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सरस्वती देवी | वीणा देवी

सरस्वती hindu dharm  की प्रमुख देवियों में से एक हैं। ये Lord Brahma की मानसपुत्री हैं जो विद्या की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं। इनका नामांतर ‘शतरूपा’ भी है। इसके अन्य पर्याय हैं, वाणी, वाग्देवी, भारती, शारदा, वागेश्वरी इत्यादि। ये शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना कही गई हैं। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की परिपाटी चली आ रही है। देवी भागवत के अनुसार ये ब्रह्मा की पत्नी हैं।

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सृजन की देवी के रूप में सरस्वती दैवी प्रेरणा हैं। हमारी भीतरी तलाश और ज्ञान की अंतर्भूत स्थिति जिसके दायरे में हम अबोध होते हैं – होने और बनने के बीच का वह द्वन्द्व जो उपनिषदों की आधारशिला है – उसने परंपरा में ज्ञान और विद्या की देवी के रूप में सरस्वती की प्रतिमा में एक रहस्यमय और भक्तमय रंग ग्रहण कर लिया है। चाहे वह नदी स्वरूप में अपने तटों पर एक संपूर्ण सभ्यता को पोषण देती हुई सरस्वती हो जिसे ऋग्वेद में प्रशस्ति का पात्र बनाया गया हैं, चाहे वह समस्त सृजनात्मक ऊर्जाओं को प्रेरित करने वाली शुभ्र वसना स्वरूप में स्त्री- प्रतिमा हो, सरस्वती बहती हुई चेतना की निरंतरधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं।

परिचय :

सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। उसमें विचारणा, भावना एवं संवेदना का त्रिविध समन्वय है। वीणा संगीत की, पुस्तक विचारणा की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है। लोक चर्चा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है। शिक्षा संस्थाओं में वसंत पंचमी को सरस्वती का जन्म दिन समारोह पूर्वक मनाया जाता है।

पशु को मनुष्य बनाने का – अंधे को नेत्र मिलने का श्रेय शिक्षा को दिया जाता है। मनन से मनुष्य बनता है। मनन बुद्धि का विषय है। भौतिक प्रगति का श्रेय बुद्धि-वर्चस् को दिया जाना और उसे सरस्वती का अनुग्रह माना जाना उचित भी है। इस उपलब्धि के बिना मनुष्य को नर-वानरों की तरह वनमानुष जैसा जीवन बिताना पड़ता है। शिक्षा की गरिमा-बौद्धिक विकास की आवश्यकता जन-जन को समझाने के लिए सरस्वती पूजा की परम्परा है। इसे प्रकारान्तर से गायत्री महाशक्ति के अंतगर्त बुद्धि पक्ष की आराधना कहना चाहिए।

पूजकगण :

कहते हैं कि महाकवि कालिदास, वरदराजाचार्य, वोपदेव आदि मंद बुद्धि के लोग सरस्वती उपासना के सहारे उच्च कोटि के विद्वान् बने थे। इसका सामान्य तात्पर्य तो इतना ही है कि ये लोग अधिक मनोयोग एवं उत्साह के साथ अध्ययन में रुचिपूवर्क संलग्न हो गए और अनुत्साह की मनःस्थिति में प्रसुप्त पड़े रहने वाली मस्तिष्कीय क्षमता को सुविकसित कर सकने में सफल हुए होंगे। इसका एक रहस्य यह भी हो सकता है कि कारणवश दुर्बलता की स्थिति में रह रहे बुद्धि-संस्थान को सजग-सक्षम बनाने के लिए वे उपाय-उपचार किए गए जिन्हें ‘सरस्वती आराधना’ कहा जाता है।

उपासना की प्रक्रिया भाव-विज्ञान का महत्त्वपूर्ण अंग है। श्रद्धा और तन्मयता के समन्वय से की जाने वाली साधना-प्रक्रिया एक विशिष्ट शक्ति है। मनःशास्त्र के रहस्यों को जानने वाले स्वीकार करते हैं कि yog , अध्ययन, कला, अभ्यास की तरह साधना भी एक समर्थ प्रक्रिया है, जो चेतना क्षेत्र की अनेकानेक रहस्यमयी क्षमताओं को उभारने तथा बढ़ाने में पूणर्तया समर्थ है। सरस्वती उपासना के संबंध में भी यही बात है। उसे शास्त्रीय विधि से किया जाय तो वह अन्य मानसिक उपचारों की तुलना में बौद्धिक क्षमता विकसित करने में कम नहीं, अधिक ही सफल होती है।

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फल :

मन्दबुद्धि लोगों के लिए गायत्री महाशक्ति का सरस्वती तत्त्व अधिक हितकर सिद्घ होता है। बौद्धिक क्षमता विकसित करने, चित्त की चंचलता एवं अस्वस्थता दूर करने के लिए saraswati साधना की विशेष उपयोगिता है। मस्तिष्क-तंत्र से संबंधित अनिद्रा, सिर दर्द्, तनाव, जुकाम जैसे रोगों में गायत्री के इस अंश-सरस्वती साधना का लाभ मिलता है। कल्पना शक्ति की कमी, समय पर उचित निणर्य न कर सकना, विस्मृति, प्रमाद, दीघर्सूत्रता, अरुचि जैसे कारणों से भी मनुष्य मानसिक दृष्टि से अपंग, असमर्थ जैसा बना रहता है और मूर्ख कहलाता है। उस अभाव को दूर करने के लिए सरस्वती साधना एक उपयोगी आध्यात्मिक उपचार है।

शिक्षा :

शिक्षा के प्रति जन-जन के मन-मन में अधिक उत्साह भरने-लौकिक अध्ययन और आत्मिक स्वाध्याय की उपयोगिता अधिक गम्भीरता पूवर्क समझने के लिए भी सरस्वती पूजन की परम्परा है। बुद्धिमत्ता को बहुमूल्य

सम्पदा समझा जाय और उसके लिए धन कमाने, बल बढ़ाने, साधन जुटाने, मोद मनाने से भी अधिक ध्यान दिया जाय। इस लोकोपयोगी प्रेरणा को गायत्री महाशक्ति के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण धारा सरस्वती की मानी गयी है और उससे लाभान्वित होने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

चेतना के रूप में सरस्वती सृजन शक्ति का रूपक है–समस्त साहित्य,संगीत,नृत्य,सौंदर्यशास्त्र और दर्शन का उत्स। वह निरंतर सक्रिय, धाराप्रवाही मन अर्थात विचारों के निरंतर प्रवाह को निरूपित करती है। लेकिन वह अखण्ड सम्पूर्ण की दिशा में भी प्रवाहित होती है, जैसा कि सरस्वती नाम का संकेत है, अतः यह उस यात्रा का भी एक रूपक है जो द्वैत के जाने पहचाने अनुभव जगत से विचार से परे के निश्‍चल बिन्दु की ओर जाती और व्यष्टि आत्मा को अपने साथ उस पार तृप्त जीव की दशा में ले जाती है।

सरस्वती को श्वेतवसना क्यों चित्रित किया जाता है :

सफेद रंग उस ज्ञान की शुद्धता का प्रतीक है जो वह खोजी मन को प्रदान करती है। इसी तरह, हंस और मयूर के साथ उनका साहचर्य भी ज्ञान पक्ष को बल देता है। कहा जाता है कि हंस में नीर क्षीर में विवेक करने की क्षमता है, वह केवल दूध ही पीता है। यह भी उस तरीक़े का एकरूपक है जिससे खोजी मन निरंतर इसके बीच भेद करता रहता है कि क्या यथार्थ और स्थायी है तथा क्या क्षणिक है। अपने सुंदर पंखों को लेकर मयूर का घंमड ज्ञान के एक सच्चे खोजी को यह चेतावनी देता है कि वह कैसे शारीरिक रूप की क्षणभंगुरता की प्रकृति को समझ कर स्वयं अपने आप को शरीर से अलग करना सीखे।

सरस्वती वाक् भी है, ध्वनि का सार तत्त्व जिसके द्वारा नाम और वस्तु के संसार से साक्षात्कार होताहै। वाक् के द्वारा एक खोजी मन संज्ञान से परे की स्थिति तक पहुंचता है। उनकी चार भुजायें कभी कभी उन्हे चार वेदों के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है, वे आत्मा के चार ज्ञानात्मक पक्षों – मानस,चित्त,बुद्धि तथा अहंकार – का प्रतिनिधित्व भी करती है जो सृष्टि रूपी वस्त्र में गुंथे हुये हैं। वे सभी सृजनात्मक प्रयासों के लिये सृजन की देवी है तथा सृजनात्मकता का मतलब है आत्मन् में गहराई से तलाशना।

सरस्वती स्व का सार भी हैं।यह सीकने का आरंभ भी है,चेतना और उसके परे की एक लंबी यात्रा का आरंभ,जिसे बसंत पंचमी के दिन शुरू किया जाता है जब सरस्वती का विशेस रूप से स्मरण किया जाता है।पारंपरिक रूप से,औपचारिक शिक्षा के आरंभ के पहले, बच्चों का अक्षर अभ्यासम अनुष्ठान किया जाता है। बसर के lakshmi देवी का विधिआत्मक तरीक़से आव्हान किया जाता है। कलाकार और संन्यासी दोनो ही अपने आत्मज्ञान के मार्ग में  अपने को पुन: समर्पित करते है,एक अपनी सृजनात्मक संभावनाओं को जगाने के लिये और दूसरा उस विंदु की तलाश को जो सृष्टि स्त्रोत है।

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