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गणेश चतुर्थी का पौराणिक महत्व और कथा

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गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व क्यों?

इसे ‘संकष्ट श्रीगणेश चतुर्थी व्रत’ भी कहते हैं। वैसे तो यह व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है, लेकिन माघ, श्रावण, मार्गशीर्ष और भाद्रपद में इस व्रत के करने का विशेष महत्व है। भविष्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जब जब मनुष्यों को बड़ा भारी कष्ट प्राप्त हो, वे स्वयं को संकटों और कठिनाइयों से घिरा हुआ अनुभव करें या निकट भविष्य में किसी अनिष्ट की आशंका हो, उस समय इस व्रत को करना चाहिए।

गणेश चतुर्थी का पौराणिक महत्व

इस व्रत को करने से धर्म, अर्थ काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है। । मनुष्य वांछित फल पाकर अंत में गणपति को पा जाता है। इससे विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन, पुत्रार्थी को पुत्र और रोगी को आरोग्य की प्राप्ति होती है। रानी दमयंती ने भाद्रपद मास की कृष्ण चतुर्थी से इस व्रत को आरंभ करके लगातार सात माह तक गणेश पूजन किया, तो उसे अपना पति, पुत्र और खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो गया। तभी से इस व्रत के करने का चलन होता आया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भक्त दिन भर उपवास रखते हैं और भगवान गणेश की पूजा अर्चना कर शाम को चंद्रोदय के बाद पारंण करते हैं। इस दिन भगवान गणेश की पूजन से संतान प्राप्ति का भी वरदान पाया जा सकता है। ऐसे में आइए जानते हैं संकष्टी चतुर्थी की प्रचलित व्रत कथा।

व‍िकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा ह‍िंदी में

संकष्टी चतुर्थी को लेकर कई प्रचलित कथाएं पौराणिक ग्रंथों में मौजूद हैं। इन्हीं में से एक प्रचलित कथा आज हम आपके लिए लाए हैं। एक बार माता पार्वती और भगवान शिव नदी किनारे बैठे हुए थे, तभी माता पार्वती और भगवान शिव का चौसर खेलने का मन हुआ। लेकिन खेल की निगरानी करने वाला कोई तीसरा नहीं था, ऐसे में भगवान शिव ने अपने वरदान से एक बालक को प्रकट किया और माता पार्वती और भगवान शिव ने उसे आदेश दिया की इस खेल को अच्छे से देखना है और अंत में विजेता की घोषणा करना है। भगवान शिव और माता पार्वती ने यह खेल खेलना शुरू कर दिया, देवी पार्वती ने लगातार तीन बार खेल जीता। लेकिन बालक ने भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया।

यह सुन मां पार्वती को बहुत गुस्सा आया और बालक को श्राप दे दिया वह लंगड़ा हो गया। बालक ने माता पार्वती से क्षमा याचना की औऱ माफी मांगा, माता ने बालक की विनती को सुन कहा कि दिया हुआ श्राप वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन माता ने एक उपाय बताया जिससे वह श्राप से मुक्त हो सकता है। उन्होंने कहा कि संकष्टी वाले दिन यहां पर पूजा अर्चना करने कुछ कन्याएं आती हैं, उनसे व्रत विधि जानकर पूजन करने से वह श्राप से मुक्त हो जाएगा। कन्याओं ने श्राप से मुक्त होने के लिए 21 दिनों का व्रत करने के लिए कहा।

माता पार्वती के सुझाव के अनुसार बालक ने संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत कर पूजा पाठ किया और भगवान गणेश उसके पूजन से प्रसन्न हो गए। गणेश जी ने उसकी इच्छा पूछा, बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की इच्छा जाहिर किया। गणेश जी ने बालक की इच्छा पूरी की और उसे शिवलोक यानि कैलाश पहुंचा दिया। वहां उसे भगवान शिव जी ही मिले, क्योंकि मां पार्वती भगवान शिव से नाराज होकर कैलाश छोड़कर चली गई थी।

भगवना शिव ने बालक से पूछा की वह यहां पर कैसे आया, तब बालक ने संकष्टी चतुर्थी के व्रत के बारे में बताया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को मनाने के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत औऱ पूजन किया। जिससे प्रसन्न होकर मां पार्वती कैलाश वापस आ गई। इस व्रत को लेकर ऐसी मान्यता है जो भी इस दिन सच्चे मन से विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा अर्चना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कष्टों का निवारण होता है।

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