भक्ति

अनादि है पुराण और इतिहास

श्रीमद्भागवत पुराण में इतिहास और पुराण को पाँचवे वेद की संज्ञा दी गयी है –

इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्र्वर: l
सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्य: ससृजे सर्वदर्शन: ll (श्रीमद्भागवत पुराण ३/१२/३९)

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‘इतिहास और पुराणरूप पाँचवे वेदको समर्थ,सर्वज्ञ ब्रह्माजीने अपने सभी मुखोंसे प्रकट किया l

पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् l
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदा अस्य विनिर्गता: ll (मत्स्यपुराण)

‘समस्त शास्त्रोंमें ब्रह्माजीने सर्वप्रथम पुराणोंका स्मरण किया-उपदेश किया| पीछे उनके मुखोंसे वेद प्रकट हुए l’

कुछ लोग ऐसी भी शंका करते है की श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार जब सत्रह पुराण की रचना करने के बाद उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण की रचना की फिर उसका वर्णन अन्य पुराणों में कैसे है इसका जवाब ये है कि वेद की भांति पुराण भी अनादि ईश्वरीय ज्ञान ही हैं | वेदों की भाँति ही पुराणों की भी परम्परा प्राप्त होती और एक ही मूल पुराण अधिकारी-भेदसे शाखा-भेदके रूपमें विस्तृत हुआ, यह भी पुराणोंसे ही ज्ञात होता है l

भगवान् व्यासने पुराणोंकी नवीन रचना नहीं की l अवश्य ही उन्होंने सृष्टिके प्रारम्भसे चली आती हुई पुराण-परम्पराको, जो बीचमें अस्त-व्यस्त हो गयी थी, व्यवस्थित किया – अपनी वाणीमें उसे सजाया,अष्टादश पुराणोंका उसे रूप दिया l आज जो पुराण प्राप्त हैं, ये यही द्वापरके अंतमें भगवान् व्यासद्वारा व्यवस्थित किये पुराण है l

इस बारे में श्रुति प्रमाण भी है l बृहदारण्यकोपनिषद् जोकि आदि शंकराचार्य द्वारा किये गये उपनिषद में से एक है जिसपर उन्होंने भाष्य किया था उसमे वर्णन है –

य यथाद्रैrधाग्रेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्र्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्र्वसितमेतद्यदृगवेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथवर्णिगिरस इतिहास: पुराणं विद्या उपनिषद: श्लोका: सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतनि निश्र्वसितानि ll ३/४/१० ll

अर्थात जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक धूआँ निकलता है, उसी प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद(arthvved), इतिहास(महाभारत और रामायण), पुराण, विद्या(धनुर्वेद आदि), उपनिषद्, श्लोक,सूत्र, मंत्रविवरण और अर्थवाद हैं वे इस महद्भूत ( परमात्मा) के ही निःश्र्वास हैं l

वेदोंमें समस्त ज्ञान सूत्ररूपसे है और परोक्ष पद्दतिसे वर्णित है l पुराणोंमें जो इतिहास-भूगोल तथा प्राणियोंके वर्णन है, वे पुराणोंको आधुनिक या किसी कालविशेषकी रचना नहीं बताते l भगवान् व्यास अपने ज्ञात इतिहास-भूगोलको लिखने नहीं बैठे थे l जो वेद श्रवण के अनधिकारी थे उनके कल्याण के लिये महाभारत और पुराण है l

इस प्रकार महाभारत और पुराणोंमें वे वेदके अनाधिकारियोंके लिये वही अनादि और अपौरुषेय ज्ञान, जो लुप्त और बिखरा हुआ था, एकत्र करनेमें प्रवृत हुए थे l इसीसे पुराणोंके अर्थके सम्बन्धमें उन्होंने बताया है –

पुराणव्याख्या त्रिधा, आधिभौतिकी आधिदैविकी आध्यात्मिकी च l

पुराणोंकी तीन प्रकारकी व्याख्या होती है, अर्थात् पुराणोंमें एक साथ तीन वर्णन चलते हैं- आधिभौतिक,आधिदैविक और आध्यात्मिक l ये तीनों सत्य है l वस्तुतः तो आध्यात्मिक नित्य जगतके अनुसार ही आधिदैविक भाव-जगत है और उसीसे आधिभौतिक स्थूल जगत व्यक्त हुआ है l तीनों जगत परस्पर सर्वथा अनुरूप हैं l अतएव कोई एक व्याख्या सत्य होनेपर तीनों ही सत्य होंगी l

जो यह लोग कहते हैं कि रामायण एवं महाभारत ह्रदयमें होनेवाले दैव एवं आसुरभावोंके संघर्षके रूपक हैं, वे भौतिक जगतकी घटनाएँ नहीं हैं, वे यह नहीं समझते कि अंतर्जगत ही स्थूल जगतमें व्यक्त होता है l अतएव जो अंतर्जगतका सच्चा रूपक है, उसकी घटनाएँ ठीक ऐतिहासिक ही होंगी l जो स्थूल जगतकी सत्य घटनाओंको छोड़कर रूपक बनाने चलेगा, वह अंतर्जगतका ठीक वर्णन नहीं कर सकता l क्योंकि अंतर्जगत स्थूल जगतसे कहीं वैसादृश्य – असमानता नहीं रखता l

वेदोंमें इतिहास है, भूगोल है, ज्योतिष है, मनुष्य-समाज का वर्णन है, मनुष्य एवं पशु-जातियाँ हैं l जो कुछ विश्वमें हो गया, हो रहा है या होनेवाला है, वह वेदोंमें है l सभी घटनादिके मूलरूप श्रुतिमें न हों तों उसमें पूर्ण ज्ञान है, यह कहा न जा सके l नित्य इतिहास वेदमें है और नित्य भूगोलादि भी – इतिहास और भूगोलादिका वह नित्य अंश जो प्रत्येक सृष्टिमें आवृति करता है l

पुराणोंने वेदोंके उसी रेखाचित्रमें रंग भरकर उसकी आकृतिको स्पष्ट किया है l जैसे वेदोंमें अपरिवर्तनीय इतिहास है l पुराणोंने कल्पभेदसे उनमें जो परिवर्तन होते हैं, उनको भी स्पष्ट कर दिया है l यही दशा भूगोलादिकी है|

उदाहरणार्थ – वेदोंमें देवासुर-संग्राम, श्रीरामचरित, श्रीकृष्णचरित एवं यदु-दुष्यंत आदिका बहुत-सा वर्णन है l यह सब वर्णन वहाँ विस्तृत नहीं है l चरितोंका केवल उतना अंश है, जितना प्रत्येक कल्पमें समान रहता है l पुराणोंमें,इतिहासमें तथा दूसरे शास्त्रोंमें ये चरित अनेक प्रकार से वर्णित हैं, एक ग्रन्थ एक या एकाधिक कल्पकी बात कहता है l इसी प्रकार चरितोंका अन्तर कल्पभेद से होता है l एक प्रलयके पश्चात फिर दूसरा कल्प आता है l उसमें वही चरित अधिकांश ज्यों-के-त्यों होते हैं l अतएव उस कल्पका पुराण भी वही होता है, जो आज है l इस प्रकार पुराण भी नित्य ज्ञान है l

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Pandit Niteen Mutha

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