यात्रा

सूर्य मंदिर,कोणार्क

Surya Temple, Konark

कोणार्क का सूर्य मंदिर पुरी के पवित्र शहर के पास पूर्वी ओडिशा राज्‍य में स्थित है और यह सूर्य देवता को समर्पित है।  इसे लाल बलुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से १२३६– १२६४ ई.पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। यह सूर्य देवता के रथ के आकार में बना एक

भव्‍य भवन है; इसके 24 पहिए सांकेतिक डिजाइनों से सज्जित हैं और इसे छ: अश्‍वखींच रहे हैं। यह ओडिशा की मध्‍यकालीन वास्‍तुकला का अनोखा नमूना है और भारत का सबसे प्रसिद्ध ब्राह्मण तीर्थ है।

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कोणार्क का मंदिर न केवल अपनी वास्‍तुकलात्‍मक भव्‍यता के लिए जाना जाता है बल्कि यह शिल्‍पकला के गुंथन और बारीकी के लिए भी प्रसिद्ध है। यह कलिंग वास्‍तुकला की उपलब्धियों का उच्‍चतम बिन्‍दु है जो भव्‍यता, उल्‍लास और जीवन के सभी पक्षों का अनोखा ताल मेल प्रदर्शित करता है। कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर सूर्य देव(अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है। इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। आज इसका काफी भाग ध्वस्त हो चुका है। इसका कारण वास्तु दोष एवं मुस्लिम आक्रमण रहे हैं। यहां सूर्य को बिरंचि-नारायण कहते थे।

इस मंदिर को यूनेस्‍को द्वारा सन १९८४ में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है और इसका विमीण 1250 ए. डी. में पूर्वी गंगा राजा नरसिंह देव - 1 (ए. डी. 1238 - 64) के कार्यकाल में किया गया था। इसमें कोणार्क सूर्य मंदिर के दोनों और 12 पहियों की दो कतारें है। इनके बारे में कुछ लोगों का मत है कि 24 पहिए एक दिन में 24 घण्‍टों का प्रतीक है, जबकि अन्‍य का कहना है कि ये 12 माह का प्रतीक हैं। यहां स्थित सात अश्‍व सप्‍ताह के सात दिन दर्शाते हैं। समुद्री यात्रा करने वाले लोग एक समय इसे ब्‍लैक पगोडा कहते थे, क्‍योंकि ऐसा माना जाता है कि यह जहाज़ों को किनारे की ओर आकर्षित करता था और उनका नाश कर देता था।

मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं।

मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मंडप में जहां मूर्ती थी अंग्रेज़ों ने भारतीय स्वतंत्रता से पूर्व ही रेत व पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था, ताकि वह मंदिर और क्षतिग्रस्त ना हो पाए।[3] इस मंदिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं:

बाल्यावस्था-उदित सूर्य- ८ फीट

युवावस्था-मध्याह्न सूर्य- ९.५ फीट

प्रौढावस्था-अस्त सूर्य-३.५ फीट[3]

इसके प्रवेश पर दो सिंह हाथियों पर आक्रामक होते हुए रक्षा में तत्पर दिखाये गए हैं। यह सम्भवतः तत्कालीन ब्राह्मण रूपी सिंहों का बौद्ध रूपी हाथियों पर वर्चस्व का प्रतीक है। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये २८ टन की ८.४फीट लंबी ४.९ फीट चौड़ी तथा ९.२ फीट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार कर लिया है।

कोणार्क का अर्थ

कोणार्क शब्द, 'कोण' और 'अर्क' शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। कोणार्क का सूर्य मंदिर पुरी के उत्तर पूर्वी किनारे पर समुद्र तट के क़रीब निर्मित है।

कथाये

एक कथा के अनुसार, गंग वंश के राजा नृसिंह देव प्रथम ने अपने वंश का वर्चस्व सिद्ध करने हेतु, राजसी घोषणा से मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बारह सौ वास्तुकारों और कारीगरों की सेना ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और ऊर्जा से परिपूर्ण कला से बारह वर्षों की अथक मेहनत से इसका निर्माण किया। राजा ने पहले ही अपने राज्य के बारह वर्षों की कर-प्राप्ति के बराबर धन व्यय कर दिया था। लेकिन निर्माण की पूर्णता कहीं दिखायी नहीं दे रही थी। तब राजा ने एक निश्चित तिथि तक कार्य पूर्ण करने का कड़ा आदेश दिया। बिसु महाराणा के पर्यवेक्षण में, इस वास्तुकारों की टीम ने पहले ही अपना पूरा कौशल लगा रखा था। तब बिसु महाराणा का बारह वर्षीय पुत्र, धर्म पाद आगे आया। उसने तब तक के निर्माण का गहन निरीक्षण किया, हालांकि उसे मंदिर निर्माण का व्यवहारिक ज्ञान नहीं था, परन्तु उसने मंदिर स्थापत्य के शास्त्रों का पूर्ण अध्ययन किया हुआ था। उसने मंदिर के अंतिम केन्द्रीय शिला को लगाने की समस्या सुझाव का प्रस्ताव दिया। उसने यह करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। लेकिन इसके तुरन्त बाद ही इस विलक्षण प्रतिभावान का शव सागर तट पर मिला। कहते हैं, कि धर्मपाद ने अपनी जाति के हितार्थ अपनी जान तक दे दी।[5]

पौराणिक महत्त्व

यह मंदिर सूर्यदेव (अर्क) को समर्पित था, जिन्हें स्थानीय लोग बिरंचि-नारायण कहते थे। यह जिस क्षेत्र में स्थित था, उसे अर्क-क्षेत्र या पद्म-क्षेत्र कहा जाता था। पुराणानुसार, श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को उनके श्राप से कोढ़ रोग हो गया था। साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की और सूर्य देव को प्रसन्न किया। सूर्यदेव, जो सभी रोगों के नाशक थे, ने इसका रोग भी अन्त किया। उनके सम्मान में, साम्ब ने एक मंदिर निर्माण का निश्चय किया। अपने रोग-नाश के उपरांत, चंद्रभाग नदी में स्नान करते हुए, उसे सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली। यह मूर्ति सूर्यदेव के शरीर के ही भाग से, देवशिल्पी श्री विश्वकर्मा ने बनायी थी। साम्ब ने अपने बनवाये मित्रवन में एक मंदिर में, इस मूर्ति की स्थापना की। तब से यह स्थान पवित्र माना जाने लगा।

स्थापना

सूर्य मंदिर को गंग वंश के राजा नरसिम्हा देव प्रथम ने लगभग 1278 ई. में बनवाया था। कहा जाता है कि ये मंदिर अपनी पूर्व निर्धारित अभिकल्पना के आधार पर नहीं बनाया जा सका। मंदिर के भारी गुंबद के हिसाब से इसकी नींव नहीं बनी थी। यहाँ के स्थानीय लोगों की मानें तो ये गुम्बद मंदिर का हिस्सा था पर इसकी चुम्बकीय शक्ति की वजह से जब समुद्री पोत दुर्घटनाग्रस्त होने लगे, तब ये गुम्बद हटाया गया। शायद इसी वज़ह से इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा भी कहा जाता है।

वास्तु रचना

स्थान चयन से लेकर मन्दिर निर्माण सामग्री की व्यवस्था और मूर्तियों के निर्माण के लिए बड़ी योजना को रूप दिया गया। चूँकि उस काल में निर्माण वास्तुशास्त्र के आधार पर ही होता था, इसलिए मन्दिर निर्माण में भूमि से लेकर स्थान व दिन चयन में निर्धारित नियमों का पालन किया गया। इसके निर्माण में 1200 कुशल शिल्पियों ने 12 साल तक लगातार काम किया। शिल्पियों को निर्देश थे कि एक बार निर्माण आरम्भ होने पर वे अन्यत्र न जा सकेंगे। निर्माण स्थल में निर्माण योग्य पत्थरों का अभाव था। इसलिए सम्भवतया निर्माण सामग्री नदी मार्ग से यहाँ पर लाई गई। इसे मन्दिर के निकट ही तराशा गया। पत्थरों को स्थिरता प्रदान करने के लिए जंगरहित लोहे के क़ब्ज़ों का प्रयोग किया गया। इसमें पत्थरों को इस प्रकार से तराशा गया कि वे इस प्रकार से बैठें कि जोड़ों का पता न चले।

सूर्यमन्दिर भारत का इकलौता सूर्य मन्दिर है जो पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और बनावट के लिए जाना जाता है। सूर्य मन्दिर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर कोणार्क में अपने समय की उत्कृष्ट वास्तु रचना है। पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने सूर्य मन्दिर को तेरहवीं शताब्दी में बनवाया था। प्राचीन उड़िया स्थापत्य कला का यह मन्दिर बेजोड़ उदाहरण है। सूर्य मन्दिर की रचना इस तरह से की गई है कि यह सभी को आकर्षित करती है। सूर्य को ऊर्जा, जीवन और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। सूर्य देवता की सभी संस्कृतियों में पूजा की जाती रही है। सूर्य की इस मन्दिर में मानवीय आकार में मूर्ति है जो अन्य कहीं नहीं है।

इस मंदिर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि अपने सात घोड़े वाले रथ पर विराजमान सूर्य देव अभी-अभी कहीं प्रस्थान करने वाले हैं। यह मूर्ति सूर्य मन्दिर की सबसे भव्य मूतियों में से एक है। सूर्य की चार पत्नियाँ रजनी, निक्षुभा, छाया और सुवर्चसा मूर्ति के दोनों तरफ़ हैं। सूर्य की मूर्ति के चरणों के पास ही रथ का सारथी अरुण भी उपस्थित है।

मान्यताएँ

सूर्यमन्दिर के निर्माण में 1200 कुशल शिल्पियों ने 12 साल तक लगातार काम किया। शिल्पियों को निर्देश थे कि एक बार निर्माण आरम्भ होने पर वे अन्यत्र न जा सकेंगे। निर्माण स्थल में निर्माण योग्य पत्थरों का अभाव था। इसलिए सम्भवतया निर्माण सामग्री नदी मार्ग से यहाँ पर लाई गई। इसे मन्दिर के निकट ही तराशा गया। पत्थरों को स्थिरता प्रदान करने के लिए जंगरहित लोहे के क़ब्ज़ों का प्रयोग किया गया। इसमें पत्थरों को इस प्रकार से तराशा गया कि वे इस प्रकार से बैठें कि जोड़ों का पता न चले। Blockquote-close.gif

कोणार्क के आध्यात्मिक महत्त्व, वर्तमान मन्दिर की स्थापना, इसके परित्याग करने से लेकर, मुख्य मन्दिर के ध्वस्त होने के बारे में अनेकानेक मान्यताएँ और अनुश्रुतियाँ हैं। मन्दिर के सम्बन्ध में कई बातें अब भी इतिहास के गर्भ में हैं। इसलिए कई बातों से विद्वतजन एकमत नहीं हैं। स्कन्दपुराण में कोणार्क की पहचान में सूर्यक्षेत्र, ब्रह्म पुराण में कोणादित्य, कपि संहिता में रवि क्षेत्र, भाम्बपुराण में मित्रवन व प्राचीन महात्यम में अर्कतीर्थ आदि नामों से की गई है। वहीं निकट में एक सूर्य मन्दिर था। पुराणों में वर्णित मित्रवन व चन्द्रभागा की पहचान के बारे में अलग-अलग तर्क हैं। कुछ लोग इसे पाकिस्तान के मुल्तान में बताते हैं, जिसका प्राचीन नाम भाम्बापुरा था और यहीं से चिनाब या चन्द्रभागा गुज़रती है। उधर कोणार्क में भाम्बापुरा तो नहीं है किन्तु मन्दिर से 2 किलोमीटर दूर चन्द्रभागा का तट है, जहाँ पर माघ माह की सप्तमी को विशाल मेला लगता है। गंग नरेश नरसिंह देव ने सूर्य मन्दिर का ही निर्माण क्यों करवाया, इसे लेकर अनेक मान्यताएँ हैं।

बारह महीने के प्रतीक चक्र

दीवार पर मन्दिर के बाहर बने विशालकाय चक्र पर्यटकों का ध्यान खींच लेते हैं। हर चक्र का व्यास तीन मीटर से ज़्यादा है। चक्रों के नीचे हाथियों के समूह को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। सूर्य देवता के रथ के चबूतरे पर बारह जोड़ी चक्र हैं, जो साल के बारह महीने के प्रतीक हैं।

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