शिव स्तुति

वीरेरस्तोत्राम

Shiv

एकं ब्रैवाद्वितीयं समस्त्तम्, सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किति्।

एको रुो न द्वितीयोवतस्थे, तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम्।।1।।

 

यह दिखलाई देने वाला समस्त अद्वितीय जगत् एक भ्रम ही है, यह सच है कि यहाँ कुछ भी भेद या द्वैत नहीं है, क्योंकि यहाँ सभी जगह सर्वत्र एक रुद्र ही स्थित है | कोई द्वितीय तत्व नहीं दिखलाई देता है, इसलिए मैं उस अद्वितीय महेश शिव की शरण में जाता हूँ।

 

एक: कर्ता त्वंहि सर्वस्य शम्भो? नानारूपेष्वेकरूपोप्यरूप:।

यद्वत् प्रत्यक्पूण एकोप्यनेक:, तस्माान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये।।2।।

 

हे शम्भो, एक अद्वितीय तुम ही इस सारे संसार के कर्ता हो, क्योंकि अनेक रूपों, जीवों में एक रूप चैतन्यस्वरूप होते हुए भी, आप रूप रहित हैं, अर्थात् निराकार हैं। जिस प्रकार आप अनेक में एक हैं, उसी प्रकार चैतन्यात्मना एक होते हुए भी जीवरूप में नाना हैं, इसीलिए ईश्वर रूप आप के सिवाय और किसकी शरण में जाऊँ?

 

रज्जौ सर्प: शुत्तिफकायां च राप्पम्, पय: पूरस्तन्मृगारव्ये मरीचौ।

यद्वत्तद्वद् विष्वगेव प्रपो, यस्मिाज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम्।।3।।

 

जिस प्रकार रज्जु के ज्ञान हो जाने पर फिर सर्प का भान नहीं होता है, और शुत्तिफका के ज्ञान हो जाने पर फिर रजत का भान नहीं होता है, तथा मृगमरिचिका के ज्ञान हो जाने पर जल प्रवाह की भ्रान्ति नहीं होती है, इसी प्रकार आनन्दस्वरूप महेश के ज्ञान हो जाने पर, उसी में कल्पित इस सारे संसार का भी भान नहीं होता है, इसीलिए उस महेश की ही शरण में मैं जाता हूँ।

 

तोये शैत्यं दाहकत्वं च वौ, तापो भानौ, शीतभानौ प्रसाद:।

पुष्पे गन्धे दुग्ध्मये च सखप:, यत्ततच्छम्भो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये।।4।।

 

हे शम्भो, जिस प्रकार जल में शीतलता, अग्नि  में दाहकता, सूर्य में ताप और चन्द्रमा में प्रसता, सुन्दरता पुष्प में गंध, तथा दूध् में घी सर्वत्र व्याप्त है, उसी प्रकार आप भी इस समस्त संसार में व्याप्त हैं, इसीलिए मैं आपकी शरण में जाता हूँ।

 

शब्दं गृास्श्रवास्त्वं हि जिघ्ने, रघ्राणस्त्वं व्यंघ्रिरायासि दूरात्।

व्यक्ष: पश्येस्त्वं रसज्ञोप्यजि:, कस्त्वां सम्यग् वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये।।5।।

 

हे शम्भो! आप स्वयं अश्रवा–कर्ण रहित होकर भी सब कुछ सुन लेते हो, बिना नाक के भी सब कुछ सूँघ लेते हो, चरण रहित होकर भी दूर से पास आ जाते हो, और स्वयं नेत्र हीन होते हुए भी सब कुछ देखते हो, जिह्वा रहित होकर भी परम रसज्ञ हो, इस प्रकार के विलक्षण व्यापार वाले परम चैतन्य स्वरूप आपको कौन जान सकता है, अर्थात् बिना आपकी कृपा के आपको जानना मुश्किल है, इसलिए मैं आपकी ही शरण में आता हूँ।

 

नो वेदस्त्वामीश साक्षाद्विवेद, नो वा विष्णुर्नो विधताखिलस्य।

नो योगीन नेन्मुख्या देवता, भत्तफो वेदस्त्वामतस्त्वां प्रपद्ये।।6।।

 

हे भगवान्! आपको ब्रह्मा भी साक्षात् नहीं जानते हैं, और सम्पूर्ण जगत् के विधाता – पालक विष्णु भी आपको नहीं जानते हैं, और योगीन्द्र - श्रेष्ठ योगीजन भी आपको नहीं जानते हैं, जिनमें इन्द्र प्रमुख है, ऐसे देवता लोग भी आपको नहीं जान सकते है, केवल भक्त ही निर्मल भक्ति से आपको जान सकते हैं, अत: मैं भी आपका भक्त बन कर ही आपकी शरण में आता हूँ।

 

नो ते गोत्रां नेश जन्मापि नाख्या,नो वा रूपं नैव शीलं न देश:।

इत्थंभूतोपीरस्त्वं त्रिालोक्या:,सर्वान् कामान् पूरयेस्तद् भजे त्वाम्।।7।।

 

हे भगवान्, आपका कोई न तो गोत्र है, न जन्म और न नाम, रूप आदि कुछ नहीं है, न शील है और न कोई देश है, अर्थात् आप जन्म जाति देश काल आदि सीमा से परे है, यह सब होते हुए भी, आप तीनों लोकों के स्वामी हैं, अत: आप मेरे मनोरथों को पूर्ण करने में सर्वथा समर्थ हैं, इसीलिए मैं आपका भजन करता हूँ।

 

त्वत्त: सव त्वं हि सव स्मरारे?

त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोतिशान्त:।

त्वं वै शु(स्त्वं युवा त्वं च बाल

स्तत्त्वं यत्ति्कं नास्त्यतस्त्वां नतोस्मि।।8।।

 

हे स्मरहर, महेश, यह सब दृश्यमान जगत् आपसे ही उत्पन हुआ है, अत: सारा जगत् शिवमय है, आप जगत जननी पार्वती के ईश–पति हैं, आप दिगम्बर तथा शान्त स्वरूप वाले हं। आप ही विशु( चेतनरूप हैं, आप ही युवा व बाल रूप वाले भी हैं, संसार की कौन सी ऐसी वस्तु है, जिसमें आप न हों, अर्थात् सत्तात्मकरूप से आप सर्वत्रा व सभी वस्तुओं में हैं, अत: आपको मैं प्रणाम करता हूँ।

 

स्तुत्वेति विप्रो निपपात भूमौ, स दण्डवद्यावदतीव हृ:।

तावत् स बालोखिलवृवृ, प्रोवाच भूदेव, वरं वृणीहि।।9।।

 

वह ब्राह्मण इस प्रकार भगवान् शंकर की स्तुति करके, अत्यन्त प्रसन्न होकर ज्यों ही दण्डवत्–प्रणाम करने के लिए जमीन में लेटा, त्यों ही समस्त वृक्षों के भी वृक्ष( बालरूप धरण किए हुए भगवान् शंकर प्रकट होकर बोले कि हे भूदेव: ब्राणदेवता? कोई वर माँगो।

 

तत उत्थाय हृात्मा मुनिखवानर: कृती।

प्रत्यब्रवीत् किमज्ञातं सर्वज्ञस्य तव प्रभो?।।10।।

 

तदनन्तर प्रसमना, कृतकृत्य, मुनि विद्वान उठकर बोले, हे प्रभो, सर्वज्ञ आप से अज्ञात क्या है, अर्थात् आप जब सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान सबके अन्त:करण में विराजमान हैं, तो फिर आपसे कोई भी बात छिपी नहीं है।

 

सर्वान्तरात्मा भगवान्, सर्व: सर्वप्रदो भवान्।

याचां प्रति नियुंत्तफे, मां किमीशो दैन्यकारिणीम्।।11।।

 

हे प्रभो, आप सर्वान्तरात्मा व भगवान् छ प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं | आप सुखस्वरूप और सभी को सब कुछ देने वाले हैं, अत: स्वयं समर्थ होकर भी, दीनता प्रकट करने वाली याचना के प्रति मुझे क्यों प्रेरित कर रहे हैं।

 

इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवो विा नरस्य ह।

शुचे: शुचिव्रतस्याथ शुचिस्मित्वाब्रवीच्छिशु:।।12।।

 

इसके बाद बालकरूप वाले, देव भगवान् शंकर, पवित्रा तथा पवित्राव्रत वाले उस ब्राण विप्र वानर के इस प्रकार के वचन को सुनकर, कुछ हंसकर बोले, इनका यह इषद् हास्य उस समय अतिरमणीय मालूम पड़ता था।

 

बाल उवाच

 

बालकरूप भगवान् शंकर तब इस प्रकार बोले–

 

त्वया शुचे शुचिष्मत्यां योभिलाष: कृतो हृदि।

अचिरेणैव कालेन स भविष्यत्शंशयम्।।13।।

 

हे पवित्राात्मन् ब्राह्मण देवता, शुचिष्मती नगरी में तुमने अपने हृदय में जिस मनोरथ को धरण किया है, वह शीघ्र ही सम्पन्न होगा, इसमें कोई सन्देह न करना।

 

तव पुत्रात्वमेष्यामि शुचिष्मत्यां महामते?

ख्यातो गृहपतिर्नाम्ना शुचि: सर्वामरप्रिय:।।14।।

 

हे महामति, विप्र, शुचिष्मती नगरी में मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण करूँगा, तब अत्यन्त सुन्दर स्वरूप मैं सभी देवताओं का प्रेम पात्र  होता हुआ, गृहपति नाम से प्रसिद( होऊंगा )

 

अभिलाषाकं पुण्यं स्तोत्रामेतन्मयेरितम्।

अब्दं त्रिाकालपठनात् कामदं शिवसधिै।।15।।

 

मेरे द्वारा कहे गये, इस पवित्र अभिलाषा का एक वर्ष तक लगातार भगवान् शंकर के समीप में पाठ करने से, मनुष्य अपनी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

 

एतत्स्तोत्रास्य पठनं पुत्रापौत्राध्नप्रदम्।

सर्वशान्तिकरं वापि सर्वापत्यरिनाशनम्।।16।।

 

इस स्तोत्र का पाठ, पुत्र, पौत्रा व धन धान्य को देने वाला है, सभी प्रकार की शान्ति प्रदान करता है, और सभी प्रकार की आपत्तियों को तथा शत्राुओं को भी नष्ट करता है।

 

स्वर्गापवर्गसम्पत्तिकारकं नात्रा संशय:।

प्रातरुत्थाय सुातो लिमभ्यच्र्य शाम्भवम्।।17।।

 

प्रात:काल उठकर, अच्छी तरह स्नान कर, तदनन्तर शिवलिंग की पूजा करके, जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह स्वर्ग तथा अपवर्ग मोक्ष रूप सम्पत्ति को प्राप्त करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

 

वष जपदिं स्तोत्रामपुत्रा: पुत्रावान् भवेत्।

वैशाखे काखतके माघे विशेषनियमैयु‍र्त:।।18।।

 

इस स्तोत्र को यदि अपुत्रा एक वर्ष पर्यन्त पाठ करे, तो पुत्र को प्राप्त करे, यदि वैशाखमास, कार्तिकमास व माघमास में विशेष नियमों का पालन करते हुए स्नान के समय, इस स्तोत्र का पाठ करे, तो सभी प्रकार के प्रफलो को प्राप्त करता है।

 

य: पठेत् सनसमये, स लभेत सकलं पफलम्।

काखतकस्य तु मासस्य प्रसादादहमव्यय:।।19।।

 

कार्तिक तक के महीने में यदि स्तोत्र का पाठ तुम करोगे, तो, मैं प्रसन्नता से तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा।

 

तव पुत्रात्वमेष्यामि यस्तवन्यस्तत् पठिष्यति।

अभिलाषकमिदं न देयं यस्य कस्यचित्।।20।।

 

अन्य जो कोई भी भक्त इस स्तोत्रा का पाठ करे, तो वह पूर्व उक्त फल को प्राप्त करे, अत: इस अभिलाश को जिस किसी को नहीं देना चाहिए, अर्थात् अधिकारी को ही इसका पाठ करना चाहिए। इस स्तोत्र  को सर्वथा गोपनीय रखना चाहिए।

 

गोपनीयं प्रयत्नेन महावन्धप्रसूतिकृत्।

स्त्रिाया वा पुरुषेणापि नियमासिधिै।।21।।

 

गोपनीय इस स्तोत्र का पाठ महावन्याओं को भी पुत्र प्रदान करता है। शिवलिंग के समीप, नियमपूर्वक स्त्राी या पुरुष यदि एक वर्ष इसका पाठ करे, तो पुत्र को प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

 

अब्दं जप्तमिदं स्तोत्रां पुत्रादं नात्रा संशय:।

इत्युक्त्वान्तर्दध्े बाल:, सोपि विप्रो गृहं ययौ।।22।।

 

वह बालरूप शंकर इस प्रकार कहकर अन्तर्धान हो गए, वह ब्राह्मण भी अपने घर को चल दिया।

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Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma’s Devotional Facts at Only One Roof.

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