यात्रा

सरस्वती मंदिर,पुष्कर

Saraswati Temple, Pushkar

राजस्थान के पुष्कर में विद्या की देवी सरस्वती का मंदिर है। यहां वे नदी भी हैं और उन्हें उर्वरता व शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।  पुष्कर में ही मां सरस्वतीजी का मंदिर भी विराजमान है। इस मंदिर में मां की प्रस्तर प्रतिमा है जिसके हाथों में वीणा, माला और पुस्तक विराजमान है। मंदिर

देखने में बहुत ही भव्य और दर्शनीय है। यहाँ सरस्वती को नदी के रूप में भी पूजा जाता है |

लुप्त सरस्वती नदीपुष्कर में सरस्वती नदी के स्नान का सर्वाधिक महत्त्व है। यहाँ सरस्वती नाम की एक प्राचीन पवित्र नदी है। यहाँ पर वह पाँच नामों से बहती है। इस क्षेत्र में पंचश्रोता सरस्वती, प्राणियों के पाप दूर करने के लिए ब्रह्मलोक से आकर ठहरी हैं और उनका सुप्रभा, चंद्रा, नंदा, प्राची, सरस्वती- ये पांच श्रोत स्थित हैं। ज्येष्ठ पुष्कर में सुप्रभा नदी, मध्य पुष्कर में शुद्ध नदी और कनिष्ठ पुष्कर में कनका, नंदा और प्राची सरस्वती नदी बहती है और मंगलकारणी, विष्णु पदि, पद-पद पर पर्वतों-शिखरों को धोती है।

ऐसी मान्यता है कि वेदों में वर्णित सरस्वती नदी पुष्कर तीर्थ और इसके आसपास बहती है। पुष्कर के समीपर्ती गनाहेड़ा, बांसेली, चावंडिया, नांद व भगवानपुरा की रेतीली भूमि में ही सरस्वती का विस्तार था। पद्म पुराण के अनुसार देवताओं ने बड़वानल को पश्चिमी समुद्र में ले जाने के लिए जगतपिता ब्रह्मा की निष्पाप कुमारी कन्या सरस्वती से अनुरोध किया तो वह सबसे पहले ब्रह्माजी के पास यहीं पुष्कर में आशीर्वाद लेने पहुंची। वह ब्रह्माजी के सृष्टि रचना यज्ञ स्थली की अग्रि को अपने साथ लेकर आगे बढ़ीं। महाभारत के शल्य पर्व (गदा युद्ध पर्व) में एक श्लोक है-

पितामहेन मजता आहूता पुष्करेज वा सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्नातम सरस्वती।

अर्थात पितामह ब्रह्माजी ने सरस्वती को पुष्कर में आहूत किया। बताते हैं कि नांद, पिचौलिया व भगवानपुरा जिस नदी से सरसब्ज रहे, वह नंदा सरस्वती ही मौलिक रूप से सरस्वती नदी है। इसके बारे में पद्म पुराण में रोचक कथा है। इसके अनुसार राजा प्रभंजन कुमार ने बच्चे को दूध पिलाती एक हिरणी को तार दिया तो हिरणी के शाप से एक सौ साल तक नरभक्षी बाघ बने रहे। उसने शाप मुक्ति का उपाय पूछा तो हिरणी ने बताया कि नंदा नाम की गाय से वार्तालाप से मुक्ति मिलेगी। एक सौ साल पूरे होने पर बाघ ने एक गाय को पकड़ लिया। गाय ने जैसे ही बताया कि वह नंदा है तो बाघ वापस राजा प्रभंजन के रूप में अवतरित हो गया। गाय की सच्चाई से प्रसन्न हो धर्मराज ने वचन दिया यहां वन में बहने वाली सरस्वती नदी नंदा के नाम से पुकारी जाए।

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