आत्मशक्ति की पहचान ही मानसिक चिंताओं व समस्याओं का समाधान है

आत्मशक्ति की पहचान ही मानसिक चिंताओं का समाधान

सुकरात ने कहा था कि अपने आपको जानो। उसने यह वाक्य एक मंदिर के द्वार पर लिख दिया था। उसका मकसद यह था कि अपनी सफलता की कामना लेकर जो भी व्यक्ति मंदिर में भगवान के दर्शन करने आए, उसे सबसे पहले अपने बारे में जानना चाहिए।

वास्तव में सुकरात का यह अपना अनुभव था कि किसी भी क्षेत्र की उपलब्धि और जीवन जीने की कला, दोनों ही अपने बारे में सही ज्ञान पर निर्भर करते हैं। उपनिषदों में कहा गया है कि सत्य का अर्थ होता है, जीवन का सर्वोच रहस्य और उसी को पाने के लिए समस्त जीवन का उपयोग करने का निश्चय ।

एक और बात, वह यह कि परमात्मा ही परम सत्य है। वही हमारे हृदय में आत्मा के रूप में विद्यमान है। इस आत्मशक्ति को जागृत करके परमात्मा के साथ एकरूप हो जाना ही सच्चा और अंतिम जीवन योग है। सुकरात ने इसीलिए कहा था कि जो अपनी आत्मशक्ति को जागृत कर लेता है, उसका जीवन सार्थक हो जाता है और आत्मशक्ति को जागृत करने के लिए जरूरी है कि पहले हम खुद को जानें।

बाइबल में कहा गया है कि हमें ईश्वर की शक्ल के जैसा बनाया गया है। इसका क्या अर्थ है ? इसका अर्थ यह है कि हममें ईश्वरीय गुण होने चाहिए। हमें सर्वज्ञ, स्वेच्छा से निर्माण करने में सक्षम, क्षमाशील और सर्वगुण सम्पन्न होना चाहिए। वास्तव में हम इनमें से जो भी बनना चाहें उसकी शक्ति हममें है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि हम अपनी शक्ति के एक छोटे से हिस्से को ही अपने जीवन में प्रयोग करते हैं और वह भी तब, जब इसके लिए अचानक कोई अवसर आता है।

एक वैज्ञानिक का कहना है कि एक औसत आदमी अपनी मानसिक या आत्मिक शक्ति का केवल 20 प्रतिशत यानी पचासवें हिस्से को ही अपने जीवन में इस्तेमाल करता है। शेष शक्ति बेकार होती रहती है। इसलिए यह बात ध्यान देने की है कि हर व्यक्ति में ऊर्जा का असीम भंडार है। जरूरत इतनी ही है कि इस भंडार को खोल दीजिए और तब आप देखेंगे कि आपकी कायापलट हो गई है। महाभारत में वेदव्यास कहते हैं कि आत्मज्ञान सबसे बड़ा ज्ञान है। सुकरात ने भी इसी शक्ति को पहचाना था।

क्योंकि जिसने आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया, वह मंदिर के अंदर जाकर ईश्वर को क्या जानेगा? बौद्ध धर्म के ग्रंथ ‘धम्मपद’ में लिखा है कि जिसने अपने को समझ लिया, वह दूसरों को समझाने नहीं जाएगा। स्वामी रामतीर्थ ने भी कहा है कि आत्मज्ञान का संपादन करना और आत्मकेन्द्र में स्थिर रहना मनुष्य का सबसे पहला और प्रधान कर्तव्य है। इसलिए अपने को जानने और अपने ऊपर नियंत्रण करने पर ही हम जीवन में सफलता के सोपान चढ़ सकते हैं।

गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक लघुकथा इस प्रकार है- एक बार मनुष्य ने कटाक्ष करते हुए धरती से कहा, ‘हे धरती! तू बहुत कंजूस है। हम दिन-रात मेहनत करते हैं, तब तू हमें अन्न के कुछ दाने देती है। अगर तू हमें बिना मेहनत कराए ही अन्न के दाने दे दे, तो तेरा क्या बिगड़ जाएगा?’ धरती ने उत्तर दिया, ‘मेरा तो कुछ न बिगड़ेगा, बल्कि मेरी तो महिमा और बढ़ जाएगी। लेकिन तब तेरा बहुत कुछ बिगड़ जाएगा। तब तेरा ऊंचा मस्तक, तेरे महल, तेरी शानोशौकत सब मिट जाएंगे, क्योंकि ये सब तेरे परिश्रम करने से ही हैं। हम जब अपनी शक्तियों को पहचान लेते हैं, तो वे अधिक सक्रिय और सार्थक हो उठती हैं।

अपनी शक्ति और अपनी ऊर्जा को सोता हुआ छोड़कर हम जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। उसे सार्थक बनाना है, तो अपनी आत्मशक्ति को जागृत कीजिए और फिर चमत्कार देखिए। एक विचारक ने ठीक कहा है-जीवन एक आश्चर्यभरा संतोषजनक अनुभव हो सकता है। अपनी तमाम असमानताओं और भिन्नताओं के बावजूद जीवन सुखद होता है। जीवन के मूल्य पर विश्वास कीजिए और इसके अनूठेपन के महत्व को स्वीकार कीजिए। इसे संवारिए क्योंकि जिन्होंने इस पर विश्वास किया है और इसे बर्दाश्त किया है, उन्हें अंत में आनंद, शांति और सफलताएं मिली हैं।

Updated: May 25, 2021 — 12:05 pm

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