Category - उपनिषद

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माण्डूक्योपनिषद : के अनुसार समस्त भूत भविष्य और वर्तमान ओमकार (ओउम) मे ही निहित है

माण्डूक्योपनिषद हे देवगण! हम कानों से कल्याणमय वचन सुने। यज्ञ कर्म में समर्थ होकर नेत्रों से शुभ दर्शन करें तथा अपने स्थिर अंग और शरीरों से स्तुति करने वाले हम लोग देवताओं के लिए हितकर आयु का भोग करें। त्रिविध ताप की शांति हो। महान कीर्तिमान इंद्र हमारा कल्याण करें; जो अरिष्टों (आपत्तियों) के लिए चक्र के सामान (घातक) है वह गरुड़ हमारा कल्याण करे तथा वृहस्पति जी हमारा कल्याण करें। त्रिविध ताप की शांति हो। माण्डूक्योपनिषद आगम प्रकरण जो अपनी चराचर......

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प्रश्नोपनिषद : महर्षि पिप्पलाद और ६ ऋषियों के बीच हुवे आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी का संकलन

१ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्नेभि श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवासस्नुभिर्व्यशेम देवहितं यदायु॥ ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!!! प्रश्नोपनिषद को छः भाग में बांटा गया है प्रथम प्रश्न २ सम्बन्ध भाष्य ३ सुकेश आदि की गुरुपसत्ति भारद्वाजनंदन सुकेशा, शिबिकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्र में उत्पन्न हुआ सौर्यायणी (सूर्य का पोता), अश्वलकुमार कौसल्य, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्य के पोते का पुत्र कबन्धी-ये अपर ब्रह्म की उपासना करने वाले और......

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अथर्ववेदोपनिषद : कई महान उपनिषद का स्त्रोत

अर्थवेद के उपनिषद प्रश्नोपनिषद ……………………………… यह अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा से सम्बद्ध उपनिषद है। यह उपनिषद ६ ऋषि महर्षि पिप्पलाद से अध्यात्म-विषयक प्रश्न पूछते हैं। उपनिषद में महर्षि पिप्पलाद उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। इन प्रश्नों के कारण ही इसे प्रश्नोपनिषद कहा जाता है। इसमें सृष्टि की उत्पत्त, उसके धारण, प्राण की उत्पत्ति, आत्मा की जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्थाओं का वर्णन प्राप्त होता है। मंडकोपनिषद ……………………………… यह अथर्वेद की शौनक शाखा......

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कृष्णयजुर्वेदीयोपनिषद : ब्रह्म आनंद और सत्य ज्ञान की महिमा मंडित करता विशिष्ट उपनिषद

कृष्ण यजुर्वेद के उपनिषद तैत्तिरीयोपनिषद ………………………… कृष्ण आयुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के तैत्तिरीय आरण्यक के सप्तम से नवं प्रपाठक को तैत्तिरीयोपनिषद कहते है। इसमें ३३ आध्याय है जिन्हें क्रमशः शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली एवं भृगुवल्ली कहते हैं। ये वल्लियाँ अनुवाकों में विभक्त हैं। इस उपनिषद में दिए गए मातृ देवो भवः, अतिथि देवो भवः इन उपदेशों का सार्वकालिक महत्त्व है। इसमें आचार्य द्वारा स्नातक को दिए गए उपदेश हैं तथा ब्रह्म को आनंद, सत्य ज्ञान......

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यजुर्वेदीयोपनिषद : शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद का जन्मदाता

यजुर्वेदीयोपनिषद – यजुर्वेद के उपनिषद – यजुर्वेदीय उपनिषद के दो भाग है शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद शुक्ल यजुर्वेद के उपनिषद इशावास्योपनिषद …………………………… यजुर्वेद सहिंता के चालीसवें अध्याय को ईशावास्योपनिषद कहा जाता है। यह अत्यंत प्राचीन पद्यात्मक उपनिषद है। इस उपनिषद में त्यागपूर्ण भोग, कर्म की महत्ता, विद्या-अविद्या का संबंध एवं परमात्मा का स्वरूप वर्णित है। इस पर सायन, अव्वट, महीधर एवं शंकराचार्य के भाष्य उपलब्ध है। वृह्दारन्याकोप्निषद......

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ऐतरेयोपनिषद : मानव-शरीर की उत्पत्ति रहस्य बतलाने वाला उपनिषद

प्रथम अध्याय इस उपनिषद के प्रथम अध्याय में तीन खण्ड हैं पहले खण्ड में सृष्टि का जन्म, दूसरे खण्ड में मानव-शरीर की उत्पत्ति और तीसरे खण्ड में उपास्य देवों की क्षुधा-तृप्ति के लिए अन्न के उत्पादन का वर्णन किया गया है। प्रथम खण्ड / सृष्टि की उत्पत्ति प्रथम खण्ड में ऋषि कहता है कि सृष्टि के आरम्भ में एकमात्र ‘आत्मा’ का विराट ज्योतिर्मय स्वरूप विद्यमान था। तब उस आत्मा ने विचार किया कि सृष्टि का सृजन किया जाये और विभिन्न लोक बनाये जायें तथा उनके......

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ऋग्वेदीयोपनिषद : जन्म, जीवन और मरण का वर्णन करता उपनिषद

ऋग्वेद के उपनिषद – ऐतरेयोपनिषद …………………………………… ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक के द्वितीय खंड के अंतर्गत चतुर्थ से षष्ठ अध्याय को ऐतरेय उपनिषद माना जाता है। इसमें 3 अध्याय है जिसमें विश्व की उत्पत्ति का विवेचन है तथा पुरुष सूक्त के आधार पर सृष्टि का क्रम निरुपित है। जन्म, जीवन और मरण का वर्णन प्राप्त होता है। आत्मा के स्वरूप का स्पष्ट निर्देश भी मिलता है। इस पर शंकर का भाष्य प्राप्त होता है। कौषीतकी उपनिषद ………………………………… यह उपनिषद ऋग्वेद के कौषीतकी आरण्यक......

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मुण्डकोपनिषद – मस्तिक्ष को अत्यधिक शक्ति देने वाला

मदकू द्वीप मुण्डकोपनिषद के रचयिता ऋषि माण्डूक्य की तप स्थली रही है। यही पर उन्होंने इसकी रचना करी थी, मुण्डकोपनिषद अथर्ववेद की शौनकीय शाखा से सम्बन्धित है। इसमें अक्षर-ब्रह्म ‘ॐ: का विशद विवेचन किया गया है। इसे ‘मन्त्रोपनिषद’ नाम से भी पुकारा जाता है। इसमें तीन मुण्डक हैं और प्रत्येक मुण्डक के दो-दो खण्ड हैं तथा कुल चौंसठ मन्त्र हैं। ‘मुण्डक’ का अर्थ है- मस्तिष्क को अत्यधिक शक्ति प्रदान करने वाला और उसे अविद्या-रूपी......

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छान्दोग्योपनिषद – ‘ॐकार’ की अध्यात्मिक महत्ता को समझाता उपनिषद

सामवेद की तलवकार शाखा में इस उपनिषद को मान्यता प्राप्त है। इसमें दस अध्याय हैं। इसके अन्तिम आठ अध्याय ही इस उपनिषद में लिये गये हैं। यह उपनिषद पर्याप्त बड़ा है। नाम के अनुसार इस उपनिषद का आधार ‘छन्द’ है, इसका यहाँ व्यापक अर्थ के रूप में प्रयोग किया गया है। इसे यहाँ ‘आच्छादित करने वाला’ माना गया है। साहित्यिक कवि की भांति ऋषि भी मूल सत्य को विविध माध्यमों से अभिव्यक्त करता है। वह प्रकृति के मध्य उस परमसत्ता के दर्शन करता है। इसमें ॐकार (‘ॐ’) को......

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कठोपनिषद – नचिकेता और यमराज का संवाद

कठोपनिषद – नचिकेता और यमराज का संवाद –  Kathopnishad in hindi pdf १. शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं कर वावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शांति: शांति: शांति: २. सम्बन्ध भाष्य ३. वाजश्रवस का दान प्रसिद्द है कि यग्य फल के इच्छुक वाजश्रवा के पुत्र ने अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्द पुत्र था। जिस समय दक्षिणाएं ले जायी जा रही थीं, उसमें – यद्यपि अभी वह कुमार ही था – श्रद्धा का आवेश हुआ। वह......

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