ज्योतिष

नवरतनों को धारण करने की विधि और रत्नों से मनोकामना सिद्धि उपाय

सूर्य का रत्न माणिक्य

सूर्य ब्राह्मण का केंद्र है । इसकी शाकी से समग्र विश्व अनुप्रणित है । यह ज्योतिष की दृष्टि से आत्मकारक ग्रह है । आत्मबल और इच्छा शक्ति तथा पिता का विचार इससे किया जाता है । सूर्य को ‘भुवनस्य भर्ता ‘ और गोप्ता कहते हैं इसलिए पितृपक्ष का सामंजस्य इससे बैठ जाता है । इसमें शामक और मारक दोनों शक्तियां बड़ी प्रबल रूप मे हैं । सारे ग्रहों की अनिष्टकारकता को अकेला सूर्य नष्ट कर सकता है तो ग्रहान्तो की मारक शक्ति का शोषण भी सूर्य से प्रारम्भ होता है ।

सूर्य की प्रतिकूल स्थिति व्यक्ति के आत्मबल को, पितृपक्ष को, सिंह राशि के कारण हृदय संस्थान को और सूरी के अग्नितत्वीय होने के कारण आमाशय को प्रभावित करती है । इसकी प्रतिकूल प्रभावकारिता के लिए माणक (माणिक्य) धारण किया जाता है ।

माणिक्य करने के लिए सूर्य का मंत्र : ॐ घ्रणिः सूर्याय नम:
चंद्रमा का रत्न मोती

मोती, चंद्रमा का रत्न है । फलादेश मे चंद्र की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है । कई विद्वानो के मतानुसार चंद्र को केंद्र मानकर फलादेश किया जाता है । यह ग्रह मन का अधिष्ठाता है । जल तत्व प्रधान होने के कारण अशुभ रहने पर यह रक्त का नियामक है और रक्त हृदय के द्वारा संचालित होता है इसलिए परोक्ष रूप से यह हृदय को भी प्रभावित करता है । मोती की पिष्टि हृदय रोग के लिए अत्यंत प्रभावकारी औषधि होती है ।

चंद्र की अनिष्टकर स्थिति की शांति के लिए मोती पहना जाता है । अनिष्ट चंद्रमा दस अंश तक हो तो पाँच रत्ती का मोती धारण किया जाना चाहिए । पुष्य नक्षत्र के प्रथम चरण मे मोती को खरीदना, दूसरे चरण मे जड़वाना और तीसरे चरण मे गाय के दूध से धोकर । धूप देकर चंद्र के मंत्र का एक सौ आठ जप करके विश्वास अवम श्रद्धापूर्वक धारण कर लेना चाहिए ।

मोती करने के लिए चंद्र का मंत्र : ॐ सों सोमाय नम: 

मंगल का रत्न मूंगा

मूंगा, मंगल का उपरत्न है । यह सर्वविदित है की मंगल क्रूर ग्रह है । इसकी अशुभ स्थिति व्यक्ति को परेशान ही नहीं करती, पापी भी बनाती है । इसके वर्तन काल के पश्चात भी व्यक्ति दुष्कर्मी बना रहता है । इससे हम व्यक्ति की शारीरिक क्षमता (क्षमता मे आक्रमकता, प्रतिरोध और प्रतिक्रियाशून्यता (कायरता) ये तीनों ही आते हैं ) और मातृसुख का विचार करते हैं । वैसे स्थिति के आधार पर यह व्यक्ति के विधि पक्षों को सवारता भी है और बिगाडता भी है ।

मंगल की अशुभ स्थिति की शानी के निमित्त मूंगा धारण किया जाता है । मंगल अशुभ स्थिति मे दस अंशों तक हो तो आठ रत्ती मूँगे का दाना अंगूठी मे जड़वाकर धारण कर्ण चाहिए । अनुराधा नक्षत्र के प्रथम चरण मे खरीदकर दूसरे चरण मे अंगूठी बनवा लेनी चाहिए और तीसरे चरण मे उसे गौ दुग्ध सहित मंत्रोच्चार से पूजित करके तथा मंगल के मंत्र की एक माला जप करके धारण कर लेना चाहिए ।

मंगल का मंत्र है :- अं अंगारकाय नमः
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बुध का रत्न पन्ना

पन्ना या करकत , बुद्ध ग्रह का रत्न है । यह अशुभ रहने पर जिस स्थान से संबंध रखता है, उसी भाव का नाश करता है । स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल स्थिति मे रहने से हृदयरोग, खांसी और कुष्ठ जैसी बीमारियाँ पैदा करता है । इसलिए पन्ने का अट्ठावन रत्ती का टावदा धारण करने से तुरंत और चमत्कारिक रूप से हृदय की बीमारी मे लाभ पहुंचता है ।

यदि बुध दस अंश तक अशुभ हो तो उसके लिए सात रत्ती का पन्ना धारण करना  उचित रहता है । यदि बुध बीस अंश तक अशुभ रहे तो पाँच रत्ती का पन्ना ठीक रहेगा । बीस से तीस अंश तक के बुध की अनिष्टकारकता को शांत करने के लिए तेरह रत्ती का पन्ना उचित रहेगा ।

पन्ना धारण करने के लिए बुध का मंत्र : ॐ बू बुधाय नम:

वृहस्पति का रत्न पुखराज

पुखराज, वृहस्पति का रत्न है । वृहस्पति प्रकृति से कफ कारक है, किन्तु वर्ण से पीला है । इसकी अच्छी स्थिति से व्यक्ति गौर वर्ण से और शरीर से पुष्ट होता है । नेत्रों मे पीली झांई वृहस्पति का प्रत्यक्ष प्रभाव है। पाश्चात्य हस्तरेखाविद वृहस्पति की इस स्थिति का एक विशेष फल और बतलाते हैं की इस ग्रह की अच्छी स्थिति से (जिसका ज्ञान मुखी रूप से तर्जनी के नीचे वाले माउंट से होता है) व्यकी पेटु होता है और मीठी चीजें उसे अधिक प्रिय होती हैं । परिणाम यह होता है की मीठा खाने से आँतें खराब हो जाती हैं और पेट खराब रहने लगता है ।

भारतीय दृष्टि से यह ग्रह ज्ञान, सुख और पुत्र का कारक है । इसकी विपरीत स्थिति से व्यक्ति इनसे वंचित रहता है । वैसे यह भी अपनी स्थिति के कारण विभिन्न भावो की हानी करता है । गुरु की अशुभ स्थिति की शांति के लिए पुखराज धारण किया जाता है । गुरु कारकांश मे यदि दस अंश तक है और उस ग्रह या भाव की राशि प्रतिकूल है तो नौ रत्ती का पुखराज धारण किया जाता है ।

पुखराज धारण करने के लिए बृहस्पति का मंत्र : ॐ ब्रह्म ब्रह्स्पतिये नम:
शुक्र का रत्न हीरा

हीरा, शुक्र ग्रह का रत्न है । यह जितना बहुतायत से मिलता है उतना ही उपयोगी भी है। शुक्र वैषयिक सुख का और संतान का कारक है । शुक्र की स्थिति को पामिस्ट्री मे विशेष विचारणीय माना गया है । इसका हाथ मे अंगूठे के नीचे वाला स्थान माना जाता है । इसी को लपेटकर चलने वाली रेखा जीवन रेखा मानी जाती है और इस स्थान की पुष्टता के आधार पर ही व्यक्ति के आवेग और सेक्सुअल पावर का तथा इस विषय के विचारों का ज्ञान किया जाता है ।

शुक्र की अशुभ स्थिति से व्यक्ति की जीवन-शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता का हास होता है । यह अशुभ होकर स्थिति के अनुसार विभिन्न भावों का नाश करता है । जिसकी शांति के लिए हीरा पहनने की व्यवस्था ज्योतिष शास्त्र मे दी गई है ।

हिरा धारण करने के लिए शुक्र का मंत्र : ॐ शं शुक्राय नम:

शनि का रत्न नीलम

नीलम, शनि ग्रह का रत्न है । यों पापी  ग्रहों मे शनि से भी अधिक उग्र और पापी दूसरे ग्रह भी हैं पर जितनी ख्याति इसकी है , उतनी औरों की नही । शायद गोचर मे ढैया और साढ़ेसाती के कारण इसको यह प्रसिद्धि मिली हो । सूर्य का पुत्र होने से यह ग्रह अत्यंत बलशाली है। आकार मे भी कई ग्रहों से बड़ा है और शाही चाल से धीरे-धीरे चलना इसकी विशेषता है । यह जिस पर प्रसन्न होता है उसे निहाल कर देता है और जिस से अप्रसन्न रेहता है उसे बर्बाद करने से भी नहीं चूकता । इसकी प्रसन्नता और अप्रसन्नता का ज्ञान कुंडली मे इसकी स्थिति के आधार पर किया जाता है ।

विपरीत स्थिति मे अशुभ शनि की शांति के लिए दान और जप आदि की व्यवस्था है । नीलम पहनने से शनि की अशुभ स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है और उसे किसी सीमा तक शुभ या अनुकूल बनाया जा सकता है ।

नीलम धारण करने के लिए शनि का मंत्र : ॐ शं शनिश्चराय नम: 
राहू का रत्न गोमेद

गोमेद, राहू का रत्न है। राहू पाप ग्रह है । इसलिए इसकी अशुभ स्थिति व्यक्ति को पीड़ित करती है । शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तथा सामाजिक स्तरों पर यह हानी पहुंचता है । इसकी शक्ति को कम करने के लिए गोमेद धारण किया जाता है । शुभ फल प्राप्त होने के लिए यदि राहू 1 अंश से 10 अंश तक हो तो तेरह रत्ती का स्वच्छ निर्दोष गोमेद धारण किया जाता है तथा 11 अंश से 20 अंशों तक 7 रत्ती का रत्न धारण करना चाहिए । 21 अंशो से 30 अंशों तक 5 रत्ती का गोमेद धारण करना चाहिए । हस्त नक्षत्र के तृतीय चरण मे इसे खरीदना चाहिए, द्वितीय चरण मे अंगूठी बनवानी चाहिए तथा प्रथम चरण मे धारण करनी चाहिए । जब अंगूठी बनकर आ जाए तब गाय के दूध से धोने के बाद पुनः शुद्ध जल से धोकर तथा चन्दन लगाकर और धूप देकर राहू के मंत्र से सवा लाख जप करके धारण केआर लेना चाहिए ।

राहू का मंत्र है :- रां राहवे नमः
केतू का रत्न लहसुनिया

लहसुनिया, केतू का रत्न है । यह रत्न नीलम की तरह की तुरंत प्रभाव प्रकट करने वाला महारत्न है । केतू की अशुभकारिता को शान करने के लिए भी इसे धारण किया जाता है । यद्द्पि लहसुनिया वजन के आधार पर धारण किया जाता है फिर भी वजन के समानान्तर इसके भीतर चलायमान प्रतीत होते हुए सूत्र महत्वपूर्ण रहते हैं । किन्तु की विपरीत स्थिति  व्यक्ति को इतना पीड़ित कर देती है, जिसकी सीमा नहीं । लहसुनिया धारण करने से दुख, दारिद्र्य , व्याधि आदि नष्ट हो जाते हैं । लहसुनिया की अंगूठी सोने या चांदी मे बनवाकर सोमवार के दिन कच्चे गौ-दुग्ध व गंगाजल से धोकर अनामिका अंगुली मे केतू के मंत्र का उच्चारण करते वक्त धारण करनी चाहिए ।

केतू का मंत्र है:- स्त्रा स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः
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Abhishek Purohit

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