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सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा सिद्ध ईशा योग क्रिया ध्यान लगाने की सरल विधी

आध्यात्मिक विकास की संभावनाएं जो पहले केवल योगियों और संयासियों के लिए ही थी अब ईशा क्रिया के द्वारा सभी लोगों को उनके घर की सुख सुविधा में बैठे प्राप्त हो सकती है।

योग विज्ञान के शाश्‍वत ज्ञान का हिस्‍सा है ईशा क्रिया। सद्‌गुरु ने ईशा क्रिया को एक सरल और शक्तिशाली विधि के रूप में पेश किया है। ईशा का अर्थ है, “वह जो सृष्टि का स्रोत है” और क्रिया का अर्थ है, “आंतरिक कार्य।” ईशा क्रिया का उद्ददेश्य मनुष्य को उसके अस्तित्व के स्रोत से संपर्क बनाने में सहायता करना है, जिससे वह अपना जीवन अपनी इच्छा और सोच के अनुसार बना सके। ईशा क्रिया के दैनिक एवं नियमित अभ्यास से जीवन में स्वास्थ्य, कुशलता, शांति और उत्‍साह बना रहता है। यह आज के भाग दौर वाले जीवन के साथ तालमेल बिठाने के लिए एक प्रभावशाली साधन है।

ईशा क्रिया ध्यान की एक सरल प्रक्रिया है। इसका आसानी से अभ्‍यास किया जा सकता है। विडियो में बताई गई विधि के साथ यह ध्यान सीखा जा सकता है और इसे डाउनलोड किया जा सकता है। जो लोग चंद मिनट का समय निकालने को तैयार हैं उन सभी का जीवन रूपांतरित करने की इसमें शक्‍ति है।

अक्सर पूछे जानें वाले कुछ प्रश्न

यह ध्यान करने से आखिर होता क्‍या है?

यह क्रिया आपके और आपके शरीर, आपके और आपके मन के बीच एक दूरी बनाती है। आप जीवन में जूझ इसलिए रहे हैं, क्योंकि आपने इन सीमित रूपों के साथ अपनी पहचान बना ली है। ध्यान की खासियत यह है कि आप और जिसे आप अपना ‘मन’ कहते हैं, उनके बीच एक दूरी बन जाती है। आप जिस भी पीड़ा से गुजरते हैं, वह आपके दिमाग की रचना है; क्या ऐसा नहीं है? अगर आप खुद को दिमाग से दूर कर लेते हैं, क्या आपके भीतर पीड़ा हो सकती है? यहीं पीड़ा का अंत हो जाता है।

जब आप ध्यान करते हैं, आपके और आपके दिमाग के बीच एक दूरी पैदा हो जाती है, और आप शांतिपूर्ण महसूस करने लगते हैं। पर समस्या यह है कि जैसे ही आप अपनी आँखें खोलते हैं, आप फिर से अपने दिमाग के साथ उलझ जाते हैं। अगर आप रोज ध्यान करेंगे, एक दिन ऐसा आएगा जब आप अपनी आँखे खोलेंगे और तब भी आप अनुभव करेंगे कि आपका दिमाग वहाँ है और आप यहाँ हैं। यह तकलीफों का अंत है। जब आप अपने शरीर और अपने मन के साथ अपनी पहचान बनाना बंद कर देते हैं, आप अपने भीतर सृष्टि के स्रोत से जुड़ जाते हैं। जैसे ही ऐसा होता है, आपके ऊपर कृपा होती है।

चाहे आप कहीं रहें, यहाँ या किसी दूसरे लोक में, अब तकलीफों का अंत हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि अपने कर्मों की पूरी गठरी – अपने अतीत और अचेतन मन – को किनारे कर दिया है। आपके ऊपर इनका कोई असर नहीं होता। जैसे ही पीछले कर्मों का आपके ऊपर असर समाप्त हो जाता है, तब जीवन एक विशाल संभावना बन जाता है।

हर साँस आपके जीवन में एक महत्वपूर्ण संभावना बन जाती है, क्योंकि अब आपके वजूद पर आपके अतीत का कोई असर नहीं होता। जब आप यहाँ बैठते हैं, आप भरपूर जीवन होते हैं। जिंदगी सहज हो जाती है।

यह ध्‍यान करने से मुझे क्या फायदा है?

सबसे पहले, ध्यान करने की क्या जरूरत है? यह जो जीवन-प्रक्रिया शुरू हुई, यह आपका सचेतन चुनाव नहीं था। यह बस आपके साथ हो गया। जब आप पैदा हुए, आपका शरीर कितना छोटा था और अब यह बड़ा हो गया है। यह बिलकुल साफ है कि यह शरीर आपने कहीं बाहर से इकट्ठा किया है। यह एक संग्रह है। जिसे आप ‘मेरा शरीर’ कहते हैं वह भोजन का एक ढेर है। इसी तरह जिसे आप ‘मेरा मन’ कहते हैं वह संस्कारों का एक ढेर है। आप जो भी बटोरते हैं, वह आपका हो सकता है पर वह स्वयं आप नहीं। बटोरने का मतलब ही है कि आपने कहीं और से जमा किया है।

आज आप 70 किलो वजन का शरीर बटोर सकते हैं, पर आप इसे 60 किलो करने का फैसला कर सकते हैं। आप उस 10 किलो वजन को ढूँढने नहीं निकलते, क्योंकि वह तो सिर्फ एक संग्रह था। जब आप वजन कम कर लेते हैं, यह गायब हो जाता है। इसी तरह आपका मन प्रभावों व संस्कारों का एक ढेर है।

जैसे ही आप अपने अनुभवों से अपनी पहचान बना लेते हैं, जैसे ही आप अपनी पहचान किसी ऐसी चीज से बना लेते हैं जो आप नहीं हैं, आपकी समझ, आपकी बोधन-क्षमता, पूरी तरह बेकाबू हो जाती है। आप जीवन को वैसे नहीं देख सकते जैसा वो है; अपकी ग्रहण करने की क्षमता बहुत ज्यादा विकृत हो जाती है। यह शरीर जिसे अपने बाहर से इकट्ठा किया है, जैसे ही आप इसे ‘स्वयं’ के रूप में अनुभव करने लगते हैं, जैसे ही आप अपने दिमाग पर पड़े प्रभावों व संस्कारों को ‘स्वयं’ के रूप में अनुभव करने लगते हैं, आप जीवन को उस तरह से नहीं अनुभव कर सकते जैसा वह है। आप जीवन को उस तरह से अनुभव करेंगे जैसा आप के जीवित रहने के लिए जरूरी है, वैसा नहीं जैसा वह असल में है।

जब आपने मानव देह धारण किया है तो इसे जीवित रखना बहुत जरूरी है, पर यह काफी नहीं है। अगर आप इस ग्रह के किसी दूसरे प्राणी की तरह आए होते तब, पेट भरा कि जीवन बेफिक्र हो जाता। परंतु जब आप एक मनुष्य के रूप मे आए हैं; जीवन सिर्फ जीवित रहने तक ही सीमित नहीं है। एक मनुष्य के लिए जीवन वाकई में तब शुरू होता है जब जिंदा रहने की उसकी जरूरतें पूरी हो जाती हैं। ध्यान आपको एक अनुभव कराता है, एक आंतरिक अवस्था जहाँ ‘मेरा’ क्या हैं और ‘मैं’ कौन हूँ यह अलग-अलग हो जाता है। एक दूरी बन जाती है, आप क्या हैं और आपने क्या जमा किया है, इनके बीच एक फरक आ जाता है। फिलहाल हम इसे ही ध्यान कह सकते हैं।

इसे करने से क्या लाभ होगा? यह आपकी समझ में पूर्ण स्पष्टता लाता है। आप जीवन को वैसे देख पाते हैं जैसा वह है, बिना किसी तोड़ मरोड़ के। अभी आप इस दुनिया में किस तरह जी रहे हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप दुनिया को कितने स्पष्ट तरीके से देख पा रहे है। यदि मुझमें समझ नहीं है केवल आत्मविश्‍वास है तो मैं मूर्ख ही साबित होऊंगा। अधिकतर लोग समझ की कमी को अत्‍मविश्वास बढ़ाकर के पूरा करने की कोशिश करते हैं। वास्तव में समझ का स्थान कोई और चीज नहीं ले सकती। जब आप को यह समझ आ जाती है तो आप स्वाभाविक रूप से ध्यान की और झुकते हैं। तब आप सभी गलत धरनाओं से मुक्त होना चाहेंगे और जीवन को वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, क्‍योंकि तब आप जीवन डगर पर बिना किसी रूकावट के, बिना कोई ठोकर खाए चलना चाहेंगे।

  • साँस का क्या महत्व है? अच्छी तरह साँस लेने से आदमी स्वस्थ रहता है। क्या इसके दूसरे फायदे भी हैं?
  • सांस वो धागा है, जो आपको शरीर से बांध कर रखता है। अगर मैं आपकी सांसें ले लूं तो आपका शरीर छूट जाएगा। यह सांस ही है, जिसने आपको शरीर से बांध रखा है। जिसे आप अपना शरीर और जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वे दोनों आपस में सांस से ही बंधे हैं। यह सांस ही आपके कई रूपों को तय करती है।जब आप विचारों और भावनाओं के विभिन्न स्तरों से गुजरते हैं, तो आप अलग-अलग तरह से सांस लेते हैं। आप शांत हैं तो एक तरह से सांस लेते हैं। आप खुश हैं, आप दूसरी तरह से सांस लेते हैं। आप दु:खी हैं, तो आप अलग तरह से सांस लेते हैं।

यह ऊर्जा या प्राण, शरीर में खास तरीके से चलता है, यह मनमाने ढंग से नहीं चलता। इसके चलने के 72,000 विभिन्न ढंग हैं। दूसरे शब्दों में, हमारी प्रणाली में 72,000 रास्ते हैं जिनसे यह चलता है। इन रास्तों को नाड़ियां कहते हैं।

क्या आपने यह महसूस किया है? इसके ठीक उल्टा है प्राणायाम और क्रिया का विज्ञान। जिसमें एक खास तरह से, सचेतन सांस लेकर अपने सोचने, महसूस करने, समझने और जीवन को अनुभव करने का ढंग बदला जा सकता है। शरीर और मन के साथ कुछ दूसरे काम करने के लिए इन सांसों को एक यंत्र के रूप में कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। आप देखेंगे कि ईशा क्रिया में हम सांस लेने की एक साधारण प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रहें हैं, पर क्रिया सिर्फ सांस में नहीं है। सांस सिर्फ एक उपकरण है। सांस तो एक शुरूआत है, पर जो होता है वह अद्भुत है। आप जिस तरह से सांस लेते हैं, उसी तरह से आप सोचते हैं। आप जिस तरह से सोचते हैं, उसी तरह से आप सांस लेते हैं। आपका पूरा जीवन, आपका पूरा अचेतन मन आपकी सांसों में लिखा हुआ है। अगर आप सिर्फ अपनी सांसों को पढ़ें, आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य आपकी सांस लेने की शैली में लिखा हुआ है।एक बार जब आप इसे जान जाते हैं, जीवन बहुत अलग हो जाता है।

इसे अनुभव करना होता है, यह ऐसा नहीं है जिसे आप प्रवचन से सीख सकते हैं। अगर आप बस यहां बैठने का आनंद जानते हैं, यानी कुछ सोचे बिना, कुछ किए बिना, बस बैठने का आनंद जानते हैं, सहज एक जीवन के रूप में बैठना, तब जीवन बहुत अलग हो जाता है।यह असल में क्या है, आज इसका वैज्ञानिक सबूत है कि बिना शराब की एक बूंद लिए, बिना कोई चीज लिए, आप यहां सहज बैठकर, अपने आप नशे में मतवाले व मदहोश हो सकते हैं। अगर आप एक खास तरह से जागरूक हैं, तो आप अपनी आंतरिक प्रणाली को इस तरह से चला सकते हैं कि आप सिर्फ यहां बैठने मात्र से परमानंद में चले जाते हैं। एक बार जब केवल बैठना और सांस लेना इतना बड़ा आनंद बन जाए, आप बहुत हंसमुख, विनम्र और अद्भुत हो जाते हैं, क्योंकि तब आप अपने अंदर एक ऊंची अवस्था में होते हैं। दिमाग पहले से ज्यादा तेज हो जाता है ।

  • जरा-सा ऊपर उठे चेहरे के साथ मुझे क्यों बैठना चाहिए?
  • सद्‌गुरु: जरा-सा ऊपर उठे चेहरे के साथ आप इसलिए नहीं बैठते हैं कि आप आसमान में तैरती कोई चीज देखना चाहते हैं या कोई कल्पना करना चाहते हैं। आप चेहरा ऊपर की ओर इसलिए रखतें हैं, क्योंकि जब आपकी प्रणाली ऊपर की ओर केंद्रित होती है, यह ग्रहणशील हो जाती है। यह एक खिड़की खोलने जैसा है। यह कृपा का पात्र होने जैसा है। जब आप इच्छुक और ग्रहणशील हो जाते हैं, आपका शरीर अपने आप ऊपर की ओर खिंचने लगता है।
  • ध्वनि ’आ…‘(आऽऽऽ) के उच्चारण का मुझ पर क्या असर होगा?
  • जब आप ध्वनि ‘आ…’ का उच्चारण करते हैं, आपके शरीर का भरण-पोषण केंद्र जागृत हो जाता है। यह केंद्र मणिपूरक चक्र है। मणिपूरक चक्र आपकी नाभि से पौन इंच नीचे होता है। जब आप अपनी मां के गर्भ में थे, तब यह ‘भरण-पोषण’ नली वहां जुड़ी थी। अब नली नहीं है, पर यह भरण-पोषण केंद्र अब भी आप के नाभि में है। जैसा इंसान का एक भौतिक शरीर होता है, वैसे ही एक पूरा ऊर्जा शरीर भी होता है, जिसे हम आमतौर पर प्राण या जीवन शक्ति के रूप में जानते हैं। यह ऊर्जा या प्राण, शरीर में खास तरीके से चलता है, यह मनमाने ढंग से नहीं चलता। इसके चलने के 72,000 विभिन्न ढंग हैं। दूसरे शब्दों में, हमारी प्रणाली में 72,000 रास्ते हैं जिनसे यह चलता है। इन रास्तों को नाड़ियां कहते हैं। इनका कोई भौतिक रूप नहीं होता, अगर आप शरीर को काटकर और अंदर देखें तो आपको ये नाड़ियां नहीं मिलेंगी। लेकिन जैसे ही आप ज्यादा जागरूक होते जाते हैं, आप महसूस करेंगे कि ऊर्जा मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि तय रास्तों से प्रवाहित हो रही हैं।

आप चेहरा ऊपर की ओर इसलिए रखतें हैं, क्योंकि जब आपकी प्रणाली ऊपर की ओर केंद्रित होती है, यह ग्रहणशील हो जाती है।

जब आप ‘आ…’ का उच्चारण करतें हैं, आप देखेंगे कि कंपन नाभि से पौन इंच नीचे शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाता हैं। ध्वनि ‘आ…’ एकमात्र कंपन है, जो पूरे शरीर में फैलता है, क्योंकि यह अकेला स्थान है जहां 72,000 नाड़ियाँ मिलती हैं और फिर से बंट जाती हैं। ये सब मणिपूरक पर मिलती हैं और खुद को फिर से बांट लेती हैं। यह शरीर में ऐसा एकमात्र बिंदु है। अगर आप ध्वनि ‘आ…’ का उच्चारण करते हैं, उसका कंपन पूरी प्रणाली में फैल जाता हैं।यह कंपन आपके भरण-पोषण केंद्र को ऊर्जा से भरने में काफी मदद कर सकता है। इस केंद्र के जागृत होने से सेहत, सक्रियता, समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है।

  • ईशा क्रिया के लिए क्या खाली पेट होना चाहिए? खाने और इस क्रिया के बीच कितने समय का अंतर होना चाहिये?
  • खाली पेट होना आवश्यक नहीं है। खाने के तुरत बाद भी इसे किया जा सकता है। हालांकि खाना खाने के बाद पेट भरे होने से आपको नींद आ सकती है।
  • क्या ध्यान कुछ दिनों तक ही करने की जरूरत है? या इसे जीवन भर करना होगा?
  • ध्यान एक प्रक्रिया है जो आपके दैनिक जीवन का हिस्सा बन सकती है, उसी तरह जैसे आप और काम करते हैं। आप मंजन करने का उदाहरण ले, शुरू में आपसे कहा गया कि ये आपको करना ही है, लेकिन जैसे ही आपने इसका महत्व समझ लिया आप इसे खुद ब खुद करने लगे, बिना इसके बारे में सोचे। यही बात ध्यान के साथ लागू होती है। जब एक बार आप इसका महत्व समझ लेते हैं तब कोई खास कोशिश किये बिना, स्वाभाविक रूप से यह आपके जीवन का एक अंग बन जायेगा। लेकिन ऐसा होने से पहले, शुरू में आपको इसे नियमित रूप से करना पड़ेगा। इसीलिए हम ज़ोर देते हैं कि बिना नागा किये इसको दिन में दो बार 48 दिन तक करना है ।

About the author

Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma’s Devotional Facts at Only One Roof.

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