यात्रा

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

Mahakaleshwar Jyotirlinga

महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित,महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है।उज्जयिनी में महाकालेश्वर मंदिर की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक

द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काल या निराकार रुप में पूजा होती है। सकल अथवा साकार रुप में उनकी नगर में सवारी निकलती है।

महाकालेश्वर मंदिर महान धार्मिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा राजनैतिक नगरी उज्जयिनी जो विश्व के मानचित्र पर २३-११ उत्तर अक्षांश तथा ७५-४३ पूर्व रखांश पर उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी के पूर्वी तट पर भूमध्यरेखा और कर्क रेखा के मिलन स्थल पर, हरिशचन्द्र की मोक्षभूमि, सप्तर्षियों की र्वाणस्थली, महर्षि सान्दीपनि की तपोभूमि, श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली, भर्तृहरि की योगस्थली, सम्वत प्रवर्त्तक सम्राट विक्रम की साम्राज्य धानी, महाकवि कालिदास की प्रिय नगरी, विश्वप्रसिद्ध दैवज्ञ वराह मिहिर की जन्मभूमि, जो अवन्तिका अमरावती उज्जयिनी कुशस्थली, कनकश्रृंगा, विशाला, पद्मावती, उज्जयिनी आदि नामों से समय-समय पर प्रसिद्धि पाती रही, जिसका अनेक पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में विषद वर्णन भरा पड़ा है, ऐसे पवित्रतम सप्तपुरियों में श्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र में स्वयंभू महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में मणिपुर चक्र नाभीस्थल सिद्धभूमि उज्जयिनी में विराजित हैं।

महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिंग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठ है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ। महाकाल के इस ज्योतिर्लिंग की पूजा अनजाने काल से प्रचलित है और आज तक निरंतर है। पुराणों में महाकाल की महिमा की चर्चा बार-बार हुई है। शिवपुराण के अतिरिक्त स्कन्दपुराण के अवन्ती खण्ड में भगवान् महाकाल का भक्तिभाव से भव्य प्रभामण्डल प्रस्तुत हुआ है। जैन परम्परा में भी महाकाल का स्मरण विभिन्न सन्दर्भों में होता ही रहा है।

महाकवि कालिदास ने अपने रघुवंश और मेघदूत काव्य में महाकाल और उनके मन्दिर का आकर्षण और भव्य रुप प्रस्तुत करते हुए उनकी करते हुए उनकी सान्ध्य आरती उल्लेखनीय बताई। उस आरती की गरिमा को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी रेखांकित किया था।महाकवि कालिदास ने जिस भव्यता से महाकाल का प्रभामण्डल प्रस्तुत किया उससे समूचा परवर्ती बाड्मय इतना प्रभावित हुआ कि प्राय: समस्त महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने जब भी उज्जैन या मालवा को केन्द्र में रखकर कुछ भी रचा तो महाकाल का ललित स्मरणअवश्य किया।

चाहे बाण हो या पद्मगुप्त, राजशेखर हो अथवा श्री हर्ष, तुलसीदास हो अथवा रवीन्द्रनाथ। बाणभट्ट के प्रमाण से ज्ञात होता है कि महात्मा बुद्ध के समकालीन उज्जैन के राजा प्रद्योत के समय महाकाल का मन्दिर विद्यमान था। कालिदास के द्वारा मन्दिर का उल्लेख किया गया।

पंचतंत्र, कथासरित्सागर, बाणभट्ट से भी उस मन्दिर की पुष्टि होती है।

जहाँ महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान है बताया जाता है, वही धरा का केन्द्र है

महाकालेश्वर मंदिर की आरती : महाकालेश्वर में प्रतिदिन अलसुबह होनेवाली भस्म आरती के बारे में एक मान्यता यह भी है कि इसको देखे बिना भगवान का दर्शन अधूरा होता है. सोमवती अमावस्या के दिन यहां पूजा करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है.

कथा : एक किवंदिती के अनुसार उज्जैन में एक समय चंद्रसेन नामक शिवभक्त राजा था. एक पांच वर्षीय गोप बालक ने जब उसे शिव अर्चना करते देखा तब उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसने भी अपने घर में पत्थर का एक टुकड़ा स्थापित करके भगवान शिव की अर्चना शुरू कर दी. वो उसमें इतना मग्न हो गया कि खाना-पीना भी भूल गया. गुस्से में उसकी मां ने पत्थर के टुकड़े को फेंक दिया. इसपर बालक रोने लगा और रोते हुए उसने भगवान शंकर को पुकारना शुरू कर दिया. रोते-रोते बालक बेहोश हो गया.

प्रकट हुआ मंदिर: होश आने पर देखता है कि वहां महाकाल का दिव्य मंदिर खड़ा है और उसमे उसके भोला नाथ भगवान शिव का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित हुआ है. उसी समय भगवान हनुमान वहां प्रकट हुए और बताया कि इस बालक की आठवीं पीढ़ी में नंद के घर स्वयं नारायण श्रीकृष्ण रूप में आएंगे. कहते हैं कि स्वयं भगवान आशुतोष द्वारा स्थापित शिवलिंग ही महाकालेश्वर है |

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Aaditi Dave

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