योग

प्राणायाम के प्रकार और उनको करने की शास्त्रोक्त विधी

प्राणायाम आरम्भ करने की विधि : 

Pranayama in Hindi :  जब भी आप प्राणायाम करे आप की रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए इसके लिए आप किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाये जैसे सिद्धासन, पझासन, सुखासन, वज्रासन, आदि यदि आप किसी भी आसन में नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर भी सीधे बैठकर प्राणायाम कर सकते है | परन्तु रीढ़ की हड्डी को सदा सीधा रखे आजकल लोग चलते-फिरते या प्रातः भर्मण के समय भी घूमते हुए नाड़ी सोधन आदि प्राणायामों को करते रहते है , यह सब गलत प्रक्रिया है  इससे कभी तीर्व हानि भी हो सकती है | प्राणायाम करने से प्राणशक्ति का उत्थान होता हैतथा मेरुदण्ड जुड़े हुए चक्रो का जागरण होता है अतः प्राणायाम में सीधा बैठना अति आवश्यक है | बैठकर प्राणायाम करने से ही मन का भी निग्रह होता है|

pranayama

प्राणायाम के प्रकार (Pranayam ke Prakar)
१. सूर्यभेदी या सुर्याग प्राणायाम :

ध्यानासन में बैठकर दाई नासिका से पूरक करके तत्पश्चात कुंभक जालंधर व् मूलबंध के साथ करे और अंत में बाये नासिका से रेचक करे अतः कुम्भक का समय धीरे धीरे बढ़ाते  चाहिए इस प्राणायाम की आर्वती 3, 5या 7 ऐसे बढाकर कुछ दिनों के अभ्याश से 10 तक बढाइये कुम्भक के समय सूर्यमण्डल का तेज के साथ ध्यान करना चाहिए ग्रीष्म ऋतू में इस प्राणायाम को अल्प मात्र में करना चाहिए |

लाभ : शरीर में उष्णता तथा पित्त की वृद्धि होती है  | वात व कफ से उत्पन होने वाले रोग रक्त व त्वचा के दोष, उदर-कृमि, कोढ़, सुजाक, छूत के रोग, अजीर्ण, अपच ,स्त्री – रोग आदि में लाभदायक है |

कुण्डलिनी जागरण में सहायक है | बुढ़ापा दूर रहता है | अनुलोम-विलोम के बाद थोड़ी मात्र में इस प्राणायाम को करना चाहिए | बिना कुम्भक के सूर्ये भेदी प्राणायाम करने से हृदयगति और शरीर की कार्यशीलता बढ़ती है तथा वजन काम होता है | इसके लिए इसके 27 चक्र दिन में २ बार करना जरुरी है |

२. चन्द्रभेदी या चन्द्राग प्राणायाम :

इस प्राणायाम में बाई नासिका से पूरक करके अंतःकुम्भक करें | इसे जालनधर व मूल बंध के साथ करना उत्तम है | तत्पश्चात दाई नाक से रेचक करे | इसमे हमेशा चन्द्रस्वर से पूरक व सूर्यस्वर से रेचक करते है | सूर्यभेदी इससे ठीक विपरीत है कुम्भक के समय पूर्ण चन्द्रमण्डल के प्रकाश के साथ ध्यान करें शीतकाल  में इसका अभ्यास  कम करना चाहिए !

लाभ : शरीर में शीतलता आकार थकावट व उषणता दूर होती है |  मन की उत्तेजनाओं को शांत करता है | पित के कारन  होने वाली जलन में लाभदायक है |

३.उजजायी प्राणायाम : 

इस प्राणायाम में पूरक करते हुए गले को सिकोड़ते है और जब गले को सिकोड़कर श्वास अंदर भरते है तब जैसे खराटे लेते समय गले से आवाज होती है, वैसे ही इसमे पूरक करते हुए कंठ से ध्वनि होती है ध्यानात्मक आसन में बैठकर दोनों नासिकाओं से हवा अंदर खिंचीये कंठ को थोड़ा संकुचित करने से हवा का स्पर्श गले में अनुभव होगा हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिए | कंठ में घर्सण होने से ध्वनि उत्पन्न होगी प्रारम्भ में कुम्भक का प्रयोग न करके रेचक – पूरक का ही अभ्यास करना चाहिए पूरक के बाद धीरे धीरे कुम्भक का समय पूरक जितना तथा कुछ दिनों के अभ्यास के बाद कुम्भक का समय पूरक से दुगुना कर दीजिये | कुम्भक 10 सेकंड से जयादा  करना हो तो जालंधर  बंध व मूलबंध भी लगाइये | इस प्राणायाम में सदैव दाई नासिका को बंध करके बाई नासिका से ही रेचक करना चाहिए |

लाभ : जो साल भर सर्दी, जुकाम से पीड़ित रहते है जिनको टॉन्सिल, थाइरोइड ग्लैंड, अनिंद्रा मानसिक तनाव व रक्त्चाप,अजीर्ण, आमवात, जलोदर, क्षय, ज्वर, प्लीहा  आदि रोग हो उनके लिए यह लाभप्रद हे | गले को ठीक निरोगी व मधुर बनाने हेतु इसका नियमित अभ्यास करना चाहिए कुण्डलिनी जागरण, अजपा – जप ध्यान आदि के लिए उत्तम प्राणायाम है | बच्चो का तुतलाना भी ठीक होता है |

४. कर्ण रोगान्तक प्राणायाम : 

इस प्राणायाम में दोनों नासिकाओं से पूरक करके फिर मुह व दोनों नासिकाए बंद कर पूरक की हुई  हवा को बहार धकका देते है, जैसे की श्वास को कानो से बहार निकालने का प्रयास किया जाता है 4-5 बार श्वास को ऊपर की और धकका देकर फिर दोनों नासिकाओं से रेचक करे | इस प्रकार 2-3 बार करना पर्याप्त होगा |

लाभ :  कर्ण रोगो में तथा बहरापन में लाभदायक है|

५.शीतलि प्राणायाम :

ध्यानात्मक आसन में बैठकर हाथ घुटने पर रखे | जिव्हा को नालीनुमा मोड़कर मुँह खुला रखते हुए हुए मुँह से पूरक करें जिव्हा से धीरे धीरे श्वास  लेकर फेफड़ो को पूरा भरे कुछ क्षण रोककर मुँह को बंद करके दोनों नासिकाओं से रेचक करें तत्पश्चात पुनः जिव्हा मोड़कर मुँह से पूरक व नाक से रेचक करें इस तरह 8 से 10 बार करें | शीतकाल में इसका अभ्याश कम करें |

विशेष : कुम्भक के साथ जालंधर बन्ध भी लगा सकते है कफ प्रकृति वालो एव टॉन्सिल के रोगियों को शीतलि व सीत्कारी प्राणायाम नहीं करना चाहिए |

लाभ :

१. जिव्हा , मुँह व गले के रोगो में लाभप्रद है गुल्म, प्लीहा, ज्वर अजीर्ण आदि ठीक होते है !

२. इसकी सिद्धि से भूख – प्यास  पर विजय प्राप्त होती है ऐसा योग ग्रन्थो में कहा गया है !

३.उच्च रक्त्चाप को कम करता है | पित के रोगो में लाभप्रद है | रक्त्शोधन भी करता है !

 

About the author

Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

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