जैन धर्म

श्री सुपार्श्वनाथ जी

suparshvaजैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के इक्ष्वाकुवंश में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को विशाखा नक्षत्र में हुआ था। इनके माता का नाम पृथ्वी देवी और पिता का नाम राजा प्रतिष्ठ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण था और इनका चिह्न स्वस्तिक था।

जीवन परिचय :

इनके यक्ष का नाम मातंग और यक्षिणी का नाम शांता देवी था। जैन धर्मावलम्बियों के मतानुसार भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी के कुल गणधरों की संख्या 95 थी, जिनमें विदर्भ स्वामी इनके प्रथम गणधर थे। ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी तिथि को वाराणसी में ही इन्होंने दीक्षा प्राप्ति की और दीक्षा प्राप्ति के 2 दिन बाद इन्होंने खीर से प्रथम पारण किया। दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 9 महीने तक कठोर तप करने के बाद फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी को धर्म नगरी वाराणसी में ही शिरीष वृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

संदेश :

भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी ने हमेशा सत्य का समर्थन किया और अपने अनुयायियों को अनर्थ हिंसा से बचने और न्याय के मूल्य को समझने का सन्देश दिया। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन भगवान श्री सुपार्श्वनाथ ने सम्मेद शिखर पर निर्वाण को प्राप्त किया था।

 

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Niteen Mutha

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