जीवन मंत्र

कुछ अनमोल बाते जो बना सकती है आपके जीवन को खुशहाल

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सफलता दिल सकती है ये शक्ति :

किसी ने सही कहा है कि कोई भी काम बेकार नहीं जाता है। यानी हम जितनी मेहनत करेंगे। उसका फल किसी न किसी रूप में जरूर मिलेगा। फर्क इतना है कि कुछ लोग इस बात पर विश्वास करते हैं कुछ नहीं। और कुछ लोग नहीं। लेकिन जो लोग विश्वास करते हैं वह विश्वास की शक्ति से अपने लक्ष्य को पा सकता है।

यही सफलता और असफलता के बीच का फर्क है

जिसे हम विश्वास या आत्मविश्वास कह सकते है क्योकि सारा खेल विश्वास का ही है। विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को पत्थरदिल। इस बात को लेकर कई तरह की प्रेरक कहानियां लिखी गईं हैं।

जिनका मूल यही है। हमें विश्वास की शक्ति को पहचानने में देर नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जिस दिन आप विश्वास की शक्ति को पहचान कर उस पर अमल करना शुरू कर देंगे। उस दिन से अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ने लगेंगे।

ह्दय परिवर्तन होता है सहिष्णुता से :

दशकों पहले स्वामी दयानद गंगा नदी के किनारे रहते थे। वहां वह चिंतन करते थे। वहां अन्य साधु रहते थे। वह उनकी इस साधना से ईर्ष्या करते थे। उन्हें लगता था कि दयानंद उनके प्रभाव को कम न कर दें।

इस बात से नाराज होकर सभी साधुओं ने दयानंद जी को भला-बुरा कहा। लेकिन उन्होंने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। अब वह साधु रोज उनकी निंदा करते और वो कुछ न कहते।

एक दिन जब स्वामी दयानंद भोजन करके अपने स्थान से उठ रहे थे तभी एक सेठ ताजे फल लेकर आया। स्वामी जी ने ये फल उन निंदा करने वाले साधुओं के लिए भिजवा दिए।

यह सब घटनाक्रम के बाद वह साधु बहुत लज्जित हुए। वह स्वामी दयानंद के पास गए और उसे अपने बर्ताब के लिए क्षमा याचना की।

संक्षेप में :

यदि आप सहिष्णु रहते हैं तो आप कठोर लोगों का ह्दय परिवर्तन कर सकने की क्षमता रखते हैं।

न गवाये समय ऐसी बातों में :

भगवान बुद्ध समय की महत्ता को बेहद अच्छी तरह से जानते थे। वह अपना हर क्षण कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे। एक बार उनके पास एक व्यक्ति आया और बोला, तथागत आप हर बार विमुक्ति की बात करते हैं। आखिर यह दुःख होता किसे है? और दुःख को कैसे दूर किया जा सकता है?

प्रश्नकर्ता का प्रश्न निरर्थक था। तथागत बेतुकी चर्चा में नहीं उलझना चाहते थे। उन्होंने कहा, 'अरे भाई! तुम्हें प्रश्न करना ही नहीं आया। प्रश्न यह नहीं था कि दुःख किसे होता है बल्कि यह कि दुख क्यों होता है?'

और इसका उत्तर है कि आप निरर्थक चर्चाओं में समय न गवाएं ऐसा करने पर आपको दुःख नहीं आएगा। यह बात ठीक उसी तरह है कि किसी विष बुझे तीर से किसी को घायल कर देना और फिर बाद में उससे पूछना कि यह तीर किसने बनाया है? भाई उस तीर से लगने पर उसका उपचार जरूरी है न की निरर्थक की बातों में समय गंवाना।

संक्षेप में

कई लोग, कई तरह की बेतुकी बातों में समय को पानी की तरह बहा देते हैं बहते पानी को तो फिर भी सुरक्षित किया जा सकता है लेकिन एक बार जो समय चला गया उसे वापिस कभी नहीं लाया जा सकता। इसलिए समय को सोच समझ कर खर्च करें। यह प्रकृति की दी हुई आपके पास अनमोल धरोहर है।

परिस्थितियां हमेशा बदलती हैं :

एक बार भगवान बुद्ध कहीं जा रहे थे। वह पैदल यात्रा कर रहे थे, इस कारण थक कर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उनके साथ उनके अन्य शिष्यों के साथ आनंद भी मौजूद थे। भगवान बुद्ध ने कहा, 'आनंद यहां नजदीक एक झरना है, वहां से जल ले आओ।'

आनंद झरने के पास पहुंचा, लेकिन वहां गंदा पानी बह रहा था। उन्होंने पानी भरना ठीक नहीं समझा। वह थोड़ा देर रुके और पानी साफ हो गया। उन्होंने साफ पानी कमंडल में भरा। और बुद्ध के पास चल दिए।

उन्होंने सारा घटनाक्रम तथागत को सुनाया। तब बुद्ध ने कहा, 'आनंद प्रकृति को देखो, परिस्थिति को नहीं। परिस्थिति बदल जाती है, लेकिन प्रकृति स्थिर रहती है। जैसा कि तुमने देखा किस तरह झरने का गंदा जल थोड़ी देर बाद स्वच्छ हो गया।'

संक्षेप में

मनुष्य की भी यही स्थिति है। झरने के पानी की तरह मनुष्य भी बदलता है। मनुष्य हमेशा अपने स्वभाव के अनुरूप वहीं नहीं रहता बल्कि वह बदलता है। यही सनातन नियम है।

किसी को भी कमतर न आंके:

एक बार चौड़े रास्ते ने पगडंडी से कहा, 'मुझे लगता है कि तुम मेरे आसपास ही चलती हो।' पगड़ंगी ने विनम्रता से कहा, 'नहीं मालूम, तुम्हारे रहते लोग मुझ पर ही चलना क्यों पसंद करते हैं। जब कि मैं तुमसे काफी छोटी हूं।'

उसी समय संयोगवश एक वाहन आकर रुका। सामने एक छोटा सा पुल था। जिस पर बोर्ड लगा हुआ था कि, 'पुलिया क्षतिग्रस्त है, बड़े वाहन यहां से न ले जाएं।' उस बस में बहुत से लोग बैठे हुए थे। उसके चालक ने उनसे उतरने के लिए कहा। लोग पगडंडी के सहारे दूसरी ओर चल दिए। इस तरह बस उस पुलिया से गुजरी और यात्रियों को लेकर रवाना हो गई।

रास्ता और पगडंडी ये दोनों घटना क्रम देख रहे थे। तब रास्ते ने कहा, 'आज में समझ गया कि समय आने पर छोटी से छोटी वस्तु भी कितनी उपयोगी हो जाती है।'

संक्षेप में

सुई का काम सुई और तलवार का काम तलवार ही कर सकती है। यानी आप सुई से युद्ध नहीं लड़ सकते और न ही तलवार से कपड़े सिल सकते हैं। कहने का आशय यह है कि किसी भी वस्तु को कमतर नहीं आंकना चाहिए।

फिर चाहे वो सजीव हो या निर्जीव। कभी-कभी छोटी वस्तु भी वो कमाल करती है, जो बड़ी वस्तु चाहकर भी न कर सकती हो।

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