यात्रा

कुम्भ मेला

Kumbh mela

नाम महाकुम्भ, कुम्भ पर्व

अनुयायी :हिंदू धर्म

प्रारम्भ :पौराणिक काल      तिथि :पौष मास की पूर्णिमा

कुम्भ मेला हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुम्भ पर्व स्थल- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष में इस पर्व का आयोजन होता है। मेला प्रत्येक तीन वर्षो के बाद नासिक, इलाहाबाद, उज्जैन और हरिद्वार में बारी-बारी से मनाया जाता है। इलाहाबाद में संगम के तट पर होने वाला आयोजन सबसे भव्य और पवित्र माना जाता है। इस मेले में करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होते है। ऐसी मान्यता है कि संगम के पवित्र जल में स्नान करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है।

धार्मिक मान्यता :

राक्षसों और देवताओं में जब अमृत के लिए लड़ाई हो रही थी तब भगवान विष्णु ने एक 'मोहिनी' का रूप लिया और राक्षसों से अमृत को जब्त कर लिया। भगवान विष्णु ने गरुड़ को अमृत पारित कर दिया, और अंत में राक्षसों और गरुड़ के संघर्ष में कीमती अमृत की कुछ बूंदें इलाहाबाद, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिर गई। तब से प्रत्येक 12 साल में इन सभी स्थानों में 'कुम्भ मेला' आयोजित किया जाता है।

अर्द्ध कुम्भ और माघ मेला:
हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्द्धकुंभ होता है। अर्द्ध या आधा कुम्भ, हर छह वर्षो में संगम के तट पर आयोजित किया जाता है। पवित्रता के लिए अर्द्ध कुम्भ भी पूरी दुनिया में लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।

कुम्भ पर्व :

'कुम्भ पर्व' एक अमृत स्नान और अमृतपान की बेला है। इसी समय गंगा की पावन धारा में अमृत का सतत प्रवाह होता है। इसी समय कुम्भ स्नान का संयोग बनता है। कुम्भ पर्व भारतीय जनमानस कीKumbh11 पर्व चेतना की विराटता का द्योतक है। विशेषकर उत्तराखंड की भूमि पर तीर्थ नगरी हरिद्वार का कुम्भ तो महाकुम्भ कहा जाता है। भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रमाण प्रत्येक 12 वर्ष में यहाँ आयोजित होता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे बसा इलाहाबाद भारत का पवित्र और लोकप्रिय तीर्थस्थल है। इस शहर का उल्लेख भारत के धार्मिक ग्रन्थों में भी मिलता है। वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में इस स्थान को प्रयाग कहा गया है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहाँ संगम होता है, इसलिए हिन्दुओं के लिए इस शहर का विशेष महत्त्व है। 12 साल बाद यहाँ कुम्भ के मेले का आयोजन होता है। कुम्भ के मेले में 2 करोड़ की भीड़ इकट्ठा होने का अनुमान किया जाता है जो सम्भवत: विश्व में सबसे बड़ा जमावड़ा है।

स्नान पर्व:

मुख्य स्नान तिथियों पर सूर्योदय के समय रथ और हाथी पर संतों के रंगारंग जुलूस का भव्य आयोजन होता है। पवित्र गंगा नदी में संतों द्वारा डुबकी लगाई जाती है। संगम तट इलाहाबाद में सिविल लाइंस से लगभग 7 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां पर गंगा, यमुना और सरस्वती नदी का संगम है, इसे त्रिवेणी संगम भी कहते हैं। यहीं कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है जहां पर लोग स्नान करते हैं। इस पर्व को 'स्नान पर्व' भी कहते हैं। यही स्थान तीर्थराज कहलाता है। गंगा और यमुना का उद्गम हिमालय से होता है जबकि सरस्वती का उद्गम अलौकिक माना जाता है। मान्यता है कि सरस्वती का उद्गम गंगा-यमुना के मिलन से हुआ है जबकि कुछ ग्रंथों में इसका उद्गम नदी के तल के नीचे से बताया गया है। इस संगम स्थल पर ही अमृत की बूंदें गिरी थी इसीलिए यहां स्नान का महत्व है। त्रिवेणी संगम तट पर स्नान करने से शरीर और आत्मा शुद्ध हो जाती है। यहां पर लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान भी करते हैं।

कुम्भ का योग :

कुम्भ बारह-बारह वर्ष के अन्तर से चार मुख्य तीर्थों में लगने वाला स्नान-दान का ग्रहयोग है। इसके चार स्थल प्रयाग, हरिद्वार, नासिक-पंचवटी

और अवन्तिका (उज्जैन) हैं। कुम्भ योग ग्रहों की निम्न स्थिति के अनुसार बनता है-

जब सूर्य एवं चंद्र मकर राशि में होते हैं और अमावस्या होती है तथा मेष अथवा वृषभ के बृहस्पति होते हैं तो प्रयाग में कुम्भ महापर्व का योग होता है। इस अवसर पर त्रिवेणी में स्नान करना सहस्रों अश्वमेध यज्ञों, सैकड़ों वाजपेय यज्ञों तथा एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है। कुम्भ के इस अवसर पर तीर्थ यात्रियों को मुख्य दो लाभ होते हैं- गंगा स्नान तथा सन्त समागम। जिस समय गुरु कुम्भ राशि पर और सूर्य मेष राशि पर हो, तब हरिद्वार में कुम्भ पर्व होता है। जब गुरु सिंह राशि पर स्थित हो तथा सूर्य एवं चंद्र कर्क राशि पर हों, तब नासिक में कुम्भ होता है। जिस समय सूर्य तुला राशि पर स्थित हो और गुरु वृश्चिक राशि पर हो, तब उज्जैन में कुम्भ पर्व मनाया जाता है।

प्रयाग कुम्भ :

प्रयाग कुम्भ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। हरिद्वार में कुम्भ गंगा के तट पर और नासिक में गोदावरी के तट पर आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर नदियों के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री आते है। यह कुम्भ अन्य कुम्भों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रकाश की ओर ले जाता है। यह ऐसा स्थान है जहाँ बुद्धिमत्ता का प्रतीक सूर्य का उदय होता है। इस स्थान को ब्रह्माण्ड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रह्माजी ने यही अश्वमेध यज्ञ किया था। दश्व्मेघ घाट और ब्रह्मेश्वर मंदिर इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप अभी भी यहाँ मौजूद है। इस यज्ञ के कारण भी कुम्भ का विशेष महत्व है। कुम्भ और प्रयाग एक दूसरे के पर्यायवाची है|

कुम्भ पर्व चक्र :

कुम्भ पर्व विश्व में किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा संग्रहण है। सैंकड़ों की संख्या में लोग इस पावन पर्व में उपस्थित होते हैं। कुम्भ का संस्कृत अर्थ है कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिन्ह है। हिन्दू धर्म में कुम्भ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है- हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में क्षिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में संगम जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं।

ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। वर्ष 2013 में 14 जनवरी से पूर्ण कुम्भ मेला इलाहाबाद में आयोजित हुआ। प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है।

कुम्भ पर्व हरिद्वार :

हरिद्वार हिमालय पर्वत शृंखला के शिवालिक पर्वत के नीचे स्थित है। प्राचीन ग्रंथों में हरिद्वार को तपोवन, मायापुरी, गंगाद्वार और मोक्षद्वार आदि नामों से भी जाना जाता है। हरिद्वार की धार्मिक महत्‍ता विशाल है एवं यह हिन्दुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थान है। मेले की तिथि की गणना करने के लिए सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की स्थिति की आवश्यकता होती है। हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। सन 2010 का कुम्भ मेला मकर संक्रांति (14 जनवरी 2010 ) से वैशाख पूर्णिमा स्नान (28 अप्रैल 2010) तक हरिद्वार में आयोजित हुआ था।

कुम्भ पर्व नासिक :

भारत में 12 में से एक ज्योतिर्लिंग त्र्यम्बकेश्वर नामक पवित्र शहर में स्थित है। यह स्थान नासिक से 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और गोदावरी नदी का उद्गम भी यहीं से हुआ। 12 वर्षों में एकkumbh nasik बार सिंहस्थ कुम्भ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार नासिक उन चार स्थानों में से एक है जहाँ अमृत कलश से अमृत की कुछ बूँदें गिरी थीं। कुम्भ मेले में सैंकड़ों श्रद्धालु गोदावरी के पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं। यहाँ पर शिवरात्रि का त्यौहार भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।

कुम्भ पर्व उज्जैन :

गंगा नदी, हरिद्वार
उज्जैन का अर्थ है विजय की नगरी और यह मध्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। इंदौर से इसकी दूरी लगभग 55 किलोमीटर है। यह क्षिप्रा नदी के तट पर बसा है। उज्जैन भारत के पवित्र एवं धार्मिक स्थलों में से एक है। ज्योतिष शास्‍त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है। महाभारत के अरण्य पर्व के अनुसार उज्जैन 7 पवित्र मोक्ष पुरी या सप्त पुरी में से एक है। उज्जैन के अतिरिक्त शेष हैं अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम और द्वारका। कहते हैं की भगवान शिव ने त्रिपुरा राक्षस का वध उज्जैन में ही किया था।

कुम्भ का अर्थ :

कुम्भ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है। कुम्भ का पर्याय पवित्र कलश से होता है। इस कलश का हिन्दू सभ्यता में विशेष महत्व है। कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन को रुद्र, आधार को ब्रह्मा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। यह चारों वेदों का संगम है। इस तरह कुम्भ का अर्थ पूर्णतः औचित्य पूर्ण है। वास्तव में कुम्भ हमारी सभ्यता का संगम है। यह आत्म जाग्रति का प्रतीक है। यह मानवता का अनंत प्रवाह है। यह प्रकृति और मानवता का संगम है। कुम्भ ऊर्जा का स्त्रोत है। कुम्भ मानव-जाति को पाप, पुण्य और प्रकाश, अंधकार का एहसास कराता है। नदी जीवन रूपी जल के अनंत प्रवाह को दर्शाती है। मानव शरीर पंचतत्वों से निर्मित है यह तत्व हैं-अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश।

कल्पवास :
प्रयाग में कल्पवास का अत्यधिक महत्व है। यह माघ के माह में और अधिक महत्व रखता है और यह पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है। कल्पवास को धैर्य, अहिंसा और भक्ति के लिए जाना जाता है और भोजन एक दिन में एक बार ही किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है।

इतिहास :
उत्तर भारत के मध्य में स्थित प्रयाग ने हज़ारों वर्षों का सफर कर लोगों को ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, कला, धर्म और संस्कृति की अमूल्य शिक्षा दी। आज इस प्रयाग को इलाहाबाद कहते हैं। मुग़ल शासक अकबर ने लगभग 1583 में इसका नाम बदल कर इलाहाबाद कर दिया। यह एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है अल्लाह द्वारा बसाया गया शहर। लेकिन इसे प्रयाग कहना ही उचित होगा, क्योंकि यह हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है। मुग़ल काल में बहुत से ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़कर उनका अस्तित्व मिटा दिया गया। प्रयाग में हिंदुओं के बहुत सारे प्राचीन मंदिर और तीर्थ है। संगम तट पर जहां कुम्भ मेले का आयोजन होता है, वहीं यहां भारद्वाज ऋषि का प्राचीन आश्रम भी है। इसे विष्णु की नगरी भी कहा जाता है और यहीं पर भगवान ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ किया था। माना जाता है पवित्र गंगा और यमुना के मिलन स्थल के पास आर्यों ने प्रयाग तीर्थ की स्थापना की थी। अर्द्ध या आधा कुम्भ, हर छह वर्षों में संगम के तट पर आयोजित किया जाता है|

पौराणिक वर्णन :

कुम्भ पर्व की मूल चेतना का वर्णन पुराणों में मिलता है। पुराणों में वर्णित संदर्भों के अनुसार यह पर्व समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत घट के लिए हुए देवासुर संग्राम से जुड़ा है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई जिनमें प्रथम विष था तो अन्त में अमृत घट लेकर धन्वन्तरि प्रकट हुए। कहते हैं अमृत पाने की होड़ ने एक युद्ध का रूप ले लिया। ऐसे समय असुरों से अमृत की रक्षा के उद्देश्य से इन्द्र पुत्र जयंत उस कलश को लेकर वहाँ से पलायन कर गये। वह युद्ध बारह वर्षों तक चला। इस दौरान सूर्य, चंद्रमा, गुरु एवं शनि ने अमृत कलश की रक्षा में सहयोग दिया। इन बारह वर्षों में बारह स्थानों पर जयंत द्वारा अमृत कलश रखने से वहाँ अमृत की कुछ बूंदे छलक गईं। कहते हैं उन्हीं स्थानों पर, ग्रहों के उन्हीं संयोगों पर कुम्भ पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि उनमें से आठ पवित्र स्थान देवलोक में हैं तथा चार स्थान पृथ्वी पर हैं। पृथ्वी के उन चारों स्थानों पर तीन वर्षों के अन्तराल पर प्रत्येक बारह वर्ष में कुम्भ का आयोजन होता है। गंगा, क्षिप्रा, गोदावरी और प्रयाग के तटों पर सम्पन्न होने वाले पर्वों ने भौगोलिक एवं सामाजिक एकता को प्रगाढ़ता प्रदान की है। हज़ारों वर्षों से चली आ रही यह परम्परा रूढ़िवाद या अंधश्रद्धा कदापि नहीं कही जा सकती क्योंकि इस महापर्व का संबध सीधे तौर पर खगोलीय घटना पर आधारित है। सौर मंडल के विशिष्ट ग्रहों के विशेष राशियों में प्रवेश करने से बने खगोलिय संयोग इस पर्व का आधार हैं। इनमें कुम्भ की रक्षा करने वाले चार सूत्रधार सूर्य, चंद्रमा, गुरु एवं शनि का योग इन दिनों में किसी ना किसी रूप में बनता है। यही विशिष्ट बात इस सनातन लोकपर्व के प्रति भारतीय जनमानस की आस्था का दृढ़तम आधार है। तभी तो सदियों से चला आ रहा यह पर्व आज संसार के विशालतम धार्मिक मेले का रूप ले चुका है।

स्कंद पुराण में कुम्भ :

इस संदर्भ में घटने वाली खगोलिय स्थिति का उल्लेख स्कंद पुराण में कुछ इस प्रकार है- 

पद्मिनी नायके मेषे कुम्भराशि गते गुरौ। गंगा द्वारे भवेद्योगः कुम्भनाम्रातदोत्तमः॥

जिसका अर्थ है कि सूर्य जब मेष राशि में आये और बृहस्पति ग्रह कुम्भ राशि में हो तब गंगाद्वार अर्थात हरिद्वार में कुम्भ का उत्तम योग होता है। ऐसे श्रेष्ठ अवसर पर सम्पूर्ण भारत के 

साधु-सन्न्यासी, बड़े बड़े मठों के महंत और पीठाधीश और दर्शन शास्त्र के अध्येता विद्वान हरिद्वार में एकत्र होते हैं। इनके अलावा समाज के सभी वर्गों के लोग छोटे बड़े, अमीर ग़रीब, बड़े बूढ़े, स्त्री पुरुष भी यहाँ आते हैं। इस पावन अवसर पर जनमानस की ऐसी विशालता और विविधता को देखकर विश्वास होता है कि वास्तव में महाकुम्भ ही अमृत साधना का महापर्व है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण :

समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुम्भ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्ग लोक तक ले जाने में इंद्र के पुत्र जयंत को 12 दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के 1 वर्ष के बराबर है इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुम्भ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है। पौराणिक विश्लेषण से यह साफ़ है कि कुम्भ पर्व एवं गंगा नदी आपस में सम्बंधित हैं। गंगा प्रयाग में बहती हैं परन्तु नासिक में बहने वाली गोदावरी को भी गंगा कहा जाता है, इसे हम गोमती गंगा के नाम से भी पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को काशी की उत्तरी गंगा से पहचाना जाता है। यहाँ पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है। इस तथ्य को ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण के 2 श्लोकों के माध्यम से समझाया गया है-

" विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्‍तरे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते । "
" एव मुक्‍त्वा गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्‍वरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये। "
ज्योतिषीय गणना के अनुसार कुम्भ का पर्व 4 प्रकार से आयोजित किया जाता है :

1. कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है।

" पद्‍मिनी नायके मेषे कुम्भ राशि गते गुरोः । गंगा द्वारे भवेद योगः कुम्भ नामा तथोत्तमाः।। "

2. मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुम्भ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है।

" मेष राशि गते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ । अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके ।। "

एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुम्भ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।

3. सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुम्भ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है।

" सिंह राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ । गोदावर्या भवेत कुम्भों जायते खलु मुक्‍तिदः ।। "

4. सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है।

" मेष राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ । उज्जियन्यां भवेत कुम्भः सदामुक्‍ति प्रदायकः ।। "

पौराणिक ग्रंथों जैसे नारदीय पुराण (2/66/44), शिव पुराण (1/12/22/-23) एवं वराह पुराण (1/71/47/48) और ब्रह्मा पुराण आदि में भी कुम्भ एवं अर्द्ध कुम्भ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुम्भ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। कहा जाता है कि हरिद्वार के बाद कुम्भ पर्व प्रयाग, नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाये जाने वाले कुम्भ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाये जाने वाले कुम्भ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है|

कुम्भ के अनुष्ठान :

कुम्भ मेला, विश्व का सबसे विशाल आयोजन है जिसमें अलग अलग जाति, धर्म, क्षेत्र के लाखों लोग भाग लेते हैं। कुम्भ भारतीयों के मस्तिष्क और आत्मा में रचा-बसा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि कुम्भ में स्नान करने से सारे पाप दूर हो जाते हैं और मनुष्य जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। यहाँ पर अन्य गतिविधियाँ, धार्मिक चर्चा, भक्ति गायन का आयोजन किया जाता है जिसमें पुरुष, महिलाएं, धनी, ग़रीब सभी लोग भाग लेते हैं।

कुम्भ मेला सभी हिंदू तीर्थ में पवित्र माना जाता है। लाखों पवित्र पुरुष और महिलाएँ (संत और साधु) विश्वास के इस प्रतीक में भाग लेते है ।
इस पवित्र स्थल ने लोगों के मन में विश्वास प्राप्त करके अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है। प्रसिद्ध प्राचीन यात्री, चीन के ह्वेन सांग पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कुम्भ मेले का उल्लेख अपनी डायरी में किया था। उनकी डायरी हिन्दू महीने माघ (जनवरी - फरवरी) के 75 दिनों के उत्सव का उल्लेख है, जिसको लाखों साधुओं, आम आदमी, अमीर और राजाओं ने देखा है।
जाति, धर्म, क्षेत्र के सभी सांसारिक बाधाओं के बावजूद, कुम्भ मेला का प्रभाव आम भारतीयों के मस्तिष्क और कल्पनाओं पर है। इतिहास में कुम्भ मेला लाखों लोगों के एकत्र होने के लिए प्रसिद्ध है। समय के साथ कुम्भ हिंदू संस्कृति और आस्था का एक केंद्र बन गया है। विभिन्न धर्म और सम्प्रदाय के लोग इस लौकिक आयोजन में सम्मिलित होते हैं।

शाही और पवित्र स्नान :

मकर संक्राति से प्रारम्भ होकर वैशाख पूर्णिमा तक चलने वाले हरिद्वार के महाकुम्भ में वैसे तो हर दिन पवित्र स्नान है फिर भी कुछ दिवसों पर ख़ास स्नान होते हैं। इसके अलावा तीन शाही स्नान होते हैं। ऐसे मौकों पर साधु संतों की गतिविधियाँ तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र होती है। कुम्भ के मौके पर तेरह अखाड़ों के साधु-संत कुम्भ स्थल पर एकत्र होते हैं। प्रमुख कुम्भ स्नान के दिन अखाड़ों के साधु एक शानदार शोभायात्रा के रूप में शाही स्नान के लिए हर की पौड़ी पर आते हैं। भव्य जुलूस में अखाड़ों के प्रमुख महंतों की सवारी सजे धजे हाथी, पालकी या भव्य रथ पर निकलती हैं। उनके आगे पीछे सुसज्जित ऊँट, घोड़े, हाथी और बैंड़ भी होते हैं। हरिद्वार की सड़कों से निकलती इस यात्रा को देखने के लिए लोगों के हुजूम इकट्ठे हो जाते हैं। ऐसे में इन साधुओं की जीवन शैली सबके मन में कौतूहल जगाती है विशेषकर नागा साधुओं की, जो कोई वस्त्र धारण नहीं करते तथा अपने शरीर पर राख लगाकर रहते हैं। मार्ग पर खड़े भक्तगण साधुओं पर फूलों की वर्षा करते हैं तथा पैसे आदि चढ़ाते हैं। यह यात्रा विभिन्न अखाड़ा परिसरों से प्रारम्भ होती है। विभिन्न अखाड़ों के लिए शाही स्नान का क्रम निश्चित होता है। उसी क्रम में यह हर की पौड़ी पर स्नान करते हैं।

गंगा स्नान और पूजन का महत्त्व :

गंगा नदी हिंदुओं के लिए देवी और माता समान है। इसीलिए हिंदुओं के लिए गंगा स्नान का बहुत महत्व है। गंगा जीवन और मृत्यु दोनों से जुडी़ हुई है इसके बिना हिंदू संस्कार अधूरे हैं। गंगाजल अमृत समान है। इलाहाबाद कुंभ में गंगा स्नान, पूजन का अलग ही महत्व है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है मकर संक्राति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में स्नान, पूजन, दान एवं दर्शन करना महत्त्वपूर्ण माना गया है। गंगाजी के अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्रम एवं गंगा आरती बहुत लोकप्रिय हैं। गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों का क्षय होता है। मान्यता है कि गंगा पूजन से मांगलिक दोष से ग्रसित जातकों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। गंगा स्नान करने से अशुभ ग्रहों का प्रभाव समाप्त होता है। अमावस्या दिन गंगा स्नान और पितरों के निमित तर्पण व पिंडदान करने से सदगती प्राप्त होती है और यही शास्त्रीय विधान भी है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि कुंभ स्थल के पवित्र जल में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप-कष्ट धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगाजी में स्नान करने से सात्विकता और पुण्यलाभ प्राप्त होता है।[

नागा साधुओं का रूप :

कुम्भ मेले में शैवपंथी नागा साधुओं को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। नागा साधुओं की रहस्यमय जीवन शैली और दर्शन को जानने के लिए विदेशी श्रद्धालु ज्यादा उत्सुक रहते हैं। कुम्भ के सबसे पवित्र शाही स्नान में सबसे पहले स्नान का अधिकार इन्हें ही मिलता है।  नागा साधु अपने पूरे शरीर पर भभूत मले, निर्वस्त्र रहते हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं भी आकर्षण का केंद्र रहती है। हाथों में चिलम लिए और चरस का कश लगाते हुए इन साधुओं को देखना अजीब लगता है। मस्तक पर आड़ा भभूत लगा, तीनधारी तिलक लगा कर धूनी रमा कर, नग्न रह कर और गुफ़ाओं में तप करने वाले नागा साधुओं का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। यह साधु उग्र स्वभाव के होते हैं। नागा जीवन की विलक्षण परंपरा में दीक्षित होने के लिए वैराग्य भाव का होना जरूरी है। संसार की मोह-माया से मुक्त कठोर दिल वाला व्यक्ति ही नागा साधु बन सकता है। साधु बनने से पूर्व ही ऐसे व्यक्ति को अपने हाथों से ही अपना ही श्राद्ध और पिंड दान करना होता है। अखाड़े किसी को आसानी से नागा रूप में स्वीकार नहीं करते। बाकायदा इसकी कठोर परीक्षा ली जाती है जिसमें तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, सन्न्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं। कठोर परीक्षा से गुजरने के बाद ही व्यक्ति सन्न्यासी जीवन की उच्चतम तथा अत्यंत विकट परंपरा में शामिल होकर गौरव प्राप्त करता है। इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों, संत परंपराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है।

एकसूत्र की कल्पना :

कुम्भ मेले के इतिहास के शोधार्थियों का मानना है कि प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के अध्ययन से ऐसा नहीं प्रतीत होता कि प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन, इन चारों स्थानों पर कुम्भ मेलों का सूत्रपात किसी एक केन्द्रीय निर्णय के अन्तर्गत, किसी एक समय पर, एक साथ किया गया होगा। कुम्भ की परम्परा का क्रमश: विकास हुआ लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये चारों स्थान अपने-अपने कारणों से पवित्र तीर्थस्थल माने जाते थे। गोदावरी, क्षिप्रा, गंगा और संगम के पवित्र तट पर किन्हीं पुण्य राशियोग पर स्नान के निमित्त मेले की परम्परा पहले से चली आ रही थी, जिन्हें आगे चलकर एक पौराणिक कथा के माध्यम से एक शृंखला में पिरो दिया गया। किन्तु जिसने भी किया, जब भी किया, उसके पीछे भारत की सांस्कृतिक चेतना और एकता को जाग्रत व सुदृढ़ करने की दृष्टि अवश्य विद्यमान थी। प्रचलित धारणा के अनुसार चार स्थानों पर कुम्भ परम्परा प्रारंभ करने का श्रेय भी आदि शंकराचार्य को ही दिया जाता है। यह सहज लगता है; क्योंकि आदि शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना की, जिसके कारण चार धाम की तीर्थयात्रा का प्रचलन हुआ। कहा जाता है कि उन्होंने ही भारत की सन्त-शक्ति को गिरी, पुरी, भारती, तीर्थ, वन, अरण्य, पर्वत, आश्रम, सागर तथा सरस्वती नामक दस वर्णों में गठित किया और भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग में धर्म-चेतना जगाने का दायित्व उन्हें सौंपा

जदुनाथ सरकार का कथन :

सुप्रसद्धि इतिहासकार जदुनाथ सरकार गहरे शोध के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कुम्भ परम्परा का कोई प्रमाण बारहवीं शताब्दी से पहले नहीं मिलता। कुम्भ मेले का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है, वहाँ विभिन्न साधु सम्प्रदायों के अखाड़ों की उपस्थिति। शैव, वैष्णव और उदासीन सम्प्रदायों के साधु अनेक अखाड़ों और मठों मं संगठित हैं। प्रत्येक अखाड़े के अपने प्रतीक चिह्न और ध्वज-पताका होती है। कुम्भ के मेले में प्रत्येक अखाड़ा अपने ध्वज और प्रतीकों के साथ उपस्थित होता है, वहाँ उनकी अपनी छावनी होती है, जिसके बीचों-बीच बहुत ऊँचे स्तम्भ पर उनका ध्वज फहराता है। इन अखाड़ों के साधु शस्त्रधारी होते हैं। उनकी रचना एकदम सैनिक पद्धति पर होती है। उनमें शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संगम होता है। ये साधु सांसारिक जीवन से विरक्त और अविवाहित होते हैं। उनकी दिनचर्या बहुत कठोर होती है। शस्त्रधारी होते हुए भी वे सन्न्यास मार्गी तपस्वी होते हैं। यदि इन अखाड़ों में प्रचलित शब्दावली की ओर ध्यान दें तो वह मुस्लिम काल की सैनिक शब्दावली है। कुम्भ के मेले में मुख्य आकर्षण इन अखाड़ों का स्नान ही होता है। उसे "शाही स्नान" कहते हैं। प्रत्येक अखाड़े के प्रमुख महन्त रथ पर सवार होते हैं। उनके दायें-बायें और आगे निर्वस्त्र खड्गधारी घुडसवार चलते हैं, तुरही नगाड़े का भेरी नाद होता है।

सवाल यह है कि इन संसार त्यागी विरक्त साधुओं को शस्त्र धारण करने और सैनिक संगठन पद्धति अपनाने की आवश्यकता कब और क्यों पड़ी? मुग़ल बादशाह बाबर के पूर्वज तैमूर की आत्मकथा के अनुसार तैमूर ने सन 1394 में हरिद्वार के कुम्भ में कई सहस्र तीर्थयात्रियों की अकारण ही निर्मम हत्या कर दी थी। जिससे विदित होता है कि उन दिनों हिन्दुओं की तीर्थ यात्रा भी सुरक्षित नहीं बची थी। स्पष्ट है, निहत्थे हिन्दू समाज की रक्षा के लिए साधु-संतों को मोक्ष-साधना के साथ-साथ शस्त्र धारण भी करना पड़ा होगा। मुस्लिम शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने और हिन्दू समाज को अपनी धार्मिक आस्थाओं का निर्विघ्न पालन करने हेतु संरक्षण देने का बीड़ा साधु समाज ने उठाया होगा। शस्त्र धारण करने की दिशा में पहले नागा साधु आगे बढ़े। कुम्भ मेलों की सुरक्षा का दायित्व वे ही संभालते थे। बहुत बाद में रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णव वैरागियों ने भी शस्त्र धारण करने का निर्णय लिया। यह निर्णय सन 1713 में जयपुर के समीप 'गाल्ता' नामक स्थान पर महन्त रामानन्द के मठ में लिया गया। जयपुर नरेश सवाई जयसिंह का नाम भी इस घटना के साथ जोड़ा जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि उस सवाई जयसिंह ने बहुत कुशलता के साथ एक ओर मुग़ल बादशाहों का विश्वास प्रात करके हिन्दू तीर्थ स्थानों पर 'जयसिंहपुरा' नामक केन्द्र स्थापित किए और उनमें रामानन्दी सम्प्रदाय के निर्मोही अखाड़ो को प्रवेश दिया। अयोध्या में निर्मोही अखाड़े की भूमिका इसी प्रकार प्रारंभ हुई दूसरी ओर जयसिंह ने सभी हिन्दू शक्तियों, जैसे मराठे, बुन्देले और बन्दा बैरागी से सम्बंध स्थापित कर उन्हें यथाशक्ति सहायता देने का प्रयास किया। पेशवा बाजीराव प्रथम की मालवा पर विजय और अधिकार दिलाने में सवाई जयसिंह की निर्णायक भूमिका थी।

आयोजन के स्थान :

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार इंद्र के बेटे जयंत के घड़े से अमृत की बूंदे भारत में चार जगहों पर गिरी- हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयाग। हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में शिप्रा नदी में, नासिक में गोदावरी और प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर। हरिद्वार उत्तराखण्ड में, प्रयाग उत्तर प्रदेश में स्थित है तो नासिक महाराष्ट्र में। उज्जैन मध्य प्रदेश के मध्य में स्थित है। धार्मिक विश्‍वास के अनुसार कुम्भ में श्रद्धापूर्वक स्‍नान करने वाले लोगों के सभी पाप कट जाते हैं और उन्‍हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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