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जीवन और जगत्‌ को कर्मों की सुगंध से भरते चलो

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हमारे कर्म हों भगवान के निमित्त

यह बात सबको हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि परमेश्वर की पूजा अपने कर्म से करनी चाहिए। हमारा प्रत्येक कर्म भगवान के निमित्त हो। कर्म करने से पहले यह सोचो कि क्या यह कर्म भगवान को प्रसन्न करेगा ? किसी की निंदा अथवा हिंसा से परमात्मा खुश होंगे? हमारे ऋषियों व संतों ने संवेदनशीलता के साथ बहुत गहराई से अच्छे कर्मों के बारे में चिंतन किया है।

उनके अनुसार पुण्य और पाप कर्मों की हमारी जो समझ है, उसमें हिंसा करना पाप है। झूठ बोलना पाप है, बेईमानी करना पाप है और तो और पापों की जो सूची है, उसमें हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण का भी ख्याल रखा है। इस सूची में वृक्षों की अकारण कटाई को भी पाप माना गया है।

आजकल बड़े जोर-शोर से पर्यावरण की बातें हो रही हैं। मगर हमारे ऋषि-मुनि जैसे पर्यावरणवादी कोई नहीं हुए। ऋषि कहते हैं कि अरे, वृक्ष ने तेरा क्या बिगाड़ा ? अकारण उसको क्यों काट रहा है? वह खुद तो धूप सहता है और तुझे छाया देता है। उसके फल, पत्ते, फूल सभी तो तेरे लिए हैं। तुझ पर उसके अनगिनत उपकार हैं। वृक्ष सूखने के बाद भी तेरे बड़े काम आएंगे। जीवन को सुखमय बनाने के लिए तू उसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाएगा, मकान बनाएगा। इसलिए अकारण उसको मत काट।

वनस्पति में भी जीव है। उसका अस्तित्व संवेदना से भरा पड़ा है। प्रयोगों से साबित हो चुका है कि बाग-बगीचे में खड़े पेड़-पौधों को जब मालिक काटने लगता है, उस समय यंत्र से नापा गया है कि पेड़-पौधे कांपने लगते हैं। वे भयभीत हो जाते हैं। जिस तरह से किसी विपरीत स्थिति में मनुष्य डर जाता है, वैसी ही प्रतिक्रिया माली जब पेड़ की डाली काटने लगता है, उस पेड़ की होती है। तो देखिए, यह कितनी विचारशील संवेदना है।

विचारशील होना और संवेदनशील होना- दो अलग-अलग बातें हैं । असल में इनमें बहुत सूक्ष्म भेद है। विचारशील संवेदना करुणा पैदा करती है। और विचारहीन संवेदना खतरे न्योतती है। विचारहीन संवेदनशीलता किसी काम की नहीं है। मनुष्य के हृदय परिवर्तन के लिए विचारशीलता और संवेदनशीलता, दोनों का समन्वय जरूरी है। ऐसा ऋषि-मुनियों ने कहा है। मनुष्य संवेदनशील ही नहीं, बल्कि विचारवान और प्रज्ञावान भी हो।

इनका समन्वय करके जो कहा जाएगा, लिखा जाएगा, किया जाएगा, वह कर्म सामने वाले के जीवन को केवल छू ही नहीं लेता, बदल भी डालेगा। इस बात पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है कि इंसान का विकास तभी संभव है, जब उसकी विचारशीलता संवेदनशीलता पर टिकी हो। इसलिए कह सकते हैं कि कोई निर्णय करने में दिल और दिमाग दोनों की जरूरत है। दोनों में संतुलन जरूरी है।

जब विचार और भावना का संतुलन करके तुम कर्म करोगे तो तुम्हारे भीतर एक तरह की हार्मनी (ताल, लय) पैदा होगी और तुम्हारा जीवन प्रेम और संगीत से भर जाएगा। प्रेम और संगीत के समन्वय से तुम्हारे जीवन में शांति रहेगी, आनंद रहेगा, मस्ती रहेगी। फिर जीवन बोझ नहीं रह पाएगा।

तब तुम खिले हुए गुलाब की भांति मुस्कराओगे, उन्नति और विकास की ओर अग्रसर होगे और सच मानिए, यही धर्म है। यदि हमारे जीवन में न संगीत होगा, न खुशी, न मस्ती और न मुस्कराहट होगी, तो फिर हम जो भी कर रहे हैं, जैसा भी कर रहे हैं, तो वह सब अधर्म के समान है।

इसलिए श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि अपने कर्म को भगवान से युक्त होकर करो। तदर्थ कर्म परमात्मा को निमित्त बनाकर करो। इसलिए सबसे पहले विचार करो कि क्या मेरे इस कर्म से भगवान प्रसन्न होंगे ? मैं किसी की निंदा करूंगा, किसी का बुरा चाहूंगा, किसी को नीचा दिखाने, गिराने की भावना रखूंगा, हिंसा करूंगा तो भगवान प्रसन्न होने वाले नहीं हैं, इसलिए पहले यह सोचो कि मेरा कर्म भगवान को प्रसन्न करने वाला है कि नहीं? दूसरी बात यह करो कि जो कर्म करो, वह संग यानी आसक्तियों से मुक्त होकर करो। इस तरह तुम्हारा जीवन सफल हो सकेगा, धन्य हो सकेगा।

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