भक्ति

जन्म से पूर्व जीवन : गर्भधारण होने से पूर्व

१. जन्म से पहले का जीवन-एक परिचय

क्या मेरे पास यही जीवन है ? जन्म से पूर्व हम कहां होते हैं ? मृत्यु के उपरांत हम कहां जाते हैं ?

लगभग हम सभी इन प्रश्‍नों से परिचित होंगे । कुछ समय पूर्व हमने मृत्यु के उपरांत क्या होता है, इस विषय पर एक लेख प्रकाशित किया था । आध्यात्मिक शोध के माध्यम से हम जन्म से पहले के जीवन का दो भागों में वर्णन करेंगे । ये दो भाग इस प्रकार हैं :

  • भाग १. गर्भ में आने से पूर्व
  • भाग २. गर्भ में आने के पश्चात

इस लेख को दो भागों – गर्भ में आने से पूर्व व गर्भ में आने के पश्चात – में प्रकाशित करने का कारण यह है कि इससे हम इस बात पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे कि हम जीवन को परिणामों के साथ जीते हैं । कर्म का सिद्धांत हमारे पूरे जीवन में व्याप्त है । हम अपना वर्तमान जीवन जिस प्रकार जीते हैं, वह हमारे मृत्यु के पश्‍चात का जीवन और पुनर्जन्म की गुणवत्ता निश्चित करता है । अधिकांश लोग जन्म से पूर्व तथा मृत्यु के पश्‍चात के आध्यात्मिक जीवन में रुचि रखते हैं, बहुत ही कम लोग पृथ्वी पर अपने आध्यात्मिक जीवन की वास्तविकता में रुचि रखते हैं । जो लोग रुचि रखते हैं, उनका मृत्यु के पश्‍चात का जीवन और पुनर्जन्म अच्छा होगा और वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाएंगे ।

. जन्म लेने से पूर्व हम कहां होते हैं ?

हमारी मृत्यु होने के पश्‍चात (हमारी विभिन्न सूक्ष्म देह) हमारे आध्यात्मिक स्तर एवं गुण-दोषों के अनुसार विभिन्न सूक्ष्म लोकों में जाती है । पृथ्वी पर जन्म लेने का अवसर मिलने से पूर्व हम इन लोकों में विभिन्न अवधि के लिए रहते हैं । (सन्दर्भ सूत्र २.४ – किस सूक्ष्म लोक में जाने की सम्भावना है ।)

२.१ जन्म से पूर्व जीवन : स्वर्गलोक एवं उससे ऊपर के लोक आज के समय में प्रत्येक १०० लोगों में से केवल २ ही व्यक्ति उच्च लोक जैसे स्वर्गलोक, महर्लोक इत्यादि तक पहुचते हैं । इन लोकों में अधिकतर सुख व आनंद का अनुभव होता है ।

शेष सभी भुवलोक अथवा पाताललोक में जाते हैं । यहां इन लोंकों में घोर दु:ख एवं अत्यधिक पीडा का अनुभव होता है ।

२.२ जन्म से पूर्व जीवन : भुवर्लोक

भुवर्लोक में अनुभव की जाने वाली पीडा सामान्यत: पृथ्वी (भूलोक) से बहुत अधिक होती है क्योंकि यहां कुछ विशेष क्रियमाण नहीं है । भुवलोक में, १०% सूक्ष्म शरीरों (आत्माओं) को उच्च लोक जैसे स्वर्गलोक, महर्लोक की सूक्ष्म शरीरों, आत्माओं से मार्गदर्शन मिलता है । ये वह जिज्ञासु आत्माएं हैं जिनमें आध्यात्मिक उन्नति की तीव्र लगन है । लगभग २% सूक्ष्म शरीर (आत्माएं) पूर्ण रूपसे प्रारब्ध के अधीन होती हैं और लगभग ८८% सूक्ष्म शरीरों (आत्माओं) पर भूतों (राक्षसों, पिशाचों, अनिष्ट शक्तियों) द्वारा आक्रमण होते हैं । ये सूक्ष्म शरीर (आत्माएं) पूरी तरह यह जानते हैं कि वे भूतों के नियंत्रण में हैं; परंतु उनसे बचने के लिए कुछ नहीं कर सकतीं । इसका कारण यह है कि उनके पास अपना कोई आध्यात्मिक बल नहीं होता ।

२.३ जन्म से पूर्व जीवन : पाताल के लोक

पाताल के विषय में इतना ही कह सकते हैं कि पृथ्वी पर अपने जीवनकाल में आने वाला सबसे कष्टपूर्ण समय भी पाताल की तुलना में अच्छा है । पाताल के विविध लोकों में सूक्ष्म शरीरों (आत्माओं) पर १००% नियंत्रण उच्च स्तर की अनिष्ट शक्तियों का होता है । जैसे-जैसे हम पाताल लोक के निचले लोकों में जाते हैं, कष्ट और पीडा बढती जाती है । पृथ्वी पर पुनर्जन्म के लिए पात्र होने से पहले हम ५०-४०० वर्ष नीचे के लोकों में रहते हैं । पाताल लोक में जाने के उपरांत पुनर्जन्म का अवसर मिलने में सहस्रों वर्ष लग सकते हैं ।

२.४ सूक्ष्म लोकों में साधना

निम्नांकित सारणी यह दर्शाती है कि वर्तमान समय में हमारी मृत्यु होने पर हमारी किन सूक्ष्म लोकों में जाने की संभावना है ।

वर्तमान समय के अनुसार मृत्यु पश्चात ब्रह्मांड के विशिष्ट सूक्ष्मलोक में जाने वाली विश्व की संभावित जनसंख्या

लोक मृत्यु के समय जनसंख्या (प्रतिशत में)
 स्वर्ग और उसके आगे २%
 भुवर्लोक ३०%
 पहला पाताल ३०%
 दूसरा पाताल ३०%
 तीसरा पाताल ३%
 चौथा पाताल २%
 पांचवा पाताल २%
 छठा पाताल १%
 सातवां पाताल ०%

इस ब्रह्मांड में निचले लोकों में (पाताल के विविध लोकों में) भोगी जाने वाली यातनाओं का अंत केवल साधना से ही संभव है । यद्यपि पाताल लोक अथवा ब्रह्मांड के निम्न लोकों में (जैसे भुवर्लोक व पाताल लोक) साधना कर पाना असंभव है । अत्यधिक कष्ट और भूतों के आक्रमण साधना के लिए वहां असंभव वातावरण का निर्मार्ण करते हैं और सूक्ष्म शरीर इस कठोर वातावरण में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं ।

स्वर्गलोक में सूक्ष्म शरीरों को इतना सुख मिलता है कि वे उसी में फंसकर रह जाते हैं और कोई साधना ही नहीं करते । यद्यपि स्वर्ग में साधना करना संभव है, तब भी सुख के अनुभव के कारण भटक जाने से इसकी संभावना नाममात्र होती है ।
महर्लोक से सत्यलोक तक के उच्च लोकों में साधना की जा सकती है और वास्तव में हो भी जाती है । इन लोकों के सूक्ष्म शरीरों (आत्माओं) को लेन-देन चुकाने अथवा साधना करने के लिए पृथ्वी (भूलोक) पर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती ।
पृथ्वी (भूलोक) पर जीवन का महत्त्व अधिक है; क्योंकि यहां निम्न लोकों की आत्माओं का जन्म साधना करने, लेन-देन चुकाने और जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटने के लिए हो सकता है ।

२.५ क्या हमें सूक्ष्म लोकों में अपना पूर्व जन्म याद रहता है ?

साधरणत: सूक्ष्म शरीर (आत्मा) को पृथ्वी (भूलोक) पर हुए अपने पिछले जन्म की घटनाएं याद होती हैं । इससे पिछले जन्म इसे याद नहीं होते, जब तक उनके बारे में कुछ विशेष न हो । ऐसा सूक्ष्म शरीर (आत्मा) के पृथ्वी (भूलोक) पर पुनर्जन्म लेने तक होता है । पाताललोक अथवा भुवर्लोक में पिछले जन्म को जानने की बात को प्राथमिकता नहीं होती । साधारणतया ये सूक्ष्म शरीर दु:खों और भूतों से बचाव और अपनों से दूर होने की पीडा से ग्रस्त रहते हैं ।

२.५.१ हमें इस जीवन में अपने पिछले जन्म क्यों याद नहीं रहते ?

जैसे-जैसे हम संसार में व्यस्त होते जाते हैं हम सूक्ष्म लोकों और पृथ्वी पर अपने पिछले जन्मों को भूल जाते हैं । हमारी भौतिक इंद्रियां / पंचज्ञानेंद्रियां, छठी ज्ञानेंद्रिय को पूरी तरह से ढंक लेती हैं । यह हम पर ईश्वर की कृपा ही है कि उन्होंने वह व्यवस्था की है कि हम पिछले जन्मों के विषय में भूल जाते हैं । अन्यथा अपने इस जीवन के क्रियाकलापों को संभालते हुए पूर्वजन्म के संबन्धों का भी स्मरण रहना कितना कष्टप्रद होता । जैसे इस जन्म के पिता-पुत्र संभव है कि पिछले जन्म में पति-पत्नी हों अथवा वर्तमान जीवन की माता पूर्वजन्म में अपनी ही बेटी की मृत्यु के लिए उत्तरदायी हो इत्यादि ।

३. हम पृथ्वी पर जन्म क्यों लेते हैं ?

पृथ्वी पर हमारा जन्म लेन-देन व कर्मों का हिसाब पूर्ण करने और साधना करने के लिए होता है । भुवर्लोक व पाताल के लोकों में लेन-देन समाप्त करने के लिए साधना करना लगभग असंभव होता है ।

संदर्भ लेख – जीवन का उद्देश्य

व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात पुन: पृथ्वी पर जन्म लेना उस व्यक्ति (या उसकी आत्मा) के हाथ में नहीं होता । पृथ्वी पर जन्म लेना दुर्लभ है । गर्भ में प्रवेश पाने वाले प्रत्येक सूक्ष्म शरीर के साथ लाखों अन्य सूक्ष्म शरीर (आत्माएं) पृथ्वी पर सांसारिक जीवन का अनुभव लेने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं । परंतु केवल वही सूक्ष्म शरीर (आत्मा) जिसका गर्भ में प्रवेश करने का प्रारब्ध है, पृथ्वी पर जन्म लेता है ।

४. हमारा पुनर्जन्म कब, कहां और किसके यहां होगा यह निर्धारित करने वाले घटक क्या हैं ?
दो मुख्य घटक जो पृथ्वी पर हमारा पुनर्जन्म निर्धारित करते हैं :

1. क्या पृथ्वी पर हमारे लेन-देन चुकाने के लिए परिस्थिति अनुकूल है ?
2. जन्म से पूर्व हम कौन से लोक में हैं ?
४.१ लेन-देन और पूर्वजन्म

हमारे लेन-देन का हिसाब एक अकेला महत्त्वपूर्ण घटक है जो निर्धारित करता है कि

• पृथ्वी पर हमारा जन्म कब होगा और
• किस परिवार में होगा इत्यादि ।

हमारे लेन-देन का हिसाब ही हमारे जन्म का समय, यहां तक कि वर्ष, माह, घंटा, मिनट और सेकंड निर्धारित करता है । इसका अर्थ यह है कि हमारा जन्म पृथ्वी पर तभी होता है जब अधिकाधिक मात्रा में लेन-देन चुकाने के लिए वह हमारे अनुकूल है । अत: हमारा जन्म उस समय पर होता है जब वे लोग, जिनके साथ हमारा लेन-देन है, वहां हों और पृथ्वी की बाहरी परिस्थितियां भी अनुकूल हों । आइए इसे एक उदाहरण से समझ लेते हैं :

‘अ’ ने ‘ब’ का सारा धन धोखे से हथिया लिया । इसलिए ‘अ’ ने ‘ब’ के साथ प्रतिकूल लेन-देन का हिसाब बना लिया है । यदि ‘अ’ की मृत्यु ब का ऋण चुकाए बिना हो जाए, तो उसे तभी पुनर्जन्म लेना होगा जब ब तब जीवित है अथवा ब का पुनर्जन्म होने तक प्रतीक्षा करनी होगी; और यदि ‘अ’ ने अन्यों के साथ भी धोखा किया है तो इससे उऋण होने के लिए उसे अत्यधिक दु:खद जीवन का सामना करना होगा । स्वभाविक है कि उसका जन्म संघर्ष के काल में होगा । अत: वह शांतिकाल में जन्म नहीं ले सकता ।

लेन-देन हिसाब की एक मुख्य बात है कि कितनी धन-संपदा लौटानी है, इसकी अपेक्षा यह सुख अथवा दुःख की इकाई में होता है । उदाहरण के लिए यदि ‘अ’ ने ‘ब’ का सारा धन धोखे से छीन लिया और वह १००० इकाई दु:ख के लिए उत्तरदायी है, तो ‘अ’ का पुनर्जन्म मां और ‘ब’ का जन्म उसके पुत्र के रूप में हो सकता है । या फिर उसकी मृत्यु लगभग १० वर्ष की आयु में किसी दुघर्टना अथवा थोडी सी बीमारी के पश्चात हो जाती है । तब तक मां का बच्चे से बहुत अधिक लगाव हो जाता है और उसकी असमय मृत्यु से १००० इकाई दु:ख उसकी इस जन्म की मां, पर पहले के ‘अ’ को होता है ।
जिन माता-पिता के यहां हमारा जन्म हुआ है उनके साथ लेन-देन की तुलना में जिस संप्रदाय / धर्म में जन्म हुआ है, उसका महत्त्व अल्प है ।

४.१.१ संचित का कौन सा भाग पृथ्वी पर प्रारब्ध बनेगा इसका निर्धारण कैसे होता है ?
यहां पुन: वही नियम लागू होता है कि संचित का जो भाग आने वाले जन्म में अधिकाधिक चुकाया जा सकता है वही चुना जाता है ।

४.१.२ क्या माता-पिता नामजप इत्यादि साधना द्वारा उच्च स्तर के सात्त्विक सूक्ष्म शरीर को आकर्षित कर सकते हैं ?
हां, साधना से अधिक उच्च स्तर के और अधिक सात्त्विक सूक्ष्म शरीर को गर्भ में आकर्षित कर सकते हैं । यह केवल तभी सम्भव है जब माता पिता पर्याप्त मात्रा में (साधना के छ: मूलभूत सिद्धांत के अनुसार और ईश्वर के लिए तन-मन-धन का त्याग करते हुए प्रतिदिन न्यूनतम ४-५ घंटे ) साधना करते हों ।

माता-पिता के साधक होने पर यदि गर्भ में आनेवाला पहला सूक्ष्म शरीर (माता-पिता की लेन-देन की शक्ति के अनुसार) यदि अधिक सात्त्विक नहीं है तो अगले सबसे अधिक सात्त्विक सूक्ष्म शरीर को प्राथमिकता मिलेगी । सात्त्विक बच्चों की विशेषताएं हैं कि वे सभ्य, बुद्धिमान, सहजता से वातावरण के अनुरूप स्वयं को ढाल लेने वाले होते हैं ।

उनके शारीरिक अथवा मानसिक रूप से विकलांग होने की संभावना भी न्यून होती है । इसका कारण यह है कि विकलांग बच्चे नकारात्मक प्रारब्ध के कारण होते हैं । साधना से प्रारब्ध का निवारण होता है । यदि माता-पिता साधना के छ: मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार तीव्र साधना कर रहे हैं तो उनका नकारात्मक प्रारब्ध न्यून (कम) हो जाता है ।

यदि किसी संत का (७०% से अधिक आध्यात्मिक स्तर) जन्म होना है तो मां का आध्यात्मिक स्तर बालक की सकारात्मकता सहन करने के लिए न्यूनतम ५०-६०% होना चाहिए । पिता के आध्यात्मिक स्तर की तुलना में मां के आध्यात्मिक स्तर का महत्त्व ७०% है ।

४.१.३ यह कैसे निर्धारित होता है कि किसी का जन्म संपन्न अथवा उच्च आध्यात्मिक स्तर के परिवार में होगा ?
यदि सूक्ष्म शरीर के गुण अधिक हैं तो वह सामान्यत: अच्छी परिस्थितियों और संपन्न परिवारों में जन्म लेते हैं । यदि सूक्ष्म शरीर का स्तर सामान्य से अधिक है तो इसका जन्म उच्च आध्यात्मिक स्तर के माता-पिता के यहां होगा जो इसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए पोषक होंगे । यहां ध्यान रखने योग्य बात यह है कि संतों का जन्म गुणों-अवगुणों के परे किसी निर्धन परिवार में भी हो सकता है । यह पृथ्वी पर उनके उद्देश्य पर निर्भर है ।

४.२ अन्य लोकों से पृथ्वी पर पुनर्जन्म

किसी सूक्ष्म शरीर के पृथ्वी पर जन्म लेने की संभावना कम होती है जब वह

• ब्रह्मांड के किसी उच्चलोक जैसे महर्लोक अथवा इससे ऊपर अथवा
• निम्नलोक जैसे पाताललोक आदि में हो

४.२.१ महर्लोक से ऊपर के लोकों से पुर्नजन्म

समष्टि आध्यात्मिक स्तरका अर्थ है, समाजके हितके लिए आध्यात्मिक साधना (समष्टि साधना) करनेपर प्राप्त हुआ आध्यात्मिक स्तर; जब कि व्यष्टि आध्यात्मिक साधनाका अर्थ है, व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना (व्यष्टि साधना) करनेपर प्राप्त आध्यात्मिक स्तर । वर्तमान समयमें समाजके हितके लिए आध्यात्मिक साधना (प्रगति) करनेका महत्त्व ७०% है, जब कि व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधनाका महत्त्व ३०% है ।

जैसे पहले उल्लेख किया गया है जब एक शरीर महर्लोक अथवा ऊपर के लोकों में स्थान पता है तो वह ६०% (समष्टि) अथवा ७०% (व्यष्टि) स्तर का होता है । जो भी प्रारब्ध शेष है वह सूक्ष्म लोकों में साधना कर, समाप्त किया जा सकता है ।
यद्यपि ६०% (समष्टि) अथवा ७०% (व्यष्टि) स्तर के लोग अपनी इच्छा से जन्म ले सकते हैं ।

महर्लोक और जनलोक में ‘मैं’पन अथवा सूक्ष्म अहंकार यद्यपि न्यूनतम होता है; परंतु वह सक्रिय होता है । यहां के सूक्ष्म शरीर स्वयं निर्धारित करते हैं कि अपने उद्देश्य के अनुसार उन्हें कब और कहां जन्म लेना है । उनका आध्यात्मिक स्तर आधिक होने के कारण वे अपनी इच्छा से और उच्च आध्यात्मिक स्तर के माता-पिता के यहां जन्म लेते हैं ।

इससे भी उच्च स्तर के ‘तपलोक’ के सूक्ष्म शरीर निर्धारित करते हैं कि उन्हें कब और कहां पुनर्जन्म लेना है । वास्तव में अनेक ऐसे विकसित सूक्ष्म शरीर पहले ही विश्व को अगले १००० वर्ष तक आध्यात्मिक पुनर्स्थापना के लिए शक्ति प्रदान करने हेतु जन्म ले चुके हैं ।

संदर्भ लेख : महायुद्ध

४.२.२ स्वर्ग लोक से यदि कोई स्वर्गलोक में है तो उसे पृथ्वी पर पुनर्जन्म लेने में हजारों वर्ष लग सकते हैं ।

४.२.३ पाताल के लोक से ब्रह्मांड के निचले लोकों जैसे नर्क इत्यादि में कष्ट की कालावधि बहुत बढ जाती है । इसके साथ ही उच्च स्तर के भूत सूक्ष्म शरीर (के अस्तित्व) को (प्रत्यक्ष रूप से) नकारात्मक कृत्यों के लिए प्रभावित करते हैं । इसके परिणामस्वरूप, सूक्ष्म शरीर नकारात्मक लेन-देन के भंवर में फंस जाता है जो उन्हें नर्क के निचले लोकों में रखता है ।

केवल जब एक सूक्ष्म शरीर नर्क के पहले तीन लोकों में अपने कष्ट का भाग पूर्ण कर लेता है, तब इसे पृथ्वी पर जन्म मिलता है । एक सूक्ष्म शरीर की नर्क के पहले क्षेत्र से पृथ्वी पर पुनर्जन्म लेने की संभावना १,००,००० जन्मों में केवल १ है । नर्क के दूसरे और तीसरे क्षेत्रों से पृथ्वी पर पुनर्जन्म असम्भव है ।
प्रतिदिन विश्व में होने वाले लगभग ३,५०,००० जन्मों में से केवल ३ सूक्ष्म शरीर नर्क से होते हैं, शेष सभी भुवर्लोक और कुछ स्वर्ग से होते हैं ।

कुछ दुर्लभ उदाहरणों में आज के युग में भी किसी सूक्ष्म शरीर का जन्म पहली बार हो सकता है। इन जीवों का पिछला लेन-देन का खाता न होने के कारण इनके जीवन में सभी घटनाएं उनके स्वैच्छिक कर्म के कारण होती हैं । उनके चित्त पर रज-तम के संस्कार भी नहीं होते, अत: वे स्वैच्छिक कर्म को साधना के लिए उपयोग में ला सकते हैं । इसलिए वे अपने पहले जन्म में ही ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं ।

५. मृत्यु और पृथ्वी पर पुनर्जन्म के बीच कितना अंतराल होता है ?

मृत्यु और पृथ्वी पर पुनर्जन्म के बीच कोई निश्चित अंतराल नहीं होता । भुवर्लोक के सूक्ष्म शरीरों के लिए यह ५०-४०० वर्ष है । स्वर्गलोक के सूक्ष्म शरीर को पृथ्वी पर पुनर्जन्म से पहले हजारों वर्ष लग सकते हैं ।
बहुत दुर्लभ घटनाओं में ऐसा अत्यंत ही दुर्लभ है जब किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत, उसे तुरंत गर्भ में प्रवेश मिल जाता है । सामान्यत: यदि ऐसा होता है तो पहली तिमाही के उपरांत होगा । इसलिए ६ माह के समय में पुनर्जन्म होता है । ऐसा होने की संभावना सभी जन्मों में केवल ०.००१% है ।

इससे भी अधिक असामान्य घटना यह होगी कि एक व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर, जिसकी अभी-अभी मृत्यु हुई है, तुरंत जन्म लेने के लिए ९ माह के भ्रूण से सूक्ष्म शरीर को निकाल सकता है । ऐसे में निकालने वाला सूक्ष्म शरीर दूसरे से अधिक आध्यात्मिक स्तर का और जिस परिवार में जन्म लेना है उसके साथ तीव्र लेन-देन होना चाहिए ।

६. एक व्यक्ति का अगला जन्म कब निर्धारित होता है ?

अधिकतर लोगों का अगले जन्म का समय पिछले जीवन के अन्त के समय ही निर्धारित हो जाता है । ऐसा इसलिए है; क्योंकि वे मरणोपरान्त (मृत्यु के उपरांत के जीवन में ) कोई साधना नहीं करते । लेन-देन हिसाब को प्रभावहीन करने का एकमात्र मार्ग साधना ही है और मरणोपरांत साधना के अभाव में अधिकांश सूक्ष्म शरीरों का लेन-देन हिसाब पहले के समान ही बना रहता है ।
केवल महर्लोक और जनलोक से आने वाले विकसित सूक्ष्म शरीरों के सम्बन्ध में, उनका निर्धारण जन्म के समय होता है । ऐसा इसलिए है; क्योंकि कब जन्म लेना है यह उनकी इच्छाके अनुसार होता है अर्थात वे प्रारब्ध के प्रभाव में नहीं होते । जबकि इससे भुवर्लोक जैसे स्वर्गलोक और पाताललोक के सूक्ष्म शरीर प्रारब्ध से १००% बंधे होते हैं ।

७. हम कितने जन्म ले चुके हैं ?

२०% आध्यात्मिक स्तर के व्यक्ति के, प्रति एक सहस्र वर्ष पृथ्वी पर होने वाले जन्म
जन्मके प्रकार जन्मोंकी संख्या
जीवाणु (किटाणु), विषाणु ३०
वनस्पति ५-१०
प्राणि ०-२
मनुष्यजन्म (समयपूर्व मृत्यु) २
मनुष्यजन्म (सम्पूर्ण जीवन) ५

टिप्पणी :

१. पृथ्वी पर व्यय किए कुल वर्ष : ५००
२. भुवर्लोक में व्यय किए कुल वर्ष : ५००

सब लोगों के लिए इसका एक उत्तर देना, बहुत कठिन है । हो सकता है कि हमने मनुष्य के रूप में हजारों जन्म लिए हों और यह भी हो सकता है कि वर्तमान जीवन हमारा पहला जन्म हो । साथ में दी गई सारणी से यह स्पष्ट होता है कि २०% स्तर के लोग १००० वर्ष के समय में कितने जन्म ले चुके हैं ।

कृपया ध्यान दें कि यह विशेष रूप से भुवर्लोक से आए व्यक्ति के लिए है । उसका जन्म मनुष्य योनि में लेने से पूर्व विभिन्न योनियों में हो सकता है ।

८. क्या किसी व्यक्ति को पता हो सकता है कि उसका प्रारब्ध अथवा उसका जन्म कहां होगा ?

गर्भधारण के समय तक व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि उसका जन्म कहां होगा । इसके बाद भी किसी अन्य सूक्ष्म शरीर द्वारा उनका स्थान लिए जाने की सम्भावना होती है । गर्भधारण के समय उनका जिस परिवार में जन्म हो रहा है उसके साथ उनके लेन-देन के हिसाब की जानकारी होती है । अर्थात उन्हें पता होता है कि उनका हिसाब सकारात्मक है अथवा नकारात्मक । यद्यपि उनके जीवन का प्रारब्ध उनसे गुप्त रहता है ।

९. उनसे (जन्म लेने वाले जीवों से ) क्या अपेक्षित है –

इस विषय पर क्या जन्म लेने से पूर्व उन्हें किसी विकसित सूक्ष्म शरीर का मार्गदर्शन मिलता है ?
नहीं, मार्गदर्शन नहीं मिलता है ।

१०. शिशु का लिंग निर्धारण कैसे होता है ?

पहले जन्म में नवजात शिशु का लिंग निर्धारण ईश्वर करते हैं । ईश्वर के दृष्टिकोण से जीवन के मूल उद्देश्य की प्राप्ति अर्थात ईश्वर प्राप्ति में स्त्री अथवा पुरुष के रूप में जन्म एक निरर्थक विषय है ।

पहले जन्म के बाद, जिन्होंने पुरुष के रूप में जन्म लिया है और यदि इसका अवचेतन मन पर प्रबल संस्कार है तो सामान्यत: वे पुरुष रूप में ही जन्म लेते रहते हैं । जो हम नहीं जानते उसमें हमारी रुचि नहीं होती इस नियम के कारण ऐसा होता है । यदि किसी की समलैंगिक पुरुष अथवा स्त्री की वृत्ति है तो उस व्यक्ति का लिंग अगले जन्म में वही होगा जिसमें उसकी अधिक रुचि है ।

देन-लेन पूर्ण करने के दृष्टिकोण से पुरुष अथवा स्त्री होना निरर्थक है; क्योंकि स्वभाव की अन्य विशेषताएं जैसे क्रोध इत्यादि एक सी रहती हैं । ईश्वर प्राप्ति के दृष्टिकोण से पुरुष जन्म का कोई विशेष लाभ नहीं है ।
वास्तव में अध्यात्म शास्त्र के अनुसार, पुरुष अथवा स्त्री श्रेष्ठ अथवा कम नहीं हैं, वे केवल एक इकाई हैं – कुंडलिनी शक्ति की चंद्रनाडी और सूर्यनाडी ।

फिर भी अपवाद के रूप में लिंग में उलट-फेर (बदलाव) संभव है । उदाहरण के लिए जब किसी पत्नी को पति द्वारा बहुत मारा गया हो और वह उसे पति बनकर वैसे ही लौटाना चाहती हो, तो पति दूसरे जन्म में पत्नी के रूप में जन्म लेगा ।
परंतु यह आवश्यक नहीं कि ऊपर बताए अनुसार नकारात्मक प्रारब्ध को पति-पत्नी बनकर ही झेलना है । ऐसा भी हो सकता है कि वर्तमान पति को किसी दूसरे ढंग से भी दु:ख झेलना पड सकता है ।

११. यह कैसे निर्धारित होता है कि किसी पशु का जन्म मनुष्य के रूप में होगा ?

किसी पशु का जन्म मनुष्य के रूप में होने का संयोग हो सकता है, यदि किसी व्यक्ति के अयोग्य कर्मों के कारण उसका पतन पशु योनि में हुआ हो । फिर उस पशु का, जो पहले एक मनुष्य था, कष्ट का भाग पूरा होने पर उसका पुन: मनुष्य योनि में जन्म हो सकता है । पितरों के लिए उनके वंशजों द्वारा की जाने वाली विधियां भी इसमें सहायता करती हैं ।

किसी पशु के लिए (जिसका जन्म पहले से पशु योनि में हुआ है) मनुष्य योनि में जन्म लेना कठिन है; क्योंकि पशु के लिए साधना करना बहुत कठिन है । फिर भी यदि पशु ने किसी संत का सत्संग प्राप्त किया है, प्रसाद खाया है, निरंतर भजन अथवा नामजप सुना है तो उसमें ईश्वर प्राप्ति करने के लिए मनुष्य योनि पाने की इच्छा जाग सकती है । यदि कोई पशु संत के साथ रहता है तो पशु की आध्यात्मिक उन्नति के लिए संत द्वारा किए गए संकल्प से पशु का जन्म मनुष्य रूप में हो सकता है ।

१२. क्या एक परिवार के पूर्वज परिवार में जन्म लेने वाले सूक्ष्म शरीर के साथ हस्तक्षेप कर सकते हैं ?

उच्च आध्यात्मिक स्तर के पूर्वज अथवा उच्च आध्यात्मिक शक्ति के भूत जैसे मांत्रिक इत्यादि की सहायता से पूर्वज परिवार में जन्म लेने वाले सूक्ष्म शरीर के साथ हस्तक्षेप कर सकते हैं । वे किसी विशेष लिंग के सूक्ष्म शरीर जैसे परिवार में लडके के जन्म को रोक सकते हैं । ऐसे में, पंक्ति का अगला सूक्ष्म शरीर अथवा जिसका निकटतम लेन-देन का हिसाब है, उसका जन्म होता है । पूर्वजों के इस हस्तक्षेप का कारण अपनी और ध्यान आकर्षित करना अथवा प्रतिशोध की भावना हो सकता है ।
संदर्भ लेख : मेरे पूर्वज मुझे कष्ट क्यों देना चाहेंगे ?

१३. सारांश

हमारे लिए इस लेख का क्या अर्थ है ?

• अधिकांश लोग जीवन भर जिन वस्तुओं का पीछा करते रहते हैं (जैसे नौकरी, प्रतिष्ठा, संपत्ति और परिवार) इन सब का वर्तमान जीवन के आध्यात्मिक उद्देश्य में विशेष महत्त्व नहीं है और मरणोपरांत तो बिल्कुल भी नहीं । मरणोपरांत चलने वाली मुद्रा केवल हमारा आध्यात्मिक स्तर है ।

• आध्यात्मिक परिपेक्ष्य से मनुष्य का पृथ्वी पर जन्म अनमोल है । केवल इसी लोक में हम अपने प्रारब्ध पर विजय पाने के लिए साधना कर सकते हैं और अंतत: जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट सकते हैं ।

• वर्तमान युग में पृथ्वी पर जन्म लेने से पूर्व कई शताब्दियों तक प्रतीक्षा करनी पडती है । वह भी तब जब हम भुवर्लोक में हैं यदि हम पाताल में चले गए तो पृथ्वी पर पुनः जन्म लेने में हजारों वर्ष लग सकते हैं ।

• वर्तमान युग में लगभग हममें से ३०% लोग ही भुवर्लोक में पहुंचते हैं । हममें से अधिकांश किसी पाताल के लोक में जाते हैं ।

• वर्तमान समय में अर्थात वर्ष १९९९-२०२२ के बीच विश्व परिवर्तन अर्थात कलियुगांतर्गत कलियुग का साक्षी होगा । यह समय आध्यात्मिक प्रगति के लिए बहुत अनुकूल है जहां १ वर्ष की साधना अन्य युगों के ५० वर्ष की साधना के समान होगी ।

• साधना द्वारा यदि एक बार ६०% (समष्टि) अथवा ७०% (व्यष्टि) आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करने पर हमें अपना प्रारब्ध समाप्त करने के लिए पुनः पृथ्वी पर नहीं आना होगा ।

क्या आपको हमारी पोस्ट पसंद आयी ?

1 Comment

  • बहुत ही बढ़िया ,जीवन का जन्म म्रत्यु तरीका बिलकुल इसी तरह से होता हे ]

error: Content is protected !!