कबीरा गरब न कीजिए ऊंचा देख निवास

अनमोल वचन – कबीरा गरब न कीजिए ऊंचा देख निवास

पुराने समय में हमारे पूर्वजों की धारणा थी कि ईश्वर ने ही उनके भाग्य का बंटवारा किया है। धर्म के विरुद्ध एक शिकायत यह रही है कि वह लोगों को डरपोक, दीनहीन और परलोकवादी बनाता है। यदि लोगों को चुस्त-दुरुस्त और ओजस्वी बनाना है तो भी धर्म उनके आड़े आता है, क्योंकि धर्म शरीर की नहीं, आत्मा की चर्चा करता है। पर क्या यही धर्म है? जो व्यक्ति इस संसार के लिए व्यर्थ और अनुपयोगी है, वह परलोक में सार्थकता सिद्ध नहीं कर सकता। जो इस जीवन की समस्याएं हल नहीं कर सकता, वह कभी पारलौकिक जीवन की समस्या का समाधान भी नहीं कर सकता।

जिसे जीवन से भय लगता है, उसके लिए मृत्यु के बाद के जीवन में भी सफलता की कोई आशा नहीं, क्योंकि वह जहां भी जाता है अपने साथ यही मनःस्थिति और यही प्रवृत्ति लेकर जाता है। एक उदास और निराश मनुष्य जिधर भी जाता है निराशा और उदासी की भावना फैलाता है। समय गुजरने के साथ ये धारणाएं बदली हैं। अब लोग देख पा रहे हैं कि वे स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माण कर सकते हैं। लोगों को अब समझ में आ रहा है कि यदि कोई हमेशा परलोक के सुख की आशा लगाए बैठा रहे, तो स्वाभाविक है कि उसके इस संसार के कार्य तिरस्कृत होंगे।

हम सामाजिक व्यवस्था से अपने को अलग नहीं रख सकते। सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं, इसका मतलब यह है कि हम कई बातों में समान नहीं भी हो सकते, परन्तु हम एक बात में सदा समान हैं कि हम सबको कष्टों का सामना करना होता है और उन्हें सहना पड़ता है। इसीलिए हमारे भीतर करुणा होनी चाहिए। भारतीय परंपरा सभी धर्मों का आदर करती है और मानवता की स्वतंत्रता में विश्वास करती है।

यहां विश्व के सभी धर्म फूले-फले और समृद्ध हुए हैं। हमारे संतों ने भक्ति और प्रेम की एक नई भावना से जनता को स्पंदित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी आदमी के धर्म की परख उसके विश्वासों से नहीं होती, वरन् उसके आचरण से होती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की गूंज इसी देश की देन है। कोई भी हृदय जो सत्य और प्रेम के लिए अपने द्वार बंद रखता है, वह ईश्वर की ज्योति नहीं पा सकता।

नानक ने कहा है कि किसी के साथ शत्रुता मत करो। ईश्वर सबके हृदय में सुशोभित है। क्षमा उच्चतम शक्ति संपन्न प्रेम ही है। जहां क्षमा है, वहां ईश्वर स्वयं है। ईश्वर घट-घटव्यापी है, सब प्राणियों में उसका निवास है, इसलिए हमें किसी से घृणा नहीं करनी चाहिए। जीवन में हमें अपने आपको सही ढंग पर लाना होगा, अपना आचरण निश्चित करना होगा। यह महत्वपूर्ण नहीं कि हम हिन्दू, मुसलमान, यहूदी या ईसाई आदि हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम भले हैं या बुरे। जब तक मन के विकारों को दूर नहीं किया जाता, तब तक मन का फेर नहीं मिट सकता, चाहे हाथ में लेकर कितनी ही माला फेरते रहें।

हम सब प्रतिदिन ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें काम, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, द्वेष इत्यादि कुटिल भावनाओं से दूर रखे, परन्तु इसके लिए हमें अपने सच्चे मन से प्रयत्न करना होगा। अगर हम ईश्वर से यह मांगते हैं कि क्षमा, सरलता, स्थिरता, निर्भयता, अहंकारशून्यता आदि भावनाएं हमारी संपत्ति बनें, तो इसके लिए और भी सच्चे मन से प्रयास करना होगा। क्रोध बुद्धि को नष्ट कर देता है और ऐसा होने से ही सर्वनाश हो जाता है।

घृणा, ईर्ष्या और वैर की भावना निकाल दें तो शांति, आनंद और सुख मिलता है। जिन व्यक्तियों को हम दीन-हीन अवस्था में देखते हैं, उनमें से अधिकांश किसी के व्यंग्य बाणों, किसी भयंकर आलोचना, जलन, डाह, क्रोध और बदले की भावना के शिकार होते हैं। इसी प्रकार विचारों का प्रभाव छूत के रोगों के समान है। हमारे इन दुर्गुणों के मूल में हमारा अभिमान है। इसीलिए कबीर ने कहा:

कबीरा गरब न कीजिए, ऊंचा देख निवास । काल्ह परे भुई लेटना, ऊपर जमसी घास ॥

ईश्वर के बनाए विधान के अनुसार अच्छे कर्म करते हुए और ईश्वर की कृपा का स्मरण करते हुए इस संसार से विदा हो जाएं, यही सच्चा धर्म है।

Updated: May 25, 2021 — 12:17 pm

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