योगासन

योगासन

yoga

योग के करने की क्रियाओं व आसनो को योगासन(Yogasan) कहते है|

योगासनों के लाभ

योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।

योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है। योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है।

आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है। अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल वाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, जब कि योगसन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।

आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं। आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

आसन 

आसन की सिद्धि से नाड़ियों की शुद्धि, आरोग्य की वृद्धि एवं स्फूर्ति प्राप्त होती है।  पतंजलि ने अपने रचित  योगसूत्र में लिखा है "स्थिरं सुखम आसनम" चित्त को स्थिर रखने वाले तथा सुख देने वाले बैठने के प्रकार को आसन कहते हैं।योग की आठ मंजिलो में  तीसरी एवं महत्वपूर्ण  मंजिल है अर्थात तीसरी मंजिल को लिए पहली व् दूसरी मंजिल को प्राप्त करना अनिवार्य है नहीं तो आसन की सिद्धि पूर्ण रूप से नहीं हो  सकेगी।

आसन को करने व उसके मुद्राओं के आधार पर इसका वर्गीकरण किया गया है।

1. सूक्ष्म आसन : सूक्ष्म आसन या व्यायाम (अंग संचालन) के बाद ही योग के आसनों को किया जाता है। योग प्रारम्भ करने के पूर्व अंग-संचालन करना आवश्यक है। इससे अंगों की जकड़न समाप्त होती है तथा आसनों के लिए शरीर तैयार होता है।

आसनों को सीखना प्रारम्भ करने से पूर्व कुछ आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना जरूरी है। आसन प्रभावकारी तथा लाभदायक तभी हो सकते हैं, जबकि उसको उचित रीति से किया जाए। आसनों को किसी योग्य योग चिकित्सक की देख-रेख में करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

2. हाथों के व्यायाम

  • हाथ की  ऊँगलीओ  के (अंगुली नमन)
  • कलाई का (मणिबंध)
  • कोहनी का
  • कंधे का (स्कन्ध चक्र)
  • सम्पूर्ण हाथों का

3. ग्रीवा (गर्दन) संचालन

4. पैरों का व्यायाम

  • पाद अंगुली नमन
  • पाद नमन
  • पाद चक्र
  • जानू चक्र
  • जानू  नमन
  • श्रोणी चक्र
  • अर्ध तितली
  • पूर्ण  तितली

बैठ कर किये जाने वाले आसन जैसे :

पद्मासन, वज्रासन, सिद्धासन, मत्स्यासन, वक्रासन, अर्ध-मत्स्येन्द्रासन, गोमुखासन, पश्चिमोत्तनासन, जानुशिरासन, मंडूकासन, शशकासन, योगमुद्रासन, बलासन, भद्रासन, बंध कोणासनबद्ध-पद्मासन, पर्वतासन, गर्भासन, आकर्ण धनुरासन आदि।

खडे  होकर किये जाने वाले आसन जैसे :

ताड़ासन, अर्ध चंद्रासन, चक्रासन, उर्ध्व उत्थान आसन, नटराज आसन, एकपादासन, उत्कटासन, उत्तानासन, वृक्षासन, वीरभद्रासन, त्रिकोणासन आदि |

पीठ के बल लेट कर किये जाने वाले आसन जैसे :

हलासन, सर्वांगासन,पवनमुक्तासन, नौकासन, शवासन, सुप्त वज्रासन, सेतुबंध आसन, उत्तानपादासन, मर्कटासन, कटिपिण्डमर्दनासन, पादोत्तानासन, कर्ण पीडासन आदि |

पेट के बल लेट कर किये जाने वाले आसन जैसे : 

मकरासन, धनुरासन, भुजंगासन, शलभासन, विपरीत नौकासन, पृष्ठतानासन आदि।

अन्य आसन :

मयुरासन, वृश्चिकासन, अनुलोम विलोम प्राणायाम, कपाल भाति प्राणायाम, मलासनकुंभकासन, पादांगुष्ठासन, सूर्य नमस्कार, कुक्कुटासन आदि।

आसनो को करने से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण शब्दों की जानकारी आवश्यक है :

रेचक - का अर्थ है श्वास छोड़ना।

पूरक - का अर्थ है श्वास भीतर लेना।

कुम्भक - का अर्थ है श्वास को भीतर या बाहर रोक देना। श्वास लेकर भीतर रोकने की प्रक्रिया को आन्तर या आभ्यान्तर कुम्भक कहते हैं। श्वास को बाहर निकालकर फिर वापस न लेकर श्वास बाहर ही रोक देने की क्रिया को बहिर्कुम्भक कहते हैं।

चक्र - चक्र, आध्यात्मिक शक्तियों के केन्द्र हैं। स्थूल शरीर में चर्मचक्षु से वे दिखते नहीं, क्योंकि वे हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित होते हैं। फिर भी स्थूल शरीर के ज्ञानतन्तु, स्नायु केन्द्र के साथ उनकी समानता जोड़कर उनका निर्देश किया जाता है।

हमारे शरीर में ऐसे सात चक्र मुख्य हैं।

1. मूलाधार(Mooladhar) - गुदा के पास मेरूदण्ड के आखिरी मनके के पास होता है।

2. स्वाधिष्ठान(Swadhishtan) - जननेन्द्रिय से ऊपर और नाभि से नीचे के भाग में होता है।

3. मणिपुर(Manipur) - नाभिकेन्द्र में होता है।

4. अनाहत(Anahath) - हृदय में होता है।

5. विशुद्ध(Vishudh) - कण्ठ में होता है।

6. आज्ञाचक्र(Agya Chakra) - दो भौहों के बीच में होता है।

7. सहस्रार(Sahastra) - मस्तिष्क के ऊपर के भाग में जहाँ चोटी रखी जाती है, वहाँ होता है।

नाड़ी - प्राण वहन करने वाली बारीक नलिकाओं को नाड़ी कहते हैं। उनकी संख्या 72000 बतायी जाती है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन मुख्य हैं। उनमें भी सुषुम्ना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

About the author

Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

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