कुण्डलिनी चक्र

शरीर में सन्निहित शक्ति-केंद्र या चक्र

body-chakras

आपके अंदर जो सुषुप्त केंद्र हैं उनको विकसित करने के किये श्रृंगार होता है । हमारे शरीर में सात केंद्र हैं।

१) मूलाधार केंद्र :

 जन्म से लेकर सात साल तक मूलाधार केंद्र विकसित होता है, यदि सात वर्ष की उम्र तक बच्चे की निरोगता का ख्याल रखा जाये, तुलसी के दो तीन पत्ते रगड़ के जरा सा शहद

या मिश्री मिला के चटा दिया जाये अथवा तुलसी होमियोपैथी गोली एक-एक दे दी जाये, बच्चे निरोग रहेंगे। जन्म से लेकर सात वर्ष तक हमारे शरीर का मूलाधार केंद्र या यूँ मान लो कि शरीर की नींव बनती है। बच्चों में कफ की प्रधानता होने पर साल में दो तीन बार बच्चों को ऋतू-परिवर्तन के समय बाल-विशेषज्ञों के पास ले जाना पड़ता है। इसकी कोई जरूरत नहीं, तुलसी माता में ८०० बीमारियों को भगाने की ताकत है। बच्चों को कफ के कारण, वायु के कारण बीमारियाँ होती है। तुलसी होमियोपैथी की एक एक गोली दे दो, ३० रूपये की इतनी बड़ी बोतल मिलती है, एक दो साल अपने व पड़ोस के बच्चों को निरोग रखो।

२) स्वधिष्ठान केंद्र :

अगले सात वर्ष तक हमारा दूसरा केंद्र विकसित होता है उसे स्वधिष्ठान केंद्र बोलते हैं। ७ से १४ साल तक की उम्र में बच्चों को भयभीत न किया जाये, वीरता के, बहादुरी के संस्कार दिये जायें या भक्ति के संस्कार जो दोगे तो जीवन भर वह उन संस्कारों की बुलन्दीयाँ छुएगा, जैसे रणजीत... महाराजा का बेटा खेल रहा था, राजा जौहरी के पास हीरे जवाहरात देख रहा था ।

रणजीत दौड़ता हुआ आया, “पिताजी, मैं इस हीरे दी अंगूठी बनवा के पावां तां कीवें लगेगी?”

पिता ने कहा, “छी....मेरा रणजीत...ऐसा हीरा पावे..” उस जमाने में लाख रूपये का हीरा था, आज के २५ या ४० लाख समझो।

जौहरी ने कहा, “ तो क्या आपका रणजीत कोहीनूर पहनेगा क्या?”

बाप ने बेटे की पीठ ठोंक दी, “क्यों रणजीत....तूं की कोहीनूर नीं पा सकदा ?”

बोला, “ पा सकदा हां”

“तेरे वास्ते असंभव कुछ है?”

बोला, “ नहीं”

“तूं जो ठान लए, ओ काम कर सकदा है कि नहीं ?”

“हाँ, कर सकदा हां”

बोले, “ तूं बहादूर बनेंगा की नहीं...”

“हाँ, बनूंगा”

ऐसे संस्कार बाप डाल देते थे। रणजीत की पीठ ठोंक दी । जौहरी ने राजा को कहा, “ कोहिनूर....हिंदुस्तान में तो है ही नहीं, अब तो अफगानिस्तान में है..”

“ ओये...रणजीत, अफगानिस्तान कोई दूर है की? तू अफगानिस्तान तों युद्ध जीत के नही ला सकदा ?”

“ला सकदा हाँ”

पीठ ठोंक दी बाप ने, और रणजीत सिंह ने कोहिनूर ला के दिखा दिया । ७ साल से १४ साल की उम्र में स्वधिष्ठान केद्र विकसित होने की बड़ी महिमा है । इन दिनों में अगर बच्चा सिगरेटबाज होता है तो सत्यानाश, बुद्धी मारी जाती है, बीडीबाज होता है, पिक्चरबाज होता है अथवा और कुछ होता है तो सत्यानाश....। ७ से १४ साल की उम्र बड़ी नाजुक उम्र होती है इसमें जो संस्कार पड़े वो फिर जीवन की आदत बन जाते हैं ।

३) मणिपुर केंद्र :

१४ से २१ साल की उम्र तक हमारा मणिपुर केंद्र विकसित होता है। १४ से २१ साल तक जितना भी बुद्धि को विकसित करना है, चाहे कितनी ही बुलंदियों पर ले जाओ, जा सकते हो। अपने यहाँ जो बच्चे आते हैं तो उनको सारस्वत्य मन्त्र देते हैं, वो बच्चे कार चला लेते हैं, मुख्यमंत्रियों का स्वागत करते हैं, विश्व-प्रसिद्ध हो जाते हैं। अभी विनय शर्मा, पठानकोट का, बिग बी वाले प्रोग्राम “कौन बनेगा करोडपति” से २५ लाख रूपये जीत के लाया और १० प्रशनों के सही उत्तर दे दिए । लोगों की नजर से ये बड़ा चमत्कार लग सकता है लेकिन ये दो और दो चार जैसी चीज है। बच्चे का ये तीसरा केंद्र विकसित हो बच्चा बुद्धिमान बनेगा ।

४) हृदय केंद्र :

अगले ७ वर्ष चौथा केंद्र, हृदय केंद्र विकसित होता है, उसके हृदय का संकल्प सिद्ध हो जायेगा, आनन्द आयेगा । उससे मिलकर दूसरों को भी अच्छा लगेगा । ऐसे संतो का हृदय केंद्र विकसित होता है तो उनसे मिलकर, उनकी वाणी सुनकर हम लोग उनसे प्रभावित होते हैं, आनंदित होते हैं, लाभ प्राप्त करते हैं । २८ साल की उम्र तक ये चौथा केंद्र विकसित होता है ।

५) विशुद्धाख्या केंद्र :

२८ से ३५ साल की आयु तक कंठ-स्थित केंद्र विकसित होता है, इसे विशुद्धाख्या केंद्र भी बोलते हैं। हम दीक्षा देते समय अथवा जैसा प्रयोग कराते हैं, आप भी इसे करो । लम्बा श्वांस लो, ऊं...ऊं, ...ऊं ....ऊं...ऊं (ऊं माना ॐ ) फिर से गहरा श्वांस लो ऊं..ऊं...ऊं..ऊं...ऊं । मैं सभी साधको को ये विशुधाख्या केंद्र का प्रयोग कराता हूँ। इसके विकसित होने पर आदमी के जीवन में सुख दुःख आये, मान-हानि, भय, दुःख उसकी चोटे लगेंगी नहीं और लगेंगी तो एकदम सामान्य हो जायेंगी। जैसा अमृत तैसी विष्खाती, जैसा मान तैसा अपमान । हर्ष शोक जाके नहीं, वैरी मित्र समान...कह नानक सुन रे मना मुक्त ताहि को जान । ये केंद्र मोक्ष के द्वार जाने में बड़ी मदद करता है। संसार के दुःख चिपकेंगे नहीं, चिंताएं चिपकेंगी नहीं, कर्म-बंधन चिपकेगा नहीं ऐसा ये निर्लेप बना देगा । ये करने वाले को हाईपो-थायराइड, थायरायड नहीं होगी और है तो फिर बढ़ेगी नहीं, नियंत्रित हो जायेगी। आजकल होमियोपैथी ने कुछ युक्तियाँ निकाली हैं, जिनसे ये बीमारी चली भी जाती है। मन्त्र-जाप से भी थायरायड भाग जाता है ।

चक्रों के प्रतीकात्मक वैदिक नाम | Vedic cycles symbolic name

६) आज्ञा चक्र अथवा आज्ञा-केंद्र 

इसके बाद जहाँ मैं तिलक लगाता हूँ, इसका बहुत महत्व है । यह षष्टम केंद्र है, जो अगले सात वर्ष के समय में विकसित होता है। ऊपर के पाँचों केन्द्रों की सफलता इस केंद्र द्वारा अर्जित होती है। इस केंद्र को मैंने जोगियों के श्रृंगार का केंद्र कहा है । इस आज्ञा चक्र की खोज कर वैज्ञानिकों को हैरानी हुई कि हिन्दू लोग जब भी कोई शुभ कर्म करते हैं तो यहाँ ललाट पर तिलक

क्यों करते हैं ? और माइयों को ऋषिओं ने यहाँ हमेशा अवश्य तिलक करने का आदेश क्यों दिया ? इसको आज्ञा-चक्र अथवा आज्ञा-केंद्र भी बोलते हैं और अंग्रेज इसे पीनियल ग्रंथी (Pineal Gland) भी बोलते हैं। यह चक्र विकसित होने से पाप-नाशनी ऊर्जा प्राप्त हो जाती है ।यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किन्नर, अप्सराएं उस योगी के वश में हो जाती हैं ।

उक्त पाँचों केन्द्रों के विकास से जो फायदे हैं, उनके फल से यहाँ ......(यहाँ जहाँ लाल तिलक किया है न मैंने, चन्दन के ऊपर) बहुत फायदा होता है ।इस चक्र पर ध्यान करने से वासना से मुक्ति प्राप्त हो जाती है । योग में ये राजा है । सामान्य महिलायें तो श्रृंगार करती हैं ठीक दिखने के लिये, पतिव्रता श्रृंगार करके यहाँ तिलक करती है ताकि निर्मल औषधियों के उपयोग से माहोल भी अच्छा रहे और पति की आयुष्य और ओज भी बढे। संत जब यहाँ श्रृंगार करता है तो चन्दन केसर का यूँ तिलक करेंगे और फिर बीच में तीला करेंगे। बोलने से वायु, प्राण-वायु ऊपर को होती है, केसर वायु शमन करता है और सिर गर्म हो जाए तो चन्दन उसको नियंत्रित करता है, उसके साथ साथ आध्यात्मिक ओरा के साथ भगवान के अनुभव हों.... भगवान की चेतना को, भगवान के मांगल्य को जोड़ने वाला ये आज्ञा-चक्र को सुविकसित करके जब हम बोलते हैं तो समाज का भला होता है। इसलिय मैं तिलक करके यहाँ तो आ सकता हूँ लेकिन कुटिया में कभी भी मैं श्रृंगार कर के नहीं जाता । जब भी करूंगा तो लोगो के बीच करूंगा ताकि लोग भी इस छ्टे केंद्र की मह्त्ता को समझें।

माइयां बेचारी ठगी गयी, ये तो है छ्टे केंद्र को विकसित करने का तिलक, सिन्दूर का तिलक, कुंकुम का तिलक, तुलसी की मिटटी का तिलक, चन्दन का तिलक, गौ-धूलि का तिलक, ये सब विकास के लिए है लेकिन माईओं के साथ आजकल बड़ा जुल्म हो रहा है। प्लास्टिक की बिंदी लगाती हैं, मरे हुये जानवरों के अंगो से बना हुआ चिपकाने वाला केमिकल लगाती हैं। विकास की जगह पर विनाश होता है। प्लास्टिक की बिंदी नहीं लगानी चाहिये । ऐसा तिलक करने का फायदा नहीं होता, सिन्दूर का तिलक करें, तुलसी की मिटटी का तिलक करें, पीपल की मिटटी का तिलक करे, गौ-धूली का तिलक करें-इससे फायदा होता है, जैसे मैंने अब किया है चन्दन केसर का तिलक । ये तुम्हारे जीवन मे दिव्य साहस और दिव्य सूझबूझ ले आता है। बाहर की डिग्रीयां कितनी भी क्यों न हो, लेकिन अगर अंदर के ये केंद्र अगर विकसित नहीं हैं तो २०-२५-४० हजार की नौकरी कर के जरा जरा बात में दुखी, जरा जरा बात में परेशान, जरा जरा बात में टेंशन, जरा जरा सी बात में आकर्षण – ऐसा कर कर के जीवन ख़त्म हो जाता है।

भगवद-ज्ञान से ही दुःख-निवृति एवं परमात्म-प्राप्ति :      

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी महाराज को सोने के सिंहासन पर बैठा कर सोने की चौखट पर उनके चरण धोये और खूब स्तुति करके पूछा कि महाराज, आज्ञा हो तो एक सवाल पूछूं ?

“पूछो, राजन”’, महाराज ने कहा ।

“मनुष्य को अपने जीवन काल में कौन सी महत्वपूर्ण चीज जान लेनी चाहिए? और मौत नजदीक हो तो उस समय मनुष्य को क्या करना चाहिये ?”

राजा परीक्षित का सवाल सुनकर शुकदेवजी महाराज ने राजा को खूब खूब शाबाशी दी, धन्यवाद दिया कि राजन, ये जो तुम्हारा सवाल है जो भी सुनेगा और मेरा जवाब सुनेगा वह बुद्धिमान बनेगा, निष्पापी होगा ।

तस्मात् सर्वात्मना राजन हरि अभिधीयते,

श्रोतव्य कीर्तितव्यस्य समृतितव्य भग्वदोनिर्माण ।

हे राजन, मनुष्य को जन्म के साथ, भगवान के स्वरूप का ज्ञान पा ले कि भगवान क्या है, कैसे हैं, और कैसे मिलते हैं ?  भगवान के स्वरूप का ज्ञान पायेगा, भगवान के स्वभाव का ज्ञान पायेगा तो मनुष्य निर्दुख हो जायेगा और भगवान को आसानी से पा लेगा और भगवान को पाने के सिवाय कुछ भी पाया तो निर्दुख नहीं होगा। सोने की लंका भी मिल गयी, फिर भी रावण निर्वासनिक नहीं हुये निर्दुख नहीं हुये लेकिन शबरी भीलन ने मत्तंग गुरु के चरणों मे भगवान का ज्ञान पाया, अंतरात्मा तो भगवान से मिल गयी, और दशरथ-नंदन भगवान रामजी भी उसके द्वार पर खींचे चले आये । भगवान का ज्ञान बड़ा महत्व-पूर्ण है तो भगवान का ज्ञान पाना चाहिए और भगवान की कीर्ति गानी चाहिए । अभी तुमने ‘हे प्रभु, आनन्द-दाता’ पाठ किया न.........दिव्य जीवन हो हमारा...तुच्छ जीवन किस को बोलते हैं और दिव्य जीवन किस को बोलते हैं ?

इस जन्मने-मरने वाले शरीर को जो मैं मानते हैं, मैं बूढा हो गया, मैं जवान हो गया, मैं फेल हो गया, मैं दुखी हो गया, मैं सुखी हो गया....जरा जरा बात मे शरीर के साथ जुड़कर जो मैं मानते हैं सो तो शरीर है । शरीर बीमार है तो निगुरे बोलते हैं कि मैं बीमार हूँ...मन में दुःख आया तो बोलते हैं कि मैं दुखी हूँ...ये तुच्छ जीवन है । दुःख मन में आता है, सुख मन में आता है, दुःख-सुख मानसिकता है, बीमारी तंदरुस्ती शारीरिक है, राग-द्वेष बौद्धिक है, चिंता चित्त में होती है....इन सब को जानने वाला मैं आत्मा हूँ, मैं चैतन्य हूँ, मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं । भगवान सत्य हैं, भगवान चेतन-स्वरूप हैं, भगवान आनन्द-स्वरूप हैं, जो कभी मरते नहीं, कभी बिछुड़ते नहीं और कभी बेवफाई नहीं करते ..... वह भगवान मेरा आत्मा है, वह भगवान मेरा चिदघन चैतन्य है, वह भगवान मुझसे दूर नहीं, मैं भगवान से दूर नहीं....इस प्रकार का जो भगवत-तत्त्व का ज्ञान है, भगवद-शान्ति देने वाला ज्ञान है, भगवद-प्रसादयामती बनाने वाला जो ज्ञान है, उस ज्ञान को पा लेने से सारे दुःख सदा के लिए चले जाते हैं। तरती शोकम आत्मवित ।

“कभी न छूटे पिंड दुखो से, जिसे न ब्रह्म का ज्ञान मिले” जिसने ब्रह्म-ज्ञान नहीं पाया उसका दुखों से कभी पिंड नहीं छूट सकता । मेरा एक शिष्य है, बोलता है कि बाबा, बी०ए० बी०एड० किया, एम०ए० एम् एड० किया, पी०एच०डी० किया फलाने फलाने विषयों पर...विशेष अंक प्राप्त करने वाला विद्वान् बना, बाबा मैंने डी० लिट् किया मेरे पास फलानी फलानी डिग्रियां है, हिदुस्तान समेत ६ देशों मे सर्वोपरि विद्वान आपका ये दास है, मेरा नाम रूप-नारायण है। मेरठ में रहते हैं । डिग्रियां तो इतनी हैं कि ६ देशों में सर्वोपरि विद्वान माना गया, लेकिन बाबा आपसे दीक्षा के बाद जो शान्ति मिली और जीवन का भेद पता चला वो कुछ और ही है । यह भगवद-ज्ञान की महिमा है ।

मनुष्य को जीवन-काल में भगवद-ज्ञान पा लेना चाहिये । भगवान के दिव्य-गुणों को सुमिरण करके अपने अंतर में जो भगवान छिपा है उसको जागृत कर लेना चाहिये । जैसे जंगल में आग लगने पर समझदार प्राणी पानी में खड़े हो जाते हैं और जंगल की आग की लपटों से बच जाते हैं । ऐसे ही संसार में दुःख, शोक, चिंता, लोभ, मोह, भय है, अगर तुरंत भगवद-ज्ञान पा लिया तो उनका निराकरण हो जायेगा और आप दुख मे दुखी होकर अपने जीवन को नीचे नहीं गिराएंगे, सुख में लम्पटू हो कर अपने जीवन को खोखला नहीं बनायेंगे। आपको पता चलेगा कि सुख और दुःख के विकास के लिए भगवद-नियम हैं । सुख आता है परोपकार के लिए, उदारता के लिये, अंतरात्मा का आनन्द जगाने के लिये और दुःख आता है संयमी होने के लिए, सावधान होने के लिये, अनासक्त होने के लिये, दुःख-हारी में विश्रांति पाने के लिये। जो सुख का भोगी होता है, दुःख से बच नहीं सकता और जो दुःख का भोगी है वो भी बार बार दुखों की चपेटों में आये बिना बच नहीं सकता ।

कुण्डलिनी शक्ति | Kundalini Shakti

भगवद-ज्ञान ये सिखाता है कि आप सुख के भोगी मत बनो सुख का उपयोग करो, उपभोग मत करो। दुःख के भोगी मत बनो दुःख का उपयोग करो तो क्या होगा कि सुख और दुःख तो स्वाभाविक आते जाते हैं, आप इनका उपयोग करोगे तो ये उपाय बनते जायेंगे और आपकी ऊंचे केन्द्रों में यात्रा हो जायेगी । lord krishna ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में क्या दिया - यही सत्संग कि

सुख और दुःख पर पैर रख के आत्मा की अमरता को पहचानना । अर्जुन सखा भाव से भगवान को मान रहा था । भगवान ने देखा कि ये सखा भाव से दिए गये ज्ञान को सुना-अनसुना करता है । उस समय जितनी ऊंचाई को इंसान छू सका उतनी ऊँचाई पर था अर्जुन । मय दानव ने कहा कि मैं अपनी शक्तियों का उपयोग करके तुम्हे स्वर्ग भेज सकता हूँ लेकिन समय लगेगा, अर्जुन ने कहा कि मैं तुम्हारी वैज्ञानिक खोजों के भरोसे नहीं रह सकता, हम सात्विक खोज के बल से मन्त्र-शक्ति से जायंगे । वह गया और वहां से दिव्य-अस्त्र लेकर भी आया । इस बात को भी ५२३० वर्ष हो गये लेकिन मय दानव के परिवार वाले ये वैज्ञानिक अभी तक भी स्वर्ग में पहुंचाने वाला यान नहीं बना सके । अर्जुन इतनी अधिक ऊंचाइयों को छुआ हुआ व्यक्ति था ।

अप्सराओं में श्रेष्ठ उर्वशी अर्जुन के पराक्रम को और सौन्दर्य को देखकर, देह की सुन्दरता को देखकर लालायित हो गयी थी और कहती है कि तुम मेरे से विवाह कर लो । अर्जुन ने कहा कि नहीं माता...मैं तो आपको प्रणाम करता हूँ, ऐसा व्यक्ति हो गया वो । वह कहती है “मैं तुम पर मोहित हो गयी हूँ, विवाह अगर नहीं करते तो कम से कम एक बार तुम मेरे साथ विश्राम करो”  आप समझ ही गए होंगे मतलब कि एक बार अपना मुंह काला करो मेरे साथ......। अर्जुन ने कहा कि ये नहीं हो सकता । बोली-“अर्जुन, तुम्हे पता है कि काम जब जागता है तो क्रोध का रूप भी ले लेता है। अगर तुम मेरी इच्छा पूरी नही करोगे तो मुझे क्रोध आयेगा और मैं तुम्हे श्राप दे दूंगी” अर्जुन कहता है कि तुम श्राप दे दोगी तो मैं स्वीकार कर लूँगा लेकिन कमर-तोड़ कार्य-क्रम करके मैं अपना सत्यनाश नहीं करूंगा । “जा...एक साल के लिये नपुंसक हो जा”, उसने श्राप दे दिया । एक साल के लिए नपुंसक होने का श्राप अर्जुन ने स्वीकार कर लिया लेकिन अपना संयम नहीं खोया, इतनी ऊंची सूझ-बूझ का धनी था ।

फिर भी भगवद-ज्ञान के आभाव में, भगवान स्वयं जिसका रथ चला रहे हैं, ऐसा वो अर्जुन विषाद में पड़ गया, गीता में आता है-विषाद-योग । भगवान समझाते हैं, दिव्य रूप दिखाते हैं, विराट रूप दिखाते हैं अर्जुन भयभीत हो जाता है । विषाद माना दुःख में घिरा, भय में घिरा । अर्जुन को देखा भगवान ने कि आत्म-विद्या के बिना इसको स्वस्थ नहीं किया जा सकता तो भगवान ने कहा, “अध्यात्म किमुच्ते ?” अध्यात्म क्या होता है ? “आदिदेविकमुचते” आधिदैविक क्या है ? “आदिभौतिकम किमुच्ते?” आदिभौतिक क्या होता है ? इतनी अधिक ऊँचाई पाया अर्जुन भी नही समझ पाया कि आध्यात्मिक ज्ञान क्या होता है, आदिदैविक क्या होता है, आदिभौतिक क्या होता है । भगवान ने अर्जुन को आध्यत्मिक प्यास जगाई, भूख जगाई तो अर्जुन नतमस्तक हो गया और कहता है कि मैं आपका शिष्य हूँ । अर्जुन को फिर भगवान ने बताया कि ये पंचभूत से उत्पन्न सारी सृष्टी आदिभौतिक है, इसको चलाने वाली सत्ता आदिदैविक है । आप इसे यूं समझो कि एक बस है, ये आदिभौतिक है, उसमे जो इंजिन है वो आदिदैविक और ड्राइवर के मन में जो स्फुरणा और चेतना है वो आध्यात्मिक ज्ञान है । अकेला ड्राइवर इतने यात्रियों को नहीं ले जा सकता, अकेली इंजिन भी स्वयम नहीं दौड़ सकती अकेली बस भी स्वयम नहीं दौड़ सकती, जैसे बस, इंजिन और ड्राइवर के होने से ही बस यात्रा होती है ऐसे ही आदिभोतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिकता से ही ये सृष्टी चलती है । आदिभौतिकता प्रकृति के राज्य में है, आदिदेविकता प्रकृति के राज्य में है, लेकिन प्रकृति को सत्ता देने वाला अपना आत्मा आद्यात्मा है । जैसे बचपन बदल गया लेकिन उसको जानने वाला आद्यात्म-आत्मा नहीं बदला, वो आत्मा परमात्मा का ज्ञान है, मन बदल जाता है लेकिन मन को जानने वाले तुम नहीं बदले। बुद्धि बदल जाती है, सुख बदल जाते हैं, दुःख बदल जाते हैं फिर भी एक ऐसा है, जो नहीं बदलता । जो नहीं बदलता, वो नारायण है, नर नारी का आयन है उस नारायण को जान कर उसमे विश्रांति पा लो उस नारायण के साथ जो अपनी एकता है, वो है बस उसको केवल जानना है, जान लो तो अर्जुन तू शोक से तर जायेगा, दुखों से तर जायेगा फिर युद्ध करेगा, सभी को मार देगा तो भी तेरे को पाप नहीं लगेगा ।

सुख में तू लिप्त न होना, और दुःख में भी तू चलायमान न होना । अर्जुन को जब ये आत्म-ज्ञान मिला तो कहता है, “नष्टो मोह, स्मृति लब्ध्वा” - अब मेरी नासमझी चली गयी और अपनी आध्यात्म स्मृति आ गयी । “करिष्ये वचनमत्वा” – अब मैं तुम्हारे वचनों का पालन करूंगा । भगवान साथ में है फिर भी अर्जुन का दुःख नहीं मिटा लेकिन भगवद-तत्त्व का ज्ञान भगवान की कृपा से मिला तो अर्जुन का दुःख टिका नहीं और सुख मिटा नहीं ।

मनुष्य को जीवन-काल में भगवद-ज्ञान पा लेना चाहिए । आपने भगवान का ज्ञान तो पा लिया लेकिन केवल रटे रटाये ज्ञान से काम नहीं चलेगा, भगवान की स्मृती चाहिए । भगवान की स्मृती से जो सुख मिलता है, जो भगवद-रस मिलता है, संसार का कोई भी सुख उसकी बराबरी नहीं कर सकता, फिर संसार के सुखों के पीछे तुमको दौड़ना नहीं पड़ेगा,यश के पीछे तुमको दौड़ना नहीं पड़ेगा । सारा सुख और यश तो तुम्हारे पीछे पीछे चलेगा और किसी पर ऐसा महापुरुष कृपा कर दे तो वह भी यशस्वी हो जाता है । जैसे शबरी पर कृपा कर दी मत्तंग ऋषि ने तो शबरी भीलन यशस्वी हो गयी। मीरा पर रहीदास ने कृपा कर दी तो मीरा यशस्वी हो गयी । प्रहलाद पर नारद जी की कृपा हो गयी तो प्रहलाद यशस्वी हो गए-ऐसे हजारों दृष्टांत आपको मिल जायेंगे ।

आपको क्या करना चाहिए....भगवद-ज्ञान पाकर भगवद-स्मृति करते हुये अपने जीवन में भगवद-रस का आनन्द लेना चाहिए । बाबाजी ये कैसे करे....तो आज सुबह भगवद-रस लेने की एक तरकीब आपको सिखाई थी। अपने बच्चों को भी यह सिखाओ और ये रस बढाते बढाते तुम्हे रस-स्वरूप भगवान में शयन करना होगा। जो भगवान के विषय में सुनाया था .... पहले तो अपने कमरे को गाय के गोबर या कंडे से खूब देदीप्यमान करो अथवा गो-चन्दन अगरबत्ती जलाकर उस पर थोड़ी घी की या सरसों के तेल की बूंदे डाल दो । खिड़कियाँ बंद कर दो, दरवाजे बंद कर दो और दिया जलाओ मैं भी हमेशा सुबह यही करता हूँ और फिर कच्छा पहन कर रोम-कूपों और श्वशोश्वास से वही वायु ग्रहण करता हूँ । प्राणायाम भी उसी में करता हूँ, आसन भी उसी में करता हूँ ।

हम एक किलो तो भोजन करते हैं, दो किलो पानी पीते हैं, दस किलो ऊर्जा हम प्राण-वायु से लेते हैं और प्राण-वायु जब इतनी शुद्ध और भव्य हो तो शरीर भी सुदृढ़ रहता है, रोग-प्रतिकारक शक्ति भी बनी रहती है।

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दिन-चर्या कैसी होनी चाहिए ?

हमारी जीवनी-शक्ति २४ घंटे में १२ केन्द्रों में घूमती है । सुबह ३ से ५ हमारी जीवनी-शक्ती फेफड़ों में होती है । ४-३० से ५ के बीच आप कस के प्राणायाम करो तो आपका प्राण-बल बढ़ जायेगा, मनोबल बढ़ जायेगा, बुद्धिबल बढ़ जायेगा, रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ जायेगी । ५ से ७ जीवनी-शक्ति आँतों में

होती है, उस समय कसरत कर ले अथवा आंतो को फायदा मिले इसके लिए पाद-पश्चिमोत्तान आसन कर लें। सूरज उगने के ५-१० मिनट पहले पानी पी ले, घूम-घाम लें और ७ से पहले पहले शौच करके अपना पेट साफ कर लें। पेट की बीमारीयाँ नहीं होगी, कोई दवाइयों की जरूरत नहीं है ।

७ से ९ आमाशय में जीवनी-शक्ति होती है, उस समय कुछ पेय पी लें आपका पाचन और हौसला बुलंद रहेगा लेकिन चाय कोफी आदि में तो दस प्रकार के जैसे कैफीन आदि कई प्रकार के द्रव्य पाए गए हैं जो कि पाचन तंत्र को नुक्सान पंहुचाते हैं। चाय हृदय को, किडनी आदि कई अंगो को नुक्सान करती है। ये मैने आपको विस्तार से वैज्ञानिक भाषा में आपको बताया है ।

९ से ११ जीवनी-शक्ती अग्नाशय मे रहती है । ९ से ११ के बीच भोजन कर ले, आपका स्वास्थय बढ़िया रहेगा, लम्बी उम्र के धनी बनोगे।

११ से १ आपकी जीवनी-शक्ति हृदय में होती है । हृदय को विकसित करने वाले पाठ, ध्यान, सुमिरण आदि इस समय करने चाहिए ।

१ से ३ आपकी जीवनी-शक्ति छोटी आंत में होती है । उस समय भूल कर भी आपने खाना नहीं खाना है । खाना खाया तो खाना ख़राब और तबीयत भी ख़राब । इस समय छोटी आंत, ११ से ३  के बीच जो भोजन किया तो उसका कच्चा रस अथवा भोजन में से जो सार-रस निकला उसको छोटी आंत अपनी ओर खींचती है तथा सारे शरीर में भेजती है । बाक़ी का कचरा बड़ी-आंत की ओर टायलेट के लिये धकेल देती है । यदि इस समय कुछ खाओगे तो उसका कच्चा रस चला जायेगा , उसका कच्चा रस अथवा भोजन में से जो सार-रस निकला उसको छोटी आंत अपनी ओर खींचती है तथा सारे शरीर में भेजती है । बाक़ी का कचरा बड़ी-आंत की ओर टायलेट के लिये धकेल देती है । यदि इस समय कुछ खाओगे तो उसका कच्चा रस चला जायेगा। बीमारियों की खोज हो गयी, दवाओं की खोज हो गयी, डाक्टर भी बढ़ गए, औषधीयाँ भी बढ़ गयी लेकिन फिर भी फलानी खराबी, फलानी खराबी ....नयी नयी बीमारिया बढ़ गई क्योकि खान-पान के सारे नियम उलटे हो गए । अगर इस समय भोजन करते हैं तो शरीर मोटा हो जायेगा लेकिन अंदर कमजोरी महसूस होगी । रोग पकड़ लेंगे ।

३ से ५ जीवनी-शक्ति मूत्राशय में होती है । भरपेट पानी पी लें। पानी पीके तुरंत पेशाब न करें और पेशाब करके भी तुरंत पानी न पीयें । पानी पीकर ५-२५ मिनट बाद पेशाब कर ले तो पेशाब संबंधी बीमारियाँ आपको नहीं होगी ।

५ से ७ जीवनी-शक्ती गुर्दे में होती है । उस समय प्राणायाम करके संध्या करके भोजन कर ले तो आपको स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। यदि दिमागी लाभ लेना हो तो फिर ७ से ९ तक जब जीवनी-शक्ति मस्तक में रहती है, उस समय शास्त्र, ध्यान अथवा जो भी दिमाग को बढाने वाला काम करना चाहें, अंक अच्छे लाने हो तो भी यह समय सर्वोत्तम है । जीभ तालू में लगा दो, अंक अच्छे आयेंगे, याद-शक्ति बनी रहेगी। आप अपने बच्चों को तुलसी के तीन चार पत्ते दिया करो अथवा तुलसी होमियोपैथी की एक गोली। इतनी बड़ी बोतल ३० रूपये की मिलेगी और दो साल चलेगी । तुलसी के सेवन के बड़े फायदे हैं।

९ से ११ जीवनी-शक्ति मेरु-रज्जू में होती है । ९ से ११ के बीच की नींद सारी थकान मिटा देती है। कितने भी थके थकाये हो, ९ बजे सो जाओ, फिर देखो फायदा। लेकिन ९ बजे खा-पी के सोओगे तो नींद नहीं आएगी। कम खाना है और ५ से ७ के बीच खा लेना अथवा ८ बजे तक खा लेना है और ९ बजे सो जाना। नींद आ गयी तो जवानी बरकरार ।

११ से १ जीवनी-शक्ति नयी कोशिकायें बनाती है। ११ से पहले सो गए तो जवान बने रहोगे, ११ के बाद जगे तो तुम्हारी खैर नहीं। जब से ये टी० वी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया तबसे बेचारे युवक युवतियों पर बड़ा अन्याय हो रहा है। चिडचिडे हो गए, याद-शक्ति कमजोर हो गयी, जीवन तनाव वाला हो गया, टेंशन वाला हो गया। १० के बाद सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ११ के बाद जागना तो मुसीबत है। जागरण से शीघ्र बुढापा आयेगा और सिर-दर्द, नेत्र रोग, अनिद्रा आदि होगा और चिडचिडा स्वभाव हो जायेगा।

१ से ३ जीवनी-शक्ति यकृत में, लीवर में रहती है। इस समय पति-पत्नी का व्यवहार करने के लिए भी नहीं जागना चाहिए। इस समय गहरी नींद के अन्यथा कुछ न करे। अगर व्यक्ति १ से ३ के बीच जगता है तो पाचन-तंत्र कमजोर हो जायेगा। इस समय जगाने वाले की दृष्टी और बुद्धी मंद हो जाती है, शारीरिक प्रतिक्रियाएं मंद हो जाती हैं। रात का जागरण प्राकृतिक नियम के खिलाफ है। रात्री की डियूटी से बचना चाहिए। अगर आपको रात्री की डियूटी से मान लो ४०००० रूपये मिलते हैं और दिन की डियूटी से २०००० रूपये मिलते हैं तो वह ४०००० रूपये तुम्हारे लिए बेकार हैं क्योंकि जीवनी-शक्ति का नाश होता है। रात्री का जागरण ठीक नहीं।

अब आप लोग अपना जीभ तालू में लगाओ और श्वांस जो चल रहा है, उसको देखो स्वांस अंदर गया, भगवान का नाम, बाहर आया गिनती, इससे आपका मन थोडा नियंत्रित रहेगा। निर्णय अच्छे आयेंगे, थोड़ी देर करो। तुमने जो अच्छे काम किये, उनको ईश्वर को अर्पण कर दो और कुछ गलती हो गयी है तो उसके लिए क्षमा याचना करो। अपने कमरे को धुप वगेरा से कभी कभार शुद्ध कर लिया करो, लम्बा श्वांस लो, बाएँ नाक से श्वांस लो, उसमे भगवान का नाम भरो ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ...मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं, मैं उनके नाम का जप करूंगा। फिर दायें नाक से श्वांस भरो – मैं परमेश्वर का हूँ, परमेश्वर सत है, चेतन है, आनन्द रूप है मेरा आत्म-रूप है ॐ ॐ प्रभु ॐ। ऐसा दस पांच बार करो फिर दोनों नथुनों से गहरा श्वांस लो, अब श्वांस रोको, हे प्रभु आप सत रूप हो, चेतन रूप हो आनन्द रूप हो, मेरा आपका सम्बन्ध कभी नहीं मिटता, शरीर और संसार का सम्बन्ध कभी टिकता नहीं और आत्मा परमात्मा का सम्बन्ध कभी मिटता नहीं। ॐ ॐ ॐ ॐ आनंद ...ॐ ॐ ......ॐ ॐ ॐ ......(दीर्घ ॐ गुंजन प्रयोग)...(देव-हास्य प्रयोग।

दिव्य-प्रेरणा पुस्तक में एक मन्त्र लिखा है, इस मन्त्र को २१ बार जप करके दूध में देखोगे तो इसके प्रयोग से बुद्धि बढ़ेगी, बल भी बढेगा। ये लोक-कल्याण पुस्तक है, इसमें भी लौकिक व्यवहार में आपका कल्याण हो, ऐसी बाते लिखी हैं। ये सर्वधर्म नामक पुस्तक है, पढोगे तो आपका दिमाग खुल जायेगा, इसमें सब धर्मों के साथ साथ इसमें विश्व के विद्वानों के वचन हैं।

दिन में आप जो भी व्यवहार करो बार बार भगवान की स्मृति करो, तो भगवान कहते है – तस्याहम सुलभं पार्थ । कोई भी मर जाये, दादा, दादी, माँ, पापा तो तुलसी की लकड़ी से उनका अग्नि-संस्कार करने से उनकी दुर्गति नही होती, सद्गति होगी। तुलसी की माला धारण करके जप करके कोई भी पुण्य कर्म करोगे तो उसका फल हजार गुना हो जाता है। मैं भी तुलसी की माला पहनता हूँ, हेलीकाप्टर गिरा धड़क-धुम्म...किसी को भी कुछ नहीं हुआ। भगवान के नाम जाप किया हो तो उसको हार्ट अटैक नही होता, हाई बी पी नहीं होता।

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