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नौ दिन ऐसे करें मां भगवती को प्रसन्न

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कैसे सम्पन्न करें नवरात्र ?

नवरात्र में अपने कुलाचार के अनुसार घट स्थापन, अखंड दीप प्रज्वलन एवं माला बंधन किया जाना चाहिए। खेत से मृत्तिका लाकर उसकी दो अंगुल चौड़ी चौकोर सतह बनाएं एवं उसमें सप्त धान्य बोएं। उसी तरह तांबे का कलश लेकर उसमें जल, गंध, फूल, अक्षत, सुपारी, पंचपल्लव, पंचरत्न तथा सिक्के डालें। यदि सप्त धान्य एवं कलश स्थापना के वेदमंत्र न मालूम हों तो मात्र पुराणोक्त मंत्र बोलें। यदि वे भी न मालूम हों तो उस वस्तु का नाम लेकर समर्पयामि कहकर समर्पित करें।

नवरात्र शब्द की संख्या पर जोर देकर कुछ लोग आखिरी दिन भी व्रत रखते हैं। वास्तव में नौवें दिन नवरात्रोत्थापन होना शास्त्र की दृष्टि से मान्य है। नवरात्रोत्थापन के दिन पूजा एवं माला बंधन के बाद भोजन करें। फिर देवता पर फूल चढ़ाकर पातः क्षमस्व कहें।

यदि पुरुष दैवत हो तो उस देवतानुसार ईश्वर, नृसिंह, विष्णवे या गणेश क्षमस्व कहकर नमस्कार करके आसन को थोड़ा सरका दें। बाद में बंधी हुई मालाओं आदि पर अक्षत डालकर निम्न मंत्र बोलें

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवीं । इष्टकाम प्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ॥

फिर उसका विसर्जन करके पूजाघर की सफाई करें। यदि फुरसत हो तो उसी दिन सभी देवताओं का उद्वार्जन (नमक, नीबू एवं भस्म आदि से मांजना) करके पंचामृत से पूजा एवं अभिषेक करें। समय न मिलने पर दूसरे दिन करें।

नवरात्री के नौ दिन में की जाने वाली पूजा

नवरात्री के नौ दिन में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है जिसका शास्त्रों में अत्यधिक महत्व है आइये जानते है –

पहले दिन: शैलपुत्री

नवरात्र पर्व (Navratri Festival) के प्रथम दिन को शैलपुत्री नामक देवी की आराधना की जाती है. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि हिमालय के तप से प्रसन्न होकर आद्या शक्ति उनके यहां पुत्री के रूप में अवतरित हुई और इनके पूजन के साथ नवरात्र का शुभारंभ होता है.

दूसरे दिन: ब्रह्मचारिणी

भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती की कठिन तपस्या से तीनों लोक उनके समक्ष नतमस्तक हो गए. देवी का यह रूप तपस्या के तेज से ज्योतिर्मय है. इनके दाहिने हाथ में मंत्र जपने की माला तथा बाएं में कमंडल है.

तीसरे दिन: चंद्रघंटा

यह देवी का उग्र रूप है. इनके घंटे की ध्वनि सुनकर विनाशकारी शक्तियां तत्काल पलायन कर जाती हैं. व्याघ्र पर विराजमान और अनेक अस्त्रों से सुसज्जित मां चंद्रघंटा भक्त की रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहती हैं.

चौथे दिन: कूष्मांडा

नवरात्र पर्व (Navratri Festival) के चौथे दिन भगवती के इस अति विशिष्ट स्वरूप की आराधना की जाती है. ऐसी मान्यता है कि इनकी हंसी से ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ था. अष्टभुजी माता कूष्मांडा के हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र तथा गदा है. इनके आठवें हाथ में मनोवांछित फल देने वाली जपमाला है.

पांचवे दिन: स्कंदमाता

नवरात्र पर्व (Navratri Festival) की पंचमी तिथि को भगवती के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की पूजा की जाती है. देवी के एक पुत्र कुमार कार्तिकेय (स्कंद) हैं, जिन्हें देवासुर-संग्राम में देवताओं का सेनापति बनाया गया था. इस रूप में देवी अपने पुत्र स्कंद को गोद में लिए बैठी होती हैं. स्कंदमाता अपने भक्तों को शौर्य प्रदान करती हैं.

छठे दिन: कात्यायनी

कात्यायन ऋषि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुई और कात्यायनी कहलाई. कात्यायनी का अवतरण महिषासुर वध के लिए हुआ था. यह देवी अमोघ फलदायिनी हैं. भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने देवी कात्यायनी की आराधना की थी. जिन लडकियों की शादी न हो रही हो या उसमें बाधा आ रही हो, वे कात्यायनी माता की उपासना करें.

सातवें दिन: कालरात्रि

नवरात्र पर्व (Navratri Festival) के सातवें दिन सप्तमी को कालरात्रि की आराधना का विधान है. यह भगवती का विकराल रूप है. गर्दभ (गदहे) पर आरूढ़ यह देवी अपने हाथों में लोहे का कांटा तथा खड्ग (कटार) भी लिए हुए हैं. इनके भयानक स्वरूप को देखकर विध्वंसक शक्तियां पलायन कर जाती हैं.

आठवें दिन: महागौरी

नवरात्र पर्व (Navratri Festival) की अष्टमी को महागौरी की आराधना का विधान है. यह भगवती का सौम्य रूप है. यह चतुर्भुजी माता वृषभ पर विराजमान हैं. इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू है. अन्य दो हाथों द्वारा वर और अभय दान प्रदान कर रही हैं. भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए भवानी ने अति कठोर तपस्या की, तब उनका रंग काला पड गया था. तब शिव जी ने गंगाजल द्वारा इनका अभिषेक किया तो यह गौरवर्ण की हो गई. इसीलिए इन्हें गौरी कहा जाता है.

नौवे दिन : सिद्धिदात्री

नवरात्र पर्व (Navratri Festival) के अंतिम दिन नवमी को भगवती के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन किया जाता है. इनकी अनुकंपा से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं. अन्य देवी-देवता भी मनोवांछित सिद्धियों की प्राप्ति की कामना से इनकी आराधना करते हैं. मां सिद्धिदात्री चतुर्भुजी हैं. अपनी चारों भुजाओं में वे शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) धारण किए हुए हैं. कुछ धर्मग्रंथों में इनका वाहन सिंह बताया गया है, परंतु माता अपने लोक प्रचलित रूप में कमल पर बैठी (पद्मासना) दिखाई देती हैं. सिद्धिदात्री की पूजा से नवरात्र में नवदुर्गा पूजा का अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है.

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