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नवरात्री के दूसरे दिन करे माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा – जाने विधि, मुहूर्त और महिमा

maa brahmcharini

मां ब्रह्मचारिणी की अमृत कथा (Download Mp3)

माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप है माँ ब्रह्मचारिणी :

lord shiva को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया। मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।

पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।

कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

माँ ब्रह्मचारिणी की पूजन विधि:

देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमंत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान कराएं व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें.

प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें. कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करें.

पूजा का समय –

शुक्रवार को पूजा का समय सुबह 6 बजे से दिन के 10.14 बजे तक पूजा का मुहूर्त है. ऐसे भक्त जो नियमानुसार पूजा करते हैं वह सुबह 10.14 तक पूजा की शुरुआत कर सकते हैं. बाकि भक्त दिन भर पूजा कर सकते हैं.

दूसरे दिन हवन में मां ब्रह्मचारिणी के इस मंत्र का उच्‍चारण करें –

ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रूं ब्रह्मचारिण्‍यै नम:।।
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कठिन समय में मन को शक्ति देती हैं मां ब्रह्मचारिणी :

चैत्र नवरात्रि में दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी का होता है। यह भी मां दुर्गा का अवतार हैं,जिन्हें ब्रह्मचारिणी के नाम से पूजा जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने वाले भक्त हमेशा उज्जवलता और ऐश्वर्य का सुख भोगते हैं। मां को बुद्धि और ज्ञान की देवी भी कहा गया है। देवी ब्रह्मचारिणी की जो भक्त भाव से पूजा करते है उसे मां हमेशा खुशी रहने का आशीर्वाद देती हैं। वह व्यक्ति अपनी जिंदगी में हमेशा संयम, विश्वास रखता है। वह नैतिकता की शिक्षा देती हैं। जीवन में कई चुनौतियां है,जिन्हें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से दूर किया जा सकता है।

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप :

मां का स्वरूप दिव्य है। वे श्वेत वस्त्र पहन कर कन्या के रूप में हैं, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। वे अक्षय माला और कमंडलधारिणी,शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को वे अपनी सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती हैं।

जब मां ब्रह्मचारिणी देवी ने हिमालय के घर जन्म लिया था, तब नारदजी के उपदेश से मिलने के बाद उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया।मां ब्रह्मचारिणी देवी ने तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए और कई हजार वर्षों तक निर्जल व निराहार रह कर तपस्या करती रहीं।

पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीर्ण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताकर सराहना की। उन्‍होंने कहा हे देवी आपकी इस आराधना से आपकी मनोकामना जरूर पूर्ण होगी। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। मां की आराधना करने वाले व्यक्ति का कठिन संघर्षों के समय में भी मन विचलित नहीं होता है।

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Niteen Mutha

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