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उत्तम आचरण ही धर्म है

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धर्म का अर्थ आदर्श आचरण – उत्तम आचरण ही धर्म है

एक बात को जीवन में धारण करेंगे तो उससे आपका परेम कल्याण होगा। सबको अपने मन में दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि भगवान को हरदम याद रखने से साधन में उत्तरोत्त वृद्धि होती है और हमारा कल्याण हो सकता है। ऐसे दृढ़ विश्वास के साथ भगवद् प्राप्ति के साधन में पूरे प्रयत्न के साथ लग जाना चाहिए।

उन्नति की ऐसी आशा रखनी चाहिए कि जल्दी से जल्दी भगवान की अनुभूति हो जाए। साथ-साथ यह भी देखते रहना चाहिए कि हमारी उन्नति हो रही है कि नहीं? जैसे हम अपने किसी प्रिय व्यक्ति के आगमन की प्रतीक्ष करते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक विकास की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस तरह भगवान में विश्वास बढ़ाकर अपना कल्याण साध लो ।

अपने मन में बसे हुए दुर्गुण-सदाचारों को दूर करने के लिए मन में हिम्मत रखनी चाहिए। दुर्गुणों का भगवद् कृपा से नाश हो जाना कोई कठिन नहीं है। भगवान का भजन करने से उनकी कृपा से दुर्गुणों का नाश बहुत जल्दी हो जाता । प्रयत्न करने पर भी अपने दुर्गुण यदि कम न होते हों तो अपने में खोज करनी चाहिए कि उनके कम नहीं होने के कारण क्या हैं ? कहीं साधना में तो कोई भूल नहीं हो रही है। इस तरह अपने मन से ही पूछकर जो दोष नजर में आएं उन्हें दूर करना चाहिए ।

हालांकि अपने अंदर छिपे हुए दोषों को दूर करने में कठिनाई अवश्य है, फिर भी भगवत् कृपा के आधार पर ऐसी उम्मीद रखनी चाहिए कि प्रयत्न करते रहने से वे दूर अवश्य होंगे। सद्गुण-सदाचार के बारे में तो ऐसा विश्वास रखना चाहिए कि उनकी प्राप्ति तो अनायास ही हो जाती है। ऐसा विश्वास रखना बड़ी लाभ की बात है। उत्तम आचरण अर्थात् सद्गुण-सदाचार को ही धर्म कहा जाता है और उस धर्म का फल होता है इहलोक और परलोक का सुख। धर्म के आचरण के

द्वारा जो इहलोक या पारलौकिक सुख की चाहना करते हैं, उनकी ऐसी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है और जो अपना लक्ष्य भगवद् प्राप्ति का रखते हैं उनको भगवान की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए हमें यह जान लेना चाहिए कि दुर्गुणों से हमारा पतन होता है और सद्गुण-सदाचारों से हमारा हित है।

अंतःकरण की मुख्य रूप से दो प्रकार की वृत्तियां होती हैं -एक मनरूप और दूसरा बुद्धिरूप। सामान्यतः मन को दुर्गुण स्वभाव से ही प्रिय लगते हैं और बुद्धि को इनसे खतरा लगता है। इसलिए बुद्धि उनका विरोध किया करती है। ज्यादातर मन और बुद्धि के इस प्रकार के झगड़े में मन जीत जाता है। इसलिए मन पर विवेक से नियंत्रण कर लगातार उसे समझाना चाहिए। अगर विवेक द्वारा मन में यह बात ठीक से दृढ़ हो जाएगी कि खराब आचरण करने में मेरा पतन है तो फिर वह ऐसा आचरण कभी नहीं कराएगा।

एक बीमार व्यक्ति को वैद्य कहे कि अगर तू अमुक चीज खाना नहीं छोड़ेगा तो मर जाएगा तो फिर वह व्यक्ति उस कुपथ्य का त्याग कर देता है। ‘ इसी तरह हम भवरोग से पीड़ित हैं, अगर हमें अपना रोग और कुपथ्य ठीक से समझ में आ जाए तो सुधार की आशा रख सकते हैं। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सद्गुण, सदाचार और ईश्वर भजन अमृत तुल्य हैं और दुर्गुण, दुराचार , प्रमाद, भोग आदि विष समान हैं। यदि दुर्गुणों को छोड़ने में और सद्गुणों को अपनाने में अपना सामर्थ्य कम मालूम पड़े तो उसके लिए भगवान से सहायता मांगनी चाहिए।

अगर आप सचमुच अपने आपको सुधारना चाहते हैं तो वह कभी असंभव नहीं है। एकांत में भगवान के सामने करुण और गद्गद् कंठ से रो पडो और प्रार्थना करो। अगर भगवान के समक्ष ऐसा गद्गद् भाव जाग्रत न होता। समझना कि अभी हमें पतन का दुख नहीं है। ऐसी समझ की कमी को दूर करने के लिए भी भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। साथ-साथ ऐसा दृढ विश्वास रखना चाहिए कि भगवान अत्यंत दयालु हैं।

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