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कालाष्टमी, क्या है इसका महत्व और पूजा विधि

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भैरवाष्टमी व्रत क्यों

पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि भैरव भगवान शिव के ही दूसरे रूप हैं। इसी दिन दोपहर के समय शिवजी के प्रिय गण भैरवनाथ का जन्म हुआ था। भैरव से काल भी भयभीत रहता है, अतः इन्हें ‘कालभैरव’ के नाम से जाना जाता है। भैरवाष्टमी ‘काल’ का स्मरण कराती है, इसलिए मृत्युभय-निवारण के लिए धर्मशास्त्र कालभैरव की शरण में जाने का शास्त्रों में निर्देश है। ऐसा विश्वास किया जाता है। कि कालभैरव सदा ही सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने वाले, धर्मसाधक, प्रकृति, क्षमाशील, सहिष्णु, मनुष्यों की काल से रक्षा करते हैं। इसी विश्वास के साथ यह व्रत किया जाता है।

यह व्रत मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। इस दिन उपवास रखकर संकल्प करें। प्रातः काल दांतों को साफ कर स्नान करें। तर्पण करके प्रत्येक प्रहर में कालभैरव एवं ईशान नाम के शिव का विधिपूर्वक पूजन करके तीन बार अर्घ्य दें। आधी रात में धूमधाम से शंख, घंटा, नगाड़ा आदि बजाकर कालभैरव की आरती करें।

काल भैरव (Kal Bhairav) के साथ ही इस दिन देवी कालिका (Devi Kali Pooja Vrat) की उपासना एवं व्रत का विधान भी है. इस रात देवी काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि (Devi Kalratri) की पूजा का विधान है.

कालाष्टमी व्रत पूजा विधि

कालाष्टमी के दिन जल्दी सुबह उठकर स्नान आदि कर लकड़ी के पाट पर भगवान शिव और मां पार्वती के साथ कालभैरव की मूर्ति या फोटो स्थापित करें। इसके बाद चारों तरफ गंगाजल का छिड़काव करें और फूल अर्पित करें। इसके साथ नारियल, इमरती, पान, मदिरा आदि चीजें चढ़ाएं। फिर चौमुखी दीपक जलाएं और धूप-दीप करें व कुमकुम या हल्दी से तिलक लगाएं। शिव चालिसा और भैरव चालिसा का पाठ करें। व्रत होने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटी या कच्चा दूध पीलाएं। रात के समय भैरवजी को सरसों का तेल, उड़द, दीपक, काले तिल आदि से पूजा करें।

काल-भैरव व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के व्यक्तित्व को लेकर कुछ ऐसा आपत्तिजनक बोल दिया जिससे शिव जी को क्रोध आ गया. फलस्वरूप उनके शरीर की छाया से काल भैरव की उत्पत्ति हुई. जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन मार्गशीष माह की अष्टमी थी. काल भैरव ने शिव जी को अपशब्द कहने को लेकर आवेश में आकर अपने नाखून से ब्रह्मा जी का मस्तक काट दिया.

लेकिन जब काल भैरव का गुस्सा शांत हुआ तब उन्हें अपनी गलती का एहसास और इसके बाद वो ब्रह्म हत्या के पाप से छुटकारा पाने के लिए भटकते-भटकते काशी पहुंचे. वहां जाकर उनके मन को शांति मिली. उसी समय आकाश से भगवान काल भैरव के लिए आकाशवाणी हुई कि उन्हें काशी का कोतवाल (रखवाला) नियुक्त किया गया है और उन्हें वहीं निवास कर लोगों को उनके पापों से छुटकारा दिलाना होगा.

भैरवाष्टमी कथा (Bhairav Ashtmi Katha)

कथा के अनुसार एक बार श्री हरि विष्णु और ब्रह्मा जी में इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया कि उनमें श्रेष्ठ कन है. विवाद इस हद तक बढ़ गया कि शिव शंकर की अध्यक्षता में एक सभा बुलायी गयी. इस सभा में ऋषि-मुनि, सिद्ध संत, उपस्थित हुए. सभा का निर्णय श्री विष्णु ने तो स्वीकार कर लिया परंतु ब्रह्मा जी निर्णय से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने महादेव का अपमान कर दिया.

यह तो सर्वविदित है कि भोले नाथ जब शांत रहते हैं तो उस गहरी नदी की तरह प्रतीत होते हैं जिसकी धारा तीव्र होती है परंतु देखने में उसका जल ठहरा हुआ नज़र आता है और जब क्रोधित होते हैं तो प्रलयकाल में गरजती और उफनती नदी के सामन दिखाई देते हैं. ब्रह्मा जी द्वारा अपमान किये जाने पर महादेव प्रलय के रूप में नज़र आने लगे और उनका रद्र रूप देखकर तीनो लोक भयभीत होने लगा. भगवान आशुतोष के इसी रद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए . भगवान भैरव (God Bhairav) कुत्ते पर सवार थे और इनके हाथ में दंड था. हाथ में दण्ड होने से ये दण्डाधिपति भी कहे जाते हैं. इनका रूप अत्यंत भयंकर था. भैरव जी के इस रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वे भगवान भोले नाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे. भगवान वैरव ब्रह्मा जी एवं अन्य देव और साधुओं द्वारा वंदना करने पर शांत हुए इस तरह भैरव बाबा का जन्म हुआ।

कालाष्टमी व्रत मंत्र

शिवपुराण में कालभैरव की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जप करना फलदायी माना गया है।

अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,
भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!!

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