योगासन

योगासन पार्ट 4 | Yoga for Back Pain | Yoga for Heatth

Dhanurasana

 

 

धनुरासन

इस आसन में शरीर की आकृति खिंचे हुए धनुष के समान दिखाई देने के कारण इसे धनुरासन कहा जाता है।

Dhanurasana

विधि : सर्वप्रथम पेट के बल लेट जाएँ। अब दोनों पैरों को आपस में सटाते हुए हाथों को कमर से सटाएँ। ठोड़ी जमीन पर रखें। एड़ी, पंजे और घुटने मिले हुए हों। कोहनियाँ कमर से सटी हुईं और हथेलियाँ ऊपर की ओर रखें। अब टाँगों को घुटनों से मोड़ें फिर दोनों हाथों से पैरों को टखनों के पास से पकड़ें। हाथों और पैरों को खींचते हुए घुटने भी ऊपर उठाएँ। जितना हो सके उतना सिर पीछे की ओर ले जाएँ। कोशिश करें कि शरीर का पूरा भार नाभि प्रदेश के ऊपर रहे। पैर के तलवे और सिर समान रूप से सीध में रहे। इस स्थिति में जितनी देर रह सकते हैं रहें।

वापस आने के लिए पहले ठोड़ी को जमीन पर टिकाएँ, फिर हाथों को बाद में धीरे-धीरे पैरों को जमीन पर लाएँ। श्वांस-प्रश्वांस के सामान्य होने पर दूसरी बार करें। इस प्रकार 3-4 बार करने से इसका अभ्यास बढ़ता है।

लाभ : धनुरासन पेट की चर्बी तेजी से घटाने में मददगार है। इससे सभी आंतरिक अंगों, मांसपेशियों और जोड़ों का व्यायाम हो जाता है। गले के तमाम रोग नष्ट होते हैं। पाचन शक्ति बढ़ती है।

यह आसन मेरुदंड को लचीला एवं स्वस्थ बनाता है। सर्वाइकल स्पांडिलाइटिस, कमर दर्द और पेट संबंधी रोगों में भी यह लाभकारी है।

महिलाओं की मासिक धर्म संबंधी विकृतियाँ दूर करता है। मूत्र विकारों को दूर कर गुर्दों को स्वस्थ रखता है।

सावधानी : जिन लोगों को रीढ़ की हड्डी का अथवा डिक्स का अत्यधिक कष्ट हो, उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए। पेट संबंधी कोई गंभीर रोग हो तो भी यह आसन न करें।

 

भुजंगासन

इस आसन से न सिर्फ पेट की चर्बी कम होती है बल्कि बाजुओं, कमर और पेट की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है और शरीर लचीला बनता है। इसकी विधि इसप्रकार है -

Bhujangasana

विधि :  पहले पेट के बल सीधा लेट जाएं और दोनों हाथों को माथे के नीचे टिकाएं। दोनों पैरों के पंजों को साथ रखें।

अब माथे को सामने की ओर उठाएं और दोनों बाजुओं को कंधों के समानांतर रखें जिससे शरीर का भार बाजुओं पर पड़े। अब शरीर के अग्रभाग को बाजुओं के सहारे उठाएं। शरीर को स्ट्रेच करें और लंबी सांस लें। कुछ सेकंड इसी अवस्था में रहने के बाद वापस पेट के बल लेट जाएं।

लाभ : इस आसन से रीढ़ की हड्डी सशक्त होती है और पीठ में लचीलापन आता है। यह आसन फेफड़ों की शुद्धि के लिए भी बहुत अच्छा है और जिन लोगों का गला खराब रहने की, दमे की, पुरानी खाँसी अथवा फेंफड़ों संबंधी अन्य कोई बीमारी हो, उनको यह आसन करना चाहिए।

इस आसन से पित्ताशय की क्रियाशीलता बढ़ती है और पाचन-प्रणाली की कोमल पेशियाँ मजबूत बनती है। इससे पेट की चर्बी घटाने में भी मदद मिलती है और आयु बढ़ने के कारण से पेट के नीचे के हिस्से की पेशियों को ढीला होने से रोकने में सहायता मिलती है।

इससे बाजुओं में शक्ति मिलती है। पीठ में स्थित इड़ा और पिंगला नाडि़यों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। विशेषकर, मस्तिष्क से निकलने वाले ज्ञानतंतु बलवान बनते है। पीठ की हड्डियों में रहने वाली तमाम खराबियाँ दूर होती है। कब्ज दूर होता है।

सावधानी : इस आसन को करते समय अकस्मात् पीछे की तरफ बहुत अधिक न झुकें। इससे आपकी छाती या पीठ की माँस-‍पेशियों में खिंचाव आ सकता है तथा बाँहों और कंधों की पेशियों में भी बल पड़ सकता है जिससे दर्द पैदा होने की संभावना बढ़ती है। पेट में कोई रोग या पीठ में अत्यधिक दर्द हो तो यह आसन न करें।

 

मकरासन

मकरासन की गिनती पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में की जाती है। इस आसन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति मगर की तरह प्रतीत होती है इसीलिए इसे मकरासन कहते है। इससे साँस की गति की रुकावट समाप्त होकर शांति महसूस होती है।

Makrasana 

विधि : सबसे पहले पेट के बल लेट जाएँ। ठोड़ी भूमि पर टिकाएँ। दोनों हाथ कमर से सटे हुए और हथेलियाँ उपर रखें। दोनों पैर भी एक दूसरे से सटे हुए हो।

फिर सर्व प्रथम दोनों हाथों को उपर उठाते हुए उसकी कैंची जैसी आकृति बनाकर उस पर सिर रखते हैं। इसके बाद पैरों में सुविधानुसार दूरी बनाए रखें।

सावधानी : दोनों पैरों में इतना अंतर रखते हैं कि भूमि को स्पर्श करें। सीना भूमि से उठा हुआ रखते हैं। दोनों हाथों की कैंची जैसी आकृति बनाने के बाद ही सिर को बीच में रखते हैं। श्वास-प्रश्वास स्वाभाविक अवस्था हो।

लाभ : मकरासन आरामदायक आसनों के अंतरगत आता है जब भी पेट के बल लेटकर यह आसन किया जाता है श्वास-प्रश्वास की गति बढ़ जाती है, उस श्वास-प्रश्वास की दृष्‍टि स्वाभाविक अवस्था में लाने के लिए मकरासन का अभ्यास किया जाता है

इस आसन के अभ्यास से समस्त कशेरुकाओं, माँसपेशियों को आराम मिलता है। शरीर में रक्त प्रवाह सुचारु रूप से होने लगता है जिससे वे हमेशा स्वस्थ और निरोगी रहते है।

इस आसन की स्थिति में फेफड़े फैलते है जिससे इनके अंदर प्राणवायु अधिक मात्रा में अंदर जाती है तथा दूषित वायु बाहर निकलती है। इसलिए दमा रोग निवारण में भी सहायता मिलती है। इस आसन में शवासन के भी लाभ प्राप्त होते है।

 

शलभासन

Shalbhasana

विधि : पेट के बल जमीन पर लेट जाइए। दोनों हथेलियों को कंधे के साथ जमीन पर रखिए ताकि हथेली कंधे के आगे पीछे न हो। फिर दोनों पैरों को आपस में मिलाइए। तलवों के ऊपर और नीचे के भाग को जहाँ तक सम्भव हो, बलपूर्वक उठाए रहिए और इस स्थिति में बने रहिए परन्तु कमर से पैर तक का भाग बिलकुल सीधा रहना चाहिए, मुड़ने न पाए।

अथवा

अपने दोनों हाथों को पेट के नीचे ले जाकर दोनों हथेलियों को एक के ऊपर एक रखिए ताकि ऊपर की हथेली उपस्थ के नीचे आ जाए। फिर पैरों को आपस में मिलाकर सीधा रखते हुए कमर के ऊपर तथा नीचे के भाग को जहाँ तक सम्भव हो, जमीन से ऊपर उठाने का प्रयत्न कीजिए।

लाभ : इस आसन से कमर लचीली बनती है और छाती चौड़ी होती है। रक्त संचार क्रिया तेज हो जाती है।

मुंह से थूक जाना और मूत्र की रूकावट आदि रोग दूर होते हैं। पेट के अनेक रोग-अम्लता गैस बनना, पेट में गुड़गुड़ाहट, भूख न लगना, अपच आदि दूर होते हैं।

नाभि अपने स्थान पर रहती है। यह आसन गर्भाशय संबंधी रोगों को दूर करता है।

मानसिक निराशा  को दूर करता है। स्मरण शक्ति का विकास करता है। इस आसन के अभ्यास से मधुमेह में लाभ मिलता है।

सावधानी : इस क्रिया के दौरान ध्यान विशुद्धि चक्र पर होना चाहिए |इस  आसन के समय हथेलियों का पृष्ठ भाग और भुजाएं जाघों के समीप रहें |अपने फेफड़ों को हवा से अंशतः भरें ताकि छाती थोड़ी चौड़ी हो जाये | इस आसन की अवधि में पैरों को यथासम्भव सीधा रखें | शलभासन हमेशा भुजंगासन  और गर्दन के व्यायाम के बाद ही किया जाता है |श्वास को अचानक या बहुत तेजी से न निकालें |अपना वजन अपनी बाँहों पर उस समय डालें जब आपके शरीर का निचला हिस्सा ऊपर जाता है |

 

विपरीत नौकासन

Viprit Naukasana

नौकासन को पीठ के बल लेटकर किया जाता है, जबकि विपरीत नौकासन को पेट के बल। इसमें शरीर की आकृति नौका समान प्रतित होती है, इसीलिए इसे विपरीत नौकासन कहते है।

विधि : यह आसन भी पेट के बल लेटकर किया जाता है। पेट के बल पहले मकरासन में लेट जाएँ। फिर दोनों हाथों को सामने फैलाएँ और हथेलियों को एक-दूसरे से सटाते हुए भूमि पर टिकाएँ। पैर भी पीछे एक-दूसरे से मिले हुए तथा सीधें रहें। पंजे पीछे की ओर तने हुए हों।

श्वास अन्दर भरकर हाथ और पैर दोनों ओर से शरीर को उपर उठाइए। पैर, छाती, सिर एवं हाथ भूमि से उपर उठे हुए होने चाहिए। इस अवस्था में शरीर का पूरा वजन नाभि पर आ जाता है। वापस आने के लिए धीरे-धीरे हाथ और पैरों को समानांतर क्रम में नीचे लाते हुए कपाल को भूमि पर लगाएँ। फिर पुन: मकरासन की स्थिति में आ जाएँ। इस प्रकार 4-5 बार यह आवृत्ति करें।

सावधानी : जिन लोगों को मेरुदंड और पेट संबंधी कोई गंभीर रोग हो वह यह आसन न करें। स्त्रियाँ यह आसन योग चिकित्सक की सलाह अनुसार ही करें।

लाभ : नाभि प्रदेश और मेरुदंड को शक्ति प्रदान करता है। गैस निकालता है। यौन रोग व दुरबलता दूर करता है। इससे पेट व कमर का मोटापा दूर होता है। नेत्र ज्योति में भी यह आसन लाभदायक माना गया है।

 

पृष्ठतानासन

विधि : पेट के बल लेटजाये। होथों को सामने फैलाकर हथेलियाँ जमीं की ओर करते हुए एक दूसरे के ऊपर रखें।  पैर सीधे तथा पंजे पीछे की ओर तने हुए हों। माथा दोनों हाथों के बीच टिका हुआ हो। श्वास अंदर भरकर हाथों को आगे की ओर खींचिए तथा पैरों को पीछे की ओर तानिए। शरीर को स्थिर रखते हुए ही यह क्रिया हो। पृष्ठ भाग में कम्पन होगा।  श्वास को बाहर छोड़ते हुए शरीर को ढीला छोड़ दें।

लाभ : पृष्ठ भाग के सम्पूर्ण नस-नाड़ियों को आरोग्य मिलता है।

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