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रक्षाबंधन धार्मिक महत्व और कुछ चर्चित कथाएं

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रक्षाबंधन का क्या महत्व है

यह पर्व प्रतिवर्ष श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार भाई के प्रति बहन के पवित्र स्नेह एवं रक्षा हेतु मनाया जाता है। यह त्योहार सब रोगों का नाशक तथा सब अशुभों को नष्ट करने वाला है। इसका देवराज इंद्र की जीत के लिए इंद्राणी ने अपनाया था, जिससे उसकी दोनों लोकों में विजय हुई।

यह त्योहार विजय, सुख, पुत्र, पौत्र, धन और आरोग्य का दाता है। रक्षाबंधन का सामान्य अर्थ किसी को अपनी रक्षा के लिए बांध लेना ही समझा जाता है। भाई को राखी बांधते समय बहन यही अपेक्षा करती है कि वह हर प्रकार से उसकी रक्षा करेगा।

वैसे तो रक्षाबंधन की कई कथाएं हैं लेकिन यहां कुछ चर्चित कथाएं हम दे रहे हैं। इनमें से पहली कथा का धार्मिक महत्व है, जिसे रक्षा बंधन की पूजा में सुनाया जाता है। बाकी की कथाएं भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक से संबंधित हैं।

रक्षा बंधन कथा 1

एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा रक्त बहने लगा। द्रौपदी ने जब यह देखा तो उसने तुरंत अपनी धोती का किनारा फाड़कर उनके हाथ में बांध दिया। इसी बंधन के ऋणी श्रीकृष्ण ने दुःशासन द्वारा चीर हरण के समय द्रौपदी की लाज बचाई थी।

रक्षा बंधन कथा 2

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- ‘हे अच्युत! मुझे रक्षा बंधन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।’

भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।

ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।

दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियां कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूं और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूं। कोई उपाय बताइए।

वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।

‘येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।’

इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। ‘रक्षा बंधन’ के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बांधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।

रक्षा बंधन कथा 3

कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा बलि देवताओं के स्वर्ग को जीतने के लिए यज्ञ कर रहा था। तब देवराज इंद्र ने विष्णुजी से प्रार्थना की कि वे राजा बलि से सभी देवताओं की रक्षा करें। इसके बाद श्रीहरि वामन अवतार लेकर एक ब्राह्मण के रूप में राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। ब्राह्मण ने बलि से दान में तीन पग भूमि मांगी। बलि ने सोचा कि छोटा सा ब्राह्मण है, तीन पग में कितनी जमीन ले पाएगा। ऐसा सोचकर बलि ने वामन को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया।

ब्राह्मण वेष में श्रीहरि ने अपना कद बढ़ाना शुरू किया और एक पग में पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में पूरा ब्राह्मांड नाप लिया। इसके बाद ब्राह्मण ने बलि से पूछा कि अब मैं तीसरा पैर कहां रखूं? राजा बलि समझ गए कि ये सामान्य ब्राह्मण नहीं हैं। बलि ने तीसरा पैर रखने के लिए अपना सिर आगे कर दिया। ये देखकर वामन अवतार प्रसन्न हो गए और विष्णुजी के स्वरूप में आकर बलि से वरदान मांगने के लिए कहा।

राजा बलि ने भगवान विष्णु से कहा कि आप हमेशा मेरे साथ पाताल में रहें। भगवान ने ये स्वीकार कर लिया और राजा के साथ पाताल लोक चले गए। जब ये बात महालक्ष्मी को मालूम हुई तो वे भी पाताल लोक गईं और राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उसे भाई बना लिया। इसके बाद बलि ने देवी से उपहार मांगने के लिए कहा, तब लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को मांग लिया। राजा बलि ने अपनी बहन लक्ष्मी की बात मान ली और विष्णुजी को लौटा दिया।

मान्यता है कि तभी से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है। हर साल बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं और भाई बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं।

रक्षा बंधन कथा 4

चित्तौड़ की महारानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से अपने राज्य को बचाने के लिए सम्राट हूमायूं को राखी भेजी और उनसे वह अपनी रक्षा की गुहार लगाई। हुमायूं ने भी उनकी राखी स्वीकार की और अपने सैनिकों के साथ उनकी रक्षा के लिए चित्तौड़ की ओर रवाना हो गया। हालांकि हुमायूं के चित्तौड़ पहुंचने से पहले ही रानी कर्णावती ने आत्महत्या कर ली। इस कहानी ने राखी के त्‍योहार को सभी धर्म और रिश्तो सें परे कर एक सामाजिक त्योहार बना दिया।

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