वेद

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त 21 से 30

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २१ (Rigveda in hindi Download pdf free)

[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- इन्द्राग्नि। छन्द -गायत्री]

इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित्स्तोममुश्मसि । ता सोमं ओमापातामा ॥१॥

इस यज्ञ स्थल पर हम इन्द्र एवं अग्निदेवो का आवाहन करते हैं, सोमपान के उन अभिलाषियो की स्तुति करते हुए सोमरस पीने का निवेदन करते हैं॥१॥

ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नरः । ता गायत्रेषु गायत ॥२॥

हे ऋत्विजो! आप यज्ञानुष्ठान करते हुये इन्द्र एवं अग्निदेवो की शस्त्रो (स्तोत्रो) से स्तुति करे, विविध अंलकारो से उन्हे विभूषित करे तथा गायत्री छन्दवाले सामगान (गायत्र साम) करते हुये उन्हे प्रसन्न करें॥२॥

ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे । सोमपा सोमपीतये ॥३॥

सोमपान की इच्छा करनेवाले मित्रता एवं प्रशंसा के योग्य उन इन्द्र एवं अग्निदेवो को हम सोमरस पीने के लिये बुलाते हैं॥३॥

उग्रा सन्ता हवामह उपेदं सवनं सुतम् । इन्द्राग्नी एह गच्छताम् ॥४॥

अति उग्र देवगण एवं अग्निदेवो को सोम के अभिषव स्थान(यज्ञस्थल) पर आमन्त्रित करते हैं, वे यहाँ पधारें॥४॥

ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम् । अप्रजाः सन्त्वत्रिणः॥५॥

देवो मे महान वे इन्द्र अग्निदेव सत्पुरुषो के स्वामी(रक्षक) हैं। वे राक्षसो को वशीभूत कर सरल स्वभाव वाला बनाएँ और मनुष्य भक्षक राक्षसो को मित्र-बांधवो से रहित करके निर्बल बनाएँ॥५॥

तेन सत्येन जागृतमधि प्रचेतुने पदे । इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम् ॥६॥

हे इन्द्राग्ने! सत्य और चैतन्य रूप यज्ञस्थान पर आप संरक्षक के रूप मे जागते रहें और हमे सुख प्रदान करें॥६॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २२

[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- १-४ अश्विकनी कुमार,५-८ सविता,९-१० अग्नि,११ देवियाँ, १२ इन्द्राणी, वरुणानी,अग्यानी,१३-१४ द्यावा-पृथ्वी,१६ विष्णु(देवगण) १७-२१ विष्णु। छन्द -गायत्री]

प्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये॥१॥

हे अध्वर्युगण! प्रातःकाल चेतनता को प्राप्त होने वाले अश्विवनीकुमारो को जगायें। वे हमारे इस यज्ञ मे सोमपान करने के निमित्त पधारें॥१॥

या सुरथा रथीतमोभा देवा दिविस्पृशा । अश्विना ता हवामहे ॥२॥

ये दोनो अश्विमनीकुमार सुसज्जित रथो से युक्त महान रथी है। ये आकाश मे गमन करते है। इन दोनो का हम आवाहन करते है॥२॥

[यहाँ मंत्र शक्ति से चालित, आकाश मार्ग से चलने वाले यान (रथ) का उल्लेख किया गया है।]

या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । तया यज्ञं मिमिक्षतम्॥३॥

हे अश्विशनीकुमारो। आपकी जो मधुर सत्यवचन युक्त कशा (चाबुक वाणी) है, उससे यज्ञ को सिंचित करने की कृपा करें॥३॥ [वाणी रूपी चाबुक से स्पष्ट होता है कि अश्वितनीकुमारो के यान मंत्र चालित है। मधुर एवं सत्यवचनो से यज्ञ का सिंचन भी किया जाता है। कशा – चाबुक से यज्ञ के सिंचन का भाव अटपटा लगते हुये भी युक्ति संगत है।]

नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥४॥

हे अश्वि्नीकुमारो। आप रथ पर आरूढ होकर जिस मार्ग से जाते है वहाँ सोमयाग करने वाले जातक का घर दूर नही है॥४॥ [पूर्वोक्त मंत्र मे वर्णित यान के तिव्र वेग का वर्णन है।]

हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये । स चेत्ता देवता पदम् ॥५॥

यजमान को (प्रकाश-उर्जा आदि) देने वाले हिरण्यगर्भ(हाथ मे सुवर्ण धारण करने वाले या सुनहरी किरणो वाले) सवितादेव का हम अपनी रक्षा के लिये आवाहन करते है। वे ही यजमान के द्वारा प्राप्तव्य(गन्तव्य) स्थान को विज्ञापित करनेवाले हैं॥५॥

अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि । तस्य व्रतान्युश्मसि ॥६॥

हे ऋत्विज! आप हमारी रक्षा के लिये सविता देवता की स्तुति करे। हम उनके लिये सोमयागादि लर्म सम्पन्न करना चाहते है। वे सवितादेव जलो को सुखा कर पुनः सहस्त्रो गुणा बरसाने वाले है॥६॥ [सौर शक्ति से जल के शोधन,वर्षण एवं शोचन की प्रक्रिया का वर्णन इस ऋचा मे है।]

विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः । सवितारं नृचक्षसम् ॥७॥

समस्त प्राणियो के आश्रयभूत,विविध धनो के प्रदाता,मानवमात्र के प्रकाशक सूर्यदेव का हम आवाहन करते हैं॥७॥

सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः । दाता राधांसि शुम्भति॥८॥

हे मित्रो! हम सब बैठकर सवितादेव की स्तुति करें। धन-ऐश्वर्य के दाता सूर्यदेव अत्यन्त शोभायमान है॥८॥

अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारं सोमपीतये ॥९॥

हे अग्निदेव! यहाँ आने की अभिलाषा रखनेवाली देवो की पत्नियो को यहाँ ले आएँ और त्वष्टादेव को भी सोमपान के निमित्त बुलायेँ॥९॥

आग्ना अग्न इहावसे होत्रां यविष्ठ भारतीम् । वरूत्रीं धिषणां वह ॥१०॥

हे अग्निदेव! देवपत्नियो को हमारी सुरक्षा के निमित्त यहाँ ले आयेँ। आप हमारी रक्षा के लिये अग्निपत्नि होत्रा, आदित्यपत्नि भारती, वरणीय वाग्देवी धिवणा आदि देवियो को भी यहाँ ले आयें॥१०॥

अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः । अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम् ॥११॥

अनवरुद्ध मार्ग वाली देवपत्नियाँ मनुष्यो को ऐश्वर्य देने मे समर्थ है। वे महान सुखो एवं रक्षण सामर्थ्यो से युक्त होकर हमारी ओर अभिमुख हो॥११॥

इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये॥१२॥

अपने कल्याण के लिए सोमपान के लिए हम इन्द्राणी, वरुणानी, और अग्नायी का आवाहन करते है॥१२॥

मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतां नो भरीमभिः ॥१३॥

अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञकर्म को अपने अपने अंशो द्वारा परिपूर्ण करें। वे भरण-पोषण करनेवाली सामग्रीयो(सुख-साधनो) से हम सभी को तृप्त करें॥१३॥

तयोरिद्घृातवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः । गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ॥१४॥

गंधर्वलोक के ध्रुवस्थान मे आकाश और पृथ्वी के मध्य मे अवस्थित घृत के समान(सार रूप) जलो (पोषक प्रवाहो) को ज्ञानी जन अपने विवेकयुक्त कर्मो (प्रयासो) द्वारा प्राप्त करते है॥१४॥

स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथः॥१५॥

हे पृथ्वी देवी! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली है। आप हमे विपुल परिमाण मे सुख प्रदान करें॥१५॥

अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥१६

जहाँ से (यज्ञ स्थल या पृथ्वी से) विष्णुदेव ने (पोषण परक) पराक्रम दिखाया, वहाँ (उस यज्ञीय क्रम से) पृथ्वी से सप्तधामो से देवतागण हमारी रक्षा करें॥१६॥

इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥१७॥

यह सब विष्णुदेव का पराक्रम है,तीन प्रकार के (त्रिविध-त्रियामी) उनके चरण है। इसका मर्म धूलि भरे प्रदेश मे निहित है॥१७॥

[त्रिआयामी सृष्टि के पोषण का जो पराक्रम दिखाता है। उसका रहस्य अंतरिक्ष धूलि (सुक्ष्म कणो) के प्रवाह मे सन्निहित है। उसी प्रवाह से सभी प्रकार के पोषक पदार्थ बनते बदलते रहते है।]

त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥

विश्वरक्षक, अविनाशी, विष्णुदेव तीनो लोको मे यज्ञादि कर्मो को पोषित करते हुये तीन चरणोसे जग मे व्याप्त है अर्थात तीन शक्ति धाराओ (सृजन, पोषण और परिवर्तन) द्वारा विश्व का संचालन करते है॥१८॥

विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा॥१९॥

हे याजको! सर्वव्यापक भगवान विष्णु के सृष्टि संचालन संबंधी कार्यो(सृजन, पोषण और परिवर्तन) ध्यान से देखो। इसमे अनेकोनेक व्रतो(नियमो,अनुशासनो) का दर्शन किया जा सकता है। इन्द्र(आत्मा) के योग्य मित्र उस परम सत्ता के अनुकूल बनकर रहे।(ईश्वरीय अनुशासनो का पालन करें)॥१९॥

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥२०॥

जिस प्रकार सामान्य नेत्रो से आकाश मे स्थित सूर्यदेव को सहजता से देखा जाता है, उसी प्रकार विद्वज्जन अपने ज्ञान चक्षुओ से विष्णुदेव(देवत्व के परमपद) के श्रेष्ठ स्थान को देखते हैं॥२०॥

[ईश्वर दृष्टिमय भले ही न हो, अनुभूतिजन्य अवश्य है।]

तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम्॥२१॥

जागरूक विद्वान स्तोतागण विष्णूदेव के उस परमपद को प्रकाशित करते हैं,अर्थात जन सामान्य के लिये प्रकट करते है॥ २१॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २३

[ऋषि- मेधातिथि काण्व। देवता १-वायु,२-३ इन्द्रवायु,४-६ मित्रावरुण, ७-९ इन्द्र-मरुत्वान,१०-१२ विश्वेदेवा,१३-१५ पूषा,१६-२३ आपः देवता, २३-२४ अग्नि। छन्द १-१८-अग्नि, १९ पुर उष्णिक्, २१ प्रतिष्ठा तथा २२-२४ अनुष्टुप।]

तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे। वायो तान्प्रस्थितान्पिब॥१॥

हे वायुदेव! अभिषुत सोमरस तीखा होने से दुग्ध मिश्रित करके तैयार किया गया है, आप आएँ और उत्तर वेदी के पास लाये गये इस सोम रस का पान करें॥१॥

उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये॥२॥

जिनका यश दिव्यलोक तक विस्तृत है,ऐसे इन्द्र और वायुदेवो को हम सोमरस पीने के लिये आमंत्रित करते है॥२॥

इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये। सहस्राक्षा धियस्पती॥३॥

मन के तुल्य वेग वाले, सहस्त्र चक्षु वाले,बुद्धि के अधीश्वर इन्द्र एवं वायु देवो का ज्ञानीजन अपनी सुरक्षा के लिये आवाहन करते हैं॥३॥

मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये। जज्ञाना पूतदक्षसा॥४॥

सोमरस पीने के लिये यज्ञ स्थल पर प्रकट होने वाले परमपवित्र एवं बलशाली मित्र और वरुणदेवो का हम आवाहन करते है॥४॥

ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती। ता मित्रावरुणा हुवे॥५॥

सत्यमार्ग पर चलनेवालो का उत्साह बढाने वाले, तेजस्वी मित्रावरुणो का हम आवाहन करते है॥५॥

वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः। करतां नः सुराधसः॥६॥

वरुण एवं मित्र देवता अपने समस्त रक्षा साधनो से हम सबकी रक्षा करते है। वे हमे महान वैभव सम्पन्न करें॥६॥

मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये। सजूर्गणेन तृम्पतु॥७॥

मरुद्गनणो के सहित इन्द्रदेव को सोमपान के निमित्त बुलाते है। वे मतुद्ग णो के साथ आकर तृप्त हों॥७॥

इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूषरातयः। विश्वे मम श्रुता हवम्॥८॥

दानी पूषादेव के समान इन्द्रदेव दान देने मे श्रेष्ठ है। वे सब मरुद्गेणो के साथ हमारे आवाहन को सुने॥८॥

हत वृत्रं सुदानव इन्द्रेण सहसा युजा। मा नो दुःशंस ईशत॥९॥

हे उत्तम दानदाता मरुतो ! आप अपने उत्तम साथी और् बलवान इन्द्र के साथ दुष्टो का हनन करें। दुष्टता हमारा अतिक्रमण न कर सके॥९।

विश्वान्देवान्हवामहे मरुतः सोमपीतये। उग्रा हि पृश्निमातरः॥१०॥

सभी मरुद्गवणो को हम सोमपान के निमित बुलाते है। वे सभी अनेक रंगो वाली पृथ्वी के पुत्र महान् वीर एवं पराक्रमी है॥१०॥

जयतामिव तन्यतुर्मरुतामेति धृष्णुया। यच्छुभं याथना नरः॥११॥

वेग से प्रवाहित होने वाले मरुतो का शब्द विजयवाद के सदृश गुन्जित होता है, उससे सभी मनुष्यो का मंगल होता है॥११॥

हस्काराद्विद्युतस्पर्यतो जाता अवन्तु नः। मरुतो मृळयन्तु नः॥१२॥

चमकने वाली विद्युतसे उप्पन्न मरुद्गुण हमारी रक्षा करें और् प्रसन्नता प्रदान करें॥१२॥

आपूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः। आजा नष्टं यथा पशुम्॥१३॥

हे दिप्तीमान पूषादेव आप अद्भूत तेजो से युक्त एवं धारण शक्ति से सम्पन्न है। अत: सोम को द्युलोक से वैसे ही लायें जैसे खोये हुये पशु को ढुंढकर लाते है॥१३॥

पूषा राजानमाघृणिरपगूळ्हं गुहा हितम्। अविन्दच्चित्रबर्हिषम्॥१४॥

दीप्तिमान पूषादेव ने अंतरिक्ष गुहा मे छिपे हुये शुभ्र तेजो से युक्त सोमराजा को प्राप्त किया॥१४॥

उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत्। गोभिर्यवं न चर्कृषत्॥१५॥

वे पूषादेव हमारे लिये याग के हेतुभूत सोमो के साथ वसंतादि षट्ऋततुओ को क्रमशः वैसे ही प्राप्त कराते है, जैसे यवो (अनाजो) के लिये कृषक बार-बार खेत जोतता है॥१५॥

अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्। पृञ्चतीर्मधुना पयः॥१६॥

यज्ञ की इच्छा करनेवालो के सहायक, मधुर रसरूप जलप्रवाह माताओ के सदृश पुष्टिप्रद है। वे दुग्ध को पुष्ट करते हुये यज्ञमार्ग से गमन करते है॥१६॥

[यज्ञ द्वारा पुष्टि प्रदायक रस प्रवाहो के विस्तार का उल्लेख है।]

अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह। ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्॥१७॥

जो ये जल सूर्य मे (सूर्य किरणो मे) समाहित है, अथवा जिन जलो के साथ सूर्य का सान्निध्य है, ऐसे वे पवित्र जल हमारे यज्ञ को उपलब्ध हों॥१७॥

[उक्त दो मंत्रो मे अंतरिक्ष किरणो द्वारा कृषि का वर्णन है। खेत मे अन्न दिखता नही, किन्तु उससे उत्पन्न होता है। पूषा-पोषण देने वाले देवो (यज्ञ एवं सूर्प आदि) द्वारा सोम (सूक्षम पोषक तत्व) बोया और उपजाया जाता है।]

अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः॥१८॥

हमारी गायें जिस जल का सेवन करती है, उन जलो का हम स्तुतिगान करते है। (अंतरिक्ष एवं भूमी पर) प्रवाहमान उन जलो के निमित्त हम हवि अर्पण करते है॥१८॥

अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥१९॥

जल मे अमृतोपम गुण है। जल मे औषधीय गुण है। हे देवो! ऐसे जल की प्रशंसा से आप उत्साह प्राप्त करें॥१९॥

अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा। अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः॥२०॥

मुझ (मंत्र द्रष्टा मुनि) से सोमदेव ने कहा है कि जल समूह मे सभी औषधियाँ समाहित हैं। जल मे ही सर्व सुख प्रदायक अग्नितत्व समाहित है। सभी औषधियाँ जलोसे ही प्राप्त होती हैं॥२०॥

आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक्च सूर्यं दृशे॥२१॥

हे जल समूह! जीवन रक्षक औषधियो को हमारे शरीर मे स्थित करें, जिससे हम निरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें॥२१॥

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि। यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्॥२२॥

हे जलदेवो! हम याजको ने अज्ञानवश जो दुष्कृत्य किये हो, जानबुझकर किसी से द्रोह किया हो, सत्पुरुषो पर आक्रोश किया हो या असत्य आचरण किया हो तथा इस प्रकार के हमारे हो भी दोष हो, उन सबको बहाकर दूर करें॥२२॥

आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि। पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा॥२३॥

आज हमने जल मे प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान किया है, इस प्रकार जल मे प्रवेश करके हम रस से आप्लावित हुये है! हे पयस्वान ! हे अग्निदेव! आप हमे वर्चस्वी बनाएँ, हम आपका स्वागत करते है॥२३॥

सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा। विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात्सह ऋषिभिः॥२४॥

हे अग्निदेव! आप हमे तेजस्विता प्रदान करें। हमे प्रजा और दीर्घ आयु से युक्त करें। देवगण हमारे अनुष्ठान को जाने और् इन्द्रदेव ऋषियो के साथ इसे जाने॥२४॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २४

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति(कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र)। देवता १-प्रजापति,२अग्नि,३-४ सविता, ५ सविता अथवा भग,६-१५ वरुण।छन्द १,२,६-१५-त्रिष्टुप, ३-५ गायत्री।]

कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम। को नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च॥१॥

हम अमरदेवो मे से किस देव के सुन्दर नाम का स्मरण करें ? कौन से देव हमे महती अदिति पृथ्वी को प्राप्त करायेंगे? जिअससे हम अपने पिता और माता को देख सकेंगे॥१॥

अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम। स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च॥२॥

हम अमरदेवो मे प्रथम अग्निदेव के सुन्दर नाम का मनन करें। वह हमे महती अदिति को प्राप्त करायेंगे, जिससे हम अपने माता-पिता को देख सकेंगे॥२॥

अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम्। सदावन्भागमीमहे॥३॥

हे सर्वदा रक्षणशील सवितादेव! आप वरण करने वाले योग्य धनो के स्वामी है, अतः हम आपसे ऐश्वर्यो के उत्तम भाग को मांगते है॥३॥

यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः। अद्वेषो हस्तयोर्दधे॥४॥

हे सवितादेव! आप तेजस्विता युक्त निन्दा रहित,द्वेष रहित,वरण करने योग्य धनो को दोनो हाथो से धारण करने वाले हैं॥४॥

भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा। मूर्धानं राय आरभे॥५॥

हे सवितादेव! हम आपके ऐश्वर्य की छाया मे रहकर संरक्षण को प्राप्त करें। उन्नति करते हुये सफलताओ के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर भी अपने कर्तव्यो को पूरा करते रहे॥५॥

नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः। नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम्॥६॥

हे वरुणदेव! ये उड़ने वाले पक्षी आपके पराक्रम ,आपके बल और सुनिति युक्त क्रोध(मन्युं) को नही जान पाते। सतत गमनशील जलप्रवाह आपकी गति को नही जान सकते और प्रबल वायु के वेग भी आपको नही रोक सकते॥६॥

अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः। नीचीना स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः॥७॥

पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण(सबको आच्छादित करने वाले) दिव्त तेज पुञ्ज सूर्यदेव को आधारहित आकाश मे धारण करते है। इस तेज पुञ्ज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है। इसले मध्य मे दिव्य किरणे विस्तीर्ण होती चलती हैं॥७॥

उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ। अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्॥८॥

राजा वरुणदेव ने सूर्य गमन के लिये विस्तृतमार्ग निर्धारित किया है, जहाँ पैर भी स्थापित न हो, ऐसे अंतरिक्ष स्थान पर भी चलने के लिये मार्ग विनिर्मित करदेते है। और वे हृदय की पीड़ा का निवारण करने वाले हैं॥८॥

शतं ते राजन्भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टे अस्तु। बाधस्व दूरे निरृतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुग्ध्यस्मत्॥९॥

हे वरुणदेव! आपके पास असंख्य उपाय है। आपकी उत्तम बुद्धि अत्यन्त व्यापक और गम्भीर है। आप हमारी पाप वृत्तियो को हमसे दूर करें। किये हुए पापो से हमे विमुक्त करें॥९॥

अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दिवेयुः।अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति॥१०॥

ये नक्षत्रगण आकाश मे रात्रि के समय दिखते हौ, परन्तु दिन मे कहाँ विलीन होते हैं? विशेष प्रकाशित चन्द्रमा रात मे आता है। वरुण राजा के नियम कभी नष्ट नही होते है॥१०॥

तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः॥११॥

हे वरुणदेव! मन्त्ररूप वाणी से आपकी स्तुति करते हुये आपसे याचना करते है। यजमान हविस्यात्र अर्पित करते हुये कहता है – हे बहुप्रशंसित देव! हमारी उपेक्षा न करें, हमारी स्तुतियो को जाने। हमारी आयु को क्षीण न करें॥११॥

तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे। शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान्राजा वरुणो मुमोक्तु॥१२॥

रातदिन मे (अनवरत) ज्ञानियो के कहे अनुसार यही ज्ञान(चिन्तन) हमारे हृदय मे होते रहता है कि बन्धन मे पड़े शुनःशेप ने जिस वरुणदेव को बुलाकर मुक्ति को प्राप्त किया, वही वरुणदेव हमे भी बन्धनो से मुक्त करें॥१२॥

शुनःशेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः। अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विद्वाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान्॥१३॥

तीन स्तम्भो मे बधेँ हुये शुनःशेप ने अदिति पुत्र वरुणदेव का आवाहन करके उनसे निवेदन किया कि वे ज्ञानी और अटल वरुणदेव हमारे पाशो को काटकर हमे मुक्त करें॥१३॥

अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः। क्षयन्नस्मभ्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि॥१४॥

हे वरुणदेव! आपके क्रोध को शान्त करने के लिये हम स्तुति रूप वचनो को सुनाते है। हविर्द्रव्यो के द्वारा यज्ञ मे सन्तुष्ट होकर हे प्रखर बुद्धि वाले राजन! आप हमारे यहाँ वास करते हुये हमे पापो के बन्धन से मुक्त करें॥१४॥

उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम॥१५॥

हे वरुणदेव! आप तीनो तापो रूपी बन्धनो से हमे मुक्त करे। आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाश हमसे दूर हों तथा मध्य के एवं नीचे के बन्धन अलग करें! हे सूर्यपुत्र! पापो से रहित होकर हम आपके कर्मफल सिद्धांत मे अनुशासित हो, दयनीय स्थिति मे हम न रहें॥१५॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २५

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता वरुण।छन्द गायत्री।]

यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्। मिनीमसि द्यविद्यवि॥१॥

हे वरुणदेव! जैसे अन्य मनुष्य आपके व्रत अनुष्ठान मे प्रमाद करते है,वैसे ही हमसे भी आपके नियमो मे कभी कभी प्रमाद हो जाता है।(कृपया इसे क्षमा करें)॥१॥

मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः। मा हृणानस्य मन्यवे॥२॥

हे वरुणदेव! आपने अपने निरादर करने वाले का वध करने के लिये धारण किये गये शस्त्र के सम्मुख हमे प्रस्तुत न करें। अपनी क्रुद्ध अवस्था मे भी हम पर कृपा कर क्रोध ना करें॥२॥

वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्। गीर्भिर्वरुण सीमहि॥३॥

हे वरुणदेव! जिस प्रकार रथी अपने थके घोड़ो की परिचर्या करते हैं, उसी प्रकार आपके मन को हर्षित करने के लिये हम स्तुतियो का गान करते हैं॥३॥

परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये। वयो न वसतीरुप॥४॥

हे वरुणदेव! जिस प्रकार पक्षी अपने घोसलो की ओर दौड़ते हुये गमन करते है,उसी प्रकार हमारी चंचल बुद्धियाँ धन प्राप्ति के लिये दूर दूर तक दौड़ती है॥४॥

कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे। मृळीकायोरुचक्षसम्॥५॥

बल ऐश्वर्य के अधिपति सर्वद्रष्टा वरुणदेव को कल्याण के निमित्त हम यहाँ (यज्ञस्थल मे) कब बुलायेंगे?(अर्थात यह अवसर कब मिलेगा?)॥५॥

तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः। धृतव्रताय दाशुषे॥६॥

व्रत धारण करने वाले(हविष्यमान)दाता यजमान के मंगल के निमित्त ये मित्र और वरुण देव हविष्यान की इच्छा करते है, वे कभी उसका त्याग नही करते। वे हमे बन्धन से मुक्त करें॥६॥

वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्। वेद नावः समुद्रियः॥७॥

हे वरुण देव! आकाश मे उड़ने वाले पक्षियो के मार्ग को और समुद्र मे संचार करने वाली नौकाओ के मार्ग को भी आप जानते है॥७॥

वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः। वेदा य उपजायते॥८॥

नियम धारक वरुणदेव प्रजा के उपयोगी बारह महिनो को जानते है और तेरहवे मास(पुरुषोत्तम मास) को भी जानते है॥८॥

वेद वातस्य वर्तनिमुरोरृष्वस्य बृहतः। वेदा ये अध्यासते॥९॥

वे वरुणदेव अत्यन्त विस्तृत,दर्शनिय और अधिक गुणवान वायु के मार्ग को जानते है। वे उपर द्युलोक मे रहने वाले देवो को भी जानते हैं॥९॥

निषसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा। साम्राज्याय सुक्रतुः॥१०॥

प्रकृति के नियमो का विधिवत पालन कराने वाले,श्रेष्ठ कर्मो मे सदैव निरत रहने वाले वरुणदेव प्रजाओ मे साम्राज्य स्थापित करने के लिये बैठते है॥१०॥

अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति। कृतानि या च कर्त्वा॥११॥

सब अद्भुवत कर्मो की क्रिया विधि जानने वाले वरुणदेव, जो मर्म संपादित हो चुके है और जो किये जाने वाले है, उन सबको भली-भांति देखते है॥११॥

स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत्। प्र ण आयूंषि तारिषत्॥१२॥

वे उत्तम कर्मशील अदिति पुत्र वरुणदेव हमे सदा श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढा़यें॥१२॥

बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्। परि स्पशो नि षेदिरे॥१३॥

सुवर्णमय कवच धारण करके वरुणदेव अपने हस्ट-पुष्ट शरीर को सुसज्जित करते है। शुभ्र प्रकाश किरणे उनके चारो ओर विस्तीर्ण होती है॥१३॥

न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम्। न देवमभिमातयः॥१४॥

हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु-जन(भयाक्रान्त होकर) जिनकी हिंसा नही कर पाते, लोगो के प्रति द्वेष रखने वाले , जिनसे द्वेष नही कर पाते ऐसे वरुणदेव को पापीजन स्पर्श तक नही कर पाते॥१४॥

उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या। अस्माकमुदरेष्वा॥१५॥

जिन वरुणदेव ने मनुष्यो के लिये विपुल अन्न भंडार उत्पन्न किया है;उन्होने ही हमारे उदर मे पाचन सामर्थ्य भी स्थापित की है॥१५॥

परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु। इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥१६॥

उस सर्वद्रष्टा वरुणदेव की कामना करने वाली हमारी बुद्धीयाँ, वैसे ही उन तक पहुंचती है जैसे गौएँ श्रेष्ठ बाड़े की ओर जाती है॥१६॥

सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्। होतेव क्षदसे प्रियम्॥१७॥

होता (अग्निदेव) के समान हमारे द्वारे लाकर समर्पित की गई हवियो का आप अग्निदेव के समान भक्षण करे, फिर हम दोनो वार्ता करेंगे॥१७॥

दर्शंनु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि। एता जुषत मे गिरः॥१८॥

दर्शनिय वरुण को उनके रथ के साथ हमने भूमि पर देखा है। उन्होने हमारी स्तुतियाँ स्वीकारी हैं॥१८॥

इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय। त्वामवस्युरा चके॥१९॥

हे वरुणदेव! आप हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें, हमे सुखी बनायें। अपनी रक्षा के लिये हम आपकी स्तुति करते है॥१९॥

त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि। स यामनि प्रति श्रुधि॥२०॥

हे मेधावी वरुणदेव ! आप द्युलोक, भूलोक और सारे विश्व पर आधिपत्य रखते है, आप हमारे आवाहन को स्वीकार कर ’ हम रक्षा करेंगे’ ऐसा प्रत्युत्तर दे॥२०॥

उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत। अवाधमानि जीवसे॥२१॥

हे वरुणदेव! हमारे उत्तम(उपर के) पाश को खोल दे, हमारे मध्यम पाश काट दे और हमारे नीचे के पाश को हटाकर हमे उत्तम जीवन प्रदान करें॥२१॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २६

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता अग्नि।छन्द गायत्री।]

वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जां पते। सेमं नो अध्वरं यज॥१॥

हे यज्ञ योग्य अन्नो के पालक अग्निदेव! आप अपने तेजरूप वस्त्रो को पहनकर हमारे यज्ञ को सम्पादित करें॥१॥

नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः। अग्ने दिवित्मता वचः॥२॥

सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव! आप सर्वोत्तम होता(यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप मे यज्ञकुण्ड मे स्थापित होकर स्तुति वचनो का श्रवण करें॥२॥

आहिष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये। सखा सख्ये वरेण्यः॥३॥

हे वरण करने योग्य अग्निदेव! जैसे पिता अपने पुत्र के,भाई अपने भाई के और मित्र अपने मित्र के सहायक होते है, वैसे ही आप हमारी सहायता करें॥३॥

आनोबर्ही रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा। सीदन्तु मनुषो यथा॥४॥

जिस प्रकार प्रजापति के यज्ञ मे “मनु ” आकर शोभा बढा़ते हैं, उसी प्रकार शत्रुनाशक वरुणदेव, मित्र-देव एवं अर्यमादेव हमारे यज्ञ मे आकर विराजमान हो॥४॥

पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च। इमा उ षु श्रुधी गिरः॥५॥

पुरातन होता हे अग्निदेव! आप हमारे इस यज्ञ से और हमारे मित्रभाव से प्रसन्न हों और हमारी स्तुतियों को भली प्रकार से सुने॥५॥

यच्चिद्धि शश्वता तना देवंदेवं यजामहे। त्वे इद्धूयते हविः॥६॥

हे अग्निदेव! इन्द्र, वरुण आदि अन्य देवताओ के लिये प्रतिदिन विस्तृत आहुतियाँ अर्पित करने पर भी सभी हविष्यमान आपको ही प्राप्त होते है॥६॥

प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः। प्रियाः स्वग्नयो वयम्॥७॥

यज्ञ समपन्न करने वाले प्रजापालक, आनदवर्धक,वरण करने योग्य हे अग्निदेव आप हमे प्रिय हो तथा श्रेष्ठ विधि से यज्ञाग्नि की रक्षा करते हुये हम सदैव आपके प्रिय रहें॥७॥

स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च नः। स्वग्नयो मनामहे॥८॥

उत्तम अग्नि से युक्त हो कर दैदीप्यमान ऋत्विजो के हमारे लिये ऐश्वर्य को धारण किया है, वैसे जी हम उत्तम अग्नि से युक्त होकर इनका (ऋत्विज) का स्वागत करते है॥८॥

अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम्। मिथः सन्तु प्रशस्तयः॥९॥

अमरत्व को धारण करने वाले हे अग्निदेव! आपके और हम मरणशील मनुष्यो के बीच स्नेहयुक्त और प्रशंसनीय वाणियो का आदान प्रदान होता रहे॥९॥

विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः। चनो धाः सहसो यहो॥१०॥

बल के पुत्र(अरणि मन्थन के रूप शक्ति से उत्पन्न) भे अग्निदेव! आप(आहवनीयादि) अग्नियो के साथ यज्ञ मे पधारें और स्तुतियों को सुनते हुये अन्न(पोषण) प्रदान करें॥१०॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २७

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता १-१२अग्नि, १३ देवतागण। छन्द १-१२ गायत्री,१३ त्रिष्टुप।]

अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः। सम्राजन्तमध्वराणाम्॥१॥

तमोनाशक, यज्ञो के सम्राट स्वरूप हे अग्निदेव! हम स्तुतियो ले द्वारा आपकी वंदना करते है। जिस प्रकार अश्व अपनी पूँछ के बालो से मक्खी मच्छर दूर भगाता है, उसी प्रकार आप भी ज्वालाओ से हमारे विरोधियों को दूर भगायें॥१॥

स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः। मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्॥२॥

हम इन अग्निदेव की उत्तम विधि से उपासना करते है। वे बल से उत्पन्न, शीघ्र गतिशील अग्निदेव हमे अभिष्ट सुखो को प्रदान करें॥२॥

स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायोः। पाहि सदमिद्विश्वायुः॥३॥

हे अग्निदेव! सब मनुष्यो के हितचिंतक आप दूर से और निकट से, अनिष्ट चिंतको से सदैव हमारी रक्षा करें॥३॥

इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम्। अग्ने देवेषु प्र वोचः॥४॥

हे अग्निदेव! आप हमारे गायत्री परक प्राण पोषक स्तोत्रो एवं नवीन अन्न(हव्य) को देवो रक (देव वृत्तियों के पोषण हेतु) पहुँचाये॥४॥

आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु। शिक्षा वस्वो अन्तमस्य॥५॥

हे अग्निदेव! आप हमे श्रेष्ठ (आध्यात्मिक), मध्यम(आधिदैविक) एवं कनिष्ठ(आधिभौतिक) अर्थात सभी प्रकार की धन सम्पदा प्रदान करें॥५॥

विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ। सद्यो दाशुषे क्षरसि॥६॥

सात ज्वालाओ से दीप्तिमान हे अग्निदेव! आप धनदायक है। नदी के पास आने वाली जल तरंगो ले सदृश आप हविष्यान्न दाता को तत्क्षण (श्रेष्ठ) कर्म फल प्रदान करतें है॥६॥

यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः। स यन्ता शश्वतीरिषः॥७॥

हे अग्निदेव ! आप जीवन संग्राम मे जिस पुरुष को प्रेरित करते हैं, उनकी रक्षा आप स्व्यं करते हैं। साथ ही उसके लिये पोषक अन्नो की पूर्ति भी करते हैं॥७॥

नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्। वाजो अस्ति श्रवाय्यः॥८॥

हे शत्रु विजेता अग्निदेव! आपके उपासक को कोई पराजित नही कर सकता, क्योंकि उसकी(आपके द्वारा प्रदत्त) तेजस्विता प्रसिद्ध है॥८॥

स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता। विप्रेभिरस्तु सनिता॥९॥

सब मनुष्यो के कल्याणकारक वे अग्निदेव जीवन-संग्राम मे अश्व रूपी इन्द्रियो द्वारा विजयी बनाने वाले हो। मेधावी पुरुषो द्वारा प्रशंसित वे अग्निदेव हमे अभीष्ट फल प्रदान करें॥९॥

जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय। स्तोमं रुद्राय दृशीकम्॥१०॥

स्तुतियो से देवो को प्रबोधित करने वाले हे अग्निदेव! ये यजमान, पुनीत यज्ञ स्थल पर दुष्टता विनाश हेतु आपका आवाहन करते है॥१०॥

स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः। धिये वाजाय हिन्वतु॥११॥

अपरिमिर्त धूम्र-ध्वजा से युक्त, आनन्दप्रदम महान वे अग्निदेव हमे ज्ञान और वैभव की ओर प्रेरित करें॥११॥

स रेवाँ इव विश्पतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः। उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः॥१२॥

विश्वपालक, अत्यन्त तेजस्वी और ध्वजा सदृश गुणो से युक्त दूरदर्शी वे अग्निदेव वैभवशाली राजा के समान हमारी स्तवन रूपी वाणियो को ग्रहण करें॥१२॥

नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः।

यजाम देवान्यदि शक्नवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः॥१३॥

बड़ो, छोटोम युवको और वृद्धो को हम नमस्कार करते है। सामर्थ्य के अनुसार हम देवो का यजन करें। हे देवो! अपने से बड़ो के सम्मान मे हमारे द्वारा कोई त्रुटी न हो॥१३॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २८

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता १-४ इन्द्र,५-६ उलूखल,७-८ उलूखल-मूसल,९ प्रजापति,हरिश्चन्द्रः,अधिषवणचर्म अथवा सोम छन्द १-६ अनुष्टुप,७-९ गायत्री।]

यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥१॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ (सोमवल्ली) कूटने के लिए बड़ा मूसल उठाया जाता है(अर्थात सोमरस तैयार किया जाता है), वहाँ(यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥१॥

यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥२॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ दो जंघाओ के समान विस्तृत,सोम कुटने के दो फलक रखे है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥२॥

यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥३॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ गृहिणी सोमरस कुटने का अभ्यास करती है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥३॥

यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥४॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ सारथी द्वारा घोड़े को लगाम लगाने के समान (मथनी को) रस्सी से बाँधकर मन्थन लरते है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥४॥

यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः॥५॥

हे उलूखल! यद्यपि घर घर मे तुमसे काम लिया जाता है, फिर भी हमारे घर मे विजय दुन्दुभि के समान उच्च शब्द करो॥५॥

उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्। अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल॥६॥

हे उलूखल – मूसल रूपे वनस्पति! तुम्हारे सामने वायु विशेष गति से बहती है। हे उलूखल! अब इन्द्रदेव के सेवनार्थ सोमरस का निष्पादन करो॥६॥

आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भृतः। हरी इवान्धांसि बप्सता॥७॥

यज्ञ के साधन रूप पूजन योग्य वे उलूखल और मूसल दोनो, अन्न(चने) खाते हुये इन्द्रदेव के दोनो अश्वो के समान उच्च स्वर से शब्द करते हैं॥७॥

ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः। इन्द्राय मधुमत्सुतम्॥८॥

दर्शनीय उलूखल एवं मूसल रूपे वनस्पते! आप दोनो सोमयाग करने वालों के साथ इन्द्रदेव के लिये मधुर सोमरस का निष्पादन करो॥८॥

उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि॥९॥

उलूखल और मूसल द्वारा निष्पादित सोम को पात्र से निकाल कर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और अवशिष्ट को छानने के लिये पवित्र चर्म पर रखें॥९॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २९

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता इन्द्र। छन्द पंक्ति।]

यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥१॥

हे सत्य स्वरूप सोमपायी इन्द्रदेव! यद्यपि हम प्रशंसा के पात्र तो नही है, तथापि हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥१॥

शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥२॥

हे इन्द्रदेव ! आप शक्तिशाली, शिरस्त्राण धारण करने वाले, बलो के अधीश्वर और ऐश्वर्यशाली है। आपका सदैव हम पर अनुग्रह बना रहे। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥२॥

निष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥३॥

हे इन्द्रदेव! दोनो दुर्गतियाँ (विपत्ति और दरिद्रता) परस्पर एक दूसरे को देखती हुई सो जायें। वे कभी न जागें, वे अचेत पड़ी रहें।हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥३॥

ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥४॥

हे इन्द्रदेव! हमारे शत्रु सोते रहें और हमारे विर मित्र जागते रहे। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥४॥

समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥५॥

हे इन्द्रदेव ! कपटपूर्ण वाणी बोलनेवाले शत्रु रूप गधे को मार डालें। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥५॥

पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥६॥

हे इन्द्रदेव ! विध्वंशकारी बवंडर वनो से दूर जाकर गिरें। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥६॥

सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥७॥

हे इन्द्रदेव ! हम पर आक्रोश करने वाले सब शत्रुओ को विनष्ट करें। हिंसको का नाश करें। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥ ७॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त ३०

[ऋषि- शुनः शेप आजीगर्ति। देवता १-१६ इन्द्र, १७-१९ अश्विहनीकुमार, २०-२२ उषा। छन्द १-१०,१२-१५ तथा १७-२२ गायत्री,११ पादनिचृत् गायत्री,१६ त्रिष्टूप्।]

आ व इन्द्रं क्रिविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम्। मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः॥१॥

जिस प्रकार अन्न की इच्छा वाले,खेत मे पानी सींचते है, उसी तरह हम बल की कामना वाले साधक इन महान् इन्द्रदेव को सोमरस से सींचते है॥१॥

शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदु निम्नं न रीयते॥२॥

नीचे की ओर जाने वाले जल के समान सैकड़ो कलश सोमरस, सहस्त्रो कलश दूध मे मिश्रित होकर इन्द्रदेव को प्राप्त होता है॥२॥

सं यन्मदाय शुष्मिण एना ह्यस्योदरे। समुद्रो न व्यचो दधे॥३॥

समुद्र मे एकत्र हुये जल के सदृश सोमरस इन्द्रदेव के पेट मे एकत्र होकर उन्हे हर्ष प्रदान करता है॥३॥

अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे॥४॥

हे इन्द्रदेव ! कपोत जिस स्नेह के साथ गर्भवती कपोती के पास रहता है, उसी प्रकार यह सोमरस आपके लिये प्रस्तुत है। आप हमारे निवेदन को स्वीकारे॥४॥

स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते। विभूतिरस्तु सूनृता॥५॥

जो (स्तोतागण), हे इन्द्र! हे धनाधिपति! हे स्तुतियों के आश्रयभूत! हे वीर! (इत्यादि) स्तुतियाँ करते है, उनके लिये आपकी विभूतियाँ प्रिय एवं सत्य सिद्ध हो॥५॥

ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतयेऽस्मिन्वाजे शतक्रतो। समन्येषु ब्रवावहै॥६॥

सैकड़ो यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यो को सम्पन्न करने वाले हे इन्द्रदेव! संघर्षो (जीवन संग्राम) मे हमारे संरक्षण के लिये आप प्रयत्नशील रहे। हम आप से अन्य (श्रेष्ठ) कार्यो के विषय मे भी परस्पर विचार-विनिमय करते रहे॥६॥

योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥७॥

सत्कर्मो के शुभारम्भ मे एवं हर प्रकार के संग्राम मे बलशाली इन्द्रदेव का हम अपने संरक्षण के लिये मित्रवत आवाहन करते हैं॥७॥

आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः। वाजेभिरुप नो हवम्॥८॥

हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर वे इन्द्रदेव निश्चित ही सहस्त्रो रक्षा साधनो तथा अन्न ,ऐश्वर्य आदि सहित हमारे पास आयेंगे॥८॥

अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्। यं ते पूर्वं पिता हुवे॥९॥

हम सहायता के लिये स्वर्गधाम के वासी, बहुतो के पास पहुँचकर उन्हे नेतृत्व प्रदान करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते है। हमारे पिता ने भी ऐसा ही किया था॥९॥

तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत। सखे वसो जरितृभ्यः॥१०॥

हे विश्ववरणीय इन्द्रदेव! बहुतो द्वारा आवाहित किये जाने वाले आप स्तोताओ के आश्रयदाता और मित्र है। हम ऋत्विग्गण आओअ से उन स्तोताओ को अनुगृहीत करने की प्रार्थना करते है॥१०॥

अस्माकं शिप्रिणीनां सोमपाः सोमपाव्नाम्। सखे वज्रिन्सखीनाम्॥११॥

हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव! सोम पीने के योग्य हमारे प्रियजनो और मित्रजनो मे आप ही श्रेष्ठ सामर्थ्य वाले है॥११॥

तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु। यथा त उश्मसीष्टये॥१२॥

हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव! आप हमारी इच्छा पूर्ण करें। हम इष्टप्राप्ति के निमित्त आपकी कामना करे और वह पूर्ण हो॥१२॥

रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः। क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥१३॥

जिन (इन्द्रदेव) की कृपा से हम धन-धान्य से परिपूर्ण होकर प्रफुल्लित होते हैं। उन इन्द्रदेव के प्रभाव से हमारी गौएँ भी प्रचुर मात्रा मे दुग्ध-घृतादि देने की सामर्थ्य वाली हों॥१३॥

आ घ त्वावान्त्मनाप्त स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः। ऋणोरक्षं न चक्र्योः॥१४॥

हे धैर्यशाली इन्द्रदेव! आप कल्याणकारी बुद्धि से स्तुति करने वाले स्तोताओ को अभीष्ट पदार्थ अवश्य प्रदान करें। आप स्तोताओ को धन देने के लिये रथ के चक्रो को मिलाने वाली धुरी के समान ही सहायक है॥१४॥

आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम्। ऋणोरक्षं न शचीभिः॥१५॥

हे इन्द्रदेव! आप स्तोताओ द्वारा इच्छित धन उन्हे प्रदान करें। जिस प्रकार रथ की गति से उसके अक्ष को भी गति मिलती है, उसी प्रकार स्तुतिकर्ताओ को धन की प्राप्ति हो॥१५॥

शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि।

स नो हिरण्यरथं दंसनावान्स नः सनिता सनये स नोऽदात् ॥१६॥

सदैव स्फूर्तिवान,सदैव (शब्दवान) हिनहिनाते हुये तीव्र गतिशील अश्वो के द्वारा जो इन्द्रदेव शत्रुओ के धन को जीतते है; उन पराक्रमशील इन्द्रदेव ने अपने स्नेह से अपने स्नेह से हमे सोने का रथ (अकूत-वैभव) दिया है॥१६॥

आश्विनावश्वावत्येषा यातं शवीरया। गोमद्दस्रा हिरण्यवत्॥१७॥

हे शक्तिशाली अश्विानीकुमारो! आप बलशाली अश्वो के साथ अन्नो, गौओ और् स्वर्णादि धनो को लेकर यहाँ पधारें॥१७॥

समानयोजनो हि वां रथो दस्रावमर्त्यः। समुद्रे अश्विनेयते॥१८॥

हे अश्विोनीकुमारो! आप दोनो के लिये जुतने वाला एक ही रथ आकाशमार्ग से जाता है। उसे कोई नष्ट नही कर सकता॥१८॥

न्यघ्न्यस्य मूर्धनि चक्रं रथस्य येमथुः। परि द्यामन्यदीयते॥१९॥

हे अश्विसनीकुमारो! आप के रथ (पोषण प्रक्रिया) का एक चक्र पृथ्वी के मूर्धा भाग मे (पर्यावरण चक्र के रूप मे) स्थित है और दूसरा चक्र द्युलोक मे सर्वत्र गतिशील है॥१९॥

कस्त उषः कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये। कं नक्षसे विभावरि॥२०॥

हे स्तुति-प्रिय, अमर, तेजोमयी उषे! कौन मनुष्य आपका अनुदान प्राप्त करता है ? किसे आप प्राप्त होती है? (अर्थात प्रायः सभी मनुष्य आलस्यादि दोषो के कारणा आप का लाभ पूर्णतया नही प्राप्त कर पाते)॥२०॥

वयं हि ते अमन्मह्यान्तादा पराकात्। अश्वे न चित्रे अरुषि ॥२१॥

हे अश्वत (किरणो) युक्त चित्र विचित्र प्रकाश वाली उषे! हम दूर अथवा पास से आपकी महिमा समझने मे समर्थ नही है॥२१॥

त्वं त्येभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः। अस्मे रयिं नि धारय ॥२२॥

हे द्युलोक की पुत्री उषे! आप उन (दिव्य) बलो के साथ यहाँ आयें और हमे उत्तम ऐश्वर्य धारण करायें॥२२॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त 21 से 30

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २१

[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- इन्द्राग्नि। छन्द -गायत्री]

इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित्स्तोममुश्मसि । ता सोमं ओमापातामा ॥१॥

इस यज्ञ स्थल पर हम इन्द्र एवं अग्निदेवो का आवाहन करते हैं, सोमपान के उन अभिलाषियो की स्तुति करते हुए सोमरस पीने का निवेदन करते हैं॥१॥

ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नरः । ता गायत्रेषु गायत ॥२॥

हे ऋत्विजो! आप यज्ञानुष्ठान करते हुये इन्द्र एवं अग्निदेवो की शस्त्रो (स्तोत्रो) से स्तुति करे, विविध अंलकारो से उन्हे विभूषित करे तथा गायत्री छन्दवाले सामगान (गायत्र साम) करते हुये उन्हे प्रसन्न करें॥२॥

ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे । सोमपा सोमपीतये ॥३॥

सोमपान की इच्छा करनेवाले मित्रता एवं प्रशंसा के योग्य उन इन्द्र एवं अग्निदेवो को हम सोमरस पीने के लिये बुलाते हैं॥३॥

उग्रा सन्ता हवामह उपेदं सवनं सुतम् । इन्द्राग्नी एह गच्छताम् ॥४॥

अति उग्र देवगण एवं अग्निदेवो को सोम के अभिषव स्थान(यज्ञस्थल) पर आमन्त्रित करते हैं, वे यहाँ पधारें॥४॥

ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम् । अप्रजाः सन्त्वत्रिणः॥५॥

देवो मे महान वे इन्द्र अग्निदेव सत्पुरुषो के स्वामी(रक्षक) हैं। वे राक्षसो को वशीभूत कर सरल स्वभाव वाला बनाएँ और मनुष्य भक्षक राक्षसो को मित्र-बांधवो से रहित करके निर्बल बनाएँ॥५॥

तेन सत्येन जागृतमधि प्रचेतुने पदे । इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम् ॥६॥

हे इन्द्राग्ने! सत्य और चैतन्य रूप यज्ञस्थान पर आप संरक्षक के रूप मे जागते रहें और हमे सुख प्रदान करें॥६॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २२

[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- १-४ अश्विकनी कुमार,५-८ सविता,९-१० अग्नि,११ देवियाँ, १२ इन्द्राणी, वरुणानी,अग्यानी,१३-१४ द्यावा-पृथ्वी,१६ विष्णु(देवगण) १७-२१ विष्णु। छन्द -गायत्री]

प्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये॥१॥

हे अध्वर्युगण! प्रातःकाल चेतनता को प्राप्त होने वाले अश्वि्नीकुमारो को जगायें। वे हमारे इस यज्ञ मे सोमपान करने के निमित्त पधारें॥१॥

या सुरथा रथीतमोभा देवा दिविस्पृशा । अश्विना ता हवामहे ॥२॥

ये दोनो अश्विमनीकुमार सुसज्जित रथो से युक्त महान रथी है। ये आकाश मे गमन करते है। इन दोनो का हम आवाहन करते है॥२॥

[यहाँ मंत्र शक्ति से चालित, आकाश मार्ग से चलने वाले यान (रथ) का उल्लेख किया गया है।]

या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । तया यज्ञं मिमिक्षतम्॥३॥

हे अश्विशनीकुमारो। आपकी जो मधुर सत्यवचन युक्त कशा (चाबुक वाणी) है, उससे यज्ञ को सिंचित करने की कृपा करें॥३॥ [वाणी रूपी चाबुक से स्पष्ट होता है कि अश्वितनीकुमारो के यान मंत्र चालित है। मधुर एवं सत्यवचनो से यज्ञ का सिंचन भी किया जाता है। कशा – चाबुक से यज्ञ के सिंचन का भाव अटपटा लगते हुये भी युक्ति संगत है।]

नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥४॥

हे अश्वि्नीकुमारो। आप रथ पर आरूढ होकर जिस मार्ग से जाते है वहाँ सोमयाग करने वाले जातक का घर दूर नही है॥४॥ [पूर्वोक्त मंत्र मे वर्णित यान के तिव्र वेग का वर्णन है।]

हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये । स चेत्ता देवता पदम् ॥५॥

यजमान को (प्रकाश-उर्जा आदि) देने वाले हिरण्यगर्भ(हाथ मे सुवर्ण धारण करने वाले या सुनहरी किरणो वाले) सवितादेव का हम अपनी रक्षा के लिये आवाहन करते है। वे ही यजमान के द्वारा प्राप्तव्य(गन्तव्य) स्थान को विज्ञापित करनेवाले हैं॥५॥

अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि । तस्य व्रतान्युश्मसि ॥६॥

हे ऋत्विज! आप हमारी रक्षा के लिये सविता देवता की स्तुति करे। हम उनके लिये सोमयागादि लर्म सम्पन्न करना चाहते है। वे सवितादेव जलो को सुखा कर पुनः सहस्त्रो गुणा बरसाने वाले है॥६॥

[सौर शक्ति से जल के शोधन,वर्षण एवं शोचन की प्रक्रिया का वर्णन इस ऋचा मे है।]

विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः । सवितारं नृचक्षसम् ॥७॥

समस्त प्राणियो के आश्रयभूत,विविध धनो के प्रदाता,मानवमात्र के प्रकाशक सूर्यदेव का हम आवाहन करते हैं॥७॥

सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः । दाता राधांसि शुम्भति॥८॥

हे मित्रो! हम सब बैठकर सवितादेव की स्तुति करें। धन-ऐश्वर्य के दाता सूर्यदेव अत्यन्त शोभायमान है॥८॥

अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारं सोमपीतये ॥९॥

हे अग्निदेव! यहाँ आने की अभिलाषा रखनेवाली देवो की पत्नियो को यहाँ ले आएँ और त्वष्टादेव को भी सोमपान के निमित्त बुलायेँ॥९॥

आग्ना अग्न इहावसे होत्रां यविष्ठ भारतीम् । वरूत्रीं धिषणां वह ॥१०॥

हे अग्निदेव! देवपत्नियो को हमारी सुरक्षा के निमित्त यहाँ ले आयेँ। आप हमारी रक्षा के लिये अग्निपत्नि होत्रा, आदित्यपत्नि भारती, वरणीय वाग्देवी धिवणा आदि देवियो को भी यहाँ ले आयें॥१०॥

अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः । अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम् ॥११॥

अनवरुद्ध मार्ग वाली देवपत्नियाँ मनुष्यो को ऐश्वर्य देने मे समर्थ है। वे महान सुखो एवं रक्षण सामर्थ्यो से युक्त होकर हमारी ओर अभिमुख हो॥११॥

इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये॥१२॥

अपने कल्याण के लिए सोमपान के लिए हम इन्द्राणी, वरुणानी, और अग्नायी का आवाहन करते है॥१२॥

मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतां नो भरीमभिः ॥१३॥

अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञकर्म को अपने अपने अंशो द्वारा परिपूर्ण करें। वे भरण-पोषण करनेवाली सामग्रीयो(सुख-साधनो) से हम सभी को तृप्त करें॥१३॥

तयोरिद्घृातवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः । गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ॥१४॥

गंधर्वलोक के ध्रुवस्थान मे आकाश और पृथ्वी के मध्य मे अवस्थित घृत के समान(सार रूप) जलो (पोषक प्रवाहो) को ज्ञानी जन अपने विवेकयुक्त कर्मो (प्रयासो) द्वारा प्राप्त करते है॥१४॥

स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथः॥१५॥

हे पृथ्वी देवी! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली है। आप हमे विपुल परिमाण मे सुख प्रदान करें॥१५॥

अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥१६॥

जहाँ से (यज्ञ स्थल या पृथ्वी से) विष्णुदेव ने (पोषण परक) पराक्रम दिखाया, वहाँ (उस यज्ञीय क्रम से) पृथ्वी से सप्तधामो से देवतागण हमारी रक्षा करें॥१६॥

इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥१७॥

यह सब विष्णुदेव का पराक्रम है,तीन प्रकार के (त्रिविध-त्रियामी) उनके चरण है। इसका मर्म धूलि भरे प्रदेश मे निहित है॥१७॥

[त्रिआयामी सृष्टि के पोषण का जो पराक्रम दिखाता है। उसका रहस्य अंतरिक्ष धूलि (सुक्ष्म कणो) के प्रवाह मे सन्निहित है। उसी प्रवाह से सभी प्रकार के पोषक पदार्थ बनते बदलते रहते है।]

त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥

विश्वरक्षक, अविनाशी, विष्णुदेव तीनो लोको मे यज्ञादि कर्मो को पोषित करते हुये तीन चरणोसे जग मे व्याप्त है अर्थात तीन शक्ति धाराओ (सृजन, पोषण और परिवर्तन) द्वारा विश्व का संचालन करते है॥१८॥

विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा॥१९॥

हे याजको! सर्वव्यापक भगवान विष्णु के सृष्टि संचालन संबंधी कार्यो(सृजन, पोषण और परिवर्तन) ध्यान से देखो। इसमे अनेकोनेक व्रतो(नियमो,अनुशासनो) का दर्शन किया जा सकता है। इन्द्र(आत्मा) के योग्य मित्र उस परम सत्ता के अनुकूल बनकर रहे।(ईश्वरीय अनुशासनो का पालन करें)॥१९॥

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥२०॥

जिस प्रकार सामान्य नेत्रो से आकाश मे स्थित सूर्यदेव को सहजता से देखा जाता है, उसी प्रकार विद्वज्जन अपने ज्ञान चक्षुओ से विष्णुदेव(देवत्व के परमपद) के श्रेष्ठ स्थान को देखते हैं॥२०॥[ईश्वर दृष्टिमय भले ही न हो, अनुभूतिजन्य अवश्य है।]

तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम्॥२१॥

जागरूक विद्वान स्तोतागण विष्णूदेव के उस परमपद को प्रकाशित करते हैं,अर्थात जन सामान्य के लिये प्रकट करते है॥ २१॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २३

[ऋषि- मेधातिथि काण्व। देवता १-वायु,२-३ इन्द्रवायु,४-६ मित्रावरुण, ७-९ इन्द्र-मरुत्वान,१०-१२ विश्वेदेवा,१३-१५ पूषा,१६-२३ आपः देवता, २३-२४ अग्नि। छन्द १-१८-अग्नि, १९ पुर उष्णिक्, २१ प्रतिष्ठा तथा २२-२४ अनुष्टुप।]

तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे। वायो तान्प्रस्थितान्पिब॥१॥

हे वायुदेव! अभिषुत सोमरस तीखा होने से दुग्ध मिश्रित करके तैयार किया गया है, आप आएँ और उत्तर वेदी के पास लाये गये इस सोम रस का पान करें॥१॥

उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये॥२॥

जिनका यश दिव्यलोक तक विस्तृत है,ऐसे इन्द्र और वायुदेवो को हम सोमरस पीने के लिये आमंत्रित करते है॥२॥

इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये। सहस्राक्षा धियस्पती॥३॥

मन के तुल्य वेग वाले, सहस्त्र चक्षु वाले,बुद्धि के अधीश्वर इन्द्र एवं वायु देवो का ज्ञानीजन अपनी सुरक्षा के लिये आवाहन करते हैं॥३॥

मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये। जज्ञाना पूतदक्षसा॥४॥

सोमरस पीने के लिये यज्ञ स्थल पर प्रकट होने वाले परमपवित्र एवं बलशाली मित्र और वरुणदेवो का हम आवाहन करते है॥४॥

ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती। ता मित्रावरुणा हुवे॥५॥

सत्यमार्ग पर चलनेवालो का उत्साह बढाने वाले, तेजस्वी मित्रावरुणो का हम आवाहन करते है॥५॥

वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः। करतां नः सुराधसः॥६॥

वरुण एवं मित्र देवता अपने समस्त रक्षा साधनो से हम सबकी रक्षा करते है। वे हमे महान वैभव सम्पन्न करें॥६॥

मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये। सजूर्गणेन तृम्पतु॥७॥

मरुद्गनणो के सहित इन्द्रदेव को सोमपान के निमित्त बुलाते है। वे मतुद्गेणो के साथ आकर तृप्त हों॥७॥

इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूषरातयः। विश्वे मम श्रुता हवम्॥८॥

दानी पूषादेव के समान इन्द्रदेव दान देने मे श्रेष्ठ है। वे सब मरुद्गेणो के साथ हमारे आवाहन को सुने॥८॥

हत वृत्रं सुदानव इन्द्रेण सहसा युजा। मा नो दुःशंस ईशत॥९॥

हे उत्तम दानदाता मरुतो ! आप अपने उत्तम साथी और् बलवान इन्द्र के साथ दुष्टो का हनन करें। दुष्टता हमारा अतिक्रमण न कर सके॥९।

विश्वान्देवान्हवामहे मरुतः सोमपीतये। उग्रा हि पृश्निमातरः॥१०॥

सभी मरुद्गवणो को हम सोमपान के निमित बुलाते है। वे सभी अनेक रंगो वाली पृथ्वी के पुत्र महान् वीर एवं पराक्रमी है॥१०॥

जयतामिव तन्यतुर्मरुतामेति धृष्णुया। यच्छुभं याथना नरः॥११॥

वेग से प्रवाहित होने वाले मरुतो का शब्द विजयवाद के सदृश गुन्जित होता है, उससे सभी मनुष्यो का मंगल होता है॥११॥

हस्काराद्विद्युतस्पर्यतो जाता अवन्तु नः। मरुतो मृळयन्तु नः॥१२॥

चमकने वाली विद्युतसे उप्पन्न मरुद्गुण हमारी रक्षा करें और् प्रसन्नता प्रदान करें॥१२॥

आपूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः। आजा नष्टं यथा पशुम्॥१३॥

हे दिप्तीमान पूषादेव आप अद्भूत तेजो से युक्त एवं धारण शक्ति से सम्पन्न है। अत: सोम को द्युलोक से वैसे ही लायें जैसे खोये हुये पशु को ढुंढकर लाते है॥१३॥

पूषा राजानमाघृणिरपगूळ्हं गुहा हितम्। अविन्दच्चित्रबर्हिषम्॥१४॥

दीप्तिमान पूषादेव ने अंतरिक्ष गुहा मे छिपे हुये शुभ्र तेजो से युक्त सोमराजा को प्राप्त किया॥१४॥

उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत्। गोभिर्यवं न चर्कृषत्॥१५॥

वे पूषादेव हमारे लिये याग के हेतुभूत सोमो के साथ वसंतादि षट्ऋततुओ को क्रमशः वैसे ही प्राप्त कराते है, जैसे यवो (अनाजो) के लिये कृषक बार-बार खेत जोतता है॥१५॥

अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्। पृञ्चतीर्मधुना पयः॥१६॥

यज्ञ की इच्छा करनेवालो के सहायक, मधुर रसरूप जलप्रवाह माताओ के सदृश पुष्टिप्रद है। वे दुग्ध को पुष्ट करते हुये यज्ञमार्ग से गमन करते है॥१६॥

[यज्ञ द्वारा पुष्टि प्रदायक रस प्रवाहो के विस्तार का उल्लेख है।]

अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह। ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्॥१७॥

जो ये जल सूर्य मे (सूर्य किरणो मे) समाहित है, अथवा जिन जलो के साथ सूर्य का सान्निध्य है, ऐसे वे पवित्र जल हमारे यज्ञ को उपलब्ध हों॥१७॥

[उक्त दो मंत्रो मे अंतरिक्ष किरणो द्वारा कृषि का वर्णन है। खेत मे अन्न दिखता नही, किन्तु उससे उत्पन्न होता है। पूषा-पोषण देने वाले देवो (यज्ञ एवं सूर्प आदि) द्वारा सोम (सूक्षम पोषक तत्व) बोया और उपजाया जाता है।]

अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः॥१८॥

हमारी गायें जिस जल का सेवन करती है, उन जलो का हम स्तुतिगान करते है। (अंतरिक्ष एवं भूमी पर) प्रवाहमान उन जलो के निमित्त हम हवि अर्पण करते है॥१८॥

अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥१९॥

जल मे अमृतोपम गुण है। जल मे औषधीय गुण है। हे देवो! ऐसे जल की प्रशंसा से आप उत्साह प्राप्त करें॥१९॥

अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा। अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः॥२०॥

मुझ (मंत्र द्रष्टा मुनि) से सोमदेव ने कहा है कि जल समूह मे सभी औषधियाँ समाहित हैं। जल मे ही सर्व सुख प्रदायक अग्नितत्व समाहित है। सभी औषधियाँ जलोसे ही प्राप्त होती हैं॥२०॥

आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक्च सूर्यं दृशे॥२१॥

हे जल समूह! जीवन रक्षक औषधियो को हमारे शरीर मे स्थित करें, जिससे हम निरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें॥२१॥

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि। यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्॥२२॥

हे जलदेवो! हम याजको ने अज्ञानवश जो दुष्कृत्य किये हो, जानबुझकर किसी से द्रोह किया हो, सत्पुरुषो पर आक्रोश किया हो या असत्य आचरण किया हो तथा इस प्रकार के हमारे हो भी दोष हो, उन सबको बहाकर दूर करें॥२२॥

आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि। पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा॥२३॥

आज हमने जल मे प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान किया है, इस प्रकार जल मे प्रवेश करके हम रस से आप्लावित हुये है! हे पयस्वान ! हे अग्निदेव! आप हमे वर्चस्वी बनाएँ, हम आपका स्वागत करते है॥२३॥

सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा। विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात्सह ऋषिभिः॥२४॥

हे अग्निदेव! आप हमे तेजस्विता प्रदान करें। हमे प्रजा और दीर्घ आयु से युक्त करें। देवगण हमारे अनुष्ठान को जाने और् इन्द्रदेव ऋषियो के साथ इसे जाने॥२४॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २४

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति(कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र)। देवता १-प्रजापति,२अग्नि,३-४ सविता, ५ सविता अथवा भग,६-१५ वरुण।छन्द १,२,६-१५-त्रिष्टुप, ३-५ गायत्री।]

कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम। को नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च॥१॥

हम अमरदेवो मे से किस देव के सुन्दर नाम का स्मरण करें ? कौन से देव हमे महती अदिति पृथ्वी को प्राप्त करायेंगे? जिअससे हम अपने पिता और माता को देख सकेंगे॥१॥

अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम। स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च॥२॥

हम अमरदेवो मे प्रथम अग्निदेव के सुन्दर नाम का मनन करें। वह हमे महती अदिति को प्राप्त करायेंगे, जिससे हम अपने माता-पिता को देख सकेंगे॥२॥

अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम्। सदावन्भागमीमहे॥३॥

हे सर्वदा रक्षणशील सवितादेव! आप वरण करने वाले योग्य धनो के स्वामी है, अतः हम आपसे ऐश्वर्यो के उत्तम भाग को मांगते है॥३॥

यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः। अद्वेषो हस्तयोर्दधे॥४॥

हे सवितादेव! आप तेजस्विता युक्त निन्दा रहित,द्वेष रहित,वरण करने योग्य धनो को दोनो हाथो से धारण करने वाले हैं॥४॥

भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा। मूर्धानं राय आरभे॥५॥

हे सवितादेव! हम आपके ऐश्वर्य की छाया मे रहकर संरक्षण को प्राप्त करें। उन्नति करते हुये सफलताओ के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर भी अपने कर्तव्यो को पूरा करते रहे॥५॥

नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः। नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम्॥६॥

हे वरुणदेव! ये उड़ने वाले पक्षी आपके पराक्रम ,आपके बल और सुनिति युक्त क्रोध(मन्युं) को नही जान पाते। सतत गमनशील जलप्रवाह आपकी गति को नही जान सकते और प्रबल वायु के वेग भी आपको नही रोक सकते॥६॥

अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः। नीचीना स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः॥७॥

पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण(सबको आच्छादित करने वाले) दिव्त तेज पुञ्ज सूर्यदेव को आधारहित आकाश मे धारण करते है। इस तेज पुञ्ज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है। इसले मध्य मे दिव्य किरणे विस्तीर्ण होती चलती हैं॥७॥

उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ। अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्॥८॥

राजा वरुणदेव ने सूर्य गमन के लिये विस्तृतमार्ग निर्धारित किया है, जहाँ पैर भी स्थापित न हो, ऐसे अंतरिक्ष स्थान पर भी चलने के लिये मार्ग विनिर्मित करदेते है। और वे हृदय की पीड़ा का निवारण करने वाले हैं॥८॥

शतं ते राजन्भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टे अस्तु। बाधस्व दूरे निरृतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुग्ध्यस्मत्॥९॥

हे वरुणदेव! आपके पास असंख्य उपाय है। आपकी उत्तम बुद्धि अत्यन्त व्यापक और गम्भीर है। आप हमारी पाप वृत्तियो को हमसे दूर करें। किये हुए पापो से हमे विमुक्त करें॥९॥

अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दिवेयुः।अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति॥१०॥

ये नक्षत्रगण आकाश मे रात्रि के समय दिखते हौ, परन्तु दिन मे कहाँ विलीन होते हैं? विशेष प्रकाशित चन्द्रमा रात मे आता है। वरुण राजा के नियम कभी नष्ट नही होते है॥१०॥

तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः॥११॥

हे वरुणदेव! मन्त्ररूप वाणी से आपकी स्तुति करते हुये आपसे याचना करते है। यजमान हविस्यात्र अर्पित करते हुये कहता है – हे बहुप्रशंसित देव! हमारी उपेक्षा न करें, हमारी स्तुतियो को जाने। हमारी आयु को क्षीण न करें॥११॥

तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे। शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान्राजा वरुणो मुमोक्तु॥१२॥

रातदिन मे (अनवरत) ज्ञानियो के कहे अनुसार यही ज्ञान(चिन्तन) हमारे हृदय मे होते रहता है कि बन्धन मे पड़े शुनःशेप ने जिस वरुणदेव को बुलाकर मुक्ति को प्राप्त किया, वही वरुणदेव हमे भी बन्धनो से मुक्त करें॥१२॥

शुनःशेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः। अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विद्वाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान्॥१३॥

तीन स्तम्भो मे बधेँ हुये शुनःशेप ने अदिति पुत्र वरुणदेव का आवाहन करके उनसे निवेदन किया कि वे ज्ञानी और अटल वरुणदेव हमारे पाशो को काटकर हमे मुक्त करें॥१३॥

अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः। क्षयन्नस्मभ्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि॥१४॥

हे वरुणदेव! आपके क्रोध को शान्त करने के लिये हम स्तुति रूप वचनो को सुनाते है। हविर्द्रव्यो के द्वारा यज्ञ मे सन्तुष्ट होकर हे प्रखर बुद्धि वाले राजन! आप हमारे यहाँ वास करते हुये हमे पापो के बन्धन से मुक्त करें॥१४॥

उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम॥१५॥

हे वरुणदेव! आप तीनो तापो रूपी बन्धनो से हमे मुक्त करे। आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाश हमसे दूर हों तथा मध्य के एवं नीचे के बन्धन अलग करें! हे सूर्यपुत्र! पापो से रहित होकर हम आपके कर्मफल सिद्धांत मे अनुशासित हो, दयनीय स्थिति मे हम न रहें॥१५॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २५

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता वरुण।छन्द गायत्री।]

यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्। मिनीमसि द्यविद्यवि॥१॥

हे वरुणदेव! जैसे अन्य मनुष्य आपके व्रत अनुष्ठान मे प्रमाद करते है,वैसे ही हमसे भी आपके नियमो मे कभी कभी प्रमाद हो जाता है।(कृपया इसे क्षमा करें)॥१॥

मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः। मा हृणानस्य मन्यवे॥२॥

हे वरुणदेव! आपने अपने निरादर करने वाले का वध करने के लिये धारण किये गये शस्त्र के सम्मुख हमे प्रस्तुत न करें। अपनी क्रुद्ध अवस्था मे भी हम पर कृपा कर क्रोध ना करें॥२॥

वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्। गीर्भिर्वरुण सीमहि॥३॥

हे वरुणदेव! जिस प्रकार रथी अपने थके घोड़ो की परिचर्या करते हैं, उसी प्रकार आपके मन को हर्षित करने के लिये हम स्तुतियो का गान करते हैं॥३॥

परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये। वयो न वसतीरुप॥४॥

हे वरुणदेव! जिस प्रकार पक्षी अपने घोसलो की ओर दौड़ते हुये गमन करते है,उसी प्रकार हमारी चंचल बुद्धियाँ धन प्राप्ति के लिये दूर दूर तक दौड़ती है॥४॥

कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे। मृळीकायोरुचक्षसम्॥५॥

बल ऐश्वर्य के अधिपति सर्वद्रष्टा वरुणदेव को कल्याण के निमित्त हम यहाँ (यज्ञस्थल मे) कब बुलायेंगे?(अर्थात यह अवसर कब मिलेगा?)॥५॥

तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः। धृतव्रताय दाशुषे॥६॥

व्रत धारण करने वाले(हविष्यमान)दाता यजमान के मंगल के निमित्त ये मित्र और वरुण देव हविष्यान की इच्छा करते है, वे कभी उसका त्याग नही करते। वे हमे बन्धन से मुक्त करें॥६॥

वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्। वेद नावः समुद्रियः॥७॥

हे वरुण देव! आकाश मे उड़ने वाले पक्षियो के मार्ग को और समुद्र मे संचार करने वाली नौकाओ के मार्ग को भी आप जानते है॥७॥

वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः। वेदा य उपजायते॥८॥

नियम धारक वरुणदेव प्रजा के उपयोगी बारह महिनो को जानते है और तेरहवे मास(पुरुषोत्तम मास) को भी जानते है॥८॥

वेद वातस्य वर्तनिमुरोरृष्वस्य बृहतः। वेदा ये अध्यासते॥९॥

वे वरुणदेव अत्यन्त विस्तृत,दर्शनिय और अधिक गुणवान वायु के मार्ग को जानते है। वे उपर द्युलोक मे रहने वाले देवो को भी जानते हैं॥९॥

निषसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा। साम्राज्याय सुक्रतुः॥१०॥

प्रकृति के नियमो का विधिवत पालन कराने वाले,श्रेष्ठ कर्मो मे सदैव निरत रहने वाले वरुणदेव प्रजाओ मे साम्राज्य स्थापित करने के लिये बैठते है॥१०॥

अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति। कृतानि या च कर्त्वा॥११॥

सब अद्भुवत कर्मो की क्रिया विधि जानने वाले वरुणदेव, जो मर्म संपादित हो चुके है और जो किये जाने वाले है, उन सबको भली-भांति देखते है॥११॥

स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत्। प्र ण आयूंषि तारिषत्॥१२॥

वे उत्तम कर्मशील अदिति पुत्र वरुणदेव हमे सदा श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढा़यें॥१२॥

बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्। परि स्पशो नि षेदिरे॥१३॥

सुवर्णमय कवच धारण करके वरुणदेव अपने हस्ट-पुष्ट शरीर को सुसज्जित करते है। शुभ्र प्रकाश किरणे उनके चारो ओर विस्तीर्ण होती है॥१३॥

न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम्। न देवमभिमातयः॥१४॥

हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु-जन(भयाक्रान्त होकर) जिनकी हिंसा नही कर पाते, लोगो के प्रति द्वेष रखने वाले , जिनसे द्वेष नही कर पाते ऐसे वरुणदेव को पापीजन स्पर्श तक नही कर पाते॥१४॥

उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या। अस्माकमुदरेष्वा॥१५॥

जिन वरुणदेव ने मनुष्यो के लिये विपुल अन्न भंडार उत्पन्न किया है;उन्होने ही हमारे उदर मे पाचन सामर्थ्य भी स्थापित की है॥१५॥

परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु। इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥१६॥

उस सर्वद्रष्टा वरुणदेव की कामना करने वाली हमारी बुद्धीयाँ, वैसे ही उन तक पहुंचती है जैसे गौएँ श्रेष्ठ बाड़े की ओर जाती है॥१६॥

सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्। होतेव क्षदसे प्रियम्॥१७॥

होता (अग्निदेव) के समान हमारे द्वारे लाकर समर्पित की गई हवियो का आप अग्निदेव के समान भक्षण करे, फिर हम दोनो वार्ता करेंगे॥१७॥

दर्शंनु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि। एता जुषत मे गिरः॥१८॥

दर्शनिय वरुण को उनके रथ के साथ हमने भूमि पर देखा है। उन्होने हमारी स्तुतियाँ स्वीकारी हैं॥१८॥

इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय। त्वामवस्युरा चके॥१९॥

हे वरुणदेव! आप हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें, हमे सुखी बनायें। अपनी रक्षा के लिये हम आपकी स्तुति करते है॥१९॥

त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि। स यामनि प्रति श्रुधि॥२०॥

हे मेधावी वरुणदेव ! आप द्युलोक, भूलोक और सारे विश्व पर आधिपत्य रखते है, आप हमारे आवाहन को स्वीकार कर ’ हम रक्षा करेंगे’ ऐसा प्रत्युत्तर दे॥२०॥

उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत। अवाधमानि जीवसे॥२१॥

हे वरुणदेव! हमारे उत्तम(उपर के) पाश को खोल दे, हमारे मध्यम पाश काट दे और हमारे नीचे के पाश को हटाकर हमे उत्तम जीवन प्रदान करें॥२१॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २६

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता अग्नि।छन्द गायत्री।]

वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जां पते। सेमं नो अध्वरं यज॥१॥

हे यज्ञ योग्य अन्नो के पालक अग्निदेव! आप अपने तेजरूप वस्त्रो को पहनकर हमारे यज्ञ को सम्पादित करें॥१॥

नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः। अग्ने दिवित्मता वचः॥२॥

सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव! आप सर्वोत्तम होता(यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप मे यज्ञकुण्ड मे स्थापित होकर स्तुति वचनो का श्रवण करें॥२॥

आहिष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये। सखा सख्ये वरेण्यः॥३॥

हे वरण करने योग्य अग्निदेव! जैसे पिता अपने पुत्र के,भाई अपने भाई के और मित्र अपने मित्र के सहायक होते है, वैसे ही आप हमारी सहायता करें॥३॥

आनोबर्ही रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा। सीदन्तु मनुषो यथा॥४॥

जिस प्रकार प्रजापति के यज्ञ मे “मनु ” आकर शोभा बढा़ते हैं, उसी प्रकार शत्रुनाशक वरुणदेव, मित्र-देव एवं अर्यमादेव हमारे यज्ञ मे आकर विराजमान हो॥४॥

पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च। इमा उ षु श्रुधी गिरः॥५॥

पुरातन होता हे अग्निदेव! आप हमारे इस यज्ञ से और हमारे मित्रभाव से प्रसन्न हों और हमारी स्तुतियों को भली प्रकार से सुने॥५॥

यच्चिद्धि शश्वता तना देवंदेवं यजामहे। त्वे इद्धूयते हविः॥६॥

हे अग्निदेव! इन्द्र, वरुण आदि अन्य देवताओ के लिये प्रतिदिन विस्तृत आहुतियाँ अर्पित करने पर भी सभी हविष्यमान आपको ही प्राप्त होते है॥६॥

प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः। प्रियाः स्वग्नयो वयम्॥७॥

यज्ञ समपन्न करने वाले प्रजापालक, आनदवर्धक,वरण करने योग्य हे अग्निदेव आप हमे प्रिय हो तथा श्रेष्ठ विधि से यज्ञाग्नि की रक्षा करते हुये हम सदैव आपके प्रिय रहें॥७॥

स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च नः। स्वग्नयो मनामहे॥८॥

उत्तम अग्नि से युक्त हो कर दैदीप्यमान ऋत्विजो के हमारे लिये ऐश्वर्य को धारण किया है, वैसे जी हम उत्तम अग्नि से युक्त होकर इनका (ऋत्विज) का स्वागत करते है॥८॥

अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम्। मिथः सन्तु प्रशस्तयः॥९॥

अमरत्व को धारण करने वाले हे अग्निदेव! आपके और हम मरणशील मनुष्यो के बीच स्नेहयुक्त और प्रशंसनीय वाणियो का आदान प्रदान होता रहे॥९॥

विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः। चनो धाः सहसो यहो॥१०॥

बल के पुत्र(अरणि मन्थन के रूप शक्ति से उत्पन्न) भे अग्निदेव! आप(आहवनीयादि) अग्नियो के साथ यज्ञ मे पधारें और स्तुतियों को सुनते हुये अन्न(पोषण) प्रदान करें॥१०॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २७

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता १-१२अग्नि, १३ देवतागण। छन्द १-१२ गायत्री,१३ त्रिष्टुप।]

अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः। सम्राजन्तमध्वराणाम्॥१॥

तमोनाशक, यज्ञो के सम्राट स्वरूप हे अग्निदेव! हम स्तुतियो ले द्वारा आपकी वंदना करते है। जिस प्रकार अश्व अपनी पूँछ के बालो से मक्खी मच्छर दूर भगाता है, उसी प्रकार आप भी ज्वालाओ से हमारे विरोधियों को दूर भगायें॥१॥

स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः। मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्॥२॥

हम इन अग्निदेव की उत्तम विधि से उपासना करते है। वे बल से उत्पन्न, शीघ्र गतिशील अग्निदेव हमे अभिष्ट सुखो को प्रदान करें॥२॥

स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायोः। पाहि सदमिद्विश्वायुः॥३॥

हे अग्निदेव! सब मनुष्यो के हितचिंतक आप दूर से और निकट से, अनिष्ट चिंतको से सदैव हमारी रक्षा करें॥३॥

इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम्। अग्ने देवेषु प्र वोचः॥४॥

हे अग्निदेव! आप हमारे गायत्री परक प्राण पोषक स्तोत्रो एवं नवीन अन्न(हव्य) को देवो रक (देव वृत्तियों के पोषण हेतु) पहुँचाये॥४॥

आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु। शिक्षा वस्वो अन्तमस्य॥५॥

हे अग्निदेव! आप हमे श्रेष्ठ (आध्यात्मिक), मध्यम(आधिदैविक) एवं कनिष्ठ(आधिभौतिक) अर्थात सभी प्रकार की धन सम्पदा प्रदान करें॥५॥

विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ। सद्यो दाशुषे क्षरसि॥६॥

सात ज्वालाओ से दीप्तिमान हे अग्निदेव! आप धनदायक है। नदी के पास आने वाली जल तरंगो ले सदृश आप हविष्यान्न दाता को तत्क्षण (श्रेष्ठ) कर्म फल प्रदान करतें है॥६॥

यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः। स यन्ता शश्वतीरिषः॥७॥

हे अग्निदेव ! आप जीवन संग्राम मे जिस पुरुष को प्रेरित करते हैं, उनकी रक्षा आप स्व्यं करते हैं। साथ ही उसके लिये पोषक अन्नो की पूर्ति भी करते हैं॥७॥

नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्। वाजो अस्ति श्रवाय्यः॥८॥

हे शत्रु विजेता अग्निदेव! आपके उपासक को कोई पराजित नही कर सकता, क्योंकि उसकी(आपके द्वारा प्रदत्त) तेजस्विता प्रसिद्ध है॥८॥

स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता। विप्रेभिरस्तु सनिता॥९॥

सब मनुष्यो के कल्याणकारक वे अग्निदेव जीवन-संग्राम मे अश्व रूपी इन्द्रियो द्वारा विजयी बनाने वाले हो। मेधावी पुरुषो द्वारा प्रशंसित वे अग्निदेव हमे अभीष्ट फल प्रदान करें॥९॥

जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय। स्तोमं रुद्राय दृशीकम्॥१०॥

स्तुतियो से देवो को प्रबोधित करने वाले हे अग्निदेव! ये यजमान, पुनीत यज्ञ स्थल पर दुष्टता विनाश हेतु आपका आवाहन करते है॥१०॥

स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः। धिये वाजाय हिन्वतु॥११॥

अपरिमिर्त धूम्र-ध्वजा से युक्त, आनन्दप्रदम महान वे अग्निदेव हमे ज्ञान और वैभव की ओर प्रेरित करें॥११॥

स रेवाँ इव विश्पतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः। उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः॥१२॥

विश्वपालक, अत्यन्त तेजस्वी और ध्वजा सदृश गुणो से युक्त दूरदर्शी वे अग्निदेव वैभवशाली राजा के समान हमारी स्तवन रूपी वाणियो को ग्रहण करें॥१२॥

नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः।

यजाम देवान्यदि शक्नवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः॥१३॥

बड़ो, छोटोम युवको और वृद्धो को हम नमस्कार करते है। सामर्थ्य के अनुसार हम देवो का यजन करें। हे देवो! अपने से बड़ो के सम्मान मे हमारे द्वारा कोई त्रुटी न हो॥१३॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २८

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता १-४ इन्द्र,५-६ उलूखल,७-८ उलूखल-मूसल,९ प्रजापति,हरिश्चन्द्रः,अधिषवणचर्म अथवा सोम छन्द १-६ अनुष्टुप,७-९ गायत्री।]

यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥१॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ (सोमवल्ली) कूटने के लिए बड़ा मूसल उठाया जाता है(अर्थात सोमरस तैयार किया जाता है), वहाँ(यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥१॥

यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥२॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ दो जंघाओ के समान विस्तृत,सोम कुटने के दो फलक रखे है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥२॥

यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥३॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ गृहिणी सोमरस कुटने का अभ्यास करती है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥३॥

यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥४॥

हे इन्द्रदेव! जहाँ सारथी द्वारा घोड़े को लगाम लगाने के समान (मथनी को) रस्सी से बाँधकर मन्थन लरते है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥४॥

यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः॥५॥

हे उलूखल! यद्यपि घर घर मे तुमसे काम लिया जाता है, फिर भी हमारे घर मे विजय दुन्दुभि के समान उच्च शब्द करो॥५॥

उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्। अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल॥६॥

हे उलूखल – मूसल रूपे वनस्पति! तुम्हारे सामने वायु विशेष गति से बहती है। हे उलूखल! अब इन्द्रदेव के सेवनार्थ सोमरस का निष्पादन करो॥६॥

आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भृतः। हरी इवान्धांसि बप्सता॥७॥

यज्ञ के साधन रूप पूजन योग्य वे उलूखल और मूसल दोनो, अन्न(चने) खाते हुये इन्द्रदेव के दोनो अश्वो के समान उच्च स्वर से शब्द करते हैं॥७॥

ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः। इन्द्राय मधुमत्सुतम्॥८॥

दर्शनीय उलूखल एवं मूसल रूपे वनस्पते! आप दोनो सोमयाग करने वालों के साथ इन्द्रदेव के लिये मधुर सोमरस का निष्पादन करो॥८॥

उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि॥९॥

उलूखल और मूसल द्वारा निष्पादित सोम को पात्र से निकाल कर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और अवशिष्ट को छानने के लिये पवित्र चर्म पर रखें॥९॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २९

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता इन्द्र। छन्द पंक्ति।]

यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥१॥

हे सत्य स्वरूप सोमपायी इन्द्रदेव! यद्यपि हम प्रशंसा के पात्र तो नही है, तथापि हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥१॥

शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥२॥

हे इन्द्रदेव ! आप शक्तिशाली, शिरस्त्राण धारण करने वाले, बलो के अधीश्वर और ऐश्वर्यशाली है। आपका सदैव हम पर अनुग्रह बना रहे। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥२॥

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Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

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