।

दाएँ हाथ को पीछे ले जाते है और बाएँ कंधे के नीचे रखते है और बाएँ हाथ को पीछे ले जाकर दाएँ कंधे के नीचे रखते है। इस अवस्था में दोनों हाथों की कैची जैसी स्‍थिति बन जाती है, उसके बाद इसके बीच में सिर को रखते है। वापस पहले वाली अवस्‍था में आने के लिए हाथों को जंघाओं के बगल में रखते है और दोनों कुहनियों की सहायता से उठकर बैठ जाते है।

लाभ : यह आसन घुटने, वक्षस्थल और मेरुदंड के लिए लाभदायक है। उक्त आसन से उदर में खिंचाव होता है, इस खिंचाव के कारण उदर संबंधी नाडि़यों में रक्त प्रावाहित होकर उन्हें सशक्त बनाता है। इससे उदर संबंधी सभी तरह के रोगों में लाभ मिलता है। साथ ही पेट की चर्बी भी घटती है।

सावधानी : जिनको पेट में वायु विकार, कमर दर्द की शिकायत हो उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए। इसे खाना खाने के तुरंत बाद न करें।

नितंब मिलने के बाद ही जमीन पर लेटे। लेटते समय जितनी आसानी से जा सकते है, उतना ही जाए। प्रारंभ में घुटने मिलाकर रखने में कठिनाई हो तो अलग-अलग रख सकते है, धीरे अभ्यास करने पर पैर को मिलाने का प्रयास करें। जमीन पर लेटते समय घुटने उपर नहीं उठने चाहिए, पूर्ण रूप से जमीन पर रखें।

 

पादोत्तानासन

पादोत्तानासन सरल आसनों की श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण आसन है |

विधि : आसन पर पीठ के बल लेट जाएँ और अपने दोनों हाथों कोसीधा करते हुए सिर के पीछे की ओर ले जाएँ | सम्पूर्ण शरीर को ऊपर और नीचे की ओर तानें किन्तु यह ध्यान रहे कि हथेलियाँ आकाश की ओर एवं पैर की अंगुलियाँ आगे की ओर खिंची होनी चाहिए | इस दौरान ताड़ासन की मुद्रा बन जाती है |

अब दोनों एडियों को तीन इंच ऊपर उठा लें और आसन के अंत तक उठाये रखें | श्वास भरते हुए दायीं टांग और बायाँ हाथ आसमान की ओर नब्बे अंश का कोण बनाते हुए उठायें किन्तु यह ध्यान रहे कि सिर  व् पैर आसन से न उठने पाए और दोनों पैर मिले व् तने रहें  | श्वास छोड़ते हुए हाथ और पांव दोनों को तीन इंच पर वापस ले आयें |एडियाँ आसन पर न जाने पायें | अब बायीं टांग और दायें हाथ को ऊपर उठायें और कुछ देर तक रुकें | अब श्वास छोड़ते हुए पूर्व स्थिति में वापस आ जाएँ किन्तु एडियाँ जमीन से तीन इंच ऊपर अभी भी  उठी रहेंगी   | इस अवधि में ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर केन्द्रित रहेगा | यह ध्यान रहे कि नीचे वाले हाथ और पांव आसन से थोडा ऊपर उठे  एवं खिंचे रहेंगे | अब दायीं टांग और बाएं हाथ को ऊपर आकाश की ओर उठायें  और कुछ देर तक रुकें फिर धीरे धीरे वापस ले आयें  |

अब यही क्रिया दोनों हाथों एवं पैरों को एक साथ ऊपर उठा कर करें और कुछ देर रुकने के पश्चात धीरे धीरे वापस हो लें |

अब श्वास को छोड़ते हुए पहले दोनों हाथ को पीछे ले जाएँ फिर पांव को वापस कर धीरे से जमीन पर रखें | अब शरीर को ढीला करके विश्राम करें |

लाभ : इस आसन से हाथ और पैर की मांसपेशियां  सशक्त एवं बलशाली बनती हैं | इस आसन से वायु विकार और कब्जियत का निवारण होता है |

यह आसन  पैर की अँगुलियों और अंगूठों को शक्ति  प्रदान करता है | इस आसन से  गठिया साइटिका का दर्द दूर हो जाता है | पैरों की नाड़ियों ,स्नायुओं और मांसपेशियों  को यह आसन सशक्त बनाता है |

 

नौकासन

नौकासन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति नौका समान दिखाई देती है, इसी कारण इसे नौकासन कहते है। इस आसन की गिनती पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में मानी जाती है।

Naukasana

विधि : सबसे पहले शवासन की स्थिति में लेट जाएँ। फिर एड़ी-पंजे मिलाते हुए दोनों हाथ कमर से सटा कर रखें। हथेलियाँ जमीन पर तथा गर्दन को सीधी रखते हैं।

अब दोनों पैर, गर्दन और हाथों को धीरे-धीरे समानांतर क्रम में एक-साथ उपर की ओर उठाते हैं। अंतिम अवस्था में पूरे शरीर का वजन नितंब के ऊपर रखना चाहिए। इस स्थिति में 30-40 सेकंड रुकने का प्रयास करें। तत्पश्चात धीरे-धीरे पुन: उसी अवस्था में आकर शवासन की अवस्था में लेट जाएँ। इसे सुविधानुसार चार-पाँच बार करें।

लाभ : इससे पाचन क्रिया, छोटी-बड़ी आँत में लाभ मिलता है। अँगूठे से अँगुलियों तक खिंचाव होने के कारण शुद्ध रक्त तीव्र गति से प्रवाहित होता है, जिससे काया निरोगी बनी रहती है। हर्निया रोग में भी यह आसन लाभदायक माना गया है।

सावधानी : शरीर को ऊपर उठाते समय दोनों हाथ-पैर के अँगूठे और सिर का भाग एक सीध में हो। अंतिम अवस्था में पैर के अँगूठे और सिर का भाग सीध में नहीं आता है, तो धीरे-धीरे अभ्यास का प्रयास करें। जिन्हें स्लिप डिस्क की शिकायत हो उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए। मेरुदंड में कड़ापन या पेट संबंधी गंभीर रोग हो तो भी यह आसन न करें।

 

मर्कटासन

विधि : सीधे लेटकर दोनों हाथों को कंधों के साथ समानान्तर फैलाइए। हथेलियाँ आकाश की ओर खुली हों। फिर दोनों पैरों को घुटनो से मोड़कर नितम्ब के पास रखें। अब घुटनों को दाएं ओर जुकाते हुए दाएं घुटने को भूमि पर टिका दें। बायां घुटना दाएं घुटने पर टिका हुआ हो तथा दाएं पैर की एड़ी पर बाएं पैर की एड़ी टिकी हुए हों। गर्दन को बाई ओर घुमाकर रखें। इसी तरह से बाई और से भी आसन करें।

लाभ : कमरदर्द,सर्वाइकल(Cervical), स्पोंडोलाइटिस,स्लिपडिस्क(SLEEPDISC),सियाटिका(SIYATIKA) में विशेष लाभकारी हैं। पेटदर्द(Abdominal pain),दस्त(diarrhea),कब्ज(constipation) एवं गैस को दूर करता है। नितम्ब(hip), जोड़ो(joint) के दर्द में लाभकारी है।

 

कर्ण पीडासन

'कर्ण' का अर्थ है 'कान', 'पीड' का अर्थ है 'दबाना'। इस आसन में घुटनों द्वारा दोनों कान दबाए जाते हैं। इसलिए इस आसन का नाम 'कर्णपीड़ासन' है।

Karnapidasana

विधि : स्वच्छ व हवादार स्थान पर कम्बल या दरी बिछा लीजिए। पीठ के बल सीधे लेट जाइए। धीरे-धीरे दोनों पैरों को सिर के पीछे ले जाइए। पहले दोनों पैर सिर के पीछे सीधे हलासन की स्थिति में रखिए घुटनों से पैरों को मोड़िए दोनों कानों के साथ सटाइए। दोनों घुटनों से कानों को दबाइए। हाथ सीधे रखते हुए हथेलियां जमीन की तरफ रखिए।

लाभ : कर्ण पीड़ासन पीठ, कमर, गर्दन, मेरुदण्ड तथा कानों को सबल बनाता है। जिगर, स्पलीन तथा पेट के अन्य रोगों में भी लाभप्रद है। मधुमेह तथा हार्निया के रोगों के लिए भी उपयोगी है। शरीर के सभी जोड़ों को सबल बनाता है। निम्न रक्तचाप के लिए लाभप्रद है।

सावधानी : उच्च रक्तचाप हृदय रोग के रोगियों को कर्ण-पीड़ासन नहीं करना चाहिए। पैरों को झटके से न ले जाकर धीरे-धीरे ले जाना चाहिए। वापस भी धीरे-धीरे आना चाहिए। अन्यथा हानि होने की सम्भावना है।

नोट : योग प्रशिक्षक के निर्देशन में ही अभ्यास करें अन्यथा विपरीत परिणाम भुगतने पड़ सकते है।

About the author

Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

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