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प्राणायाम : क्या है, कैसे करें, क्या है लाभ और कितने प्रकार का होता है ?

pranayama poses

प्राणायाम क्या है ? | What Is Pranayama 

प्राणस्य आयाम: इत प्राणायाम, श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायाम – (योग सूत्र 2/49)

अर्थात प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम (Pranayama) है।

Pranayam in Hindi : सामान्य भाषा में जिस क्रिया से हम श्वास लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं उसे प्राणायाम (pranayam) कहते हैं। प्राणायाम से मन-मस्तिष्क की सफाई की जाती है। हमारी इंद्रियों द्वारा उत्पन्न दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि प्राणायाम करने से हमारे मन और मस्तिष्क में आने वाले बुरे विचार समाप्त हो जाते हैं और मन में शांति का अनुभव होता है और शरीर की असंख्य बीमारियो का खात्मा होता है।

सांस लेने की क्रिया के संबंध में योगशास्त्र (Ashtanga Yoga) के अनुसार 10 प्रकार की वायु बताई गई है। यह 10 प्रकार की वायु इस प्रकार है- प्राण, अपान, समान, उदान, ज्ञान, नाग, कूर्म, क्रीकल, देवदत्त और धनन्जय। अच्छे स्वास्थ्य में इन सभी प्रकार की वायु पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है। प्राण के पाँच प्रकार हैं – अपान, व्यान, उदान, समान, प्राण। हमारा पूरा शरीर इसी प्राण के आधार पर चल रहा है। प्राण वायु का क्षेत्र कंठ नली से श्वास पटल के मध्य है, इसको यह प्राणवायु कंट्रोल करता है ।

अपान – नाभि के नीचे जितने अंग हैं, इनकी कार्य प्रणाली को अपानवायु नियंत्रित करता है। जो कुछ हम खाते हैं उसको पचाना और जो व्यर्थ है उसे मल – मूत्र के रूप में बाहर निकलना ; यह कार्य अपानवायु से संचालित होते हैं। अपान हमारे पाचनक्रिया को कंट्रोल करती है, जैसे गालब्लेडर, लिवर, छोटी आंत, बड़ी आंत ; ये सब इसी क्षेत्र में आते हैं।

उदान कंठ के साथ जुड़े जितने भी अंग हैं; आँख, कान, नाक, जीभ, बोलना, स्वाद लेना; ये ज्ञानेन्द्रियाँ जो हैं, इनके सारे कार्य उदानवायु से होते हैं। जब तक उदानवायु है , तब तक आँखें देखेंगी, कान सुनेंगे, जीभ बोलेगी, नाक सूंघेगा। उदानवायु के द्वारा हमारी जो कर्मेन्द्रियाँ हाथ – पैर और नाभि के ऊपर के सारे अंग ; जैसे हृदय की धड़कन , हृदय की धमनियां आती हैं, फेंफडे यह सब उदान की शक्ति से कार्य करते हैं।

समान यह हमारे शरीर के मध्य भाग में होती हैं। अपान और उदान की जो बैलेंसिंग है, यह समान वायु के द्वारा होती है।

व्यान यह प्राण हमारे पूरे शरीर में है। इसको हम सर्वव्यापी भी बोलते हैं। अर्थात जो पूरे शरीर में फैला हुआ है।

इन पंचप्राणों के भी पाँच उपप्राण हैं – जैसे हिचकी, आंखों का झपकाना, यह भी प्राण से हो रहा है। अब प्राणायाम का सीधा सम्बन्ध इन्ही पंचप्राणों (prana) से है। पूरे शरीर का कार्य इन पंचप्राणों से हो रहा है और इन पंचप्राणों पर सीधा प्रभाव देता है- प्राणायाम (pranayama)।

प्राणायाम कैसे करें | How to do Pranayama

नाक से बाहरी वायु का भीतर प्रवेश करना श्वास कहलाता है और भीतर की वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। इन दोनों के नियंत्रण का नाम प्राणायाम है। प्राणायाम में हम पहले श्वास को अंदर खींचते हैं, जिसे पूरक (puraka) कहते हैं। पूरक मतलब फेफड़ों में साँस को भरना। श्वास लेने के बाद कुछ देर के लिए श्वास को फेफड़ों में ही रोका जाता है, जिसे कुंभक (kumbhaka) कहते हैं। इसके बाद जब श्वास को बाहर छोड़ा जाता है तो उसे रेचक (rechaka) कहते हैं। इस तरह प्राणायाम की सामान्य विधि पूर्ण होती है। भीतर की श्वास को बाहर निकालकर बाहर ही रोके रखना बाह्यकुंभक कहलाता है।

योग व प्राणायाम दोनों माध्यमों से चक्रों व कुण्डलिनी शक्ति का जागरण संभव होता है इसलिए हर व्यक्ति को अपने जीवन में थोड़ा समय निकालकर प्रतिदिन योग प्राणायाम जरूर करना चाहिए |

प्राणायाम के लाभ (Pranayama benefits or advantages) 

  • योग में प्राणायाम क्रिया सिद्ध होने पर पाप और अज्ञानता का नाश होता है।
  • प्राणायाम की सिद्धि से मन स्थिर होकर योग के लिए समर्थ और सुपात्र हो जाता है।
  • प्राणायाम के माध्यम से ही हम अष्टांग योग की प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि की अवस्था तक पहुंचते हैं।
  • प्राणायाम से हमारे शरीर का संपूर्ण विकास होता है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में शुद्ध हवा जाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
  • प्राणायाम से हमारा मानसिक विकास भी होता है। प्राणायाम करते हुए हम मन को एकाग्र करते हैं। इससे मन हमारे नियंत्रण में आ जाता है।
  • प्राणायाम से शरीर की सारी बीमारियां 9 महीने में दूर हो जाती हैं।
  • सुबह-सुबह थोड़ा सा व्यायाम या योगासन करने से हमारा पूरा दिन स्फूर्ति और ताजगीभरा बना रहता है। यदि आपको दिनभर अत्यधिक मानसिक तनाव झेलना पड़ता है तो यह क्रिया करें, दिनभर चुस्त रहेंगे। इस क्रिया को करने वाले व्यक्ति से फेफड़े और सांस से संबंधित बीमारियां सदैव दूर रहेंगी।
  • Positive Energy मिलने लगती है।

सावधानियाँ (Precautions and prohibitions in Pranayama and Yoga) 

  • अगर आप कोई प्राणायाम या एक्सरसाइज करते है तो नीचे लिखे कुछ बातो का जरूर ध्यान दे नहीं तो फायदे के बजाय भयंकर नुकसान हो जायेगा —
  • अगर आपने कोई लिक्विड पिया है चाहे वह एक कप चाय ही क्यों ना हो तो कम से कम २ घंटे बाद प्राणायाम करे और अगर आपने कोई सॉलिड (ठोस) सामान खाया हो तो कम से कम 5 घंटे बाद प्राणायाम करे।
  • अगर पेट में बहुत गैस हो या हर्निया या अपेण्डिस्क का दर्द हो या आपने 6 महीने के अंदर पेट या हार्ट का ऑपरेशन करवाया हो तो प्राणायाम न करे।
  • प्राणायाम व योग को करने के कम से कम 7 मिनट बाद ही कोई हार्ड एक्सरसाइज (जैसे दौड़ना, जिम की कसरतें आदि) करनी चाहिए !
  • प्राणायाम करते समय रीढ़ की हड्डी एकदम सीधी रखे और चेहरे को ठीक सामने रखे (कुछ लोग चेहरे को सामने करने के चक्कर में या तो चेहरे को ऊपर उठा देते है या जमींन की तरफ झुका देते है जो की गलत है )
  • प्राणायाम करते समय हमारे शरीर में कहीं भी किसी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए, यदि तनाव में प्राणायाम करेंगे तो उसका लाभ नहीं मिलेगा।
  • प्राणायाम करते समय अपनी शक्ति का अतिक्रमण ना करें।
  • ह्‍र साँस का आना जाना बिलकुल आराम से होना चाहिए।
  • जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप की शिकायत है, उन्हें अपना रक्त-चाप साधारण होने के बाद धीमी गति से प्राणायाम करना चाहिये।
  • हर साँस के आने जाने के साथ मन ही मन में ओम् का जाप करने से आपको आध्यात्मिक एवं शारीरिक लाभ मिलेगा और प्राणायाम का लाभ दुगुना होगा।
  • साँसे लेते समय मन ही मन भगवान से प्रार्थना करनी है कि “हमारे शरीर के सारे रोग शरीर से बाहर निकाल दें और ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा, ओज, तेजस्विता हमारे शरीर में डाल दें”
  • ऐसा नहीं है कि केवल बीमार लोगों को ही प्राणायाम करना चाहिए, यदि बीमार नहीं भी हैं तो सदा निरोगी रहने की प्रार्थना के साथ प्राणायाम करें।

प्राणायाम आरम्भ करने की विधि | Pranayama Breathing Exercise

Pranayama in Hindi :  जब भी आप प्राणायाम करे आप की रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए इसके लिए आप किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाये जैसे सिद्धासन, पझासन, सुखासन, वज्रासन, आदि यदि आप किसी भी आसन में नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर भी सीधे बैठकर प्राणायाम कर सकते है | परन्तु रीढ़ की हड्डी को सदा सीधा रखे आजकल लोग चलते-फिरते या प्रातः भर्मण के समय भी घूमते हुए नाड़ी सोधन आदि प्राणायामों को करते रहते है , यह सब गलत प्रक्रिया है  इससे कभी तीर्व हानि भी हो सकती है | प्राणायाम करने से प्राणशक्ति का उत्थान होता हैतथा मेरुदण्ड जुड़े हुए चक्रो का जागरण होता है अतः प्राणायाम में सीधा बैठना अति आवश्यक है | बैठकर प्राणायाम करने से ही मन का भी निग्रह होता है|

प्राणायाम के प्रकार – Pranayam ke Prakar – Types of Pranayama

सूर्यभेदी या सुर्याग प्राणायाम | Surya bhedi pranayama in hindi

ध्यानासन में बैठकर दाई नासिका से पूरक करके तत्पश्चात कुंभक जालंधर व् मूलबंध के साथ करे और अंत में बाये नासिका से रेचक करे अतः कुम्भक का समय धीरे धीरे बढ़ाते  चाहिए इस प्राणायाम की आर्वती 3, 5 या 7 ऐसे बढाकर कुछ दिनों के अभ्याश से 10 तक बढाइये कुम्भक के समय सूर्यमण्डल का तेज के साथ ध्यान करना चाहिए ग्रीष्म ऋतू में इस प्राणायाम को अल्प मात्र में करना चाहिए |

सुर्याग प्राणायाम के लाभ | Surya bhedi pranayama benefits

शरीर में उष्णता तथा पित्त की वृद्धि होती है  | वात व कफ से उत्पन होने वाले रोग रक्त व त्वचा के दोष, उदर-कृमि, कोढ़, सुजाक, छूत के रोग, अजीर्ण, अपच ,स्त्री – रोग आदि में लाभदायक है |

कुण्डलिनी जागरण में सहायक है | बुढ़ापा दूर रहता है | अनुलोम-विलोम के बाद थोड़ी मात्र में इस प्राणायाम को करना चाहिए | बिना कुम्भक के सूर्ये भेदी प्राणायाम करने से हृदयगति और शरीर की कार्यशीलता बढ़ती है तथा वजन काम होता है | इसके लिए इसके 27 चक्र दिन में २ बार करना जरुरी है |

चन्द्रभेदी या चन्द्राग प्राणायाम | Chandra Bhedi pranayama in hindi

इस प्राणायाम में बाई नासिका से पूरक करके अंतःकुम्भक करें | इसे जालनधर व मूल बंध के साथ करना उत्तम है | तत्पश्चात दाई नाक से रेचक करे | इसमे हमेशा चन्द्रस्वर से पूरक व सूर्यस्वर से रेचक करते है | सूर्यभेदी इससे ठीक विपरीत है कुम्भक के समय पूर्ण चन्द्रमण्डल के प्रकाश के साथ ध्यान करें शीतकाल  में इसका अभ्यास  कम करना चाहिए !

चन्द्राग प्राणायाम लाभ | Chandra Bhedi pranayama benefits

शरीर में शीतलता आकार थकावट व उषणता दूर होती है |  मन की उत्तेजनाओं को शांत करता है | पित के कारन  होने वाली जलन में लाभदायक है |

उज्जयी प्राणायाम । Ujjayi pranayama in hindi

इस प्राणायाम में पूरक करते हुए गले को सिकोड़ते है और जब गले को सिकोड़कर श्वास अंदर भरते है तब जैसे खराटे लेते समय गले से आवाज होती है, वैसे ही इसमे पूरक करते हुए कंठ से ध्वनि होती है ध्यानात्मक आसन में बैठकर दोनों नासिकाओं से हवा अंदर खिंचीये कंठ को थोड़ा संकुचित करने से हवा का स्पर्श गले में अनुभव होगा हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिए | कंठ में घर्सण होने से ध्वनि उत्पन्न होगी प्रारम्भ में कुम्भक का प्रयोग न करके रेचक – पूरक का ही अभ्यास करना चाहिए पूरक के बाद धीरे धीरे कुम्भक का समय पूरक जितना तथा कुछ दिनों के अभ्यास के बाद कुम्भक का समय पूरक से दुगुना कर दीजिये | कुम्भक 10 सेकंड से जयादा  करना हो तो जालंधर  बंध व मूलबंध भी लगाइये | उज्जयी प्राणायाम (ujjayi pranayama) में सदैव दाई नासिका को बंध करके बाई नासिका से ही रेचक करना चाहिए |

उज्जयी प्राणायाम लाभ | Ujjayi pranayama benefits

जो साल भर सर्दी, जुकाम से पीड़ित रहते है जिनको टॉन्सिल, थाइरोइड ग्लैंड, अनिंद्रा मानसिक तनाव व रक्त्चाप,अजीर्ण, आमवात, जलोदर, क्षय, ज्वर, प्लीहा  आदि रोग हो उनके लिए यह लाभप्रद हे | गले को ठीक निरोगी व मधुर बनाने हेतु इसका नियमित अभ्यास करना चाहिए कुण्डलिनी जागरण, अजपा – जप ध्यान आदि के लिए उत्तम प्राणायाम है | बच्चो का तुतलाना भी ठीक होता है |

कर्ण रोगान्तक प्राणायाम | Karna Rogantak Pranayama in Hindi

इस प्राणायाम में दोनों नासिकाओं से पूरक करके फिर मुह व दोनों नासिकाए बंद कर पूरक की हुई  हवा को बहार धकका देते है, जैसे की श्वास को कानो से बहार निकालने का प्रयास किया जाता है 4-5 बार श्वास को ऊपर की और धकका देकर फिर दोनों नासिकाओं से रेचक करे | इस प्रकार 2-3 बार करना पर्याप्त होगा |

कर्ण रोगान्तक प्राणायाम लाभ | Karna Rogantak pranayama benefits

कर्ण रोगो में तथा बहरापन में लाभदायक है|

शीतली प्राणायाम। Sheetli pranayama in hindi

ध्यानात्मक आसन में बैठकर हाथ घुटने पर रखे | जिव्हा को नालीनुमा मोड़कर मुँह खुला रखते हुए हुए मुँह से पूरक करें जिव्हा से धीरे धीरे श्वास  लेकर फेफड़ो को पूरा भरे कुछ क्षण रोककर मुँह को बंद करके दोनों नासिकाओं से रेचक करें तत्पश्चात पुनः जिव्हा मोड़कर मुँह से पूरक व नाक से रेचक करें इस तरह 8 से 10 बार करें | शीतकाल में इसका अभ्याश कम करें |

विशेष : कुम्भक के साथ जालंधर बन्ध भी लगा सकते है कफ प्रकृति वालो एव टॉन्सिल के रोगियों को शीतलि व सीत्कारी प्राणायाम नहीं करना चाहिए |

शीतली प्राणायाम लाभ |  Sheetli pranayama benefits

१. जिव्हा , मुँह व गले के रोगो में लाभप्रद है गुल्म, प्लीहा, ज्वर अजीर्ण आदि ठीक होते है |

२. इसकी सिद्धि से भूख – प्यास  पर विजय प्राप्त होती है ऐसा योग ग्रन्थो में कहा गया है |

३.उच्च रक्त्चाप को कम करता है | पित के रोगो में लाभप्रद है | रक्त्शोधन भी करता है |

नाड़ीसोधन प्राणायाम। Nadishodhan Pranayam in hindi

नाड़ीसोधन प्राणायाम को अनुलोम-विलोम भी कहा जाता है। शास्त्रों में नाड़ीसोधन प्राणायाम या अनुलोम-विलोम को अमृत कहा गया है और स्वास्थ्य लाभ में इसका महत्व सबसे ज़्यदा है। इस प्राणायाम में आप बाएं नासिका छिद्र से सांस लेते हैं, सांस को रोकते हैं और फिर धीरे धीरे दाहिनी नासिका से श्वास को निकालते हैं। फिर दाहिनी नासिका से सांस लेते हैं, अपने हिसाब से सांस को रोकते हैं और धीरे धीरे बाएं नासिका से सांस को छोड़ते हैं। यह एक चक्र हुआ।  इस तरह से आप शुरुवाती समय में 5 से 10 बार करें फिर धीरे धीरे इसको बढ़ाते रहें।

नाड़ीसोधन प्राणायाम के लाभ | Nadishodhan pranayama benefits

अनेकों है जैसे  चिंता एवं तनाव कम करने में; शांति, ध्यान और एकाग्रता में; शरीर में ऊर्जा का मुक्त प्रवाह करने में; प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में ; इत्यादि।

भस्त्रिका प्राणायाम। Bhastrika pranayama in hindi

भस्त्रिका भस्त्र शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है ‘धौंकनी’। इस प्राणायाम में श्वास तेजी से लिया जाता है,सांस को रोकते हैं और बलपूर्वक छोड़ा जाता है। वैसे तो यह प्राणायाम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए काफी प्रभावी है लेकिन ह्रदय रोगी, उच्च ब्लड प्रेशर एवं एसिडिटी में इसको करने से बचना चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ | Bhastrika pranayama benefits

पेट की चर्बी कम करने के लिए, वजन घटाने के लिए, अस्थमा के लिए, गले की सूजन कम करने में, बलगम से नजात में, भूख बढ़ाने के लिए, शरीर में गर्मी बढ़ाने में, कुंडलिनी जागरण में, श्वास समस्या दूर करने में, आदि में इसका बहुत बड़ा प्रभावी रोल माना जाता है।

शीतकारी प्राणायाम । Sheetkari pranayama in hindi

शीतकारी प्राणायाम में सांस लेने के दौरान ‘सि’ की आवाज निकलती है। शीत का मतलब होता है ठंडकपन और ‘कारी’ का अर्थ होता है जो उत्पन्न हो। इस प्राणायाम के अभ्यास से शीतलता का आभास होता है। इस प्राणायाम का अभ्यास गर्मी में ज़्यदा से ज़्यदा करनी चाहिए और शर्दी के मौसम में नहीं के बराबर करनी चाहिए।

शीतकारी प्राणायाम के लाभ | Sheetkari pranayama benefits

इसके फायदे निम्नलिखित है। तनाव कम करने में, चिंता कम करने में, डिप्रेशन के लिए प्रभावी, गुस्सा कम करने में, भूख और प्यास के नियंत्रण में, रक्तचाप कम करने में, जननांगों में हार्मोन्स के स्राव में, मन को शांत करने में, आदि।

भ्रामरी प्राणायाम। Bhramri pranayama in hindi

भ्रामरी शब्द की उत्पत्ति ‘भ्रमर’ से हुई है जिसका अर्थ होता है गुनगुनाने वाली काली मधुमक्खी। इसके अभ्यास के दौरान नासिका से गुनगुनाने वाली ध्वनि उत्पन्न होती है इसलिए इसका नाम भ्रामरी पड़ा है।

भ्रामरी प्राणायाम के लाभ | bhramari pranayama benefits

मस्तिष्क को शांत करने में, तनाव कम करने में , क्रोध कम करने में, समाधि का अभ्यास, चिंता को दूर करने में, डिप्रेशन को कम करने में और मन को शांत करने में

प्लाविनी प्राणायाम । Plavini pranayama in hindi

संस्कृत भाषा में प्लावन का अर्थ है तैरना। इस प्राणायाम के अभ्यास से कोई भी व्यक्ति जल में कमल के पत्तों की तरह तैर सकता है इसलिए इसका नाम प्लाविनी पड़ा। इसके अभ्यास में अपनी साँस को इच्छानुसार रोककर रखा जाता है इसलिए इस प्राणायाम को केवली या प्लाविनी प्राणायाम कहा जाता है|

प्लाविनी प्राणायाम के लाभ | Plavini pranayam benefits

ध्यान के लिए अच्छा प्राणायाम, पाचनशक्ति को बढ़ाने में, आयु बढ़ाने में, मन शांति में , तनाव को कम करने में,

चिंता कम करने के लिए, मेमोरी को बढ़ाने में और तैरने में सहायक

मूर्छा प्राणायाम । Murcha pranayama in hindi

संस्कृत भाषा में मूर्छा का अर्थ होता है सभी मानसिक गतिविधियों के निलंबन की अवस्था। मूर्छा प्राणायाम आपको तनाव, चिंता एवं डिप्रेशन से बचाता है और साथ ही साथ मानसिक समस्याओं एवं नपुंसकता से प्रभावित रोगियों के लिए भी असरदार है।

कपालभाति प्राणायाम। Kapalbhati pranayama in hindi

‘कपाल’ का अर्थ है खोपड़ी और भाति का अर्थ होता है चमकना। कपालभाति एक ऐसी प्राणायाम है जिसके प्रैक्टिस से सिर तथा मस्तिष्क की क्रियाओं को नई जान आ जाती है। हृदय रोग, चक्कर की समस्या, उच्च रक्तचाप, हर्निया तथा आमाशाय के अल्सर होने पर इस प्राणायाम को नहीं करनी चाहिए।

कपालभाति के लाभ | kapalbhati pranayam benefits

वजन घटाने में, त्वचा में निखार लाने में, बालों को सफेद होने से रोकने में , अस्थमा को कम करने में, बलगम कम करने में, साइनसाइटिस के उपचार में, पाचन क्रिया को सुधारने में , फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने में, कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में, कब्ज की शिकायत को दूर करने आदि में काम आता है।

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Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

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