यात्रा

शोर मंदिर:महाबलीपुरम

Shore Temple, Tamil Nadu

शोर मंदिर तमिलनाडु के महाबलीपुरम में स्थित है। शोर मंदिर को दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है जिसका संबंध आठवीं शताब्दी से है।

यह मंदिर द्रविड वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है और ग्रेनाइट के ब्लॉक के साथ बनाया गया है। यह पाँच मंज़िला मंदिर है, इसका पिरामिड संरचना 60 फुट ऊंची है और एक 50 फुट वर्ग में फैला हुआ है। महाबलीपुरम में स्मारकों के समूह के रूप में, यह एक यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मंदिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा दृश्य उपस्थित करती हैं।शोर मंदिर के भीतर तीन मंदिर हैं। बीच में भगवान विष्णु का मंदिर है इसके दोनों तरफ शिव मंदिर हैं। यह मंदिर मुख्य रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है |

प्राचीन चट्टानों तथा विशाल शिलाओं को काट कर बनाए गए इन मंदिरों का निर्माण दक्षिण भारत के प्रसिद्ध प्राचीन पल्लव राजवंश के शासनकाल में शुरू हुआ तथा राजा महेंद्रवर्मन द्वारा इनका प्रमुख भाग निर्मित करवाया गया। तमिलनाडु का यह प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। सातवीं शताब्दी में यह शहर पल्लव राजाओं की राजधानी था। द्रविड़ वास्तुकला की दृष्टि से यह शहर अग्रणी स्थान रखता है। यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। यहां के तीन मंदिर प्रसिद्ध हैं। बीच में भगवान विष्णु का मंदिर है, जिसके दोनों तरफ शिव मंदिर हैं। यहां पर निर्मित पल्लव मंदिरों और स्मारकों के मिलने वाले अवशेषों में चट्टानों से निर्मित अर्जुन की तपस्या, गंगावतरण जैसी मूर्तियों से युक्त गंङ्गा मंदिर और समुद्र तट पर बना शैव मंदिर प्रमुख हैं। ये सभी मंदिर भारत के प्राचीन वास्तुशिल्प के गौरवमय उदाहरण माने जाते हैं। पल्लवों के समय दक्षिण भारत से बहुसंख्यक लोग जाकर यहां बसे थे और वहां पहुंच कर उन्होंने नए-नए भारतीय उपनिवेशों की स्थापना भी की थी। महाबलीपुरम के निकट एक पहाड़ी पर स्थित दीपस्तंभ समुद्र यात्राओं की सुरक्षा के लिए बनवाया गया था। इसके निकट ही सप्तरथों के परम विशाल मंदिर विदेश यात्राओं पर जाने वाले यात्रियों को मातृभूमि का अंतिम संदेश देते रहे होंगे। इस नगर के पांच रथ या एकाश्म मंदिर, उन सात मंदिरों के अवशेष हैं, जिनके कारण इस नगर को सप्तपगोडा भी कहा जाता है। इन मंदिरों का संबंध पांडवों से भी जोड़ा जाता है। हालांकि पांडवों के दक्षिण भारत जाने के प्रमाण बहुत कम हैं, परंतु यहां के रथों में से दो रथों का नाम राजा पांडु पुत्र नकुल तथा सहदेव के नाम पर है। मध्य युग में जब यूरोपियन लोग यहां पहुंचे, तो इन मंदिरों का आकर्षण देखकर उनकी हैरानी की सीमा न रही।  इन मंदिर समूहों का कुछ भाग सागर से सटकर अभी भी सुरक्षित खड़ा है, परंतु इनमें से काफी मंदिर समुद्र में डूब गए हैं। स्थानीय मान्यतानुसार इन मंदिरों की सुंदरता से ईर्ष्या के चलते इंद्र ने यहां के मंदिरों का बाकी भाग समुद्र में डुबो दिया।

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पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यतानुसार यह स्थान महातपस्वी राक्षस हिरण्यकश्यप के साम्राज्य की राजधानी थी, जो उसके पोते तथा भक्तराज प्रह्लाद के पुत्र राजा बलि को विरासत में प्राप्त हुआ था। राजा बलि अपने बल, तप, तेज तथा वैभव से अधिक अपनी दानवीरता के लिए माने जाते थे। एक बार उनकी दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने एक ब्राह्मण के रूप में उनसे मात्र तीन कदम भूमि दान में मांगी, परंतु जब ब्राह्मण रूपी उस वामन अवतार द्वारा मात्र अढ़ाई कदमों में सारी धरती को माप लिया गया, तो महादानी राजा बलि ने उनके पांव रखने के लिए अपना सिर ही आगे कर दिया। कहा जाता है कि प्रभु के वामनावतार के पांव का वेग व भार इतना था कि उससे राजा बलि अपने राज्य के उस भू-भाग सहित धरती के नीचे धंस कर पाताल में जा पहुंचा और इसी कारण आज तक पाताल लोक में राजा बलि का राज है और इसी वेग में अन्य मंदिर डूब गए। समुद्र में डूबे कुछ मंदिर इतने आकर्षक हैं कि इन्हें देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यहां पर राजा स्ट्रीट के पूर्व में स्थित इस संग्रहालय में स्थानीय कलाकारों की 3000 से अधिक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। संग्रहालय में रखी मूर्तियां पीतल, रोड़ी, लकड़ी और सीमेंट की बनी हुई हैं। यहां पर एक कृष्ण मंडप है। यह मंदिर महाबलीपुरम के प्रारंभिक पत्थरों को काटकर बनाए गए मंदिरों में से एक है। मंदिर की दीवारों पर ग्रामीण जीवन की झलक देखने को मिलती है। एक चित्र में भगवान कृष्ण को गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाए दिखाया गया है। यहां पर महाभारत के पांच पांडवों के नाम पर इन रथों को पांडव रथ कहा जाता है। पांच में से चार रथों को एकल चट्टान पर उकेरा गया है। द्रौपदी और अर्जुन रथ वर्ग के आकार का है। एक भीम रथ है। धर्मराज रथ सबसे ऊंचा है।

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