t>

गंगा जल को क्यों मानते हैं इतना पवित्र

Share this

गंगा का जल पवित्र क्यों माना जाता है ?

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद् गीता में कहा है कि स्त्रोत सामास्मि जाह्नवी अर्थात जल स्रोतों में मैं ही जाह्नवी (गंगा) हूं। इस प्रकार गंगा श्रीहरि का ही एक स्वरूप है। शास्त्रों में औषधि जाह्नवी तोऽयं वैद्यो नारायणः हरि अर्थात् समस्त आध्यात्मिक रोगों की औषधि गंगा जल है और इन रोगों के चिकित्सक जगन्नाथ श्रीहरि नारायण हैं। गंगाजी की महत्ता प्रकट करते हुए स्कंदपुराण में कहा गया है—

अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहनो हि यथा दहेत्। अनिच्छयापि संस्नाता गंगा पापं तथा दहेत् ॥

अर्थात् जिस प्रकार अग्नि का स्पर्श करने पर बिना इच्छा के भी अग्नि जला देती है, उसी प्रकार गंगा के जल में स्नान करने पर बिना इच्छा किए हुए ही गंगाजी सभी पापों को धो देती हैं। महाभारत के वनपर्व में गंगाजी के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है

यद्यकार्यशतम् कृत्वा कृतम् गंगाभिषेचनम् । सर्व तत तस्य गंगाभ्यो दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥ सर्व कृतयुगे पुण्यम् त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् । द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गंगा कलियुगे स्मृता ॥ पुनाति कर्तिता पापं दृष्य भद्रं प्रयच्छति । अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥

अर्थात् अग्नि जिस प्रकार ईंधन को जला देती है, उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करने के पश्चात् भी गंगाजल में स्नान करने पर सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सतयुग में सभी तीर्थ पुण्य फल प्रदान करने वाले थे। त्रेतायुग में पुष्कर, द्वापर युग में कुरुक्षेत्र और कलियुग में गंगाजी की महिमा का अत्यधिक गुणगान किया गया है। गंगाजी नाम लेने मात्र से ही वह पापी प्राणी को पापमुक्त कर देती हैं। गंगाजी के दर्शन से सौभाग्य प्राप्ति होती है और गंगाजल में स्नान करने या गंगाजल ग्रहण करने से सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।

अग्निपुराण के अनुसार गंगाजी सद्गति प्रदान करने वाली हैं। जो प्राणी नित्य गंगाजल का सेवन करते हैं, वे अपने वंशसहित भवबाधा से मुक्त हो जाते हैं। गंगाजी में स्नान करने, गंगाजल का पान करने और गंगाजी का श्रद्धा-भक्ति से जप करने पर अनेक मनुष्य पापमुक्त और पुण्य गति को प्राप्त हुए हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में गंगाजी के समान कोई अन्य जल तीर्थ नहीं है।

पद्म पुराण के अनुसार गंगाजी के परम प्रताप से मनुष्य के जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है, फिर उसे सहज ही स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त हो जाता है।

गंगाजी आदिकाल से ही भारतवासियों के हृदयों में श्रद्धा भक्ति की ज्योति जलाती रही हैं और जनमानस में परम पूजनीय रही हैं। ‘जैसी श्रद्धा वैसा फल’ वाली उक्ति गंगाजी के संबंध में भी प्रचलित है। इस बारे में एक कथा बहुत प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है

एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा- “हे प्राणनाथ ! क्या गंगा में स्नान करने वाले प्राणी के पाप नष्ट हो जाते हैं ? ” “हां पार्वती! है तो ऐसा ही, किंतु जैसी प्राणी की श्रद्धा होती है, उसे वैसा ही फल भी प्राप्त होता है। ” भगवान शिव बोले। “भगवन्! कृपया अपनी बात को स्पष्ट कीजिए।” माता पार्वती आग्रहपूर्वक बोलीं।

“तो फिर चलिए, गंगा के तट पर चलते हैं। “जैसी आपकी इच्छा भगवन्!” कहकर पार्वती शिव के पीछे-पीछे गंगाजी के तट पर पहुंचकर शिव ने अपना और माता पार्वती का स्वरूप चल पड़ीं।

परिवर्तित किया। वे स्वयं तो एक कोढ़ी पुरुष बनकर धरती पर जा लेटे और माता पार्वती एक सुंदर नारी के वेष में उनकी सेवा-सुश्रूषा में लग गईं। गंगाजी के तट पर मेला लगा हुआ था। लोगों की भीड़ उमड़ी पड़ रही थी। ऐसे में कौढ़ी बने भगवान शिव की ओर तो कोई भी मनुष्य आंख उठाकर भी न देखता और जो देखता भी था, उसकी आंखों में घृणा के ही भाव भरे होते थे।

इसके वेपरीत लोग माता पार्वती के रूप-सौंदर्य को एकटक देखते हुए वहां से गुजरते थे। माता पार्वती के रूप सौंदर्य से आकर्षित कुछ लोगों ने तो उनके समक्ष कोढ़ी रूप शिव को छोड़कर अपने साथ चलने का भी प्रस्ताव रखा।

शिव अपनी लीला और लोगों की मंदबुद्धि पर माता पार्वती की ओर देख देखकर मुस्कराते रहे। अंततः गंगा स्नान करने वाले श्रद्धालुओं में से एक व्यक्ति उधर से निकला। उसने भी एक कोढ़ी के साथ एक सुंदर स्त्री को देखा, किंतु उसका आकर्षण स्त्री का रूप सौंदर्य नहीं, बल्कि उसका पतिव्रता धर्म था।

वह श्रद्धालु उनके पास आया और उसने पार्वती के पतिव्रत धर्म की बहुत सराहना की। फिर उसने कोढ़ी को गंगा स्नान कराने में पार्वती की सहायता की, ताकि कोढ़ी का कोढ़ रोग दूर हो सके। गंगा-स्नान करते ही श्रद्धालु वहां से चला गया। तब भगवान शंकर अपने पूर्व वेष में आ गए और माता पार्वती से बोले, “देखो पार्वती! यही श्रद्धालु सद्गति पाने का सच्चा अधिकारी है। इसके मन में न तो रूप-सौंदर्य का आकर्षण है और न ही माया-मोह का लोभ है।

ऐसे श्रद्धालु ही सच्चे श्रद्धालु होते हैं। यद्यपि अन्य लोगों को भी गंगा स्नान का पुण्य मिलता है तथापि उनकी जैसी श्रद्धा होती है, उसी के अनुरूप पुण्य फल में वृद्धि अथवा कमी होती है। भगवान शिव ने माता पार्वती को गंगा की महत्ता और भक्त की श्रद्धा के बारे में समझाया।

विभिन्न धर्मग्रंथों में गंगाजी की पवित्रता और महत्ता को स्वीकार किया गया है। इसके साथ ही गंगाजल पर विभिन्न शोधों से स्पष्ट हुआ है कि गंगाजल को वर्षों तक रखने पर भी यह खराब नहीं होता और न ही इसमें से दुर्गंध उठती है। गंगाजल में स्वास्थ्यवर्धक तत्त्वों की बहुलता पाई जाती है।

यही कारण है कि यह पीने में मीठा, अमृततुल्य, पाचक, त्रिदोषों का नाश करने वाला, हृदय के लिए हितकारी और आयुवर्द्धक होता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में रासायनिक लवण यथा- कैल्सियम, पोटैशियम, सोडियम आदि पाए जाते हैं। इनके अलावा गंगा जल में 45 प्रतिशत क्लोरीन भी होता है। यह जल में कीटाणुओं को पनपने से रोकता है। गंगाजल में अम्लीयता और क्षारीयता लगभग एक समान ही होती है।

डॉक्टर कोहिमान के अनुसार जब किसी व्यक्ति की जीवनी शक्ति समाप्त होने लगे तो उसे गंगाजल पिला देना चाहिए। इससे उस व्यक्ति की जीवनी शक्ति आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ जाएगी। इसके साथ ही रोगी व्यक्ति को अपने अंदर एक प्रकार की अनुपम सात्त्विक आनंद की लहरें उमड़ती महसूस होंगी। यही कारण भी है कि मरणासन्न व्यक्ति के मुख में गंगाजल डालने की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है।

Share this

Leave a Comment