योग

कर्मयोग – भगवत गीता, श्री राम शर्मा आचार्य और सद गुरु के अनुसार

कर्मयोग से तात्पर्य :-

“अनासक्त भाव से कर्म करना”। कर्म के सही स्वरूप का ज्ञान।

कर्मयोग दो शब्दों से मिलकर बना है‘कर्म’ तथा ‘योग’

कर्मयोग के सन्दर्भ ग्रन्थ – गीता, योगवाशिष्ठ एवं अन्य।

1. कर्मों का मनोदैहिक वर्गीकरण :

कर्म से तात्पर्य है कि वे समस्त मानसिक एवं शारीरिक क्रियाएँ । ये क्रियाएँ दो प्रकार की हो सकती है। ऐच्छिक एवं अनैच्छिक। अनैच्छिक क्रियायें वे क्रियाएं हैं जो कि स्वतः होती हैं जैसे छींकना, श्वास-प्रश्वास का चलना, हृदय का धड़कना आदि। इस प्रकार अनैच्छिक क्रियाओं के अन्तर्गत वे क्रियाएँ भी आती हैं जो कि जबरदस्ती या बलात् करवायी गयी हैं। ऐच्छिक क्रियाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

वे क्रियाएँ या कर्म जो कि सोच-समझकर ज्ञानसहित अथवा विवेकपूर्वक किये गये हैं, वे क्रियाएँ या कर्म जो कि भूलवशात् या अज्ञानवशात् अथवा दबाव में किये गये हों। दोनों ही स्थितियों में किसी न किसी सीमा तक व्यक्ति इन क्रियायों के फल के लिये उत्तरदायी होता है। कर्मयोग की व्याख्या में उपरोक्त क्रियाओं के विवेचन के अतिरिक्त कर्मों के अन्य वर्गीकरण को देखना भी आवश्यक होगा।

2. कर्म का प्रयोजन की दृष्टि से वर्गीकरण –

गीता में प्रयोजन का उद्देश्य की दृष्टि से कर्म का विशद् विवेचन किया गया है – इसके अन्तर्गत तीन प्रकार के विशिष्ट कर्मों की चर्चा की गयी है

1. नित्य कर्म

2. नैमित्तिक कर्म

3. काम्य कर्म

नित्य कर्म – वे उत्तम परिशोधक कर्म हैं, जिन्हें प्रतिदिन किया जाना चाहिये। जैसे – शुद्धि कर्म, उपासना परक कर्म आदि।

नैमित्तिक कर्म – वे कर्म हैं, जिन्हें विशिष्टि निमित्त या पर्व को ध्यान में रखकर किया जाता है जैसे विशिष्ट यज्ञ कर्मादि – अश्वमेध यज्ञ, पूर्णमासी यज्ञ(व्रत) आदि।

काम्य कर्म – वे कर्म हैं जिन्हे कामना या इच्छा के वशीभूत होकर किया जाता है इस कामना में यह भाव भी समाहित रहता है कि कर्म का फल भी अनिवार्य रूप से मिले इसीलिये इन्हें काम्य कर्म कहा गया है। चूँकि इनमें फल की अभिलाषा जुड़ी हुयी है अतः यह कर्म ही कर्मफल के परिणाम सुख या दुःख (शुभ या अशुभ) से संयोग कराना वाला कहा गया है। इसीलिये काम्य कर्मों को बन्धन का कारण कहा गया है क्योंकि सुख अपने अनुभूति के द्वारा पुनः वैसे ही सुख की अनुभूति करने वाला कर्म की ओर ले जाता है, इसी प्रकार दुःख ऐसी विपरीत अनुभूति न हो इसके विरूद्ध कर्म कराने वाला बनाता है। इस प्रकार काम्य कर्म के अन्तर्गत किये गये कर्म अपने दोनों ही परिणामों (सुख तथा दुःख) के द्वारा बाँधते हैँ इसीलिये इन्हें बंधन का कारण कहा गया है। इसी काम्य कर्म के सुखद या दुःखद् परिणामों से निषेध के लिये भारतीय योग परम्परा में कर्मयोग की अवधारणा प्रस्तुत की गयी है। इस कर्मयोग को गीता में निष्काम कर्म एवं अनासक्त कर्म के नाम से भी प्रस्तुत किया गया है।

गीता में कर्मयोग

गीता में कर्मयोग स्रोत-ग्रन्थ – “गीता या कर्मयोग रहस्य

“गीता या कर्मयोग रहस्य” नामक ग्रन्थ में बाल गंगाधर तिलक ने गीता का मूलमन्तव्य कर्मयोग ही बतलाया है। जो कि निष्काम कर्म ही है।

निष्काम से तात्पर्य – ‘कामना से रहित या वियुक्त

निष्काम कर्म के सम्बन्ध में गीता का विश्लेषण निम्न मान्यताओं पर आधारित है –

कामना से वशीभूत कर्म करने पर फलांकाक्षा या फल की इच्छा होती है जो कि उनके सुखादुःख परिणामों से बाँधती है। और यह आगे भी पुनः उसी-उसी प्रकार के सुख-दुःख परिणामों को प्राप्त करने की इच्छा या संकल्प को उत्पन्न करती है। अर्थात् वैसे-वैसे ही कर्म में लगाकर रखती है। इन्हें ही संस्कार कहा गया है। ये संस्कार तब तक प्रभावी होते हैं, जब तक या तो फलों को भोग करने की क्षमता ही समाप्त हो जाये (अर्थात् मृत्यु या अक्षमता की स्थिति में) या फलों के भोग से इच्छा ही समाप्त हो जाये (तब अन्तोगत्वा कर्मों को करने की इच्छा ही समाप्त हो जायेगी और इस प्रकार काम्य कर्म ही नहीं होंगे तो फल से भी नहीं बँधेगे)।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि फलों के परिणाम से आसक्ति समाप्त होना उनमें भोग की इच्छा समाप्त होना ही सुख-दुःख के परिणाम या कर्म के बन्धन से छूटना है। इसीपरिप्रेक्ष्य में गीता अपने विश्लेषण से निष्काम कर्म या अनासक्त कर्म की अवधारणा को प्रस्तुत करती है।

गीता में कर्म की सविस्तार चर्चा की गयी है। एवं कर्म की गति गहन बतलायी गयी है – “गहना कर्मणो गति”। कृष्ण कहते हैं – कर्म को भी जानना चाहिये, अकर्म को भी जानना चाहिये, विकर्म को भी जानना चाहिये। इस प्रकार गीता में कर्म के जिन प्रकारों की चर्चा आयी है, वे हैं –

  • कर्म, अकर्म, विकर्म
  • आसक्त एवं अनासक्त कर्म
  • निष्काम कर्म
  • नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य कर्म
निष्काम कर्म या अनासक्त कर्म

निष्काम कर्म या अनासक्त कर्म – निष्काम कर्म वस्तुतः यह बताता है कि किस प्रकार कर्म किया जाय कि उससे फल से अर्थात् कर्म के बन्धन से न बँधे। इसके लिये ही गीता में प्रसिद्ध श्लोक जो कि बारंबार उल्लेखित किया जाता है –

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भू मासङ्गोSस्त्वकर्मणि।।

अर्थात्, “तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में नहीं है, तुम कर्मफले के कारण भी मत बनो तथा कर्मों को न करने (की भावना के साथ) साथ भी मत हो ”।

गीता का उपरोक्त श्लोक कर्मयोग के सिद्धान्त का आधारभूत श्लोक है तथा विभिन्न तत्त्वमीमांसीय आधार(सिद्धान्त) को भी अपने आप में समाहित करता है |

1. गुणों का सिद्धान्त – गीता के अनुसार समस्त प्रकृति सत् रजस् तथा तमस् इन तीनों गुणों की निष्पत्ति है। इसलिये प्रकृति को त्रिगुणात्मक भी कहा गया है। इसी के अनुरूप मानव देह भी त्रिगुत्मक है। इसमें सतोगुण से ज्ञान वृद्धि सुख आनन्द प्रदायक अनुभूति तथा ऐसे ही कार्य करने की प्रेरणा होती है। तथा इन फलों से बाँधने वाले भी ये गुण हैं। इसी प्रकार क्रिया परक, कार्यों को करने की प्रवृत्ति रजो गुण के कारण होती है क्योंकि रजोगुण का स्वभाव ही क्रिया है। इनसे सुख-दुःख की मिश्रित अनुभूति होती है। इस प्रकार की अनुभूति को कराने वाले तथा इनको उत्पादित करने वाले कर्मों में लगाने वाला रजो गुण है। अज्ञान, आलस्य जड़ता अन्धकार आदि को उत्पन्न करने वाला तमोगुण कहा गया है। इससे दुःख की उत्पत्ति एवं अनुभूति होती है। इस प्रकार समस्त दुःखोत्पादक कर्म या ऐसे कर्म जो आरम्भ में सुखद तथा परिमाण में दुःखानुभव उत्पन्न कराने वाले तमोगुण ही हैं – या ऐसे कर्म/ फल तमोगुण से प्रेरित कहे गये हैं। इस प्रकार समस्त फलों के उत्पादककर्ता गुण ही हैं। अहंकार से विमूढ़ित होने पर स्वयं के कर्ता होने का बोध होता है। ऐसी गीता की मान्यता है।

2. अनासक्त तथा निस्त्रैगुण्यता – उपरोक्त विश्लेषण से तीनों ही गुणों के स्वरूप के विषय में यह कहा जा सकता है कि सुख एवं दुःख को उत्पन्न करना तो इन गुणों स्वभाव ही है, और मानव देह भी प्रकृति के इन तीन गुणों के संयोजन से ही निर्मित है, तब ऐसे में स्वयं को सुख-दुःख का उत्पादन कर्ता समझना भूल ही है। ये सुख-दुःख परिणाम या फल हैं, जिनका कारण प्रकृति है। अतः इनमें आसक्त होना (आसक्त-आ सकना गुणों की जगह) ठीक नहीं है। (मा कर्मफल हेतुर्भू – कर्मफल का कारण मत बनो)।

इसी सन्दर्भ में गीता में निस्त्रैगुण्य होने को भी कहा गया है। (निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन)

पुनः क्या कर्म करना बन्द कर दिया जाय ? गीता ऐसा भी नही कहती। क्योंकि गीता की स्पष्ट मान्यता है कि कर्म प्रकृति जन्य तथा प्रकृति के गुणों से प्रेरित हैं। अतः जब तक प्रकृति का प्रभाव, पुरुष पर रहेगा (प्रकृति से पुरुष अपने आप को अलग नही समेझेगा) तब तक गुणों के अनुसार कर्म चलते रहेंगे। उनको टालना संभव नहीं है। ( इसी परिप्रेक्ष्य में गीता में कहा गया है – मा सङंगोsस्तुकर्मणि – अकर्म के साथ भी मत हो)। किन्तु जब ऐसा विवेक (अन्तर को जान सकने की बुद्धि, विभेदन कर सकने की क्षमता) उत्पन्न हो जाये या बोध हो जाये कि समस्त कर्म प्रकृति जन्य हैं, तब कर्मों से आसक्ति स्वंयमेव समाप्त हो जायेगी। ऐसी स्थिति में कर्म, काम्य कर्म नहीं होंगे। तब वे अनासक्त कर्म होंगे। यही आत्म बोध की भी स्थिति होगी क्योंकि आत्मस्वरूप जो कि प्रकृति के प्रभाव से पृथक है का बोध ही विवेक या कैवल्य है, मोक्ष है। इसे ही कर्म योग कहा गया है।

[1] प्रकृतैः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।। – गीता 3 / 27

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।। – गीता 3 / 28

[2] केवल – अकेला, प्रकृति से अलग, आत्म यानि स्वंय, अन्य सभी विकारों से रहित ।

[3] “मुच्यते सर्वै दुःखैर्बंधनैर्यत्र मोक्षः” – जहाँ(जब) सभी दुःख एवं बंधन छूट जाये, वही मोक्ष है।

कर्म योग की उपमा

कर्म योग की उपमा विवेकानन्द दीपक से देते हैं। जिस प्रकार दीपक का जलना एवं या उसके द्वारा प्रकाश का कर्म होना उसमें तेल, बाती तथा मिट्टी के विशिष्ट आकार – इन सभी के विशिष्ट सामूहिक भूमिका के द्वारा संभव होता है। उसी प्रकार समस्त गुणों की सामूहिक भूमिका से कर्म उत्पन्न होते हैं।

फलों की सृष्टि भी गुणों का कर्म है न कि आत्म का । इसी का ज्ञान वस्तुतः कर्म के रहस्य का ज्ञान है, इसे ही आत्म ज्ञान भी कहा गया है। तात्पर्य यह भी है कि संस्कार वशात् उत्तम-अनुत्तम कर्म में स्वतः ही प्रवृत्ति होती है, तथा संस्कारों के शमन होने पर स्वंय ही कर्मों से निवृत्ति भी हो जाती है, ऐसा जानना विवेक ज्ञान भी कहा गया है। ऐसे ज्ञान होने पर ही अनासक्त भाव से कर्म होने लगते हैं, इन अनासक्त कर्मों को ही निष्काम कर्म कहा गया है। इस निष्काम कर्म के द्वारा पुनः कर्मों के परिणाम उत्पन्न नहीं होते। यही आत्म ज्ञान की स्थिति कही गयी है। इससे ही संयोग करने वाला मार्ग “कर्मयोग” कहा गया है। (क्योंकि यह कर्म के वास्तविक स्वरूप से योग करता है।)

उपसंहार

कर्मयोग की अवधारणा कर्म के सिद्धान्त के मूलमन्तव्यों को समाहित कर कर्मों के यथा-तथ्य विश्लेषण को प्रस्तुत करती है। यह पुरातन भारतीय सृष्टि रचना के गुण सिद्धान्त को भी अपने में अन्तर्निहित करता है। इस प्रकार कर्म योग का सिद्धान्त मनोदैहिक विश्लेषण के द्वारा व्यक्ति तथा अस्तित्व अध्यात्मपरक विवेचन को प्रस्तुत करता है।

पंडित श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा दिए गए कर्म योग का सार : 

श्रीमद्भगवदगीता की प्रवृत्ति युद्ध से विरत होते हुए अर्जुन को युद्धरत करने के लिए हुई है और इसमें गीता का ज्ञान सफल रहा है, अतः मानना होगा कि गीता प्रवृत्ति प्रधान ग्रन्थ है। यों तो उसमें निवृत्ति का भी वर्णन है, परन्तु वह गीता का अपना विषय नहीं। अर्थों की खींचतान यदि न की जावे तो गीता को निष्काम कर्म योग परक मानना ही होगा। गीता के प्रवृत्ति प्रधान होने का एक पुष्ट प्रमाण है उसकी यह परम्परा जो भगवान ने बताया है-

इमं विघस्त्रे योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विबस्वान मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे ऽब्रवीत॥

एवं परम्परा प्राप्तमिमं राजर्षयों विदुः।

‘अविनाशी मुझ परमात्मा ने यह (गीता रूपी) योग सूर्य को बतलाया था। सूर्य ने उसका उपदेश मनु को दिया और मनु ने इक्ष्वाकु को। इसी प्रकार परम्परा द्वारा आये इस योग को राजर्षि लोग जानते रहे।’

इस परम्परा में सभी प्रवृत्ति प्रधान क्षत्रिय बताये गये हैं। निवृत्ति प्रधान नारद, सनकादि, दत्तात्रेय प्रभूति को छोड़कर सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु का नाम लिया गया है जो क्षत्रिय वंश के प्रतिष्ठापक एवं कर्मरत नरेश हैं। आगे भी ‘राजर्षियो विदु’ कहा गया है। यह ज्ञान प्रवृत्ति प्रधान राजर्षियों का रहा है। निवृत्ति प्रधान ब्रह्मर्षियों का नहीं। लोक संग्रह के लिये निष्काम होकर राज्य करते हुए, दुष्टों के दमन में तत्पर चक्रवर्ती नरेश इस ज्ञान का आश्रय लेते रहे हैं। इस परम्परा के अतिरिक्त भगवान ने स्थान-स्थान पर स्पष्ट कहा भी है ‘तयोस्तु कर्म संन्यासात कर्मयोगो विशिष्यते’ आदि।

संपूर्ण गीता निष्काम कर्म योग का शास्त्र है। उसमें कर्मयोग के प्रत्येक पहलू पर विशद रूप से विचार किया गया है। लेकिन पूर्वकाल में वर्णन की रीति ‘समास व्यास विधिना’ थी। किसी विषय को प्रथम कहीं थोड़े शब्दों में कह देते थे और पुनः उसी का विस्तार करते थे। भगवान ने इस परम्परा की रक्षा की है। संपूर्ण कर्मयोग को सूत्र रूप से एक श्लोक में बता दिया है। फिर उसी का विस्तार किया गया है। चार सूत्रों में गागर में सागर भर दिया गया है। वह कर्मयोग की चतुःसूत्री है-

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचन।

भा कर्मफल हेतुभूः मा ते संगो ऽस्त्वकर्मणि॥

‘तेरा अधिकार कर्म करने में ही है, फल में कभी नहीं। कर्म फल का कारण मत बन। अकर्म से तेरा साथ न होवे।’

कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कर्म करने में तेरा अधिकार है। कर्मयोग का यह प्रथम सूत्र है। इसमें बतलाया गया है कि जीव कर्म करने में स्वतंत्र है। कर्म करने से उसे कोई रोकता नहीं। मनुष्य योनि की यही विशेषता है कि इस मानव शरीर में आकर स्वेच्छानुसार कर्म कर सकता है। वह अपने उत्थान या पतन का मार्ग यहीं बनाता है। मानव शरीर में किये कर्मों को ही वह देव, दैत्य, पशु, तिर्यकप्रभृति योनियों में भोगता है। गीता में इसके विपरीत दो श्लोक आते हैं-

“ईश्वरः सर्वभूतानाँ हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया॥”

ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता है और अपनी माया में उन्हें यन्त्र पर चढ़े हुए की भाँति घुमाता रहता है।

‘प्रकृतीं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।’

प्राणी मात्र अपने स्वभाव के अनुसार ही बर्ताव करते हैं, वहाँ निरोध कुछ भी नहीं कर सकता।

इस प्रकार के जो वाक्य आये हैं, उनका तात्पर्य यह नहीं कि मनुष्य कर्म करने में परतंत्र है। यदि वह कर्म करने में परतन्त्र हो तो शास्त्रों के समस्त विधि निषेध व्यर्थ हो जावेंगे। क्योंकि व्यवस्था तो स्वतन्त्र के लिए ही बनती है। परतन्त्रता पूर्वक जो कर्म मानव करेगा, उसका फल भागी भी वह नहीं हो सकता। अतएव कर्म करने में मनुष्य को स्वतन्त्र ही मानना होगा। यही बात भगवान ने प्रथम सूत्र से कही। ईश्वर प्राणिमात्र के हृदय में रहता और उन्हें यन्त्रारूढ़ की भाँति घुमाया करता है, तथा जीवमात्र अपनी अपनी प्रकृति के परतन्त्र है, इसको कहने का उद्देश्य मनुष्य कर्म करने में कहाँ तक स्वतंत्र है, इस स्वतन्त्रता की सीमा बतलाना है। कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए भी मानव ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्’ समर्थ तो है नहीं। उसके कर्म स्वातंत्र्य की सीमा है।

प्रत्येक व्यक्ति संसार में किसी न किसी विशेष उद्देश्य से आता है और उसका एक जन्म जात स्वभाव भी होता है। वह उस विशेष उद्देश्य को करते हुए और स्वभाव के अनुसार कर्म करने में समर्थ होता है। उनके विपरीत जाने के लिए वह स्वतन्त्र नहीं। उदाहरण के रूप में अर्जुन को लीजिए, पृथ्वी के भार को दूर करने के विशेष उद्देश्य से उसका जन्म हुआ था। अतएव इस कार्य में वह ईश्वर परतन्त्र हुआ। उसे यह कार्य करना ही होगा। ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता हुआ उन्हें घुमाता रहता है, इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि भगवान उदय में हैं और उन्हीं के प्रकाश से जीव यावत्कर्म करता है। हमारे शरीर के भीतर जितने रक्त के कीटाणु हैं, वे जिस स्थान पर हैं, वहाँ रहने के लिए विवश हैं। कहा जा सकता है कि हमारी शक्ति उनके भीतर है और हमीं उनको संचालित करते हैं। परन्तु वे अपने स्थान पर रहते हुए अपनी चेष्टाओं में स्वतंत्र हैं। ऐसे ही ईश्वर द्वारा नियुक्त स्थान पर रहते हुए, संसार में अपने आने के विशेष उद्देश्य को पूर्ण करते हुए मनुष्य अपनी दूसरी चेष्टाओं में स्वतंत्र है। यही मनुष्य का कर्म स्वातंत्र्य है।

‘प्रकृतीं यान्ति भूतानि’ में जीव को स्वभावतः परतन्त्र बताया गया है। स्वभाव परतन्त्रता से कर्म की स्वतन्त्रता में तो कोई बाधा आती नहीं। इतना अवश्य होता है कि स्वभाव के विपरीत चलने के लिए मनुष्य समर्थ नहीं। एक व्यक्ति का स्वभाव क्रोधी है। अब वह चाहे कि उसे क्रोध न आवे, यह असम्भव नहीं तो कठिनतम अवश्य है। लेकिन क्रोध के उपयोग में तो वह स्वतंत्र है ही। वह पापियों, दुष्टों तथा अपने दुर्गुणों पर क्रोध करके संसार की भलाई एवं अपनी आत्मोन्नति कर सकता है। दुष्टों से मिल कर निरापराधियों पर क्रोध करेगा तो उसका परिणाम उसके लिए घातक होगा। इसी प्रकार के स्वभावों का भला और बुरा उपयोग हो सकता है। स्वभाव के उपयोग में मनुष्य स्वतंत्र है और यही उपयोग उसकी उन्नति या अवनति का कारण होता है, अतः स्वभाव परतन्त्र होते हुए भी वह कर्म करने में स्वतन्त्र है, ऐसा कहने में कोई बाधा नहीं। इसीलिए भगवान ने ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कहा। केवल कर्म में अधिकार है, स्वभाव परिवर्तन या ईश्वर के दिये स्थान परिवर्तन में नहीं।

‘माँ फलेषु कदाचन’ फल में तेरा अधिकार कभी नहीं। यह दूसरा सूत्र है कर्मयोग का। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि एक ही परिस्थिति में, एक ही प्रकार के साधन से, एक ही कर्म के करने वालों में फल भेद होता है। कोई सफल होता है, कोई विफल होता है, कोई किसी अंश में ही सफल होता है और कोई हानि भी उठाता है। अतः उद्योग का फल उद्योग पर निर्भर हो, ऐसी बात नहीं। फल तो प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त होता है। गोस्वामी जी ने कहा है –

‘हानि लाभ जीवन मरण -जस अपजस विधि हाथ।’

कर्म के परिणाम स्वरूप हानि-लाभ, जीवन-मृत्यु यश एवं अपयश ये प्रारब्ध के अनुसार होते हैं। इन्हें प्राप्त करने में हम परतन्त्र हैं। अतः कर्म का यह फल होगा ही या यह फल होना ही चाहिए ऐसा सोच कर कर्म करने वाले सर्वदा दुख पाते हैं। फल भगवान को समर्पित करके कर्तव्य बुद्धि से कर्म करना चाहिए। फलासक्ति ही सर्वदा कष्ट देती है। यदि फल आसक्ति छोड़ दी जावे तो फिर कष्ट क्यों हो। जिसमें अपना अधिकार नहीं, उसमें आसक्ति करके कष्ट तो भोगना ही पड़ेगा।

तीसरे सूत्र में कहा गया ‘मा कर्मफल हेतु र्भूः’ कर्म फल के कारण मत बनो ! कर्म करने पर उसका अच्छा या बुरा, पूरा या अधूरा कुछ न कुछ फल तो होता ही है। वह फल मेरे कर्म से, मेरे उद्योग से हुआ है ऐसा मत समझो। क्योंकि कर्म फल का कारण केवल उद्योग तो है नहीं।

“अधिष्ठानं तथा कर्ताकरणं च पृथग्विधम।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥

शरीवाँमनोभिर्यर्त्कम प्रारभते नरः।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचेते तस्य हेतवः॥

तत्रैवं सति कर्तारंमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न। स पश्यति र्मदुतिः॥”

अधिष्ठान (कर्म का जो आधार है) कर्ता (करने वाले की शक्ति और योग्यता) नाना प्रकार की सामग्रियाँ (जो उपयोग में आती हैं, उनकी अच्छाई बुराई) विविध प्रकार की भिन्न-भिन्न चेष्टा (जितनी तत्परता से और ठीक समय पर हो) तथा प्रारब्ध (जैसा अनुकूल या प्रतिकूल हो) ये पाँच उन सब उचित और अनुचित कर्मों के कारण होते हैं जो मनुष्य शरीर से, मन से अथवा वाणी से प्रारम्भ करता है। अज्ञता वह जो कर्मों में केवल अपने को कारण मानता है, वह दुर्बुद्धि ठीक नहीं समझता।

‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ता ऽहमिति मन्यते॥’

सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किये जाते हैं, केवल अहंकार से मूढ़ बुद्धि हुआ पुरुष अपने को कर्ता समझता है। यह कर्ता समझना ही बंधन का हेतु है। जब पुरुष अपने को कर्ता मान लेता है, कर्म फल को अपने उद्योग का फल मानता है तो वह उसके पाप-पुण्य का भागी होकर संसार चक्र में भटकता रहता है। कर्तापन का यह अभिमान ही उसे पाप-पुण्य से युक्त करता है। अन्यथा-

“गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।”

त्रिगुण अपने गुणों में ही बर्ताव कर रहे हैं, ऐसा समझ कर उनके द्वारा किये कर्मों से संसक्त नहीं होता।

‘यस्य नाहंकृतोभावों बुद्धिर्यस्य न लिप्यति।

हत्वाऽपि स इमान्लोकानहन्ति न निबध्यते॥’

‘मैंने यह कार्य किया है’ ऐसा अहंभाव जिसमें नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म में लिप्त नहीं होती, वह त्रिभुवन के संहार के सदृश घोर कर्म करे तो भी न तो वह हत्यारा होता और न उसे उस कर्म से बंधन होता। भगवान शंकर इसके साक्षात उदाहरण भी है। संपूर्ण विश्व का प्रलय करके भी वे शिव कल्याण स्वरूप ही रहते हैं।

बात यह है कि कर्म में अहंकार व्यक्ति से पाप कराता है। पाप सर्वदा भोगेच्छा या स्वार्थ बुद्धि से होते हैं, ऐसे ही सकाम पुण्य कर्म भी अहंकार युक्त और यशादि की इच्छा से ही होते है। जिसमें अहंभाव नहीं है, उससे न तो पाप हो सकते है और न सकाम पुण्य। वह केवल अपने स्वभाव के अनुसार उस कर्म को करेगा, जिस कर्म विशेष के लिए विश्वनियन्ता ने उसे भेजा है। उसके द्वारा जो भी कर्म होता है, वह विश्वकर्ता की इच्छा ही से होता है। अतः वह उस कर्म के फल से क्यों संसक्त होने लगा। फल से तो संसर्ग तभी होता है जब उस फल में आसक्ति हो। मैंने उसे प्रकट किया है, ऐसा अहंकार हो अतएव भगवान इस अहंकार से जो कि मिथ्याहंकार है, सावधान करते हैं ‘मा कर्मफल हेतु र्भूः’ कर्मफल को अपने उद्योग का फल समझ उसके कारण मत बनो ! यह तो प्रारब्ध की देन है, भगवान का प्रसाद है।

सदगुरु जग्गी वासुदेव के अनुसार कर्म योग की व्याख्या :  

ज्यादातर लोग बिना सहारे के नहीं चल सकते। कुछ लोग ही ऐसे होते हैं, जो शुरु से ही बिना सहारे के चल सकते हैं। इसलिए साधना को सही तरीके से संतुलित करने के लिए कर्म योग को आपके जीवन में लाया गया है।

योग के लिए कर्म की जरूरत नहीं है। कर्म से परे जाना योग है। इंसान में संतुलन लाने के लिए कर्म योग की शुरुआत की गई। जिसे हम अपनी जागरूकता, प्रेम, अनुभव या सत्य की झलक कहते हैं, अगर उसे बनाए रखना है तो कुछ नहीं करने का मार्ग बहुत बढिय़ा मार्ग है।

किसी ऐसे काम को पूरी भागीदारी के साथ करना, जो आपके लिए कोई मायने नहीं रखता, कर्म के ढांचे को तोड़ता है।

मगर वह बहुत फि सलन भरा और अस्थिर है। सचमुच बहुत ही फि सलन भरा है। यह सबसे आसान और सबसे मुश्किल रास्ता है। यह मुश्किल नहीं है मगर पूरी तरह आसान भी नहीं है, क्योंकि यह सरल है – अभी और यहीं। मगर इस ‘अभी और यहीं’ को कैसे पाएं? आप जो भी करते हैं, वह आपके हाथ में नहीं है। वह कभी आपके हाथ में नहीं होगा। मगर आपके हाथों को अभी किसी चीज की जरूरत है, आपको कुछ पकडऩे की जरूरत है। इसीलिए आपको कर्म योग का सहारा दिया गया है।

ज्यादातर लोग बिना सहारे के नहीं चल सकते। कुछ लोग ही ऐसे होते हैं, जो शुरु से ही बिना सहारे के चल सकते हैं। वे बहुत असाधारण जीव होते हैं। बाकी हर किसी को अपनी जागरूकता को संभालने के लिए सहारे की जरूरत होती है। इसके बिना, ज्यादातर लोग जागरूक नहीं रह सकते। इसलिए साधना को सही तरीके से संतुलित करने के लिए कर्म योग को आपके जीवन में लाया गया है।

कर्म – मुक्त करता है या उलझाता है

कर्म योग को दुर्भाग्यवश सेवा कहा जाता है, मगर ऐसा नहीं है। यह उन प्रभावों को खत्म करने का तरीका है, जो आपने जमा कर रखे हैं। अगर आप किसी क्रियाकलाप में खुद को खुशी से शामिल करते हैं, तो यह कर्म योग है। अगर आप उसे बहुत प्रयास के साथ करते हैं तो सिर्फ कर्म घटित होगा, योग नहीं।

आम तौर पर आप अपने तमाम कार्यकलापों से ही जीवन में फंसते और उलझते हैं। मगर जब वही कार्यकलाप उलझाव की जगह मुक्ति की प्रक्रिया बन जाए, तो उसे कर्म योग कहते हैं। चाहे वह कोई काम हो या सिर्फ  सडक़ पर टहलना हो या किसी से बातचीत करना हो, आप क्या करते हैं, यह अहम नहीं है। जब आप किसी चीज को सिर्फ  इसलिए करते हैं क्योंकि उसे किए जाने की जरूरत है, जहां वह काम आपके लिए कोई मायने नहीं रखता मगर आप खुद को उसमें इस तरह शामिल कर देते हैं मानो वह आपका पूरा जीवन हो, तो वह काम आपको रूपांतरित कर देता है और वह क्रियाकलाप आपके लिए मुक्तिदायक बन जाता है।

भरपूर भागीदारी

ऐसे बहुत से गुरु रहे हैं जिन्होंने इस तरह के काम कराए। जब गुरजिएफ ने यूरोप में अपने सेंटर शुरू किए, तो यूरोप का कुलीन वर्ग उनके पास गया। सुबह वह उन्हें एक कुदाल और खुरपे देकर कहते ‘बड़े गड्ढे खोदो।’ वे लोग कड़ी धूप में खड़े होकर मिट्टी खोदते। ये ऐसे लोग थे जिन्हें किसी तरह की मेहनत की आदत नहीं थी। कुछ घंटे काम करने के बाद ही उन्हें हर जगह छाले हो जाते। वह वहां खड़े होकर उनसे काम करवाते रहते।

कर्म योग को दुर्भाग्यवश सेवा कहा जाता है, मगर ऐसा नहीं है। यह उन प्रभावों को खत्म करने का तरीका है, जो आपने जमा कर रखे हैं।

देर शाम तक, उन्हें भूख लग आती मगर वे काम करते रहते और खाइयां खोदते रहते। फि र गुरजिएफ  घड़ी देखते हुए कहते, ‘ठीक है, सात बज गए हैं। लगता है कि डिनर का समय हो गया है। आप सब डिनर पर चलने से पहले इन गड्ढों को भर दीजिए।’ यह होता था पूरे दिन का काम!

“किसी ऐसे काम को पूरी भागीदारी के साथ करना, जो आपके लिए कोई मायने नहीं रखता, कर्म के ढांचे को तोड़ता है। अगर अपने क्रियाकलाप को योग बनना है, तो उसे मुक्ति प्रदान करने वाला होना चाहिए। अगर आपका कार्य आपके लिए बंधन की एक प्रक्रिया बन गया है, तो वह कर्म है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि आप कितना काम करते हैं। आप उस काम को कैसे करते हैं, इससे फर्क पड़ता है। अगर आप घिसट-घिसट कर अपना काम कर रहे हैं, तो वह कर्म है। अगर आप मजे-मजे में नाचते-गाते हुए अपना काम कर रहे हैं, तो वह कर्म योग है।”

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Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

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