भक्ति

जानिये आपके पुनर्जन्म में किये गए कार्यो और पुनर्जन्म के संकेत

rebirth

rebirth से अर्थ उस जन्म से है जो आपको आपके इस जन्म से पहले मिला था और कहा जाता है कि हमे इस जन्म में जो भी सुख या दुःख मिलता है उसका आधार हमारा पूर्व जन्म और पूर्व जन्म में किये हुए हमारे कार्य ही होते है. अगर हमने अपने पूर्व जन्म में अच्छे कार्य किये है तो इस जन्म में हमे सुख की प्राप्ति होगी और यदि हमने अपने पूर्व जन्म में बुरे कार्य किये है या किसी को कोई कष्ट दिया है तो हमे इस जन्म में दुखो का सामना करना पड़ेगा. इसलिए जब भी हम किसी मुसीबत में पड़ते है या हमें कोई परेशानी होती है तो हम अपने पिछले / पूर्व जन्म में बारे में सोचने लगते है कि आपने अपने पिछले जन्म में ऐसा क्या किया था जिनकी सजा आपको भगवान आपके इस जन्म में दे रहा हा और जिनकी वजह से आपको इस जन्म में दुःख देखना पड़ रहा है.

rebirth

अगर आप भी अपने पिछले जन्म में बारे में और पिछले जन्म में किये गये कार्यो के बारे में जानना चाहते है तो आप इसके लिए lal kitab hindi की सहायता ले सकते हो. लाल किताब में हमारे पिछले जन्म से सम्बंधित हमारे सभी सवालों के जवाब के बारे में बताया गया है. उन्ही सवालों में से कुछ सवालों के जवाब हम भी देने का प्रयास कर रहे है और ये बताने की कोशिश कर रहे है कि पिछले जन्म में किये गये आपके इन कार्यो के  क्या परिणाम आपको इस जन्म में झेलने पडेंगे.

अगर आपने सरकारी कार्यो को करते हुए बेईमानी का सहारा लिया है तो उसके परिणाम : लाल किताब में हमारे पिछले जन्म की बातो को कुंडली के आधार पर बताया गया है तो लाल किताब के हिसाब से आपके पिछले जन्म के कार्यो को कुंडली के आठवे घर के जरिये जाना जा सकता है. अगर आप इस जन्म में अपने जन्म स्थान से दूर दुखो को भोग रहे है और आपको एक संघर्ष पूर्ण जीवन बिताना पड़ रहा है तो आपकी कुंडली के आठवे घर में सूर्य का वास अवश्य मिलेगा, आठवे घर में सूर्य के वास की वजह से ही आपको ऐसे दुखो को झेलना पड़ता है.

शुभ कार्यो के लिए लाल किताब

और इसका ये अर्थ है कि आपने अपने पूर्व जन्म में किसी बेकसूर व्यक्ति को सताया है और उसको दुःख दिया है. क्योकि आपने अपने पूर्व जन्म में सरकारी कार्यो को करने के लिए या सरकारी पद पर रहकर बेईमानी की है तो हो सकता है कि आपको इस जन्म में सरकारी दंड झेलना पड़े और आपको आपके  सरकारी कार्यो को करते वक़्त मुसीबतों का सामना करना पड़े.

बहुत प्रयास करने पर भी बार – बार असफलता के हाथ में आने के कारण : इस स्थिति का कारण गुरु का अशुभ स्थिति में होंना है. आपकी कुंडली के आठवे घर में विराजमान गुरु की स्थिति अगर अशुभ है तो आप कितना भी प्रयास कर ले आपको कभी सफलता प्राप्त नही हो सकती. ऐसे व्यक्तियों को उनके द्वारा किये गये परिश्रम का फल भी नही मिलता और न ही उनके सम्मान और यश में कोई वृद्धि हो पाती है. बल्कि इनको अपने संतान सुख से भी वंचित रहना पड़ता है.

hindu astrology  में इसका कारण लिखा है कि जो व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने माता – पिता, गुरु या शरण में आये व्यक्ति को सम्मान नही देता और उसका अनादर करता है, उन्हें धोखा देता है उस व्यक्ति को इन सब संकटो का सामना करना पड़ता है क्योकि गुरु इन लोगो की कुंडली के आठवे घर में विराजमान होकर इनको इनके किये हुए कार्य का दंड देता है.

किसी दुसरे द्वारा की हुई गलती पर आपको सजा मिलने का कारण : शनि देव जिनको ज्योतिष शास्त्र में न्यायकर्ता का दर्जा मिला हुआ है अगर वे आपकी कुंडली के आठवे घर में विराजमान हो जाये तो शनि देव आपको आपके किये गये हर गलत कार्य का उचित और न्यायपूर्ण दंड देते है. ऐसी स्थिति में अगर आप किसी दुसरे के द्वारा किये गये कार्य का दंड भोग रहे है तो ये दंड आपको आपके पूर्व जन्म में किसी लाचार व्यक्ति को सताने के कारण मिलता है. जो जो व्यक्ति शराब पीते है और पराई स्त्री के साथ अपने सम्बन्ध रख कर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नही करते, ऐसे व्यक्तियों को शनि देव ये दंड देते है. ऐसे व्यक्तियों को अधकारियो से भी दंड प्राप्त होता है, उन्हें हर जगह बार बार अपमान का सामना करना पड़ता है, ऐसे लोग संपत्ति से सम्बंधित विवादों में भी उलझे रहते है और अगर ऐसे व्यक्ति अधिक परिश्रम करके सफलता प्राप्त कर भी लेते है तो उनकी ये सफलता ज्यादा दिनों तक नही टिक पाती और उन्हें दुबारा दंड का सामना करना पड़ता है.

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अगर आपने अपने पूर्व जन्म में अपने जीवन साथी को सताया है तो उसके परिणाम : ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारे वैवाहिक जीवन और हमारे भौतिक जीवन के सुखो के लिए शुक्र जिम्मेदार होता है. अगर शुक्र आपकी कुंडली के आठवे घर में विराजमान है तो आपके वैवाहिक जीवन के लिए उनका खुश होना अत्यंत जरूरी है. तभी आपका दांपत्य जीवन सुखद हो पता है और इसके साथ साथ आपको धन और वैभव की भी प्राप्ति होती है, किन्तु वे लोग जिन्होंने आने पूर्व जन्म में आने जीवनसाथी को सताया है या अपने जीवन साथी के होते हुए कोई नाजायज संबंध रखा है ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में शुक्र नाराज़ होकर उनकी कुंडली के आठवे घर में बैठ जाता है और ऐसे लोगो को सज़ा देता है. जिसके परिणाम स्वरूप ऐसे लोगो को अपने धन के लालच की वजह से समाज में अपमानित होना पड़ता है और अपना दांपत्य जीवन भी कष्ट में हे बिताना पड़ता है.  ऐसे व्यक्तियों को कभी भी उनके प्रेम में सफलता नही मिलती.

गृहस्थ सुख और लाल किताब

इन सब परिणामो को पढ़ कर आप समज सकते है कि आपके पिछले जन्म के बुरे कार्य ही इस जन्म में आपके दुखो का कारण बनते है और आपको आपकी कुंडली के आठवे घर के महत्व का भी जरुर पता चला होगा जिसमे आपके सभी ग्रहों का शुभ स्थिति में होना जरूरी है तभी आपका जीवन सुख से व्यतीत हो पता है. और आपको अपने सभी ग्रहों को शुभ रखने के लिए सिर्फ अच्छे काम करने की जरूरत है क्योकि आपके अच्छे कार्य ही आपके न सिर्फ इस जीवन बल्कि आपके अगले जीवन में सुखो को भर सकते है.

ग्रहों की चाल के अनुसार करे रत्नों को धारण
विभिन्न ग्रहों के मंत्र

पुर्नजन्म के संकेत – मनुष्य की मृत्यु के 13 दिन बाद उसके अगले जन्म के बारे में जानकारियां मिल सकती है जैसेकि उसका अगला जन्म कब और कहाँ होगा. इसके लिए आपको उस मनुष्य की पुण्य चक्र को बनवाना होगा. इसे आप उस मनुष्य की मृत्यु के समय बनवा सकते है उसे भी कुंडली ही कहा जाता है और उसी का नाम पुण्य चक्र है.

जातक – पारिजात में मृत्युपरांत गति के बारे मे भी बताया गया है, उसके अनुसार अगर मनुष्य के मरण काम में लग्न में सूर्य या मंगल हो तो उसकी गति मृत्यलोक में होगी, यदि लग्न में मरण काल में लग्न में गुरु हो तो जातक की गति देवलोक में होती है, लग्न में अगर चंद्रमा या शुक्र है तो उसकी गति पितृलोक में होगी और यदि लग्न में बुध या शनि हो तो नर्क लोक में जाता है. लेकिन जातक के बाहरवें स्थान में शुभ ग्रह हो, द्वादशेश ग्रह बलवान होकर शुभ ग्रह से दृष्टि हो तो जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है. साथ ही अगर जातक की जन्म कुंडली में गुरु और केतु का संबंध द्वादश भाव से हो तो इससे भी जातक के मोक्ष प्राप्ति के योग बनते है. किन्तु जातक के बाहरवें भाव में शनि, राहू या केतु की युति अष्टमेश के साथ हो, तो जातक को नर्क की प्राप्ति होती है.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्मपत्रिका का प्रेत आत्माओ से बहुत गहरा संबंध होता है. जन्मपत्री में गुरु, शनि और राहू की स्थिति से जातक की आत्मा के पूर्व जन्म के कर्म के आधार पर प्राप्त फल या प्रभाव को बतलाती है. शनि के पहले घर और शनि के बाद के घर में राहू की उपस्थिति या दोनों की युति और इनके साथ गुरु के होने की दृष्टी या प्रभाव जातक पर प्रेत आत्माओ के प्रभाव को बढ़ा देती है.

आपकी राशि पर शनि का प्रभाव
मंगल दोष और शांति के उपाय

आपकी जन्म पत्रिका को गुरु, शनि और राहू किस तरह से प्रभावित करते है इस बारे में कुछ उदहारण निम्नलिखित है –

1. लग्न में गुरु की स्थित होंना जातक के पूर्वजो की आत्मा का आशीर्वाद या फिर दोष दिखाता है. इन जातको को अकेले में या फिर जब वे पूजा कर रहे होते है तो उन्हें अपने पूर्वजो का आभास भी होता है. इन जातको को अमावस्या के दिन दूध का दान करना चाहिए.

2. अगर जातक के दुसरे और आठवे स्थान में गुरु स्थित है तो ये स्थिति बताती है कि जातक अपने पूर्व जन्म में या तो संत था या फिर संत की परवर्ती का था, इसके साथ ये भी पता चलता है कि उसकी कुछ अतृप्त इच्छाओ के पूरा न होने पर उस जातक को दुबारा जन्म लेना पड़ा है.

इन जातको का एक संपन्न घर में जन्म होता है. साथ ही ये अपने पुर्नजन्म में धार्मिक प्रवृति के जीवन को बिताते है. इन जातको का जीवन साधारण होता है लेकिन इनका पूरा जीवन सुखमय स्थिति में व्यतीत होता है और अंत में ये जातक एक अच्छी और सम्मानित मृत्यु को प्राप्त होते है.

1. गुरु का तीसरे स्थान पर होने का अर्थ है कि जातक के पूर्वजो में से कोई स्त्री सती हुई थी और उनका आशिर्वाद इन जातको पर हमेशा होता है. इसी वजह से इन जातको का पूरा जीवन सुख शांति से भरा होता है और इनके जीवनकाल में इन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता.

About the author

Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

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  • Bahut gyan Bardhak post hay bahut achha laga. Bhakti Saskar post ke liye bahut bahut Dhanyebad…

  • शनि का आठवें भाव में होना दीर्घायु का संकेत है जो अकेले जातक को नब्बे वर्ष से अधिक की आयु देता है। शनि यदि आठवें उच्च भाव का हो तो यह जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्त होने का संकेत है। शनि का आठवें भाव में होना अत्यत शुभंकर है क्योंकि आठवाँ भाव मृत्यु भाव है और शनि की यह विशेषता है कि वह जिस भाव में बैठता उस भाव को नष्ट कर देता है। मृत्यु के नष्ट होने का अर्थ अमरत्व है। यदि आप भगवान राम, रावण और भगवान श्रीकृष्ण की जन्मकुण्डली देखें तो आप इस रहस्य को आसानी से समझ सकते हैं। जैमिनी सूत्रम्, जातक पारिजात और फलदीपिका के अध्ययन के बाद निर्णयात्मक रूप से कुछ कहना चाहिए। धनलिप्सा और जल्दी प्रसिद्धि के चक्कर में फँसकर कई ऐसे लोग ज्योतिर्विद बनना चाहते हैं जो अपने अधूरे ज्ञान से न तो स्वय का और न दूसरो का कल्याण कर सकते हैं।

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