लाल किताब

ज़बरदस्त चमत्कारी बूटी : हत्था जोड़ी

एक विशेष प्रकार का और दुर्लभ पौधा पाया जाता है, इसका नाम है हत्था जोड़ी। इसकी जड़ को चमत्कारी उपायों में प्रयोग किया जाता है। इस जड़ को हत्था जोड़ी कहते हैं। हत्था जोड़ी इंसान की भुजाओं के आकार की होती है। इसमें दो पंजे दिखाई देते हैं और उंगलियां भी साफ-साफ दिखाई देती हैं। पंजों की आकृति ठीक इसी प्रकार होती है, जैसे मुट्ठी बंधी हुई हो। ज्योतिषीय उपायों में इस जड़ का विशेष महत्व है। यह पौधा विशेष रूप से मध्यप्रदेश के वन क्षेत्रों में पाया जाता है। आमतौर वनवासी लोग इस जड़ को निकालकर बेचते हैं।

Hatha-Jodi-hindi

                                          Hatha Jodi pujan Vidhi

यह जड़ बहुत चमत्कारी होती है और किसी कंगाल को भी मालामाल बना सकती है। इस जड़ के असर से मुकदमा, शत्रु संघर्ष, दरिद्रता से जुड़ी परेशानियों को दूर किया जा सकता है। इस जड़ से वशीकरण भी किया जाता है और भूत-प्रेत आदि बाधाओं से भी निजात मिल सकती है।

हत्था जोड़ी को तांत्रिक विधि से सिद्ध किया जाता है। इसके बाद यह चमत्कारी असर दिखाना शुरू कर देती है। सिद्ध की हुई हत्था जोड़ी, जिस व्यक्ति के पास होती है वह बहुत जल्दी धनवान हो सकता है। यदि कड़ी मेहनत के बाद भी आपको आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो किसी भी शनिवार अथवा मंगलवार हत्था जोड़ी घर ले आएं। इस जड़ को लाल रंग के कपड़े में बांध लें। इसके बाद घर में किसी सुरक्षित स्थान पर या तिजोरी में रख दें। इससे आपकी आय में वृद्घि होगी एवं धन का व्यय कम होगा। तिजोरी में सिन्दूर लगी हुई हत्था जोड़ी रखने से विशेष आर्थिक लाभ होता है।

इस प्रकार सिद्ध करें हत्था जोड़ी को : Hatha Jodi Sidh Karne ki Vidhi

होली से पहले हत्था जोड़ी अपने घर ले आएं। होली के दिन स्वयं स्नान आदि कर्मों से पवित्र हो जाएं। होली पर श्रेष्ठ मुहूर्त में हत्था जोड़ी को पवित्र जल से स्नान कराएं, पूजन करें। मंत्र जप करें। इसके बाद इस जड़ को दो हफ्तों के लिए तिल्ली के तेल में डुबोकर रख दें। दो हफ्तों के बाद जड़ निकाल लें। इसके बाद गायत्री मंत्र जप करते हुए जड़ का पूजन करें। इलायची तथा तुलसी के पत्तों के साथ एक चांदी की डिब्बी में बंद करके घर में धन स्थान पर रखें। ऐसा करने पर धन लाभ होता है।

रवि पुष्य नक्षत्र में पंचामृत से स्नान कराकर विधिवत पूजन कर निम्नलिखित मंत्र का १२५०० जप कर के इसको सिद्ध कर लें. रक्त आसन उत्तरभिमुख बैठ कर लाल चन्दन की माला से जप करें

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मूल मंत्र : Hatha Jodi Mantra

“हत्थाजोड़ी अति महिमाधरी कामणगारी , खरी प्यारी , राज-प्रजा सब मोहनगारी सेवतफल पावे सब नरनारी , केसर कर्पूर से करू मैं पूजा, दुश्मन के बल को तू दे बुझा , मनइश्चित मांगू जो देवे , कहना कथन ही मेरा रखे , हत्थाजोड़ी मातु दुहाई , रखजे मेरी बात सवाई , मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरो मंत्र ईश्वर वाचा ” !!

विधि : रवि पुष्य नक्षत्र में पंचामृत से स्नान कराकर विधिवत पूजन कर उपरोक्त मंत्र का १२५०० जप कर के इसको सिद्ध कर लें. रक्त आसन उत्तरभिमुख बैठ कर लाल चन्दन की माला से जप करें. लाल फूल चढाएं व लाल वस्त्र पहने. सामने चक्रेश्वरी व भैरव की   मूर्ती या चित्र स्थापन करें. व उनकी पूजा करें. भैरव की पूजा तेल और सिन्दूर व लाल फूल से करनी है तथा चक्रेश्वरी की पूजा की अष्ट प्रकार से पूजा करनी है.

मंत्र जप पूर्ण होने के बाद कर्पूर द्वारा माता लक्ष्मी की आरती करे ! तत्पश्चात प्रसाद ग्रहण कर ले ! जब दीपक ठंडा हो जाय तब पुष्प – केसर – और लौंग सहित डिबिया को लाल वस्त्र के एक रुमाल में बाँध कर अपनी तिजोरी – गल्ला या अलमारी में सुरक्षित रख दे ! माता लक्ष्मी के चित्र को पूजा स्थान में रख दे , लाल वस्त्र सहित अक्षत को उठा ले जो चौकी पर बिछा था और २१ रूपए के साथ किसी ब्राह्मण को दान कर दे ! ऐसा करने से हत्थाजोड़ी अभिमंत्रित होकर आपके लिए कार्य सिद्धि प्रदायक हो जाती है |

अन्य विधि हत्था जोड़ी को अभिमंत्रित करने की :  Hatha jodi ki Pujan Vidhi

मन्त्र :  ऊं नमो नामिऊण विसहर विस प्रणाशन रोग शोक दोष ग्रह कप्प्दुमच्चा यई सुहनाम गहण सकल सुह दे ऊं नमः स्वाहा.

उपरोक्त मूल मंत्र के अतिरिक्त ऊपर दिए गए ऋद्धि और मंत्र से भी पूजा करें. इस प्रकार साधना करने के पश्चात एक चांदी की डिबिया में शुद्ध सिन्दूर के साथ कृष्णपक्ष के पहले दिन ही सुबह इसको उल्टा करके (यानि पंजे नीचे की तरफ ) रख दें. फिर शुक्लपक्ष के पहले दिन सुबह सीधा करके (यानी पंजे ऊपर) रख दें. इस तरह तीन कृष्णपक्ष व तीन ही शुक्लपक्ष उल्टा सीधा करके रखते रहें. आखिर के शुक्लपक्ष में वो उल्टा ही रहेगा फिर हमेशा के लिये उसे उल्टा ही रखना है. उस चांदी की डिबिया को अपनी तिजोरी में रख दें. परन्तु कभी भी कोई औरत उस डिबिया को भूल से भी खोल कर न देखे.  नहीं तो प्रभाव समाप्त हो जायेगा.  यह बहुत ही सुंदर लक्ष्मी वर्धक प्रयोग है.

वशीकरण में इसका अचूक प्रयोग

वशीकरण का सामान्य और सामान्य अर्थ है- किसी दूसरे को प्रभावित करना, आकर्षित करना या वश में करना। जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब इंसान को अपने किसी Near या Dear को अपने अनुकूल बनाने के लिए किसी उपाय की जरूरत पड़ती है। किसी रूठें हुए प्रियजन को मनाना हो या किसी अपने के अनियंत्रित होने पर उसे किसी भी प्रकार से अपने नियंत्रण में लाना हो, तब ऐसे ही हत्था जोड़ी इत्यादि किसी उपाय की सहायता ली जा सकती है। वशीकरण के लिये यंत्र, तंत्र, और मंत्र तीनों ही शास्त्रों में विभिन्न प्रकार के प्रयोग किये जाते हैं। यहां हम ऐसे ही एक अचूक हत्था जोड़ी का प्रयोग बता रहे हैं। इस प्रयोग के लिए यह श्री दुर्गा सप्तशती का अनुभव सिद्ध मंत्र का प्रयोग किया जाता है। जप संख्या 11,250

मंत्र :
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती ही सा।
बलादाकृष्य मोहाय, महामाया प्रयच्छति॥

यह एक अनुभवसिद्ध प्रभावशाली मंत्र है। हत्था जोड़ी साधना से पूर्व देवी भगवती त्रिपुर सुन्दरी माता का एकाग्रता पूर्वक ध्यान करें। ध्यान के पश्चात पूर्ण भक्ति-श्रृद्धा भाव से पंचोपचार से पूजन कर देवी मां के समक्ष अपना मनोरथ व्यक्त कर दें।
वशीकरण सम्बंधी प्रयोगों में लाल रंग का प्रयोग किया जाता हैं, अत: साधना के दोरान यथा सम्भव लाल रंग का ही प्रयोग करें।

साधक अपनी अनुकूलता अनुशार इस मंत्र के अलावा अन्य वशीकरण मंत्र का चुनाव भी कर सकते हैं। वशीकरण के कई प्रकार के यंत्र मंत्र एवं तंत्र के उपाय हमारे समाज में प्रचलित हैं। जिनमें से कुछ तो सार्वजनिक हैं तथा कुछ अत्यंत गोपनीय किस्म के होते हैं। विद्वानों के मतानुसार  वशीकरण के कुछ उपाय अत्यंत अचूक और 100% प्रमाणिक साधन या उपाय माने जाते हैं, जिसमें से हात्था जोडी का प्रयोग भी अत्यंत अचूक एवं लाभप्रद माना जाता हैं।

किसी भी साधना या प्रयोग के लिए विशेष विधी-विधान एवं नियमों का पालन करना आवश्य होता है। किसी भी प्रकार की भूल-चूक होने पर विपरित परिणाम संभव हैं। इसीलिये, आज की इस भाग-दोड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति ऐसे तरीके या उपाय करना चाहता है, जो कम से कम समय में सम्पन्न हो सके और किसी भी प्रकार के जोखिम या विपरीत परिणामो से पूरी तरह से सुरक्षित हों। इस लिय इस प्रकार की साधनाएं या उपाय करने में असमर्थ हो तो किसी योग्य साधक या गुरु से सिद्ध करवा लें एवं उसे प्रयोग लें इससे भी आपको समान फल की प्राप्ति होती हैं।

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