यात्रा

राजा राम मंदिर,झाँसी

Rajaram Temple

मध्यप्रदेश। झांसी के पास में मप्र का एक छोटा-सा गांव है ओरछा। बुंदेलखंड के इतिहास को अपने में समेटे यह गांव मप्र टूरिज्म का प्रमुख हिस्सा है। यहां पर भगवान श्री राम का मंदिर स्थित है जो कि राम राजा मंदिर कहलाता है। मंदिर के बारे में बहुत-सी कहानियां मशहूर हैं। यहां पर श्रीराम को राजा की तरह पूजा जाता है।

मान्यता है कि राम यहां के राजा हैं।  इसके बाद ही भक्त यहां दर्शन करते हैं। एक और किंवदंती है कि राम राजा को ओरछा इतना पसंद है कि वह अयोध्या में रात रुकते हैं और सुबह ओरछा आ जाते हैं।

भगवान राम के राजा के रूप में विराजमान होने के साथ एक अनोखी जनश्र्रुति जुड़ी हुई है । कहते है कि धर्म परायण बुंदेला राजा मघुकर शाह स्वप्र में भगवान राम के दर्शन पाकर और उसके निर्देश पर अयोध्या से राम की प्रतिमा ओरछा लाए थे तब राजा को भगवान ने निर्देश दिया था कि वे जिस जगह सबसे पहले विराजमान हो जाऐंगे फिर वहां से हटाए नहीं जाऐंगे । लेकिन मंदिर में प्रतिष्ठा के पहले इसे महल मेें एक स्थान पर रख दिया गया और प्राण प्रतिष्ठा के समय मूर्ति को वहॉ से हटाना असंभव हो गया तब से राम राजा के रूप में उसी महल में विराजमान है ।मंदिर में राम राजा के अलावा सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां भी स्थापित हैं। यहां का विशेष आकर्षण है राम बरात। यह दिसंबर माह में होती है। रामनवमीं भी यहां पर विशेष तौर से मनाई जाती है। कई ऐतिहासिक स्मारक भी यहां देखने को मिलते हैं। बुंदेलखंड के शूरवीर लाला हरदौल यहीं के राजकुमार थे। बुंदेला राजाओं के इतिहास की झलक भी ओरछा में देखने मिलती है।

स्थापत्य की द़ष्टि से गगनचुम्बी कलश और प्रासाद वास्तुकला के कारण यह मंदिर नि: सन्देह समूचे भारत में अनूठा है यह देश का अनोखा ऐसा मंदिर है जहॉ राम की पूजा राजा की तरह होती है । इसके साथ ही ओरछा नगरी का स्थान अनूठा हो गया इस नगरी में हमारी मध्ययुगीन विरासत पत्थरों मेें मुखरित होती है । कहते है कि समय हमेशा गतिमान होता है लेकिन इस मध्ययुगीन नगर में पाषाण के धनीभूत सौन्दर्य को देखकर लगता है कि समय यहॉं विश्राम कर रहा है । लगता है समूचा सौन्दर्य युगों युगों के लिए समय की शिला पर अंकित हो गया है जैसे आनन्द की परमअनुभूति पर जाकर लगता है मानों समय ठहरे गया हो ।

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16 वीं सदी में बुंदेला राजपूत रूद्र प्रताप ने बेतवा के किनारे स्थित इस भूमि को अपनी राजधानी बनाया परवतों राजा वीर सिंह जूदेव के समय ओरछा नगरी ने अपना वैभव प्राप्त किया । 16 वीं व 17 वीं सदी में बनवाए गए मंदिर और प्रासाद आज भी अपनी पुरातन गरिमा बनाए हुए हैं। ओरछा के स्थापत्य बाहर से तो भव्य है ही उनका अंतरंग भी बुंदेली कला से सुसज्जित है ।

लक्ष्मी नारायण मंदिर में अंकित मर्मस्पर्शी भित्ति चित्रों में लोक और परलोक की गाथाओं वे अशिभक्ति पाई है वे आज भी मंदिर क ेअंतरंग को जीवन्त बनाए हुए है । लक्ष्मी नारायण मंदिर की वास्तुसंकल्पना अत्यंत रोचक है जिसमें मंदिर अैर दुर्गाशैली का अद्भुत समन्वय है जिसमें बने भित्ति चित्रों में जीवन स्पंदित होता है साथ ही सर्वधर्र्म संभाव और आध्यात्मिक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति मिलती है ।

एक और मंदिर चतुर्भुज मंदिर जो अयोध्या से लाए गए राम की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के लिए बनवाया गया था पर जनश्रुति के अनुसार प्रतिष्ठा राम रानी लॉड कुंवर के महल में स्थापित हो गए थे । इस मंदिर पर वाह्य अलंकरण के रूप में धार्मिक महत्व के कमल प्रतीक के चिन्ह सुरूचि पूर्वक अंकित किए गए है । आंतरिक भाग का मंदिर गर्भ बिल्कुल सात्विक है। जिसकी दीवारें गहन पवित्रता से भरी हुई है । मंदिरों के साथ ही यहाँ राज प्रसादों की भी एक श्रृंखला है जिसमें जहांगीर महल, राजामहल, राय प्रवीण महल ,सुन्दर महल शामिल है । ओरछा ने भारतीय स्वंतत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को अज्ञातबास में अपनी शरण स्थली देकर भूमिका का निर्वहन किया है । मप्र सरकार ने एक स्मारक निर्मित कर उस शहीद को नमन किया है । अध्यात्म और स्थापत्य का अनूठा संगम किसी भी आमजन के लिए उत्सुकता पैदा कर सकता है फिर पर्यटन के शैकीन जनों के लिए तो यह अद्भुत है ही । यहाँ वायु , रेल और सड़क मार्ग से निकट ही सुविधाऐं उपलब्ध है । म प्र पयर्टन विकास निगम ने भी इस स्थान के महत्व को देखते हुए ठहनेे के उचित प्रबन्ध किए है जिसमें होटल शीश महल और बेतवा रिट्रीट में बहुत ही उपयुक्त सुविधाऐं उपलब्ध हैे ।

यहां पर जब दर्शन के लिए पट खुलते हैं तो सबसे पहले पुलिस की सलामी दी जाती है।

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