पौराणिक कथाएं

वट सवित्री व्रत कथा

मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नि सहित सन्तान के लिये सावित्रीदेवी का विधि पूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने पर वर प्राप्तकिया । सर्वगुण देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घरकन्या के रूप मे जन्म लिया ।

vat-savitri-katha

कन्या के युवा होने पर अश्वपति नेअपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दियासावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसेउसी दिन देवर्षि नारद उनके यहाँ पधारे नारदजी ने पूछने परसावित्री ने कहा,”महाराज द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्तिसुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है”।

नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहो की गणना कर अश्वति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणो की भूरि-भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान कि मृत्यु हो जायेगी । नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुर्झा गया उन्होने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परन्तु सावित्री ने उतर दिया,”आर्य कन्या होने के नाते जब मै सत्यवान का वरण कर चुकी हूँ तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दिर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने ह्वदय मे स्थान नही दे सकती।” सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञातकर लिया दोनो को विवाह हो गया ।

सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल मे रहने लगी । नादरजी द्वारा बताय हुये दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारद द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकडी काटने के लिये चला तो सास-श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी । सत्यवान वन में पहुँचकर लकडी काटने के लिए चढा ।

वृक्ष पर चढने के बाद उसके सिर में भंयकर पीडा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड के पेड के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जाँघ पर रख लिया । देखते ही देखते यमराज ने ब्र्रह्या के विधान के रूप रेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणो को लेकर चल दिये (कही-कही ऐसा भी उल्लेख मिलता हैं कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डस लिया था) सावित्री सत्यावान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे पीछे चल दी ।

पीछे आती हुई सावित्री को यमराज  ने उसे लौट जाने का आदेश दिया । इस पर वह बोली महराज जहा पति वही पत्नि । यही धर्म है, यही मर्यादा है । सावित्री के धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले पति के प्राणो से अतिरिक्त कुछ भी माँग लो । सावित्री ने यमराज  से सास-श्वसुर के आँखो ज्योती और दीर्घायु माँगी । यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ गए सावित्री भी यमराज का पीछा करते हुये रही ।

यमराज  ने अपने पीछे आती सावित्री से वापिस लौटे जाने को कहा तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन के कोई सार्थकता नही । यमराज  ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान माँगने के लिये कहा इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापिस दिलाने की प्रार्थना की ।

तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिए सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही इस बार सावित्री ने सौ पुत्रो का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं पुत्रो का वरदान दिया है पर पति के बिना मैं माँ किस प्रकार बन सकती हूँ, अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए। सावित्री की धर्मनिष्ठा,ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणो को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया । सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुँची जहाँ सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुँची जहाँ सत्यवान का मृत शरीर रखा था ।

सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा । प्रसन्नचित सावित्री अपने सास-श्वसुर के पास पहुँची तो उन्हे नेत्र ज्योती प्राप्त हो गई इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हे मिल गया आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रो की माता बनी । इस प्रकार चारो दिशाएँ सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की किर्ति से गूँज उठी ।

About the author

Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

क्या आपको हमारी पोस्ट पसंद आयी ?

error: Content is protected !!