कुण्डलिनी चक्र

देह में स्थित पंचकोश

panchkosh in humans

पञ्च कोश क्या हैं इनके विषय में क्या और कहाँ किसी सिद्ध महत्मा द्वारा लिखा गया है । पञ्च कोश जागरण चक्रों का जागरण कैसे हो सकता है ? किसी खगोलीय पिण्ड,ग्रह, उपग्रह की स्थिति बदलने की बात ज्योतिष ग्रन्थों मे कहीं नहीं लिखी गयी है और ना ही कोई विद्वान दैवज्ञ कहते हैं । लेकिन जन्म समय, स्थान, परिस्थिति, आदि आदि विभिन्न तत्वों

पर आपकी शारीरिक और मानसिक संरचना खगोलीय स्थिति के अधीन निर्भर करती है और तदनुसार आपके शरीर पर, चक्रो और उपत्तिकाओं पर उनकी विशेष छाप दिखायी पड़ती है और जिसमे कुछ सुधार होने की संभावनाये दैवज्ञ लोगों को दिखायी पड़ती हैं यद्यपि यह कठिन कार्य है , लेकिन बिना प्रयत्न किये उम्मीद करना भी व्यर्थ है । खगोलीय स्थिति के अनुसार कुण्डली से अधिकतम जानकारी आप प्राप्त करते हैं ,परन्तु जब आप परिस्थितियों के दास बन गये तो ज्योतिष विद्या किस लिये जीवित चली आ रही है । दैवज्ञ लोगों का संदेश आप लोगों तक किसी भी माध्यम से पहुँचाना ही हमारा ध्येय है ।

नर से नारायण बनाने का मार्ग पञ्च कोश जागरण:

चक्रों के जागरण के माध्यम से सृष्टि के आरम्भ काल से बताया गया है । मर्ज़ी आपकी कि आप क्या करना चाहते हैं । आप परिस्थितियों के दास बने रहना चाहते हैं तो यह आपकी अपनी मर्ज़ी है , लेकिन याद रखिये कि परमात्मा ने आपको दुर्लभ मानव जन्म दिया है और पशु पक्षी नहीं बनाया है

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पञ्च कोश:

ओउम् | केष्‍वन्तः पुरुष आ विवेश कान्यन्तः पुरुषे अर्पितानि |

एतद् ब्रह्मन्नुप वल्हामसि त्वा किँ स्विन्नः प्रति वोचास्यत्र ||

ओउम् | पञ्चस्वन्तः पुरुषSआ विवेश तान्यतः पुरुषे अर्पितानि |
एतत्त्वात्र प्रतिमन्वानोSअस्मि न मायया भवस्युत्तरो मत् || 

यजुर्वेद 23|51,52

शब्दार्थ -

प्रश्न -

केषु+अन्तः........किनमें
पुरुषः..............पुरुष
आविवेश..........आविष्‍ट है, समाया है ? और
कानि..............कौन
पुरुषे+अन्तः.......पुरुष में या पुरुष के लिए
अर्पितानि..........अर्पित हैं |
ब्रह्मऩ्..............हे ब्रह्मन् ! चतुर्वेदवित् अथवा साक्षात् ब्रह्म !
एतत्..............यह
त्वा................तुझसे
उप................समीप आकर
वल्हामसि..........हम प्रश्न करते हैं |
अत्र................इस विषय में
नः.................हमें
किं+स्वित्..........क्या
प्रति+वोचासि.......प्रत्युत्तर देते हो, समाधान देते हो ?

उत्तर -

पञ्चसु+अन्तः.........पाँच में
पुरुषः...................पुरुष
आ+विवेश.............आविष्‍ट है |
तानि...................वही पाँच‌
पुरुषे+अन्तः...........पुरुष में या पुरुष के लिए
अर्पितानि...............अर्पित हैं |
त्वा....................तुझको
अत्र....................इस विषय में
एतत्..................यह
प्रतिमन्वानः+अस्मि..प्रत्युत्तर देता हूँ=समाधान देता हूँ |तू
मायया................बुद्धि के द्वारा
मत्...................मुझसे
उत्तरः..................उत्कृष्‍ट
न.....................नहीं
भवसि..................है |

व्याख्या -

पुरुष=जीव पाँच में आविष्‍ट हैं और पाँच पुरुष के अर्पित हैं | पाँच से यहां तात्पर्य्य पाँच कोश‌ हैं | जीवात्मा उनमें रहता हुआ उनसे पृथ‌क् है | वे पाँच कोश निम्नलिखित हैं -

1. अन्नमय कोश

2. प्राणमय कोश

3. मनोमय कोश

4. विज्ञानमय कोश

5. आनन्दमय कोश

इन कोशों का वर्णन इस प्रकार  हैं -

1. पहलाअन्नमयजो त्वचा से लेकर अस्थिपर्य्यन्त का समुदाय पृथिवीमय है |

2 दूसरा प्राणमय जिसमें निम्न पञ्चविध प्राण समाविष्‍ट हैं - 1. प्राण अर्थात् जो भीतर से बाहर आता है; 2. अपान‌ जो बाहर से भीतर जाता है;

3. समान‌ जो नाभिस्थ होकर शरीर में सर्वत्र रस पहुँचाता है

4. उदान‌ जिससे कण्‍ठस्थ अन्नपान खींचा जाता है और बल पराक्रम होता है|

5. व्यान‌ जिससे सब शरीर में चेष्‍टादि कर्म जीव करता है |

6. तीसरामनोमय‌ जिसमें मन के साथ अहंकार, वाक्, पाद्, पाणि, पायु, और उपस्थ पाँच कर्म्मेन्द्रियाँ हैं |

7. चौथाविज्ञानमय‌ जिसमें बुद्धि, चित्त, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पाँच ज्ञान‍-इन्द्रियाँ हैं जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है |

8. पाँचवाँआनन्दमय कोश‌ जिसमें प्रीति, प्रसन्नता, न्यून आनन्द्, अधिक आनन्द और आनन्द का आधार कारणरूप प्रकृति हैं | ये पाँच कोश कहाते हैं, इन्हीं से जीव सब प्रकार के कर्म्म, उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है |
(सत्यार्थप्रकाश, नवम् समुल्लास)

इस सन्दर्भ में स्पष्‍ट सिद्ध है कि जीवात्मा इन सबसे पृथक् है, और मानो इनके अन्दर छिपा हुआ है | इन कोशों को = पर्दों को दूर करो, तो आत्मा का दर्शन सुलभ हो जाता है | ये पाँच कोश स्थूल और कारणशरीर से भिन्न हैं | कोई-कोई यहाँ पाँच से पाँच प्राण लेते हैं, जैसा कि मुडकोपनिषद् में लिखा है -

एषोSणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश | 
प्राणैश्‍चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा || - 3|1|6

पूर्वोक्त जीवात्मा चित्त से = चिन्तन से जाना जा सकता है | इसमें प्राण‌ प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान भेदों से संविष्‍ट हुआ है | सब प्राणियों का चित्त प्राणों से ओतप्रोत है, जिसके शुद्ध होने पर यह आत्मा विभूतियों वाला हो जाता है |

उपनिषद् के इस भाव का वेद में भी वर्णन किया गया है -

पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः 
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेSभवत्सरित् || यजु. 34|11

स्रोतोंसहित पाँच नदियाँ = इन्द्रियाँ, सरस्वती=ज्ञानस्वरूप आत्मा को प्राप्त हो रही हैं और वह सरस्वती=आत्मा भी शरीररूप देश में पाँच प्रकार की सरित्=गतिवाला हो गया है | पाँच इन्द्रियाँ बाहर से लाकर आत्मा को ज्ञान देती हैं, और आत्मा सब शरीर में इन्द्रियों द्वारा अपना प्रकाश करता है

यही पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जब पुरुष के वश में आ जाती हैं तब मोक्ष प्राप्त हो जाता है, जैसा कि कठोपनिषद् में कहा है -

यदा पञ्चावतिष्‍ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह | 
बुद्धिश्‍च न विचेष्‍टते तामाहुः परमां गतिम् - 2|6|10

जब मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपने व्यापार से विरत हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्‍टा नहीं करती, उसे परमगति कहते हैं |

पंचकोशी साधना ध्यान गायत्री की उच्च स्तरीय साधना है। पंचमुखी गायत्री प्रतिमा में पाँच मुख मानवीय चेतना के पाँच आवरण हैं। इनके उतरते चलने पर आत्मा का असली रूप प्रकट होता है। इन्हें पाँच कोश पाँच खजाने भी कह सकते हैं। अन्तःचेतना में एक से एक बढ़ी- चढ़ी विभूतियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थिति में छिपी पड़ी हैं। इनके जागने पर मानवीय सत्ता देवोपम स्तर पर पहुँची हुई,

जगमगाती हुई दृष्टिगोचर होती है।

पंचकोश ध्यान धारणा के निर्देश में जो पाँच प्राण तत्त्व हैं, वे इस प्रकार हैं:

पाँच प्राण – चेतना में विभिन्न प्रकार की उमंगें उत्पन्न करने का कार्य प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान — ये पाँच प्राण करते हैं।

पाँच तत्त्व – अग्नि, जल, वायु ,, आकाश और पृथ्वी यह पाँच तत्त्व काया, दृश्यमान पदार्थों और अदृश्य प्रवाहों का संचालन करते हैं। समर्थ चेतना इन्हें प्रभावित करती है।

पाँच देव – भवानी, lord ganesha , ब्रह्मा, lord Vishnu, lord shiv इन्हें क्रमशः बलिष्ठता, बुद्धिमता, उपार्जन शक्ति, अभिवर्धन, पराक्रम एवं परिवर्तन की प्रखरता कह सकते हैं। यही पाँच शक्तियाँ आत्मसत्ता में भी विद्यमान हैं और इस छोटे ब्रह्माण्ड को सुखी समुन्नत बनाने का उत्तरदायित्व सम्भालती हैं।

आत्म सत्ता के पाँच कलेवरों के रूप में पंचकोश को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है।

शरीर में सत्रिहित शक्ति-केंद्र या चक्र | Body Satrihit power – center or chakra

देह में स्थित पंचकोश:

१. अन्नमय कोश:

प्रत्यक्ष शरीर, जीवन शरीर। अन्नमयकोश ऐसे पदार्थों का बना है जो आँखों से देखा और हाथों से छुआ जा सकता है। अन्नमयकोश के दो भाग किये जा सकते हैं। एक प्रत्यक्ष अर्थात् स्थूल, दूसरा परोक्ष अर्थात् सूक्ष्म, दोनों को मिलाकर ही एक पूर्ण काया बनती है। पंचकोश की ध्यान धारणा में जिस अन्नमयकोश का ऊहापोह किया गया है, वह सूक्ष्म है, उसे जीवन शरीर कहना अधिक उपयुक्त होगा। अध्यात्म शास्त्र में इसी जीवन शरीर को प्रधान माना गया है और अन्नमयकोश के नाम से इसी की चर्चा की गई है। योगी लोगों का आहार- विहार बहुत बार ऐसा देखा जाता है जिसे शरीर शास्त्र की दृष्टि से हानिकारक कहा जा सकता है फिर भी वे निरोगी और दीर्घजीवी देखे जाते हैं, इसका कारण उनके जीवन शरीर का परिपुष्ट होना ही है। अन्नमय कोश की साधना जीवन शरीर को जाग्रत्, परिपुष्ट, प्रखर एवं परिष्कृत रखने की विधि व्यवस्था है।

जीवन- शरीर का मध्य केन्द्र नाभि है। जीवन शरीर को जीवित रखने वाली ऊष्मा और रक्त की गर्मी जो सच्चार का कारण है और रोगों से लड़ती है, उत्साह स्फूर्ति प्रदान करती है, यही ओजस् है।

ध्यान धारणा:-

ध्यान धारणा में श्रद्धा और सङ्कल्प के साथ भावना करें कि साक्षात् सविता देव नाभि चक्र में अग्नि के माध्यम से सारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। जीवन शरीर में ओजस् का उभार और व्यक्तित्व में नव जीवन का सच्चार हो रहा है। पहले की अपेक्षा सक्रियता बढ़ गई है, उदासी दूर हुई है और उत्साह एवं स्फूर्त में उभार आया है।

२. प्राणमय कोश:

जीवनी शक्ति। जीवित मनुष्य में आँका जाने वाला विद्युत् प्रवाह, तेजोवलय एवं शरीर के अन्दर एवं बाह्य क्षेत्र में फैली हुई जैव विद्युत् की परिधि को प्राणमय कोश कहते हैं। शारीरिक स्फूर्ति और मानसिक उत्साह की विशेषता प्राण विद्युत् के स्तर और अनुपात पर निर्भर रहती है।

चेहरे पर चमक, आँखों में तेज, मन में उमंग, स्वभाव में साहस एवं प्रवृत्तियों में पराक्रम इसी विद्युत्प्रवाह का उपयुक्त मात्रा में होना है। इसे ही प्रतिभा अथवा तेजस् कहते हैं। शरीर के इर्दगिर्द फैला हुआविद्युत् प्रकाश तेजोवलय कहलाता है। यही प्राण विश्वप्राण के रूप में समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसे पात्रता के अनुरूप जितना अभीष्ट है, प्राप्त कर सकते हैं।

ध्यान धारणा :-

सविता शक्ति मूलाधार चक्र के माध्यम से प्राणमय कोश में प्रवेश और संव्याप्त हो रही है। सविता की विद्युत् शक्ति काया में संव्याप्त बिजली के साथ मिलकर उसकी क्षमता असंख्य गुना बढ़ा देती है। ध्यान करें कि मेरे कण- कण में, नस- नस में, रोम- रोम में सविता से अवतरित विशिष्ट शक्ति का प्रवाह गतिशील हो रहा है। आत्मसत्ता प्राण विद्युत् से ओत- प्रोत एवं आलोकित हो रही है। यह दिव्य विद्युत् प्रतिभा बनकर व्यक्तित्व को प्रभावशाली बना रही है, पराक्रम और साहस का जागरण हो रहा है।

३. मनोमय कोश:

विचार बुद्धि, विवेकशीलता। मनोमय कोश पूरी विचारसत्ता का क्षेत्र है। इसमें चेतन, अचेतन एवं उच्च चेतन की तीनों ही परतों का समावेश है। इसमें मन, बुद्धि और चित्त तीनों का संगम है। मन कल्पना करता है। बुद्धि विवेचना करती और निर्णय पर पहुँचाती है। चित्त में अभ्यास के आधार पर वे आदतें बनती हैं, जिन्हें संस्कार भी कहा जाता है। इन तीनों का मिला हुआ स्वरूप मनोमय कोश है।
मनोमय कोश का प्रवेश द्वार आज्ञाचक्र (भू्र मध्य) है। आज्ञाचक्र जिसे तृतीय नेत्र अथवा दूरदर्शिता कह सकते हैं, इसका जागरण एवं उन्मीलन करना मनोमय कोश की ध्यान धारणा का उद्देश्य है। आज्ञाचक्र की संगति शरीर शास्त्री पिट्यूटरी एवं पीनियल ग्रन्थियों के साथ करते हैं।

ध्यान धारणा-

व्यक्ति चेतना में उच्चस्तरीय प्रखरता उत्पन्न करने के लिए बह्मचेतना के समावेश की आवश्यकता पड़ती है। ब्रह्मसत्ता की उसी की विनिर्मित प्रतीक- प्रतिमा सूर्य है। उसकी सचेतन स्थिति सविता है, भावना करें सविता का प्रकाश आज्ञाचक्र, मस्तिष्क क्षेत्र से सम्पूर्ण शरीर मेंव्याप्त,मनोमय कोश में फैल रहा है। आत्मसत्ता का समूचा चिन्तन, क्षेत्र, मनोमय कोश सविता की ज्योति एवं ऊर्जा से भर गया है। आत्मसत्ता की स्थिति ज्योति पुञ्ज एवं ज्योति पिण्ड बनने जैसी हो रही है। दृश्य में ज्योति का स्वरूप भावानुभूति में प्रज्ञा बन जाता है। सविता के मनोमय कोश में प्रवेश करने का अर्थ है- चेतना का प्रज्ञावान् बनना, ऋतम्भरा से- भूमा से आलोकित एवं ओतप्रोत होना। इस स्थिति को विवेक एवं सन्तुलन का जागरण भी कह सकते हैं। इन्हीं भावनाओं को मान्यता रूप में परिणत करना, श्रद्धा, निष्ठा एवं आस्था की तरह अन्य क्षेत्र में प्रतिष्ठापित करना- यही है सविता शक्ति का मनोमय कोश में अवतरण। भावना करें कि प्रज्ञा- विवेक, सन्तुलन की चमक मस्तिष्क के हर कण में प्रविष्ट हो रही है, संकल्पों में दृढ़ता आ रही है।

४. विज्ञानमय कोश:

भाव प्रवाह। विज्ञानमय कोश चेतन की तरह है जिसे अतीन्द्रिय- क्षमता एवं भाव संवेदना के रूप में जाना जाता है। विज्ञानमय और आनन्दमय कोश का सम्बन्ध सूक्ष्म जगत् से ब्रह्मचेतना से है। सहानुभूति की संवेदना, सहृदयता और सज्जनता का सम्बन्ध हृदय से है। यही हृदय एवं भाव संस्थान

अध्यात्म शास्त्र में विज्ञानमय कोश कहलाता है। परिष्कृत हृदय- चक्र में उत्पन्न चुम्बकत्व ही दैवी तत्त्वों को सूक्ष्म जगत् से आकर्षित करता और आत्मसत्ता में भर लेने की प्रक्रियाएँ सम्पन्न करता है।

श्रद्धा जितनी परिपक्व होगी- दिव्य लोक से अनुपम वरदान खिंचते चले आएँगे। अतीन्द्रिय क्षमता, दिव्य दृष्टि, सूक्ष्म जगत् से अपने प्रभाव- पराक्रम पुरुषार्थ द्वारा अवतरित होता है।

ध्यान धारणा :

विज्ञानमय कोश में सविता प्रकाश का प्रवेश ‘दीप्ति’ के रूप में माना गया है। दीप्ति प्रकाश की वह दिव्य धारा है, जिसमें प्रेरणा एवं आगे बढ़ने की शक्ति भी भरी रहती है, ऐसी क्षमता को वर्चस् कहते हैं। यह प्रेरणा से ऊँची चीज है। प्रेरणा से दिशा प्रोत्साहन देने जैसा भाव टपकता है, किन्तु वर्चस् में वह चमक है जो धकेलने, घसीटने, फेंकने, उछालने की भी सामर्थ्य रखती है। नस- नस में रोम- रोम में दीप्ति का सच्चार, दीप्ति का प्रभाव, दिव्य भाव संवेदनाओं और अतीन्द्रिय ज्ञान के रूप में होता है। दीप्ति की प्रेरणा से सद्भावनाओं का अभिवर्धन होता है और सहृदयता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ उभर कर आती हैं, ऐसी आस्था अन्तःकरण में सुदृढ़ अवस्था में होनी चाहिए। स्वयं को असीम सत्ता में व्याप्त फैला हुआ अनुभव करें। सहृदयता, श्रद्धा, दिव्य ज्ञान का विकास और स्नेह करुणा जैसी संवेदनाओं से रोमांच का शरीर में बोध हो रहा है।

५. आनन्दमय कोश:

आनन्दमय कोश चेतना का वह स्तर है, जिनमें उसे अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति होती रहती है।

आत्मबोध के दो पक्ष हैं-

1. अपनी ब्राह्मी चेतना, बह्म सत्ता का भान होने से आत्मसत्ता में संव्याप्त परमात्मा का दर्शन होता है।

2. संसार के प्राणियों और पदार्थों के साथ अपने वास्तविक सम्बन्धों का तत्त्वज्ञान भी हो जाता है। इस कोश के परिष्कृत होने पर एक आनन्द भरी मस्ती छाई रहती है। ईश्वर इच्छा मानकर प्रखरकर्त्तव्य- परायण; किन्तु नितान्त वैरागी की तरह काम करते हैं। स्थितप्रज्ञ की स्थिति आ जाती है। आनन्दमय कोश की ध्यान धारणा से व्यक्तित्व में ऐसे परिवर्तन आरम्भ होते हैं, जिसके सहारे क्रमिक गति से बढ़ते हुए धरती पर रहने वाले देवता के रूप में आदर्श जीवनयापन कर सकने का सौभाग्य मिलता है।

ध्यान धारणा -

धारणा में सविता का सहस्रार मार्ग से प्रवेश करके समस्त कोश सत्ता पर छा जाने, ओत- प्रोत होने का ध्यान किया जाता है। यदि सङ्कल्प में श्रद्धा, विश्वास की प्रखरता हो, तो सहस्रार का चुम्बकत्व सविता शक्ति को प्रचुर परिमाण में आकर्षित करने और धारण करने में सफल हो जाता है। इसकी अनुभूति कान्ति रूप में होती है। कान्ति सामान्यतः सौन्दर्य मिश्रित प्रकाश को कहते हैं और किसी आकर्षक एवं प्रभावशाली चेहरे को कान्तिवान् कहते हैं, पर यहाँ शरीर की नहीं आत्मा की कान्ति का प्रसङ्ग है। इसलिए वह तृप्ति, तुष्टि एवं शान्ति के रूप में देखी जाती है। तृप्ति अर्थात् सन्तोष। तुष्टि अर्थात् प्रसन्नता। शान्ति अर्थात् उद्वेग रहित, सुस्थिर मनःस्थिति। यह तीनों वरदान, तीनों शरीरों में काम करने वाली चेतना के सुसंस्कृत उत्कृष्ट चिन्तन का परिचय देते हैं। स्थूल शरीर सन्तुष्ट, तृप्त। सूक्ष्म शरीर प्रसन्न, तुष्ट। कारण शरीर शान्त समाहित। इस स्थिति में सहज मुसकान बनी रहती है, हलकी- सी मस्ती छायी रहती है।

सविता शक्ति के पंचकोश में प्रवेश करने और छा जाने की अनुभूति ऐसी गहरी और भावमय होनी चाहिए, जैसे प्रसन्नता की स्थिति में मन उल्लास से उभरता है या धूप में बैठने से शरीर गर्म होता है।

पञ्चकोश साधकों हेतु आवश्यक दिशा निर्देश:

रहन-सहन का सिद्धांत :

दिनचर्या को नियमित करना तथा घर एवं उसके वातावरण को स्वच्छ व कीटाणुरहित बनाये रखना ही रहन-सहन है। इससे व्यक्ति सदा स्वस्थ व समर्थ बना रह सकता है। रहन-सहन के प्रमुख सूत्र —

1. सूर्योदय से पूर्व उठना - सूर्य का संबंध नाभि के सोलर प्लेक्सस से। अतः उषापान करके सिस्टम ठीक कर लिया जाय +मंत्रलेखन +स्वाध्याय।

2.स्वच्छता सफाई - शरीर +वस्त्र +परिकर।

3.जप-ध्यान + APMB -( आसन,प्राणायाम, मुद्रा, बंध)

4.भोजन-  क्यों खायें? कब खायें?क्या खायें? कितना?
कैसे खायें? का ध्यान।

5.ड्यूटी वर्क- ईश्वर का काम समझकर, कुशलता पूर्वक

6.मनोरंजन-  ताजगी के साथ कुछ नया सीखने को मिले

7.विश्राम-  जब भी शरीर में थकावट हो। हरहाल मस्त रहने की कला का अभ्यास।
(निदिध्यासन– रात्रि सोते समय तत्वबोध + सुबह जगते समय आत्मबोध की साधना)

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Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

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