भक्ति

कोई कैसे जान सकता है अपने पूर्व जन्म को

कैसे पता चल सकता है की पिछले जन्म में हम क्या थे ?

इसका उत्तर यह है कि सामान्य श्रेणी हम मनुष्यों को इस प्रश्न का पूर्ण व स्पष्ट  उत्तर ज्ञात नहीं हो सकता परन्तु यदि हम ऋषि पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार योग को पूर्णतया अपने जीवन में धारण कर लें, उसका पालन करें व दोनों प्रकार की समाधि, सम्प्रज्ञान व असम्प्रज्ञात,  को सिद्ध कर लें तो इससे हम अपने पूर्वजन्मों के बारे में ज्ञान सकते हैं।

ऐसा शायद इस लिए सम्भव होता है कि योगाभ्यास से हमारी आत्मा पूर्णतया शुद्ध हो जाती है और हमारे जो बुरे संस्कार रह जाते हैं उन्हें हम दग्ध बीज कर देते हैं। जिस प्रकार से भुने हुए चने खेत में डालने से उससे चने के पौधे नहीं उगते उसी प्रकार दग्ध बीज किए गये संस्कार भुने हुए चने के समान होकर उनका फल मिलना रुक जाता है वा समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार बचे हुए बुरे संस्कारों के दग्ध बीज होने और आत्मा के पवित्रहो जाने पर आत्मा की इस जन्म व पूर्व जन्मों की स्मृतियां लौट आती हैं और वह उन्हें निभ्र्रान्त रूप से जानने में समर्थ हो जाती है | यह स्थितिहम सब लोगों के लिए प्राप्त करना कठिन है क्योंकि हम सांसारिक विषयों में रूचि रखते हैं और योग के सभी नियमों का आचरण नहीं करते। पूर्वजन्म जानने की एक स्थिति यह है कि हम तर्क, ऊहापोह व विश्लेषण का प्रयोग कर यह जानें कि क्या पूर्वजन्म के पक्ष मे कोई सम्भव कोटि का तर्क है जो हमें सन्तुष्ट करता है ?

पूर्वजन्म की सिद्धि के अनेक तर्क हमारे पास हैं। सबसे पहले तो यह पूर्वजन्म वा पुनर्जन्म एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है। कोई भी पदार्थ अभाव से उत्पन्न नहीं होता। अभाव का अर्थ शून्य है। अर्थात् बिना किसी पदार्थ से कोई नया पदार्थ नहीं बनता। उदाहरण के लिए यदि हम रोटी को लें तो यह आटे से बनती है। अन्य भी सहायक साधन होते हैं। अब यदि आटा ही न हो तो बिना आटे के रोटी नहीं बन सकती।

इसलिए संसार में जितनी भी रचनायें है उनका कोई न कोई उपादान कारण अवश्य होता है। अब हम अपनी जीवात्मा को लें तो इसका अस्तित्व हमें ज्ञात व विदित होता है। कोई नहीं कहता कि मैं व मेरी आत्मा नहीं है। मैं ही मेरी आत्मा है और मेरी आत्मा ही मैं हूं। इसआत्मा से कोई नया पदार्थ नहीं बनता और न हि संसार में कोई ऐसा पदार्थ है जिससे कि आत्मा का निर्माण हो सकता हो।

हमारे ऋषि जोवैज्ञानिक या आध्यात्मिक विषयों में भौतिक वैज्ञानिकों से कहीं अधिक ज्ञान रखते थे, ने आत्मा का पूरा अध्ययन व परीक्षा करके यह परिणामनिकाला है कि आत्मा अनादि, अनुत्पन्न, अविनाशी, अजर व अमर है। यह न तो उत्पन्न होती है और न मरती है। न यह जल से गीली होती है, न जीर्ण होती है और न हि अग्नि से जलती व सूखती है। जन्म व मरण तो शरीर का होता है।

जन्म के समय यह आत्मा शरीर के साथ संयुक्त रूप मेंमाता के गर्भ से बाहर आती है और मृत्यु के समय यह शरीर से पृथक होकर शरीर से निकल जाती है। शरीर से निकलने का प्रयोजन प्रथम तो यह है कि पूर्व का शरीर अब इसके रहने योग्य नहीं रहा अतः अब इसे अपनी जीवन यात्रा को चलाने के लिए नया शरीर वा निवास चाहिये। यह नया शरीर वा निवास इसे ईश्वर की कर्म-फल व्यवस्था से परमात्मा प्रदान करते हैं। हम देखते हैं कि प्रतिदिन सहस्रों व लाखों लोगों के जन्म इस पृथिवी पर हो रहे हैं।

उन सबमें आत्मायें हैं। वह आत्मायें कहां से आती हैं, इसका अर्थ यह है कि वह आत्मायें कुछ समय पूर्व मरे हुए मनुष्य व अन्य प्राणियों में से आती हैं। मनुष्य मरते कम हैं और पैदा अधिक संख्या में होते हैं तो इससे एक परिणाम यह सामने आता है कि मनुष्य योनि में पैदा होने वाले बच्चों की बहुत सी आत्मायें पशु, पक्षी व कीट-पतंग आदि योनियों व अन्तरिक्षस्थ अन्य ग्रहों आदि से आयीं हैं।

इसी से संतुलन बनता है क्योंकि नई आत्मा न तो अपने आप और न ही ईश्वर रूपी सत्ता द्वारा बनाई जा सकती है क्योंकि आत्मा जिससे बन सकती हो, ऐसा कोई पदार्थ संसार में नहीं है जिसका समर्थन विस्तृत वैदिक साहित्य व हमारे ऋषि मुनियों के दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थ करते हैं।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि आत्मा अनादि और अविनाशी है। यह अनन्त काल से इस ब्रह्माण्ड में है और अनन्त काल तक रहेगी। अतः इस जन्म की भांति इससे पूर्व भी अनेक जन्म होना निश्चित होता है जिनकी संख्या अनन्त ही आती है। यह अनुमान प्रमाण है और इसकी काट हमारे पास नहीं है। यदि आत्मा, प्रकृति और ईश्वर इस ब्रह्माण्ड में सदा से हैं और सदा रहेंगे तो यह अनुमान सत्य ही माना जाना चाहिये कि इस सृष्टि की ही भांति इससे पूर्व भी अनेक सृष्टि हो चुकी हैं और आगे भी होंगी।

इसमें सन्देह करना हमें तो बुद्धि की मलिनता ही प्रतीत होती है। ऐसा पहले हमारे साथ भी होता था परन्तु अनेकानेक ग्रन्थों का अध्ययन करने और विचार व चिन्तन करने पर अब पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्पष्ट हो गया है। इसके लिए हमारे पाठकों को पुनर्जन्म विषयक अनेक ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये। इस विषय का ऋषि दयानन्द का पूना प्रवचन भी उपलब्ध है और उनके शिष्य पं. लेखराम सहित अनेक विद्वानों के ग्रन्थ इस विषय में उपलब्ध हैं जिन्हें देखा जा सकता है। यहां संक्षेप में ही हमनें कुछ बातें कहीं हैं।

हम यह भी उल्लेख करना चाहते हैं कि गीता के एक प्रसंग में योगेश्वर श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को बताया है कि वह अपने अनेक पूर्वजन्मों को जानते हैं परन्तु अर्जुन को अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान नहीं है। इससे भी यही ध्वनित होता है कि श्रीकृष्ण जी योगी होने के कारण ही अपने पूर्वजन्मों को जानते थे।

हमारे सामने एक प्रश्न यह भी है कि कुछ मनुष्य कई बार कहते हैं कि वह अपने किसी विरोधी व शत्रु के उसके प्रति किये गये अन्याय व बुरे व्यवहार वा कर्म का बदला अगले जन्म में लेगा। कुछ कहते हैं कि हम जो कर्म इस जन्म में करते हैं उसका फल हमें अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। इसकी क्या स्थिति है? इसकी स्थिति हमें यह लगती है कि इस जन्म के सभी मनुष्यों का उनकी मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होना निश्चित है।कौन अपने कर्मानुसार किस प्राणी योनि में कहां उत्पन्न होगा यह कोई नहीं जानता।

हां, इस जन्म के जिस मनुष्य के जैसे कर्म हैं उसका फल उन सभी को इस जन्म में भी मिल सकता है और भावी जन्मों में भी। ‘अवश्यमेव ही भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं’ के अनुसार किये हुए कर्म का फल जीवात्मा को अवश्य ही भोगना पड़ता है। वह इससे बच नहीं सकते। यहां यह भी जान लेना आवश्यक है

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कि हम इस जन्म में जो कर्म करते हैं वहदो प्रकार के होते हैं। एक क्रियमाण कर्म व दूसरे संचित कर्म। जिन कर्मों का फल हमें इस जन्म में मिल जाता है उन्हें क्रियमाण कर्म कहते हैं औरजिनका परजन्म में मिलेगा वह संचित कर्म की कोटि में आते हैं |

इन संचित कर्मों को ही प्रारब्ध या भाग्य कहते हैं। आर्यसमाज व वेदों के मानने वाले लोग जो प्रातः व सायं सन्ध्या व ईश्वर का ध्यान करते हैं उसमें मनसा परिक्रमा के मन्त्रों का विधान है जिसमें ईश्वर को सभी दिशाओं में व्यापक मानकर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं जो कोई हमसे द्वेष करता है और यदि हम किसी से द्वेष करते हैं तो उस द्वेष को हम ईश्वर की न्याय व्यवस्था में प्रस्तुत व समर्पित करते हैं।

 इसका अर्थ है कि हम दूसरों व अपने द्वेष को को ईश्वर की न्याय व्यवस्था में छोड़ देते हैं जिससे वह यथासमय पक्षी-प्रतिपक्षियों को उनका यथोचित फल देता है। हम समझते हैं कि इससे अगले जन्म में बदला लेने और अगले जन्म में फल भोगने विषयक बातों का समाधान हो जाता है।

कई बार संसार में हिसंक पशुओं शेर व भेड़िया आदि के बारे में कहा जाता है कि वह वनों में अन्य पशुओं को मार कर खा जाते हैं तो उनकी आत्माओं का कल्याण तो कभी हो ही नहीं सकता? इस विषय में यह जानना होता है कि मनुष्य योनि ही उभय योनि अर्थात् कर्म व भोग योनि है जिसमें मनुष्य स्वतन्त्रता पूर्वक कर्म करता जिसके फल उसे भोगने होते हैं। मनुष्य को परमात्मा ने वाणी और सत्य व असत्य का विचार करने के लिए बुद्धि नामक यन्त्र दिया है।

इस प्रकार की विवेक बुद्धि अन्य योनियों के किन्हीं प्राणियों के पास नहीं है अतः वह कर्म करते हुए अच्छे-बुरे वा सत्यासत्य का विचार नहीं कर सकते। दण्ड तभी मिलता है जब किसी को कर्म करने की स्वतन्त्रता हो। मनुष्य को स्वतन्त्रता है कि वह चोरी करे न करे, झूठ बोले न बोले, सत्य का आचरण करे या न करे, किसी विरोधी के प्रति हिंसा करे या न करे। अतः कर्म की स्वतन्त्रता होने पर ही मनुष्य को दण्ड मिलता है।

हमारे जितने मनुष्येतर पशु, पक्षी आदि प्राणी हैं, यह कर्म करने में स्वतन्त्र योनियां नहीं हैं। उनके कर्म ईश्वर द्वारा निर्धारित हैं। अतः यह जो भी अच्छा व बुरा काम करते हैं वह ईश्वर के विधान के अनुसार है। कर्म की स्वतन्त्रता न होने के कारण इन पशुओं व पक्षियों आदि को उनके इन योनियें में किए कर्मों का कोई दण्ड ईश्वर की ओर इस जन्म व परजन्म में नहीं मिलेगा। यह तो अपने पूर्वजन्म के बुरे कर्मों का भोग करने के कारण से ही वर्तमान जन्म में इन इन योनियों में भेजे गये हैं। यह एक प्रकार की जेल है जहां वह अपने कर्मों का भोग कर रहे हैं।

हमसे हमारे लन्दन स्थित मित्र ने यह भी प्रश्न किया है कि यदि आप का घर चींटीओं या मधु मक्खियों से भर जाए तो उन्हें कैसे घर से भगाओगे और यदि मच्छर बहुत हो जाएं तो क्या किया जा सकता है क्योंकि जीवों को मारना तो हत्या है? हमें लगता है कि कर्मफल सिद्धान्त के अनुसार यदि हमारे कारण किसी प्राणी को कष्ट या पीढ़ा होती है यह अशुभ कर्म होता है।

यहां यह भी देखने योग्य बात है कि हम अकारण वा अनिच्छापूर्वक यह कार्य कर रहे हैं या सकारण वा इच्छापूर्वक। यदि सकारण कर रहे हैं तो क्या कृमियों की हत्या के अतिरिक्त इन्हें वहां से भगाने व हटाने का अन्य कोई उपाय हमारे पास है या नहीं है? हमें याद है कि बचपन में जब घर में मच्छर होते थे तो हमारे पिता घर में गाय के उपलों को जलाकर घुआं करने को कहते थे जिससे मच्छरों का प्रभाव कम व दूर हो जाता था। मच्छरदानी का प्रयोग भी मच्छरों से बचने का एक उपाय है। आजकल कई प्रकार के साधन मच्छरों को भगाने के उपलब्ध हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है। चीटींओं को घर से भगाने के लिए हमने घर में देखा कि चींटीयों के स्थान पर यदि आटा डाल दिया जाये तो कुछ देर बाद चींटियां दिखाई नहीं देती। सबसे पहला काम तो हमें यह करना है कि इन प्राणियों की हत्या करने के स्थान पर इन्हें अन्य साधनों से घर से भगाया या हटाया जाये।

यदि हत्या के अतिरिक्त कोई उपाय न बचे तो फिर इन्हें मारना ही हो सकता है। यहां यह भी स्मरण करना चाहिये कि हमारे सड़क आदि में चलने से कई छोटे व सूक्ष्म किटाणुओं को भी कष्ट होता है व उनकी हत्या होती है। चूल्हे व चक्की से काम लेते समय भी कुछ कृमियों व किटाणुओं का नाश होता है। यज्ञ करने से भी बैक्टिरिया व अन्य सूक्ष्म किटाणुओं का शमन व दमन हो सकता सकता है परन्तु ऐसा होना हमारी उनके प्रति किसी द्वेष भावना के कारण नहीं अपितु विवशता के कारण है।

अतः प्रतिदिन बलिवैश्वदेव यज्ञ कर्म करके हम इनसे कुछ सीमा तक बच सकते हैं। हमारे ऋषियों ने शायद इसका यज्ञ व बलिवैश्वदेव यज्ञ समाधान ही हमें दिया है। इसे हम सभी को पूरी श्रद्धा के साथ करना चाहिये। इससे अनुमान है कि हम अनिच्छा व विवशता में होने वाले इन अशुभ कर्मों के प्रभाव से कुछ व पूर्ण सीमा तक बच सकेंगे।

हमारे मित्र ने हमें यह भी बताया है कि उनके मित्र ज्ञानी जी ने इस समस्या का समाधान बताते हुए उन्हें कहा था कि भगवान को हर दम अपने पास अनुभव करके बुरे कामों से परहेज करना चाहिये और इससे अधिक कर्मकांडों की आवश्यकता नहीं है। हमारा विचार है कि ज्ञानी जी की बात आंशिक दृष्टि से ठीक है। इसके साथ यदि अग्निहोत्र यज्ञ, स्विष्टकृद व प्रायश्चित आहुतियों सहित बलिवैश्वदेवयज्ञ भी करते हैं तो इससे अधिकतम् लाभ हो सकता है।

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Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

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