शिव स्तुति

महामृत्युञ्जयकवचम् २

Maha Mrityunjay

श्रिदेव्युवाच

भगवन् सर्वधर्मज्ञ सृष्टिस्थितिलयात्मक ॥

मृत्युञ्जयस्य देवस्य कवचं में प्रकाशय ॥

 

श्री ईश्वर उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिदम् ।

मार्कण्डेयोऽपि यद्धृत्वा चिरञ्जीवी व्यजायत ॥

 

तथैव सर्वदिक्पाला अमरात्वमवाप्नुयुः ।

कवचस्य ऋषिर्ब्रह्मा छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतन् ॥

 

मृत्यञ्जयः समुद्दिष्टो देवता पार्वतीपतिः ।

देहारोग्यदलायुष्ट्वे विनियोगः प्रकीर्तितः ।

ओं त्रयम्बकं मे शिरः पातु ललाटं मे यजामहे ।

सुगन्धिं पातु हृदयं जठरं पुष्टिवर्धनम् ॥

 

नाभिमुर्वारुकमिव पातु मां पार्वतीपतिः ।

वन्धनादूरुयुग्मं मे पातु वामाङ्गशासनः ॥

 

मृत्योर्जानुयुगं पातु दक्षयज्ञविनाशनः ।

जङ्घायुग्मं च मुक्षीय पातु मां चन्द्रशेखरः ॥

 

मामृताच्च पदद्वन्द्वं पातु सर्वेश्वरो हरः ।

प्रसौ मे श्रीशिवः पातु नीलकण्ठश्च पार्श्वयोः ॥

 

ऊर्ध्वमेव सदा पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ।

अधः पातु सदा शम्भुः सर्वापद्विनिवारणः ॥

 

वारुण्यामर्धनारीशो वायव्यां पातु शङ्करः ।

कपर्दी पातु कौबेर्यामैशान्यामीश्वरोऽवतु ॥

 

ईशानः सलिले पायदघोरः पातु कानने ।

अन्तरिक्षे वामदेवः पायात्तत्पुरुषो भुवि ॥

 

श्रीकण्ठः शयने पातु भोजने नीललोहितः ।

गमने त्र्यम्बकः पातु सर्वकार्येषु भुपतिः ।

सर्वत्र सर्वदेहं मे सदा मृत्युञ्जयोऽवतु ।

इति ते कथितं दिव्यं कवचं सर्वकामदम् ॥

 

सर्वरक्षाकरं सर्वग्रहपीडा-निवारणम् ।

दुःस्वप्ननाशनं पुण्यमायुरारोग्यदायकम् ॥

 

त्रिसन्ध्यं यः पठेदेतन्मृत्युस्तस्य न विद्यते ।

लिखितं भूर्जपत्रे तु य इदं मे व्यधारयेत् ॥

 

तं दृष्ट्वैव पलायन्ते भूतप्रेतपिशाचकाः ।

डाकिन्यशचैव योगिन्यः सिद्धगन्धर्वराक्षसाः ॥

 

बालग्रहादिदोषा हि नश्यन्ति तस्य दर्शनात् ।

उपग्रहाश्चैव मारीभयं चौराभिचारिणः ॥

 इदं कवचमायुष्यं कथितं तव सुन्दरि ।

न दातव्यं प्रयत्नेन न प्रकाश्यं कदाचन ॥

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Aaditi Dave

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