Category - कुण्डलिनी चक्र

कुण्डलिनी चक्र

कुण्डलिनी शक्ति का भेद और जाग्रत करने के बीज मन्त्र

कुण्डलिनी योग (Kundalin Jagran) अंतर्गत शक्तिपात विधान का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है । योग वशिष्ठ, तेजबिन्दूनिषद्, योग चूड़ामणि, ज्ञान संकलिनी तंत्र, Shiva Puran, देवी भागवत, शाण्डिपनिषद, मुक्तिकोपनिषद, हठयोग संहिता, कुलार्णव तंत्र, योगनी तंत्र, घेरंड संहिता, कंठ श्रुति ध्यान बिन्दूपनिषद, रुद्र यामल तंत्र, योग कुण्डलिनी उपनिषद्, शारदा तिलक आदि ग्रंथों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है । कुण्डलिनी साधना को अनेक स्थानों पर......

कुण्डलिनी चक्र

चक्रों के प्रतीकात्मक वैदिक नाम

वैदिक साहित्ये में मानव -शरीर -गत मूलाधार आदि चक्रो के नाम प्रतीकात्मक वैदिक नाम या संकेत मन्त्र 'भू:', 'भुव:', आदि सस महाव्यहतियो के रूप में है ! yog के आचार्ये 'भू:', 'भुव:', आदि सस महायावतियो के रूप में है ! योग के आचार्ये 'भू:', नाम से मूलाधार ', 'भुव:', से स्वाधिस्तान 'स्व:', से मणिपुर चक्र , 'मह:', से हदय' व् 'अनाहत चक्र ' 'जन:', से विसुदी चक्र ' , ' तप: 'से 'आज्ञा चक्र ' और 'सत्यम' से सहस्तार का ग्रहण करते है ! ये सब चक्र जहाँ अपनी निजी......

कुण्डलिनी चक्र

शरीर में सन्निहित शक्ति-केंद्र या चक्र

आपके अंदर जो सुषुप्त केंद्र हैं उनको विकसित करने के किये श्रृंगार होता है । हमारे शरीर में सात केंद्र हैं। १) मूलाधार केंद्र :  जन्म से लेकर सात साल तक मूलाधार केंद्र विकसित होता है, यदि सात वर्ष की उम्र तक बच्चे की निरोगता का ख्याल रखा जाये, तुलसी के दो तीन पत्ते रगड़ के जरा सा शहद या मिश्री मिला के चटा दिया जाये अथवा तुलसी होमियोपैथी गोली एक-एक दे दी जाये, बच्चे निरोग रहेंगे। जन्म से लेकर सात वर्ष तक हमारे शरीर का मूलाधार केंद्र या यूँ मान लो......

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देह में स्थित पंचकोश

पञ्च कोश क्या हैं इनके विषय में क्या और कहाँ किसी सिद्ध महत्मा द्वारा लिखा गया है । पञ्च कोश जागरण चक्रों का जागरण कैसे हो सकता है ? किसी खगोलीय पिण्ड,ग्रह, उपग्रह की स्थिति बदलने की बात ज्योतिष ग्रन्थों मे कहीं नहीं लिखी गयी है और ना ही कोई विद्वान दैवज्ञ कहते हैं । लेकिन जन्म समय, स्थान, परिस्थिति, आदि आदि विभिन्न तत्वों पर आपकी शारीरिक और मानसिक संरचना खगोलीय स्थिति के अधीन निर्भर करती है और तदनुसार आपके शरीर पर, चक्रो और उपत्तिकाओं पर उनकी......

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कुण्डलिनी चालीसा

श्री कुण्डलिनी चालीसा सिर सहस्त्रदल कौ कमल , अमल सुधाकर ज्योति | ताकि कनिका मध्य में , सिंहासन छवि होति || शांत भाव आनंदमय , सम चित विगत विकार | शशि रवि अगिन त्रिनेत्रयुत , पावन सुरसरिधार || सोहे अंक बिलासनी, अरुण बरन सौ रूप | दक्षिण भुज गल माल शिव, बाएं कमल अनूप || धवल वसन सित आभरण, उज्जवल मुक्ता माल | सोहत शरदाभा सुखद , गुरु शिव रूप कृपाल || एक हाथ मुद्रा अभय , दूजे में वरदान |  तीजे कर पुस्तक लसै , चौथे निर्मल ज्ञान || श्री गुरु पद नख सों ......

कुण्डलिनी चक्र

प्राण के प्रकार

प्राण साक्षात Lord Brahma से अथवा प्रकर्ति रुपए माया से उत्पन हे प्राण गत्यात्मका सदा गतिक वायु में पाई जाती हे अतः गोनी वर्ती से वायु को प्राण कह देते हे शरीरगत स्थानभेद से एक ही वायु  प्राण अपान आदि नमो से वेव्हाट होता हे प्राण सकती एक हे इसी प्राण को इस्थान व कार्यो के भेद से विविध नामो से जाना जाता हे देह में मुखय रूप से पांच प्राण तथा पांच  उपप्राण हे | 1.प्राण: शरीर में कंठ से लेकर ह्रदय प्रयन्त जो वायु कार्य करता हे उसे प्राण कहा जाता हे......

कुण्डलिनी चक्र

कुण्डलिनी जागरण के दिव्य लक्षण व अद्भुत अनुभव

कुंडलिनी जागरण के आध्यात्मिक लाभ की अभिव्यक्ति शब्दो में तो नहीं की जा सकती, हाँ, इतना अवशय कहा जा सकता है की यह एक पूर्ण आनंद की स्थिति होती है ! इस स्थिति को प्राप्त करने के बाद कुछ पाना शेष नही रह जाता ! मन में पूर्ण संतोष, पूर्णशांति व परमसुख होता है ! ऐसे साधक के पास बैठने से दूसरे व्यक्ति को भी शांति अनुभूति होती है ! ऐसे योगी पुरुष के पास बैठने से दूसरे विकासी पुरुष के भी विकार शांत होने लगते है तथा yog व भगवान के प्रति स्रद्धा भाव बढ़ते......

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