शिव स्तुति

शिवपादादिकेशान्तवर्णनस्तोत्राम्

shivaa

कल्याणं नेा विध्त्तां कटकतटलसत्कल्पवाटीनिकु

क्रीडासंसत्तफविधध्रनिकरवध्ूगीतरूापदान:

तारैहेर्रम्बनादैस्तलितनिनदत्तारकारातिकेकी,

कैलास: शर्वनिवृर्त्यभिजनकपद: सर्वदा पर्वतेन्:।।1।।

 

जिस कैलाश पर्वत के शिखर तटों में सुशोभित कल्पवृक्षों की वाटिकाओं के लतामण्डपों में, नाना क्रीड़ाओं में संलग्न विधध्र वन्धुओ अप्सराओं के द्वारा भगवान् शंकर के पवित्र चरित्रों का गान किया जा रहा है, और तारकासुर के शत्रु स्वामी कार्तिकेय, जहाँ गणेश जी के ऊँचे निनाद शद्ववनि से तवरलित होकर गुनगुना रहे है, और भगवान् शंकर का जो आनन्दाय प्रिय निवास स्थान है, ऐसा पर्वतराज कैलाश, हम लोगों का हमेशा कल्याण करता रहे

 

यस्य प्राहु: स्वरुपं सकलदिविषदां सारसर्वस्वयोगं,

यस्येषु र्शाध्न्वा समजनि जगतां रक्षणे जागरूक:।

मौर्वी दर्वीकराणामपि च परिवृढ: पूस्त्रायी सा च लक्ष्यं,

सोव्यादव्याजमस्मानशिवमिदमिशं नाकिनां श्रीपिनाक:।।2।।

 

भगवान् शंकर के जिस श्रीपिनाक नामक धनुष को, ऋषि मुनि लोग देवताओं का सर्वस्वभूत–सारवस्तु समझते हैं। संसार की रक्षा में तत्पर भगवान् विष्णु जिस धनुष के बाण बने, तथा सर्पो के स्वामी वासुकि, जिस धनुष की प्रत्यंचा - ;डोरी बने, वह प्रसिद ( त्रिपुरासुर का निवास स्थान जिसका लक्ष्य वेय था) निरन्तर देवताओं के अमंगल का निवारक, वह श्रीपिनाक अनेक प्रकार की विभूतियों से भूषित वह, भगवान् शंकर काधनुष, हम लोगों की रक्षा करे, भगवान् के इस धनुष का रक्षा करना सहज कर्म–स्वभाव है, अत: वह बिना किसी व्याज–निमित्त से स्वभावत: भी हमारी रक्षा करता रहे।

 

आतावेगहारी सकलदिविषदविषदाभघ्रिपदश्रयाणाम्,

माताद्युग्रदैत्यप्रकरतनुगलत्तफधरात्तफधर:।

क्रूर: सूरायुतानामपि च परिभवं स्वीयभासा वितन्व–

न्धोराकार: कुठारो दृढतरदुरिताख्याटवीं पाटये:।।3।।

 

भगवान् शंकर का यह घोरकार कुठारद्ध उनके चरण्कमलों का आश्रय लेने वाले समस्त देवताओं के भय व आवेश ;अधैर्य को दूर करने वाला है, और यह कुठार हमेशा मात आदि भयानक दैत्यों के गलों से निकलते हुए रक्त की धरा से सिक्त रहता है, अपने तेज की चम से असंख्य योद्धाओ को भी तिरस्कृत कर देता है, इस प्रकार का क्रूर व घोर आकार वाला यह भगवान् शंकर का कुठार कुल्हाड़ा हमारे जन्मजन्मान्तरों के सिक्त, अतएव दृढ राशीभूत पापरूपी वन को काटे।

 

कालाराते: कराग्रे कृतवसतिरुर: शाणशातो रिपूणां,

काले काले कुलाप्रिवरतनयया ल्पितस्ेहलेप:।

पाया: पावकाखचप्रसरशतमुख: पापहन्ता नितान्तं,

शूल: श्रीपादसेवाभजनरसजुषां पालनैकान्तशील:।।4।।

 

जो शूल हमेशा काल के भी काल, भगवान् शंकर के कराग्रभाग में रहता है, और समय समय में, पर्वत राजनतना–पार्वती जी ने जिसका स्नेह रूपी लेप किया है, शत्राुओं के वक्षस्थल रूपी अग्नि की चिंगारियों से जिसकी धर तेज हो गई है, और जो लोग भगवान् के श्रीपदों की सेवा व भजनादि रस का सेवन करते हैं, उनके समस्त पापों को दूर करने वाला है, रक्षा करना ही जिसका स्वभाव है, ऐसा भगवान् शर का शूल ‘त्रिशूल’ हम लोगों की रक्षा करे।

 

देवस्यााश्रयाया: कुलगिरिदुहितु ने‍र्त्राकोणप्रचार–

प्रस्तारानत्युदारान् पिपठिषुरिव यो नित्यमत्यादरेण।

आध्त्ते भतिुैरनिशमवयवैरन्तरं समोदं,

सोमापीडस्य सोयं प्रदिशतु कुशलं पाण्डुर: कुर:।।5।

 

भगवान् शंकर के शिरोभूषण रूप चन्द्र के मय में स्थित जो कुल मृग है, वह भगवान् शंकर के गोद में स्थित भगवती पार्वती जी के आदर व लज्जापूर्वक किये गये नेत्र प्रान्तों के विस्तार के साथ जो भगवान् को प्रणति नमस्कार है, उनको मानो रात दिन बडे़ आदर से पढ़ता हो, या गिनता हो, और अपने चो विशेष से निम्नोत अवयवों से हमेशा जो दोनों के अन्तर को आनन्दित करता है। वह चन्द्र का भूषभूत–भूरेवर्ण का कुल–मृग हम लोगों के लिए कुशल–कल्याण प्रदान करें, या हम लोगों की रक्षा करे।

 

कण्ठप्रान्तावसज्जत्कनकमयमहाघण्टिकाघोरघोषै:,

कण्ठारावैरकुण्ठैरपि भरितजगच्चक्रवालान्तराल:।

चण्ड: प्रोद्दण्डश्रृ: ककुदकवलितोत्तुकैलासश्रृ:,

कण्ठेकालस्य वाह: शमयतु शमलं शातं: शाकटेन्।।6।।

 

गले के आस–पास लगी हुई सुवर्णमय मघघण्टिका के भयानक शद्वों से, तथा अमन्द कण्ठ की गर्जना से, जिसने संसार चक्र के अन्तराल–मयभाग को भर दिया है, अर्थात् जिस शिव वाहन नन्दी की, सुवर्णमय घण्टिका की ध्वनि तथा तीव्र कण्ठ गर्जना से सारा संसार गुंजायमान हो गया। ऐसे ऊपर को उठे हुए भयानक दण्डाकार सींघ वाले, तथा ऊँचाई में कैलास शिखर को भी मात करने वाला है, ककुद जिसका, ऐसा कालकण्ठ भगवान् शंकर का वाहनभूत वृषभराज नन्दी आपके चिर सित पापों को दूर करे।

 

निर्यद्दानाम्बुधरापरिमलतरलीभूतरोलम्बपाली–

झंकारै: शरो: शिखरशतदरी: पूरयन्भूरिघोषै:।

शार्व: सौवर्णशैलप्रतिमपृथुवपु: सर्वविघ्नपहत्र्ता,

शर्वाण्या: पूर्वसनु: स भवतु भवतां स्वस्तिदो हस्तिवक्त्रा:।।7।।

 

जिनके गण्डस्थलों से टपकती हुई मदधरा के सुगन्धि से, चंचल भ्रमरपंक्ति के झाररूप प्रचुरवनि से, हिमालय की शिखर गुफायें परिपूर्ण हो रही है, और सुवर्णमय पर्वताकार विशाल जिनका शरीर है, जो सभी प्रकार के विघ्नों के विनाशक हैं, वे भगवान् शंकर तथा पार्वती के प्रथमपुत्र, हाथी के समान मुख वाले, श्री गणेश जी, आप लोगों का कल्याण करें।

 

य: पुण्यै दे‍र्वतानां समजनि शिवयो: श्लायवीयैकमत्या–

द्याम्नि श्रूयमाणे दितिजभटघटा भीतिभारं भजन्ते।

भूयात् सोयं विभूत्यै निशितशरशिखापाटितक्रौशैल:,

संसारागाध्कूपोदरपतितसमुत्तारकस्तारकारि:।।8।।

 

भगवान् शंकर तथा पार्वती के पुत्र, जो स्वामी कार्तिकेय, प्रशंसनीय पराक्रम तथा बुिन्दू वैभवादि से युक्त है, और जो देवताओं के पुण्यों से ही उत्पन्न हुए हैं, जिनका नाम सुनते ही दैत्यों की सेनायें भयभीत हो जाती हैं, तथा जिनके तीक्ष्ण बाणाग्रभाग से क्रौ पर्वत का भेदन हुआ, जो 

अपार संसार रूपी कूप में गिरे हुए मनुष्यों का उद्धार करते हैं, वे तारकासुर के शत्रु, भगवान् कार्तिकेय स्वामी, हम लोगों को प्रचुर विभूति प्रदान करें।

 

आरूढ: प्रौढवेगप्रविजितपवनं तुंतुं तुरं,

चेलं नीलं वसान: करतलविलसत्काण्डाकोदण्डदण्ड:।

रागद्वेषदिनानाविध्मृगपटलीभीतिकृद्भूतभत्र्ता,

कुव‍रखेटलीलां परिलस्तु मन:कानने मामकीने।।9।।

 

जो किरातवेषधरी भगवान् शंकर अपने प्रबल वेग से पवन को भी जीतने वाले, बहुत बडे़ घोड़े में चढ़कर, नीले वस्त्रा पहनकर, हाथ में श्रेष्ठ धनुषरूपी दण्ड को धारण कर, राग द्वेषादि अनेक प्रकार के मृगों का शिकार करते हैं, ऐसे आखेट लीला करने वाले, भूतभावन भगवान् मेरे मनरूपी वन में हमेशा विचरण करें।

 

अम्भोजाभ्यां च रम्भारथचरणलताद्वन्दकुम्भीन्कुम्भै:,

खबम्बेनेन्दो कम्बोरुपरि विलसता विुमेणोत्पलाभ्याम्।

अम्भोदेनापि स्म्ीाावितमुपजनिताडम्बरं शम्बरारे:,

शम्भो: संभोगयोग्यं किमपि ध्नमिदं संभवेत्संपदे न:।।10।।

 

रम्भा–कदलीखण्ड अथवा अप्सरा रथ चक्र, लता द्वन्द, श्रेष्ठ हाथियों के कुम्भों से, नीलकमलद्वन्द तथा कम्ब के ऊपर सुशोभित चन्द्रबिम्ब से, अथवा बिम्ब नामक फलों से, विद्रुमलता प्रवाल और रमणीय  कमलों से मण्डित यह वन, बादलों से भी सुशोभित, अतएव कामदेव के आडम्बर के समान, भगवान् शंकर के उपभोग के योग्य, अनिर्वच्नीय यह वनरूपी धन, हमारे अभी सम्पत्ति के लिए होवे, अर्थात् हमें अभिलषित सम्पत्ति प्रदान करे।

 

वेणीसौभाग्यविस्मापिततपनसुताचारुवेणीविलासान्,

वाणीखनध्ू‍र्तवाणीकरतलविध्ृतोदारवीणाविरावान्।

एणीनेत्राान्तभीनिरसननिपुणापाकोणानुपासे,

शोणान् प्रणानुदूढप्रतिनवसुषमाकन्दलानिन्दुमौले:।।11।।

 

मैं भगवान् शंकर की, वेणीभूत उस जटाकलाप–लट की उपासना करता हूँ, जिसने अपने सौभाग्य से यमुना के मनोरम प्रवाह के विलासों को भी विस्मित कर दिया है, और चन्द्रशेखर भगवान् शंकर की उस दिव्य वाणी की भी उपासना करता हूँ, जिसने सरस्वती के करतल में स्थित उदारवीणा के मधुर वाणी को भी तिरस्कृत कर दिया है। भगवान् के उन लाल–लाल नेत्राों के अपो कोयों की उपासना करता हूँ, जो नेत्राप्रान्त मृगी हिरन आदि के नेत्रा–भमि, वैचित्रय को मात करने में निपुण है। अब मैं भगवान् के उन प्राणों की आराधना करता हूँ, जो प्रतिक्षण अभिनव सुषमा के अरों को धारण करते हैं।

 

नृत्तारम्भेषु हस्ताहतमुरजध्मििि(ंकृतैरत्युदारै,

त्तिानन्दं विध्त्ते सदसि भगवत: संततं य: स नन्दी।

चण्डीशाद्यास्तथान्ये चतुरगुणगणप्रीणितस्वामिसत्का–

रोत्कर्षोद्यत्प्रसादा: प्रमथपरिवृढा: पान्तु संन्तोषिणो न:।।12।।

 

भगवान् शंकर के नृत्यारम्भ में, अर्थात् नाट्यगोशी में, जो नन्दी अपने हाथों से बजाये गये मृद–मुरज आदि की खघम–खघम वाणी के ऊँची–ऊँची तालों से निरन्तर सम्यों के चित्तों को आनन्दित करते हैं, वे नन्दी हमारी रक्षा करें, तथा और भी जो चण्डीशादि, भगवान के गण हैं, जिन्होने अपने गुणों के चातुर्य से भगवान् को प्रसन्न कर दिया है, और अपने स्वामी के इस सत्कारोत्कर्ष, से जो खुद भी बडे़ प्रसन्न है, वे चण्डी शादि और सन्तोषशील श्रेष्ठ प्रमथगण भी हमारी रक्षा करें।

 

मुत्तफामाणिक्यजालै: परिकलितमहासालमालोकनीयं,

प्रत्युप्तानध्‍र्रत्नै खदशि दिशि भवनै: कल्पितैखदक्पतीनाम्।

उद्यानैरकिन्यापरिजनवनितामाननीयै: परीतं,

हृद्यं हृद्यस्तु नित्यं मम भुवनपते र्धम सोमाध्‍र्मौले:।।13।।

 

भगवान् शंकर के जिस धाम–निवास स्थान के बीच में, मोती व माणिक्य आदि श्रेष्ठ रत्नों द्वारा एक साल वृक्ष या स्तम्भद्ध की रचना की गई है, और उस स्थान के चारों ओर या प्रत्येक दिशा में, बहुमूल्य रत्नों से रचित दिक्पालों के भवन विराजमान हैं, और जगत्जननी पार्वती जी की सेवा में संलग्न जो यक्षानायें व अप्सरायें हैं, उनसे समादरणीय या सेवनीय उद्यानों से जो शिव धाम व्याप्त है। इस प्रकार का वह भुवनपति भगवान् चन्द्रशेखर का रमणी धामस्थान, हमेशा मेरे हृदय में रहे, अर्थात् ऐसे रमणीय व दिव्य धम का मैं हमेशा ध्यान करता रहूँ।

 

स्तम्भैर्जम्भारिरत्नप्रवरविरचितै: सम्भृतोपान्तभागं,

शुम्भत्सोपानमाग शुचिमणिनिचयैगु‍र्म्पिफतानल्पशिल्पम्।

कुम्भै: सम्पूर्णशोभं शिरसि सुघटितै: शातकुम्भैरपै:,

शम्भो: संभावनीयं सकलमुनिजनै:, स्वस्तिदं स्पात्सदो न:।।14।।

 

इन्द्र के भवनों के रत्नों से भी श्रेष्ठ रत्नों द्वारा निखमत स्तम्भों से सुसज्जित पर्यन्त भाग वाला, उज्जवल  मणियों के समुदाय से जिसमें विविध् चित्राकारी की गई है, ऐसा सुन्दर सोपानमार्ग वाला, शिखर प्रदेश में बनाये हुए निर्मल सुवर्णमय कलशों से जिसकी समस्त सुषमा प्रकट हो रही है, समस्त मुनिजनों से भी सम्मानीय, यह भगवान् शंकर का सुन्दर सभागार–सभा भवन, हम लोगों के लिए कल्याणकारक होवे।

 

न्यस्तो मये सभाया: परिसरविलसत्पादपीठभिरामो,

हृद्य: पादैतुखम: कनकमणिभयैरुच्चकैरुज्ज्वलात्मा।

वासोरलेन केनाप्यध्किमृदुतरेणास्तृतो विस्तृतश्री:,

पीठ: पीडाभरं न: शमयतु शिवयो: स्वैरसंवासयोग्य:।।15।।

 

समीपस्थित सुन्दर पायदान से सुशोभित, और सुवण व मणियों के बने हुए चार पादों - पैरों से प्रतीक्षित, अतएव हृदय, अत्यन्त सूक्ष्म किसी अनिर्वचनीय शोभा सम्प श्रेष्ठ वस्त्रा से आच्छादित होने से, जिसकी कान्ति सरंप हो रही है, इस प्रकार जगत्जननी पार्वती व जगतपिता भगवान् शंकर के स्वच्छन्द श्वांश के योग्य, सभा के बीच में प्रतीक्षित यह ‘पीठ’ हम लोगों के अशेष क्लेशों को दूर करे।

 

आसीनस्याध्पिीठं त्रिाजगदध्पितेर्घ्रिपीठानुषत्तफौ,

पाथोजाभोगभाजौ परिमृदुलतलोासिपद्मादिरेखौ।

पातां पादावुभौ तौ नमदमरकिरीटोसच्चारुहीर–

श्रेणीशोणायमानोतनखदशकोद्भासमानौ समानौ।।16।।

 

पूर्वोक्त्त पीठ में विराजमान, तीनों लोकों के अधिपति जो भगवान् शंकर हैं, उनके, पायदान में सटे हुए, कमल के आकार का है स्वरूप या प्रकार जिनका और अत्यन्त कोमल तलभागों में स्प दिखाई दे रही पद्मादि जिनमें, नमस्कार करते समय देवताओं के मुकुट में स्थित जो हीरकादि मणिगण, उनकी लाल लाल कान्ति से चमक रहे हैं उत दशों नरव जिनके, परस्पर एक दूसरे से मिलते जुलते वे दोनों चरण पाद हम लोगों की रक्षा करें।

 

यादो वेदवाचां निगदति निखिलं लक्षणं पक्षिकेतु–

र्लक्ष्मीसंभोगसौख्यं विरचयति ययोश्चापरे रूपभेदे।

शम्भो: सम्भावनीये पदकमलसमासतस्तुशोभे,

माल्यं न: समग्रं सकलसुखकरे नूपुरे पूरयेताम्।।17।।

 

भगवान् शंकर के जिन नूपुरों का निनाद–झंकार, समस्त वेदवाक्यों के आकार व प्रकाररूप लक्षण को प्रस्तुत करता है, जिन नूपुरों के रूपान्तरदशा में अर्थात् कुछ दूसरा ही रूप धारण कर लेने पर, भगवान् विष्णु लक्ष्मी के संयोग सौख्य का अनुभव करते हैं। इस प्रकार भगवान् के पदकमल के संसर्ग से जो निरतिशय शोभा सम्प हैं, सभी लोगों को सुख देने वाले, तथा भगवान् शंकर के भी सम्माननीय वे ‘नूपुर’ हम लोगों के समस्त मलों को या सम्पूर्ण कामनाओं को पूरण करें।

 

अे श्रृारयोने: सपदि शलमतां नेत्रावौ प्रयाते,

शत्राोरु(त्य तस्मादिषुध्यिुगमधे न्यस्तमग्ने किमेतत्।

शामित्थं नतानाममरपरिषदामन्तरकूरयत्त,

त्संघातं चारु ज्घायुगमखिलपते रंहसां संहरे:।।18।।

 

जब भगवान् शंकर के तृतीय नेत्रााग्नि में कामदेव का सारा शरीर शलमता को प्राप्त हो गया, अर्थात् भस्म हो गया, तो भगवान् के जड़धयुगल में देवताओं को यह दशा होने लगी, कि क्या उसी शत्रुभूत कामदेव से छीने हुए और नीचे तूणीर युगल हैं। जिन जघायुगलों ने देवताओं के अन्त: करण में इस प्रकार की दशा उत्पन्न कर दी, अखिल पति भगवान् के, वे सुन्दर जघायुगल, हम लोगों के पाप संघात को दूर करें।

 

जानुद्वन्देन मीनवजनृवरसमुद्गोपमानेन साकं,

राजन्तौ राजरम्भाकरिकरकनकस्तम्भसम्भावनीयौ।

ऊरू गौरीकराम्भोरुहसरससमामर्दनानन्दभाजौ,

चारू दूरीक्रियास्तां दुरितमुपचितं जन्मजन्मान्तरे न:।।19।।

 

सुन्दरता में जो कामदेवादि के जानुयुगल के समान सुशोभित हैं, और राजरम्भा, करिकर कनकस्तम्भ की जिनमें सम्भावना की जाती है, जो गौरी के कर कमलों से सरसता पूर्वक समर्दन के योग्य है, ऐसे सुन्दर भगवान् शंकर के ऊरू घुटने हमारे जन्म जन्मान्तरों से सिक्त पापों के समुदाय को दूर करें।

 

आमुत्तफानर्घरत्नप्रकरकरपरिष्वत्तफ कल्याणकाी

दाम्ना ब(ेन दुग्ध्ध्ुतिनिचयमुषा चीनपाम्बरेण।

संवीते शैलकन्यासुचरितपरिपाकायमाणे नितम्बे,

नित्यं नर्नत्र्तु चित्तं मम निखिलजगत्स्वामिन: सोममौलेे:।।20।।

 

पर्वतराज पुत्री पार्वती के प्रचुर पुण्यों के परिपाक स्वरूप फलस्वरूपद्ध बहुमूल्य रत्नों की किरणों का सम्पर्क है जिसमें, ऐसे कल्याणकारक–काची–करघनी रूपी रस्सी डोर से बंधे हुए, स्वच्छता में दुग्ध् को भी मात करने वाले, चीनप वस्त्र अर्थात् सूक्ष्म व सुन्दर वस्त्र से आच्छादित, या संवेति, जो निखिल ब्रह्माण्ड के अधिपति चन्द्रशेखर भगवान् शंकर जी का नितम्ब हैं, मेरा मन हमेशा उसमें नाचा करे, अर्थात् मैं उसका ध्यान करता रहूँ।

 

संयाकालानुरज्यद्दिनकरसरुचा कालधैतेन गाढं,

व्यान(: स्ग्ध्मिुग्ध्: सरसमुदरबन्ध्ेन वीतोपमेन।

उद्दीप्तै: स्वप्रकाशैरुपचितमहिमा मन्यथारेरुदारो,

मयो मिथ्यार्थसय्मम दिशतु सदा सत मलानाम्।।21।

 

भगवान् शंकर का कटि मयभाग, जो कि सांयकालीन लाल लाल सूर्य की किरणों के समान, काल वस्त्र से अच्छी तरह बंधा हुआ है, और यज्ञोपवीत के समान जो उदरबन्ध् त्रिवलि है उदरमयस्थित तीन रेखायें उनसे उससे कोमल तथा मनोहर मालूम पड़ता है, ऊपर को फैले हुए प्रकाश पुज से जिसकी महिमा और बढ़ रही है, और मिथ्यावस्तु के समान नगण्य अर्थात् क्षीण–पता और उदार जो भगवान् कामारि महादेव का ‘मयभाग’ कठिमयभागद्ध है, वह हमेशा हमें मलपरम्परा प्रदान करें।

 

नाभीचक्रालवालावनवसुषमादोहदश्रीपरीता–

दुद्गच्छन्ती पुरस्तादुरदरपथमतिक्रम्य वक्ष: प्रयान्ती।

श्यामा कामागमार्थप्रकथनलिपिवद् भासते या निकामं,

सा मां सोमाध्‍र्मौले: सुखयतु सततं रोवीमती।।22।।

 

भगवान् शंकर की वह श्रेष्ठ रोमावली, जो उनके अभिनव सुषमा कलिका के मनोभिषित सौन्दर्य निकेतन स्वरूप, नाभि चक्रालवाल–थाल से निकलती हुई आगे उदर प्रदेश को पार कर, वक्ष:स्थल तक पहुँची हुई है। श्यामा काली वह रोमावली, काम शास्त्र के अभिप्राय को प्रकट करने वाली लिपि–अक्षरवाली की तरह अत्यन्त सुशोभित हो रही है। अथवा कोई ‘श्यामा’ यौवनमयस्था सुन्दरी जिस प्रकार रोमावली के द्वारा अपने कामाभिप्राय को प्रकट कर सुशोभित होती है, उसी प्रकार उत्तम रोमावली भी अति सुशोभित है। इस प्रकार की चन्द्रशेखर भगवान् शंकर की वह निरतिशय श्रेष्ठ रोमावली मुझे हमेशा सौख्य प्रदान करे।

 

आश्लेषेष्वजिाया: कठिनकुचतटीलिप्तकाश्मीरप–

व्यासदुद्यदर्कद्युतिभिरुपचितस्पध्‍र्मुद्दामहृद्यम्।

दक्षारातेरुदूढप्रतिनवमणिमालावलीभासमानं,

वक्षो विक्षोभिताघं सततनतिजुषां रक्षतादक्षतं न:।।23।।

 

भगवती पार्वती के आश्लेष के प्रस में, कठिन कुचस्थल में लिप्त जो काश्मीर केसर प, उसके सम्पर्क से जिनका वक्षस्थल कुछ लाल व पीला हो गया है, ऐसा मालूम पड़ता है कि मानो उगते हुए सूर्य की किरणों के साथ स्पर्ध कर रहा हो, इस प्रकार अतिमनोहर तथा नवनीनमणिमाला के धरण करने से उज्वल, पापों को न करने वाल, अविनाशी दक्षारति, शर का वह वक्षस्थल, निरन्तर प्रणामादि में लगे हुए हम लोगों के वक्ष–हृदय की रक्षा करे।

 

वामो विस्पफुरन्त्या: करतलविलसच्चारुरत्तफोत्पलाया:,

कान्ताया वामवक्षोरुहभरशिखरोन्मर्दनव्यग्रमेकम्।

अन्यांस्त्राीनप्युदारान् वरपरशुमृगालतानिन्दुमौले–

र्बाहूनाब(हेमादमणिकटकानन्तरालोकयाम:।।24।।

 

चन्द्रशेखर भगवान् शंकर के बायें भाग में विराजमान, हाथ में सुन्दर लाल कमल को धारण की हुई, भगवाती के बायें वक्षस्थल के अत्युत भाग के मर्दन में एक हाथ व्यग्र है, और शेष परशुमृगादि अलंकारों से युक्त जिनमें सुवर्णमय केयूर तथा मणिमय कटक–कण बंधे हुए हैं, ऐसे विशाल भगवान् के अन्य तीन हाथो का भी, बीच में हम दर्शन कर रहे हैं।

 

संभ्रान्ताया: शिवाया: पतिविलयभिया सर्वलोकोपतापा–

त्संविग्नस्यापि विष्णो: सरभसमुभयोर्वारणप्रेरणाभ्याम्ं

मये त्रौशवीयामनुभवति दशां यत्रा हालाहलोष्मा,

सोयं सर्वापदां न: शमयतु निचयं नीलकण्ठस्य कण्ठ:।।25।।

 

समुद्रमन्थन के समय जब पहले समुद्र से कालकूल हालाहल विष निकला था, तो दैत्यों ने देवताओं के हिस्से में उसे लगा दिया, परन्तु देवताओं के बीच में कोई भी देव उसे पीने के लिए राजी नहीं हुआ, इसी बीच में भगवान् नीलकण्ठ शिव ने उस विष के प्याले को पीने के लिए उठा लिया, इस अवसर पर पति के निधन के भय से पार्वती जी बहुत घबराई, और उस प्याले को पीने से रोकने लगी, इधर भगवन विष्णु इसलिए घबरा रहे थे, यदि यह विष का प्याला भगवान् शंकर ने नहीं पिया तो बहुत ही अनर्थ हो जायेगा, इससे तो सारा संसार ही जल जायेग, अत: भगवान् विष्णु शंकर को विष पीने के लिए प्रेरित कर रहे थे। इस बीच में जब भगवान् शंकर ने विष का प्याला उठा लिया, तो वह करीब करीब गले कण्ठ तक पहुँच गया था, इस स्थिति में आगे निगलने को पार्वती जी मना कर रही हैं, और भगवान् विष्णु निगल जाने को प्रेरित कर रहे हैं, इन दोनों के निवारण व प्ररेणा से कण्ठ में स्थित ज्वालारूप उस विष की वही हालत हुई, जो हालत त्रिश की हुई थी, अर्थात् उस विष को भगवान् अब न तो उगल ही सकते हैं, और न निगल ही सकते हैं। अत: जिस नीलकण्ठ के कण्ठ में उक्त विष, त्रिश की दशा का अनुभव कर रहा है, वह भगवान् का कण्ठ हमारी सभी आपत्तियों के ढ़ेर को न करें।

 

हृघैरीन्कन्यामृदुदशनपदै मु‍र्तिो विुमश्री–

रुद्योतन्या नितान्तं ध्वलध्वलतया मिश्रितौ दन्तकान्त्या।

मुत्तफामाणिक्यजालव्यतिकरसदृश तेजसा भासमान:,

सद्योजातस्य दद्यादध्रमणिरसौ संपदां संचयं न:।।26।।

 

भगवान् शंकर का जो अध्र, पर्वतराज पुत्री पार्वती के सुन्दर एवं कोमल दशन दन्त पंक्ति से अति है। स्वयं वह अध्र प्रवालमणि की तरह लाल है, पर उपर को उठती हुई अत्यन्त स्वच्छ दन्तकान्ति से मिश्रित है, इस प्रकार स्वयं लाल और दन्त कान्ति के ध्वल वह ‘अध्रमणि’ मोती व माणिक्य समुदाय से मिश्रित कान्ति वाला मालूम पड़ता है। भगवान् शंकर का वह पूर्वोक्त्त ‘प्रवालमणि की तरह रक्त अध्रमणि’ हम लोगों को सम्पत्ति का भण्डार प्रदान करे।

 

कर्णालारनानामणिनिकररुचां सयिैरतिायां,

वण्र्यायां स्वर्णपद्मोदरपरिविलसत्कखणकासंनिभायाम्।

प(त्यां प्राणवायो: प्रणतजनहृदम्भोजवासस्य शम्भो–

खनत्यं नत्तिमेतद्विरचयतु सुखेनासिकां नासिकायाम्।।27।।

 

भगवान् शंकर की जो नासिका, कर्णाभरण के रूप में गुंथे हुए अनेक प्रकार के मणिगणों की कान्ति के जाल से व्याप्त है, स्वयं जो नासिका स्वर्णमय कमल के मय स्थित कखणका के समान है, जिसमें निरन्तर प्राणवायु का पूरक कुम्भक व रेचक द्वारा संहार होता रहता है। प्रणतजनों के हृदय कमल में वसने वाले, भगवान् शंकर की, वण्र्य विषयीभूत या प्रस्तुत इस नासिका में, हमारा यह चित्त निरन्तर विश्राम करें अर्थात् हम मनोयोग पूर्वक उक्त नासिका का ध्यान करते रहें।

 

अत्यन्तं भासमाने रुचिरतररुचां संगमात् सन्मणीना–

मुद्यच्चण्डांशुधमप्रसनिरसनस्पदृापदाने।

भूयास्तां भूतये न: करिवरजयिन: कर्णपाशावलम्बे,

भत्तफालीभलसज्जज्जनिमरणलिपे: कुण्डले कुण्डले ते।।28।।

 

भगवान् शंकर के वे कुण्डल, जो कि अतिशय कान्ति सम्प सुन्दर मणियों के सम्पर्क से खूब सुशोभित हो रहे हैं। जो कुण्डल उगते हुए सूर्य के तेज के प्रसार को रोकने में तत्पर हैं। पुन: भक्ति के भाल में लिखी हुई जन्ममरण की जो अक्षर पंक्ति है, उसको स्पष्ट देखने के लिए कुण्डली के समान हैं, अर्थात् दर्पण की तरह जिन कुण्डलों में भक्त अपना शुभाशुभ फल देखा करते है, अथवा जिन कुण्डलों के ध्यान  से भक्तो की जन्म मरण अक्षरों वाली कुण्डली ही गोल हो जाती है, अर्थात् जन्म मरण चक्र से छुटकारा मिल जाता है। मत हाथी को जीतने वाले जो भगवान् शंकर हैं, उनके कर्णपाशों में लटके हुए वे अनिर्वचनीयद्ध ‘कुण्डल’ हम लोगों का कल्याण करें।

 

याभ्यां कालव्यवस्था भवति तनुमतां यो मुखं देवतानां,

येषामाहु: स्वरूपं जगति मुनिवरा देवतानां त्रायीं ताम्।

रुाणीवक्त्रायेरुहसततविहारोत्सुकेन्दिन्दिरेभ्य–

स्तेभ्यस्त्रिाभ्य: प्रणामालिमुपरचये त्राीक्षणस्येक्षणेभ्य:।।29।।

 

भगवान् शंकर के जिन दो नेत्राों से संसार में शरीरधरियों के लिए कालव्यवस्था होती है, अर्थात् जिन नेत्रों के उन्मीलन तथा निमीलन से संसार का उदयास्त होता है, और भगवान् का जो तृतीय भाल स्थित नेत्रा या नेत्रााग्नि है, वही देवताओं का मुख कहा जाता है, अर्थात् अग्नि द्वारा देवताओं को हव्य तथा कव्य पहुँचता है। संसार में श्रेष्ठ मुनि लोग जिन नेत्राों को, देवत्रायी स्वरूप मानते हैं, अर्थात् जिनको ब्रह्मा विष्णु व रुद्र स्वरूप मानते हैं। जिनसे क्रमश: सृष्टि स्थिति व लय होता है। भगवान् शंकर के वे नेत्र, जो कि भगवती पार्वती के मुखकमल में विहरण करने में, भ्रमरों के समान हैं, उन्हीं तीन भगवान् के नेत्राों के लिए, मैं अपनी प्रणामाव्लि अर्पण करता हूँ।

 

वामं वामागाया वदनसरसिजे व्यावलद्वल्लभाया,

व्यानम्रेष्वन्यदन्यत्पुनरलिकभवं वीतनि:शेष रौक्ष्यम्।

भूयो भूयोपि मोदत्रिापतदतिदयाशीतलं चूतवाणे,

दक्षारेरीक्षणानां त्रायमपहरतादाशु तापत्रायं न:।।30।।

 

भगवान् शंकर की वरौनियों से झुकी हुई, उन तीन आंखों में से, एक जो बायीं आँख है, वह तो बायें भाग में समासीन प्रिया पार्वती जी के मुखकमल में लगी हुई है, अर्थात् वदनकमल के सौन्दर्य में समान आशक्त है, पुन: दूसरी आँख जो ललाट में स्थित है, वह कामदेव के विषय में अब निवैर है, अर्थात् अब उस ललाटस्थित अग्निरूप नेत्र ने कामदेव के संबंध् में होने वाली अपनी रूक्षता को भी समाप्त कर दिया है। पुन: तीसरी आँख जो कि प्रसता से विकसित होती हुई, बार बार पलकें गिरा रही है, वह दया से अत्यन्त शीतल है। इस प्रकार भगवान् शंकर की यह नेत्रभयी तीन आँखें हम लोगों के तीनों तापों को दूर करें, अर्थात् तीनों नेत्र क्रमश: अध्भिौतिक, आध्दिैविक तथा अयात्मि तापों को दूर करें।

 

यस्मिनध्े‍र्न्दुमुग्ध्द्युतिनिचयतिरस्कारनिस्तन्कान्तौ,

काश्मीरक्षोदसंकल्पितमिव रुचिरं चित्राकं भाति नेत्राम्।

तस्मिुीलचिीनटवरतरुणीलास्यरयमाणे,

कालारे: पफालदेशे विहरतु हृदयं वीतचिन्तान्तरं न:।।31।।

 

भगवान् शंकर का वह भाल देश फलप्रदेश, जिसने अपनी पूर्ण कान्ति से अध्‍र्चन्द्र के सुन्दर छविसाम्राज्य को तिरस्कृत कर दिया है, जिस भाल के मय में स्थित विचित्रा व रूचिर तृतीय नेत्रा, ऐसा मालूम पड़ता है, मानो कश्मीर में समुत्प, केसर से ही बना हो, जो भालदेश, उक्त नृत्य में लीन अर्थात् ताण्डव नृत्य परायण, भगवान् शंकर की प्रिया पार्वती के लास्य कोमलनृत्य के लिए रशाला है, इस प्रकार के कालनाथ भगवान् शंकर के फलादेश–भाल प्रदेश में, नित तथा निरन्तर मेरा हृदय विहार करे।

 

स्वामिन् गामिवाीकुरु तव शिरसा मामपीत्यर्थयन्तीं,

ध्न्यां कन्यां खरांशो: शिरसि वहति कत्वेष कारुण्यशाली।

इत्थं शा जनानां जनयदतिघनं कैशिकं कालमेघ

च्छायं भूयादुदारं त्रिापुरूविजयिन: श्रेयसे भूयसे न:।।32।।

 

हे स्वामिन् आप अपनी गंगा की तरह मुझे भी शिर में धारण कीजिए, इस प्रकार प्रार्थना करने वाली धान्य–भाग्यशालिनी सूर्यसुल्ता यमुना जी को भी ये करुणा वरुणालय शंकर शिर में धरण करते हैं क्या? लोगों के मन में इस प्रकार की दशा उत्पन्न कराने वाला, वह त्रिपुरविजयी भगवान् का विशाल व घना काले बादलों के समान कान्तिवाला केश समूह, हम लोगों के लिए अत्यन्त कल्याणकारक होवे।

 

श्रृाराकल्पयोग्यै: शिखरिखरसुतासत्सखीहस्तलूनै:,

सूनैराब(मालावलिपरिविलसत्सौरभाकृभृम्।

तुं माणिक्यकान्त्या परिहसितसुरावासशैलेन्श्रृं,

संघं न: संकटानां विघटयतु सदा काटीकं किरीटम्।।33।।

 

भगवान् शंकर का वह उत किरी–मुकुट, जो पर्वतराज पुत्री पार्वती की सुन्दर सखियों के हाथों से तोडे़ गये, श्रृंगार संबंधी आवरण के योग्य, पुष्पों की मालाओं से खचित–आवरण है, मालाओं में बँध्े हुए जिन पुष्पों की उत्कृष्ट सुगन्ध् से, आकृ हुए भ्रमर, उस किरीट के चारों ओर मंडरा रहे हैं। जो किरीट माणिक्यादि मणियों की कान्ति के निम्नोत पुष्प से, कैलास पर्वत के शिखरों को भी मात कर रहा है, ऐसा अत्युत भगवान् का वह अनेकमणि प्रभाओं के जाल से खचित ‘किरीट’ हमेशा हमारे संकटों के जाल को नष्ट करे।

 

वक्राकार: कली जडतनुरहमप्य्घ्रिसेवानुभावा–

दुत्तंसत्वं प्रयात: सुलभतरघृणास्यन्दिनन्मौले:।

तत्सेवन्तां जनौघा: शिवमिति निजयावस्थयैव ब्रुवाणं,

वन्दे देवस्य शम्भो मु‍र्कुटसुघटितं मुग्ध्पीयूषभानुम्।।34।।

 

अकारण करुणालय, यों ही कृपा करने वाले, भक्त वत्सल चन्द्रशेखर, भगवान् शंकर की चरणों की सेवा के प्रभाव से, वक्री कुटिल कुचाली, कली, अनेक दोषों का घर, जड़मति महामूर्ख मैं चन्द्रद्ध भी, जब भगवान् का शिरोभूषण बन गया, तब सरल सज्जन व स्वस्थ मनुष्यों के विषय में क्या कहा जाय, अर्थात् इतना दोष ग्रस्त जब मैं उनकी सेवा से इस प्रकार के पद को प्राप्त कर सकता हूँ, तो सरल स्वभाव और ज्ञानपूर्वक उनकी सेवा करने से तो न जाने किस पद को मनुष्य प्राप्त करेगा? इसलिए हे मनुष्यो! तुम शिव की सेवा में तत्पर रहो। अपनी अवस्था से जो इस बात को बता रहा है, भगवान् शंकर के मुकुट में प्रतिष्ठित उस सुन्दर अमृत के समान शीतल किरणवाले, चन्द्र को मैं नमस्कार करता हूँ।

 

कान्त्या संपफुमीकुसुमध्वलया व्याप्य विं विराज–

न्वृत्ताकारो वितन्वन्मुहुरपि च परां निवु‍र्त पादभाजाम्।

सानन्दं नन्दिदोष्णा मणिकटकवता वाह्यमान: पुरारे:,

ेतच्छत्रााख्यशीतद्युतिरपहरतादापदस्तापदा न:।।35।।

 

भगवान् का वह छत्र जो प्रफुल्लित माध्वी पुष्प के समान स्वच्छ कान्ति से संसार को ध्वलित कर रहा है, जिसका आकार गोल है, और समीपस्थ पर्वतों में स्थित प्राणियों को परम शान्ति प्रदान कर रहा है, जिसको मणिमय–कण पहने हुए हाथ से भगवान् नन्दी बडे़ आनन्द के साथ धरण कर रहे हैं, वह महादेव का शीतल कान्ति वाला ेतच्छत्रा, हम लोगों को अत्यन्त संन्ताप देने वाली, आपत्तियों को दूर करे।

 

दिव्याकल्पोज्वलानां शिवगिरिसुतयो: र्पायोराश्रितानां

रुाणीसत्सखीनां मदतरलकटाक्षालैरतिानाम्।

उदवेद्बाहुवीविलसनसमये चामरान्दोलनीना–

मुदभूत: कणालीवलयकलकलो वारयेदापदो न:।।36।।

 

भगवान् शंकर व गिरिसुता पार्वती जी के समीप में बैठी हुई, दिव्यवेष से उज्वल, मद से चंचल कटाक्ष नैनों से युक्त, जो चामर चलाने वाली पार्वती जी की प्रिय सखियाँ हैं, उनके चामर चलाते समय, उपर को उठते हुए उनके भुजलताओं के विलास से उत्पन्न हुआ कणों का कलकल, कलकल वाणी युक्त शद्व हमारी आपत्तियों का निवारण करे।

 

स्वगौक:सुन्दरीणां सुललितवपुषां स्वामिसेवापराणां,

वल्गद्भूषाणि वक्त्रााम्बुजपरिविगलन्मुग्ध्गीतामृतानि।

नित्यं नृत्तन्यूपासे भुजविध्ुतिपदन्यासभावावलोक–

प्रत्युद्यत्प्रीतिमाद्यत्प्रमथनटनटीदत्तसंभावनानि।।37।।

 

सुललित शरीर युक्त, स्वामी सेवा परायण जो स्वर्गानायें हैं, उनके झनकते हुए भूषामणियों की वाणी है, जिसमें ऐसा मुखकमलों से निकलता हुआ सुन्दर गीतामृत वाला वह नृत्त, गात्रा विक्षेप, विशि नृत्यद्ध जिसमें भुजविक्षेपों, पाद विन्यासों तथा हावभाव पूर्वक अवलोकन से, प्रमथगण शिवसेवकों की नटी व नटों का हर्ष बढ़ रहा है, और वे आदरपूर्वक उस नृत्त को देख रहे हैं, ऐसे सुर सुन्दरियों के पादविक्षेप विशेष ‘नृत्त’ की मैं प्रतिदिन उपासना करता हूँ।

 

स्थानप्राप्त्या स्वराणां किमपि विशदतां व्ययन्मुवीणा–

स्वानावच्छित्रातालक्रमममृतमिवास्वाद्यमानं शिवाभ्याम्।

नानारागातिहृद्यं नवरसमध्ुरसस्तोत्राजातानुवि(ं,

गानं वीणामहषे‍र्: कलमतिललितं कर्णपूरायतां न:।।38।।

 

स्वरों के अपने अपने स्थानों में पहुँच जाने से, कुछ अधिक स्पष्टता से सुनाई देने वाला, मृदुल वीणा के स्वर व ताल के क्रम से युक्त, अनेक प्रकार के रागों से सरित, श्रृरादि नवों रसों से मधुर,मधुर स्तोत्राों से संयुक्त, शिव तथा पार्वती के द्वारा भी अमृत की तरह आस्वादनीय, वीणापाणि महखष नारद का वह अवयक्त व ललित संगीत, हमारे कानों का आभरण बने, अर्थात् हमेशा हमें सुनाई दे।

 

चेतो जातप्रमोदं सपदि विदध्ती प्राणिनां वाणिनीनां,

पाणिद्वन्दाग्रजाग्रत्सुललितरणितस्वर्णतालानुकूला।

स्वीयारावेण पाथोध्रखपटुना नादयन्ती मयूरीं

मायूरी मन्दभावं मणिमुरजमवा मार्जना मार्जये:।।39।।

 

प्राणियों के चित्त को प्रसन्न करती हुई, सुर–सुन्दरियों के सुकोमल करताल से ताडित बजाये गये स्वर्ण ताल के अनुकूल, मेघ की गम्भीर वाणी के समान अपनी वाणी से, मयूर को बुला देने वाली, मणिमुरज से उत्पन्न होने वाली वह मयूर वाणी तुल्य मार्जन गर्जनाद्ध हमारे अज्ञान को दूर करे।

 

देवेभ्यो दानवेभ्यो पितृमुनिपरिषत्सि(विद्याध्रनेभ्य:,

सायेभ्यारणेभ्यो मनुजपशुपतज्जातिकीटादिकेभ्य:।

श्रीकैलासप्ररुढास्तृणाविटपिमुखाापि ये सन्ति तेभ्य:,

सवे‍र्भ्यो निखवचारं नतिमुपरचये शर्वपादाश्रयेभ्य:।।40।।

 

मैं शंकराचार्यद्ध सभी देवताओं, दानवों, पितरों, मुनिगणों, सिद्धो व विधध्रों, तथा सायों शिवगणोंद्ध चारणों स्तुतिगायकोंद्ध और मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट आदियों को, तथा श्री कैलाश पर्वत में उत्पन्न हुए जितने भी तृण घास, लतायें व वृक्ष हैं, उन सब अथ च भगवान् शंकर के चरणकमलों के आश्रित, जितना भी चराचर प्राणिमात्रा है, या ब्रह्माण्ड है, सबको निर्विचार पूर्वक, बिना विचारे अर्थात् चराचर जगत् के किसी भी पदार्थ में, उच्च नीच भाव को न देखते हुए, क्योंकि समस्त ब्रह्माण्ड में एक ही सच्चिदानन्द घन जब व्याप्त है, तो फिर भेदभाव के लिए गुंजाइश ही कहाँ है, अत: यावत् चराचर पदार्थ को मैं समान दृष्टि से प्रणाम करता हूँ।

 

यायेत्यिं प्रभाते प्रतिदिवसमिदं स्वोत्रारत्नं पठेद्य:,

क वा ब्रूमस्तदीयं सुचरितमथवा कीर्तयाम: समासात्।

सम्पज्जातं समग्रं सदसि बहुमत सर्वलोकप्रियत्वं,

सम्प्राप्यायु:शतान्ते पदमयति परब्राणो मन्यथारे:।।41।।

 

जो मनुष्य इस स्तोत्र का प्रतिदिन हमेशा ध्यान करे या पाठ करे तो उसके सुचरित–पुण्यों के विषय में क्या कहा जाय, अर्थात् उस पुण्यात्मा का वर्णन शब्दों से नहीं हो सकता है, फिर भी लोक व्यवहार या लोक संग्रह के लिए हम संक्षेप में उसके पुण्यों के सुपरिणामों का थोड़ा वर्णन करते हैं। वह सुकृति, इस लोक में समस्त सम्पत्तियों को, सभा में सम्मान को, तथा लोकप्रियता को प्राप्त कर, सौ वर्ष के बाद अर्थात् अन्त में, परब्रस्वरूप भगवान् शंकर के ‘पद’ को अर्थात् ‘शिवलोक’ को प्राप्त करता है।

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Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

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