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धर्म से रहित अर्थ व्यर्थ ही नहीं, हानिकारक भी है

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अर्थ को नहीं, धर्म को प्रधानता मिले

धन मनुष्य जीवन की एक आवश्यक वस्तु है, पर इतनी नहीं कि उसे प्रथम स्थान दिया जा सके। प्रथम स्थान धर्म का है, अर्थ का इसके बाद नम्बर आता है। धर्म से रहित अर्थ व्यर्थ ही नहीं, हानिकारक भी है। इसके विपरीत, अर्थरहित मनुष्य भी सुखी और तेजस्वी जीवन व्यतीत कर सकता है।

अधर्मी व्यक्ति धन के लालच में बुरे से बुरा काम कर सकता है। उसने जो कमाया है, उसे बुरे से बुरे कार्यों में खर्च कर सकता है। कमाई का स्रोत और खर्च का औचित्य अशुद्ध हो जाने पर धन अपने स्वामी का नाश करने वाला बन जाता है। ऐसी दशा में उसका न होना ही श्रेयस्कर माना जाता है।

लेकिन धर्म दृढ़ बना रह सकता है। जिसमें धर्म बुद्धि है, वह थोड़े में भी मितव्ययिता और संतोषपूर्वक अपना काम चला सकता है। प्राचीन काल में ऋषियों का जीवन इसी प्रकार का था। उन्होंने स्वेच्छा से निर्धनता अपनाकर यह बात प्रमाणित की थी कि कम साधनों में भी मनुष्य का व्यक्तित्व विकसित हो सकता है।

भारत के भी ज्यादातर संत और सत्पुरुष इसी श्रेणी के हुए हैं, जो सम्पन्न थे। उन्होंने सम्पन्नता छोड़कर गरीबी को अपनाया, क्योंकि वे जानते थे कि अर्थ का बाहुल्य नहीं, सद्गुणों का विकास ही मानव जीवन की पहली आवश्यकता है। धन के झंझटों में अत्यधिक व्यस्त रहने वालों के लिए आत्मिक प्रगति की ओर समुचित ध्यान दे सकना संभव नहीं रहता, इसीलिए सत्पुरुषों को आवश्यकताएं छोटी ही रखनी पड़ती हैं।

बुद्ध, गांधी, नानक, रामतीर्थ, दयानंद, रैदास, कबीर आदि निर्धनता में ही पले और बढ़े थे। विश्वामित्र, बुद्ध, महावीर, मीरा आदि राजघरानों में जन्मे अवश्य, पर उन्होंने उसका परित्याग कर गरीबी का जीवन स्वेच्छापूर्वक अपना लिया। ईसा और मुहम्मद गरीब घरों में जन्मे थे। संसार के सभी संतों और दार्शनिकों का जीवन गरीबी में बीता।

यहां गरीबी को आवश्यकता नहीं बताया जा रहा है और न यह कहा जा रहा है कि मनुष्य को धन की आवश्यकता ही नहीं और उसे कमाना नहीं चाहिए। बताया यह जा रहा है कि धन के बिना भी उत्तम व्यक्ति अपने जीवन

का विकास कर सकते हैं। इसके विपरीत प्रचुर धन होते हुए भी धर्म और बुद्धि के अभाव में मनुष्य क्षुब्ध रह सकता है। कमाई के संबंध में नीति धर्म की न हो, तो मनुष्य चोरी, बेइमानी, रिश्वत, छल आदि अनैतिक साधन अपना कर पैसा इकट्ठा करेगा। इससे जिन लोगों से ऐसा धन लिया गया होगा, वह कराह रहे होंगे और उसे शाप दे रहे होंगे। जिस पैसे को कमाने में कम परिश्रम लगता है, वह खर्च भी अपव्यय से होता है।

मुफ्त माल को उड़ाने में दिल बेरहम रहने की कहावत गलत नहीं है। अनीति से उपार्जित धन आमतौर से नशाखोरी, व्यभिचार, सट्टेबाजी जैसे कुमार्ग में व्यय होता है। या चोरी, ठगी, बीमारी, राजदंड आदि के माध्यम से छिन जाता है। बुरे पैसे के सहारे आमतौर से कोई फलता-फूलता नहीं देखा गया।

व्यक्ति का विकास न हुआ हो, धर्म-बुद्धि जाग्रत न हुई हो, तो परिश्रम से कमाए पैसे को भी उचित कार्य में खर्च नहीं किया जा सकता। ऐसे अनेक लोग हैं, जिनकी तनख्वाहें औसत भारतीयों की आमदनी से कहीं अधिक हैं, पर वे उनमें से बहुत सा पैसा चाय, सिगरेट, शराब, पान, सिनेमा, यारबाजी जैसे अनुपयुक्त कार्यों में खर्च कर डालते हैं और अच्छी आमदनी होते हुए भी अभावग्रस्त बने रहते हैं। शहरी धनिक वर्ग में ऐसे अनगिनत उदाहरण चाहे जब देखे जा सकते हैं।

धन आवश्यक है, उसकी आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। अनेकों सुख-साधन तथा प्रगति के उपकरण धन के द्वारा ही प्राप्त होते हैं, पर इसके साथ ही एक बड़ी शर्त जुड़ी हुई है कि धन से भी पहले मनुष्य में सदाचार की विवेक बुद्धि जाग्रत होनी चाहिए, जिससे वह कमाई का सदुपयोग कर सके।

पानी लेने से पहले उसे भरने का पात्र ढूंढना पड़ता है। यदि पात्र न हो, तो पानी को किस प्रकार लिया या रखा जा सकेगा? मनुष्य का सही पात्र बनना, धन उपार्जन से भी बड़ा कार्य होना चाहिए। धन को प्राथमिकता मिल जाने से आजीविका तो बढ़ जाती है, पर इस बात का कोई ठिकाना नहीं कि उसके मिलने पर उलटी नहीं हो जाएगी।

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