योगासन

योगासन पार्ट 1 | अनुलोम विलोम | कपल भाटी | प्राणायाम

Mayurasana

 

 

मयूरासन

इस आसन में मयूर अर्थात मोर की आकृति बनती है, इससे इसे मयूरासन कहा जाता है।

ध्यान मणिपुर चक्र में। श्वास बाह्य कुम्भक।

Mayurasana

विधिः जमीन पर घुटने टिकाकर बैठ जायें। दोनों हाथ की हथेलियों को जमीन पर इस प्रकार रखें कि सब अंगुलियाँ पैर की दिशा में हों और परस्पर लगी रहें। दोनों कुहनियों को मोड़कर पेट के कोमल भाग पर, नाभि के इर्दगिर्द रखें। अब आगे झुककर दोनों पैर को पीछे की लम्बे करें। श्वास बाहर निकाल कर दोनों पैर को जमीन से ऊपर उठायें और सिर का भाग नीचे झुकायें। इस प्रकार पूरा शरीर ज़मीन के बराबर समानान्तर रहे ऐसी स्थिति बनायें। संपूर्ण शरीर का वजन केवल दो हथेलियों पर ही रहेगा। जितना समय रह सकें उतना समय इस स्थिति में रहकर फिर मूल स्थिति में आ जायें। इस प्रकार दो-तीन बार करें।

लाभ : मयूरासन करने से ब्रह्मचर्य-पालन में सहायता मिलती है। पाचन तंत्र के अंगों की रक्त का प्रवाह अधिक बढ़ने से वे अंग बलवान और कार्यशील बनते हैं। पेट के भीतर के भागों में दबाव पड़ने से उनकी शक्ति बढ़ती है। उदर के अंगों की शिथिलता और मन्दाग्नि दूर करने में मयूरासन बहुत उपयोगी है।

 

अनुलोम विलोम प्राणायाम

अनुलोम –विलोम प्रणायाम में सांस लेने व छोड़ने की विधि को बार-बार दोहराया जाता है। इस प्राणायाम को 'नाड़ी शोधक प्राणायाम' भी कहते है।

अनुलोम-विलोम को रोज करने से शरीर की सभी नाड़ियों स्वस्थ व निरोग रहती है। इस प्राणायाम को हर उम्र के लोग कर सकते हैं। वृद्धावस्था में अनुलोम-विलोम प्राणायाम योगा करने से गठिया, जोड़ों का दर्द व सूजन आदि शिकायतें दूर होती हैं।

Anulom Vilom Pranayam

विधि :  दरी व कंबल स्वच्छ जगह पर बिछाकर उस पर अपनी सुविधानुसार पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठ जाएं। फिर अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दाएं छिद्र को बंद कर लें और नासिका के बाएं छिद्र से सांस अंदर की ओर भरे और फिर बायीं नासिका को अंगूठे के बगल वाली दो अंगुलियों से बंद कर दें। उसके बाद दाहिनी नासिका से अंगूठे को हटा दें और सांस को बाहर निकालें। अब दायीं नासिका से ही सांस अंदर की ओर भरे और दायीं नाक को बंद करके बायीं नासिका खोलकर सांस को 8 की गिनती में बाहर निकालें। इस क्रिया को पहले 3 मिनट तक और फिर धीरे-धीरे इसका अभ्यास बढ़ाते हुए 10 मिनट तक करें। 10 मिनट से अधिक समय तक इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। इस प्रणायाम को सुबह-सुबह खुली हवा में बैठकर करें।

लाभ : 1. इससे शरीर में वात, कफ, पित्त आदि के विकार दूर होते हैं।

2. रोजाना अनुलोम-विलोम करने से फेफड़े शक्तिशाली बनतेहैं।

3. इससे नाडियां शुद्ध होती हैं जिससे शरीर स्वस्थ, कांतिमय एवं शक्तिशाली बनता है।

4. इस प्रणायाम को रोज करने से शरीर में कॉलेस्ट्रोल का स्तर कम होता है।

5. अनुलोम-विलोम करने से सर्दी, जुकाम व दमा की शिकायतों में काफी आराम मिलता है।

6. अनुलोम-विलोम से हृदय को शक्ति मिलती है।

7. इस प्राणायाम के दौरान जब हम गहरी सांस लेते हैं तो शुद्ध वायु हमारे खून के दूषित तत्वों को बाहर निकाल देती है। शुद्ध रक्त शरीर के सभी अंगों में जाकर उन्हें पोषण प्रदान करता है।

8. अनुलोम-विलोम प्राणायाम सभी आयु वर्ग के लोग कर सकते हैं और सुविधानुसार इसकी अवधि तय की जा सकती है।

सावधानियां : कमजोर और एनीमिया से पीड़ित रोगियों को इस प्राणायाम के दौरान सांस भरने व छोड़ने में थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। कुछ लोग समय की कमी के चलते जल्दी-जल्दी सांस भरने और निकालने लगते हैं। इससे वातावरण में फैला धूल, धुआं, जीवाणु और वायरस, सांस नली में पहुंचकर अनेक प्रकार के संक्रमण को पैदा कर सकते है। प्राणायाम के दौरान सांस की गति इतनी सहज होनी चाहिए। प्राणायाम करते समय स्वयं को भी सांस की आवाज नहीं सुनायी देनी चाहिए।

 

कपाल भाति प्राणायाम

यह सांस लेने संबंधी प्राणायाम का ही एक रूप है जो शरीर में ऑक्सिजन ले जाने और पेट की पेशियों को मज़बूत करने का काम करता है। यह पेट की चर्बी को कम करता है और पाचन शक्ति को दुरुस्त करता है।

Kapal Bhati Pranayam

विधि : कपाल भाति प्राणायाम करने के लिए रीढ़ को सीधा रखते हुए किसी भी ध्यानात्मक आसन,सुखासन या फिर कुर्सी पर बैठिए। इसके बाद तेजी से नाक के दोनों छिद्रों से सांस को यथासंभव बाहर फेंकिए। साथ ही पेट को भी यथासंभव अंदर की ओर संकुचित करे। तत्पश्चात तुरन्त नाक के दोनों छिद्रों से सांस को अंदर खीचते है और पेट को यथासम्भव बाहर आने देते है। इस क्रिया को शक्ति व आवश्यकतानुसार50 बार से धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 500 बार तक कर सकते है, किन्तु एक क्रम में 50 बार से अधिक न करे। क्रम धीरे-धीरे बढ़ाएं। कम से कम 5 मिनट एवं अधिकतम 30 मिनट। इस तरह सांस लेने के बाद आप शुरुआत में आप पेट की पेशियों के आस-पास सूजन सा महसूस करेंगे पर परेशान न हों, ये तात्कालिक व सामान्य है।

सावधानी :  अगर आप उच्च रक्तचाप के मरीज़ हैं या हार्निया अथवा ह्रदय संबंधी मर्जों से जूझ रहे हैं तो यह आसन न करें।

 

मलासन

मल+आसन अर्थात मल निकालते वक्त हम जिस अवस्था में बैठते हैं उसे मलासन कहते हैं। बैठने की यह स्थति पेट और पीठ के लिए बहुत ही लाभदायक रहती है। मलासन की एक अन्य विधि भी है, लेकिन यहां सामान्य विधि का परिचय।

विधि : दोनों घुटनों को मोड़ते हुए मल त्याग करने वाली अवस्था में बैठ जाएं। फिर दाएं हाथ की कांख को दाएं और बाएं हाथ की कांख को बाएं घुटने पर टिकाते हुए दोनों हाथ को मिला दें (नमस्कार मुद्रा)। उक्त स्थिति में कुछ देर तक रहने के बाद सामान्य स्थिति में आ जाएं।

लाभ : मलासन से घुटनों, जोड़ों, पीठ और पेट का तनाव खत्म होकर उनका दर्द मिटता है। इससे कब्ज और गैस का निदान भी होता है।

 

वृश्चिकासन

वृश्चिक का अर्थ है बिच्छू। इस आसन को करने में व्यक्ति की आकृति किसी बिच्छू के समान हो जाती है इसीलिए इसे वृश्चिकासन कहते हैं। इस योग आसन को शुरुआत में करना कठिन है। अभ्यास के बाद यह सरल ही लगता है।

विधि : किसी दीवार के पास समतल भूमि पर नर्म आसन बिछाएं। फिर दोनों हाथों में कुछ अंतर रखते हुए उनकी हथेलियों को कोहनियों सहित भूमि पर टिका दें। दूसरी ओर दोनों घुटनों को भूमि पर टिकाकर किसी चौपाए की तरह अपनी आकृति बना लें। इस स्थित में आपका मुंह दीवार की ओर रहेगा।

अब सिर को हाथों के बीच टिकाकर पैरों को ऊपर ले जाकर सीधा करते हुए घुटनों से मोड़कर दीवार से टीका दें। अर्थात कोहनियों और हथेलियों के बल पर शीर्षासन करते हुए दोनों पैरों के पंजों को दीवार पर टिका दें।

अब सिर को उठाने का प्रयत्न कर दीवार को देखने का प्रयास करें। दूसरी ओर पैरों को दीवार के सहारे जहां तक संभव हो नीचे सिर की ओर खसकाते जाएं। 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहने के बाद पुन: सामान्य अवस्था में लौट आएं।

वृश्चिकासन की पूर्ण स्थिति में पैरों के पंजे सिर पर टिक जाते हैं। आप इसे दीवार के सहारे शीर्षासन करते हुए भी कर सकते हैं। इससे यह आसन करना आसान होगा।

अवधि/दोहराव : आप इस आसन की स्थिति में 20 से 30 सेकंड तक रह सकते हैं। और, इसे सिर्फ 2 बार ही करें।

लाभ : इस आसन को करने से कोहनी, रीढ़, कंधे, गर्दन, छाती और पेट में खिंचाव होता है। शीर्षासन और चक्रासन से जो लाभ मिलता है वही लाभ इस आसन को करने से भी मिलता है।

यह आसन पेट संबंधित रोग को दूर कर भूख बढ़ाता है। इसके अभ्यास से मूत्र संबंधित विकार भी दूर हो जाते हैं। खासकर यह चेहरे को सुंदरता प्रदान करता है। इसके नियमित अभ्यास से मुख की कांति बढ़ जाती है।

सावधानी : इस आसन का अभ्यास धैर्य पूर्वक करें। जिन लोगों को ब्लडप्रेशर, टीबी, हृदय रोग, अल्सर और हर्निया जैसे रोग की शिकायत हो, वे यह आसन न करें।

 

कुंभकासन

यह आसन करने में भले ही आसान हो पर इसे योग के सबसे असरदार आसनों में से एक माना जाता है। ये आपकी बांहों, कन्धों, पीठ, पुष्टिकाओं, जंघाओं को मज़बूत करता है। और शरीर में मज़बूत एब्स के लिए यह आसन बेहतरीन है।

Kumbhkasana

सावधानी : अगर आपकी पीठ या कन्धों में चोट हो या आप उच्च रक्तचाप के शिकार हों तो यह आसन न करें। विधि :  चटाई पर पेट के बल लेट जाएं। अब अपनी हथेलियों को अपने चेहरे के आगे रखें और पैरों को इस तरह मोड़ें कि पंजे जमीन को धकेल रहे हों। अब हाथ को आगे की तरफ पुश करें और अपनी पुष्टिका को हवा में उठाएं। आपके पैर ज़मीन से यथासंभव सटे होने चाहिए और गर्दन ढीली होनी चाहिए। इसे अधोमुख स्वानासन के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ तक पहुँचने के बाद सांस अन्दर लें और अपने धड़ को इस तरह नीचे ले जाएं कि आपकी बांहों का बल ज़मीन पर लग रहा हो ताकि आपकी छाती और कंधे सीधा उन पर टिके हों। इस मुद्रा में तब तक रहें जब तक सहज हो। आसन से बाहर आने के लिए सांस छोड़ें और आराम से शरीर को फर्श पर लेटने दें।

 

सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है। यह अकेला अभ्यास ही साधक को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। 'सूर्य नमस्कार' स्त्री, पुरुष, बाल, युवा तथा वृद्धों के लिए भी उपयोगी बताया गया है। प्रत्येक स्थिति के लिए एक मंत्र बताया गया है | सूर्य नमस्कार का अभ्यास बारह स्थितियों में किया जाता है, जो निम्नलिखित है-

१) प्रार्थनासन : दोनों पैर एक-दूसरेसे सटाए रखें । दोनों हाथ छातीके मध्य में नमस्कारकी स्थिति में सीधे जुडे हों । गर्दन तनी हुई व दृष्टि सामने हो । नेत्र बंद करें। ध्यान 'आज्ञा चक्र' पर केंद्रित करके 'सूर्य भगवान' का आह्वान 'ॐ मित्राय नमः' मंत्र के द्वारा करें।

Pranamasana

२) ताडासन : दोनों ही हाथोंको ऊपरकी दिशामें ले जाते हुए थोडासा पीछेकी ओर नमस्कारकी स्थितिमें तानकर (कोहनी मोडे बिना) रखें । गर्दन दोनों हाथोंके बीचमें रखकर कमरमें पीछेकी ओर थोडा झुवें । दृष्टि ऊपरकी दिशामें स्थिर रखें । ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करके 'सूर्य भगवान' का आह्वान ' ॐ रवये नमः' मंत्र के द्वारा करें।

Tarasana

३) उत्तानासन : सामने झुकते हुए हाथ धीरे-धीरे भूमि की दिशामें ले जाएं । तत्पश्चात् कमर से झुककर खडे रहें । दोनों हथेलियोंको पैरों के पाश्र्व में भूमि पर टिकाकर घुटने मोडे बिना मस्तक (कपाल) को घुटनों से स्पर्श कराने का प्रयास करें । ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए 'ॐ सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें।

Uttanasana

४) एकपाद प्रसरणासन : इस स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाते हुए 'ॐ भानवे नमः' का जाप करे । मुखाकृति सामान्य रखें।

Ek Padhprasaranasan

५) अधोमुखश्वानासन : श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित कर 'ॐ खगाय नमः' का जाप करें।

Parvatasana

६) अष्टांगासन : श्वास भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा पृथ्वी पर लगा दें। नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें। श्वास छोड़ दें। ध्यान को 'अनाहत चक्र' पर लगते हुए 'ॐ पूष्णे नमः' का जाप करे । श्वास की गति सामान्य करें।

Ashtanagasana

७) भुजंगासन : इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। गर्दन को पीछे की ओर ले जाएँ। घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहें। मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को लगा कर 'ॐ हिरण्यगर्भाय नमः' का जाप करे |

Bhujangasana

८) अधोमुखश्वानासन : पाचवी स्थिति की तरह श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित कर 'ॐ मरिचये नमः' का जाप करे |

९) एकपाद प्रसरणासन : यह स्थिति भी चौथी स्थिति की तरह ही है परन्तु बाये पैर के स्थान पैर दाए पैर को पीछे ले जाये | छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाएँ तथा 'ॐ आदित्याय नमः ' का जाप करे । मुखाकृति सामान्य रखें।

१०) उत्तानासन : तीसरी स्थिति की तरह श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए 'ॐ सवित्रे नमः ' जाप कर कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।

११) ताडासन : दूसरी स्थिति की भाति श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करते हुए 'ॐ अर्काय नमः ' का जाप करे ।

१२) प्रार्थनासन : प्रथम स्थिति की तरह दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों। नेत्र बंद करें। ध्यान 'आज्ञा चक्र' पर केंद्रित करके 'सूर्य भगवान' का आह्वान 'ॐ भास्कराय नमः' मंत्र के द्वारा करें।

अंत में 'ॐ श्री सवितृसूर्यनारायणाय नमः' का जाप करे |

लाभ : सूर्य नमस्कार अत्यधिक लाभकारी है। इसके अभ्यास से हाथों और पैरों का दर्द दूर होकर उनमें सबलता आती है। गर्दन, फेफड़े तथा पसलियों की माँसपेशियाँ सशक्त हो जाती हैं, शरीर की फालतू चर्बी कम होकर शरीर हल्का-फुल्का हो जाता है।

सूर्य नमस्कार के द्वारा त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं अथवा इनके होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इस अभ्यास से कब्ज आदि उदर रोग समाप्त हो जाते हैं और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है। इस अभ्यास के द्वारा हमारे शरीर की छोटी-बड़ी सभी नस-नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती हैं, इसलिए आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार दूर हो जाते हैं।

सावधानी : कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न यह योग न करें। सूर्य नमस्कार की तीसरी व पाँचवीं स्थितियाँ सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं। कोई गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह से ही सूर्य नमस्कार करें।

पादांगुष्ठासन

इस आसान में शरीर को पैर की उंगलियो पर स्थिर रखा जाता है इसीलिए इसे पादांगुष्ठासन कहेते है |

Padangushthasana

विधि : दोनों पैर के बिच एक फुट का अंतर रखके खड़े रहे | पैर के पंजे ऊपर बैठे | दोनों घुटनों को आगे लेते हुए जमीं पर टिकाये, यहाँ शरीर का वजन दोनों घुटने एवं पैर की उंगलियो पर आएगा | दांये पैर की एडी को दोंनो नितंब के बिच में योनिस्थान में स्थित करे | अब दांये पैर को उठाकर बांये पैर की जांघ पर रखे, यहाँ शरीर का वजन एक पैर के एक घुटने पर और पैर की उंगलियो पर स्थिर रहेगा | दोनों हाथो की नमस्कार मुद्रा बनाये | प्राप्त पादान्गुष्ठासन की स्थिति को कुछ सेकेण्ड तक बनाये रखे | विपरीत क्रम से आसन की स्थिति को छोड़े | आसन के दो से तीन आवर्तन करे | पैरों के स्थान बदलकर आसन को दोहराए |

कुक्कुटासन

Kukkutasana

विधि : कुक्कुटासन के लिए पदमासन में बैठिए | इस स्थिति में दोनों पैरों की एड़ियाँ मिलाने का प्रयास करें या फिर पैरों के तलवे को जंघा से ज़्यादा से ज़्यादा ऊपर की ओर रखें | इस स्थिति में बारी-बारी से अपने दोनों हाथों को पैरों की पिंडली और जंघा के बीच से बाहर निकालिए | बाजू को कोहनी तक बाहर निकालने का प्रयास करें |

अब हथेलियों को ज़मीन पर रखिए, उंगलियों का रुख़ आगे की ओर हो | अपने शरीर का भार हाथों पर लाते हुए शरीर को पैरों सहित ज़मीन को थोड़ा ऊपर उठाइए | नज़र सामने और बाजू की सीध में रखें |

सावधानी : इस अवस्था में रीढ़ को सीधा रखने का प्रयास करें | कंधों और छाती में भी खिंचाव महसूस किया जा सकता है | इस अवस्था में जितनी देर संभव हो रुकें, फिर साँस छोड़ते हुए वापस ज़मीन पर आ जाइए |

धीरे से अपनी बाजू, हथेली को बाहर निकलें और पैरों को सामने की ओर फैलाएँ | पूरे शरीर को ढ़ीला छोड़ दें और साँस को सामान्य कर लें |

विशेष : जिनके बाजू में चोट आई हो या फिर माँसपेशियाँ इतनी मज़बूत न हों कि शरीर का भार सहन कर सकें, उन्हें ये आसन नहीं करना चाहिए |

आप चाहें तो पैरों की स्थिति बदलकर फिर से पदमासन लगाएँ और कुक्कुटासन को एक बार फिर से दोहराएँ |

ख़्याल रखें कि हाथों के बल शरीर और पैरों को उठाते हुए साँस छोड़ें | जब तक आप रुकें साँस को सामान्य कर लें और वापस आते हुए भी साँस बाहर निकालें |

इस आसन के अभ्यास से बाजू और कंधों की शक्ति बढ़ती है | यानी बाजू की पेशियों में बल आता है और कंधे मज़बूत बनते हैं | छाती और फेफड़ों में खिंचाव आता है |

जो दुबले और कमज़ोर दिखते हों उन्हें आंतरिक बल बढ़ाने के लिए ये आसन करना चाहिए |

कुक्कुटासन के अभ्यास से आपके शरीर और मन में स्थिरता एवं संतुलन का भाव जागृत होता है, सजगता बढ़ती है और आप पहले से अधिक एकाग्र हो जाते हैं |

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