साधना में भी क्रम से ही उन्नति होती है

जानें साधना की उन्नति कैसे करे | Essential things to achieve meditation 

जन्म से विश्व का प्रत्येक जीव पशुभाव प्रधान प्राणी होता है, मनुष्य भी। हमें कालक्रम में उस पशुभाव को देवभाव में बदलना होता है। पहले चरण में जिस मनुष्य का आचार पशुवत् है, उन्नत जीवनचर्या और साधना के द्वारा उसे मनुष्यत्व में बदलता है। इसके बाद वह अपने उस मनुष्यत्व को प्रयासों द्वारा देवत्व में प्रतिष्ठित करता है। पशुत्व से देवत्व में यह जो क्रमोन्नयन है यह जिस पद्धति द्वारा संभव हो सकता है, उसी का नाम ‘साधना’ है।

कहा गया है कि जन्म से सभी शूद्र हैं, यहां शूद्र का अर्थ है- जिनके अंदर पशु वृत्तियां हैं। मनुष्य जब दीक्षा लेता है अर्थात् सीख लेता है कि किस तरह से प्रार्थना करनी है तो ऐसी अवस्था को ‘द्विज’ कहा गया। द्विज शब्द का अर्थ है, जिसका जन्म दो बार हुआ। इसके बाद शास्त्रों के अध्ययन और सम्यक् आध्यात्मिक ज्ञान से वह बनता है विप्र । और अंतिम चरण में तांत्रिकी दोक्षा या मानसिक आध्यात्मिक साधना की सहायता से ब्रह्मोपलब्धि के बाद होता है ब्राह्मण।

तो क्या जो पशुभाव युक्त मनुष्य है, उसका कोई रक्षक या कल्याणकर्त्ता नहीं है? निश्चय ही है, क्योंकि परमपुरुष सभी के साथ ही सम भाव से विराजमान होते हैं। मानव देहधारी पशुस्वभाव जीव में भी वे विद्यमान हैं। यह जीव पशु स्वभाव वाला है, इसलिए इनके उपास्य देवता हैं ‘पशुपति।’

इसके बाद वाले चरण में जब मनुष्य अनुभव से समझता और सीखता है कि उसके लिए करणीय क्या है और अकरणीय क्या है, जीवन का लक्ष्य क्या है, तब वह वीरभाव को प्राप्त करता है। सभी तरह की प्रतिकूलता, बाधा विपत्ति और परिस्थितियों के विरुद्ध संग्राम करना वीरभाव का द्योतक है। मनुष्यत्व में पहुंचकर साधक के अंदर जब वह वीरभाव जागता है, तब वह मनुष्यत्व विरोधी तत्वों के विरुद्ध संग्राम के लिए उठता है। तंत्र में इस स्तर के साधकों को कहा जाता है ‘वीर’ और उनके उपास्य देवता को कहा जाता ‘वीरेश्वर।’

तृतीय स्तर में जब साधक पूर्ण रूप से वीरभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब वह इस संग्राम में भयभीत या पराजित नहीं होता, तब उसमें दिव्यभाव जन्म लेता और उसे ‘वीर’ की जगह ‘देव’ कहा जाता है। इस दिव्यचारी साधक के देवता हैं ‘महादेव!’

इस तरह साधना के प्रथम चरण में उपास्य हुए ‘पशुपति’, द्वितीय चरण में ‘वोरेश्वर’ और तृतीय तथा शेष चरण में ‘महादेव।’ साधक के मानसिक, आध्यात्मिक स्तर के ही अनुसार उसके उपास्य देवता भी होते हैं।

साधारणतः हम मनुष्य की अभिव्यक्ति को तीन भाव में देखते हैं –

  1. मनुष्य मन ही मन चिंतन करता है।
  2. मुख से बातें करता है।
  3. हाथ-पैर से काम करता है।

चिंतन करते समय मनुष्य मस्तिष्क के स्नायुकोषों को काम में लगाता है, बात करते समय दोनों होंठ काम में आते हैं और काम करने पर प्रायः पूरे शरीर का ही उपयोग करना पड़ता है। मनुष्य देहधारी पशुरूपी मनुष्य लक्ष्य कुछ और करते हैं, यानी मन ही मन कुछ और सोचते हैं, मुख बात दूसरे

प्रकार की करते हैं और काम उससे भी अलग तरह से करते हैं। अर्थात् उनके चिंतन में, वचन में और कर्म में कोई संगति नहीं मिलती है ।

द्वितीय चरण में वीरभाव के साधकों की चिंतन भावना अवश्य ही बेहतर होती है। उनकी बात में और कार्य में एकरूपता रहती है। वे जैसा सोचते हैं, ठीक वैसी ही बात और काम में तालमेल नहीं मिलता, फिर भी बात में और काम में मेल होता है, अर्थात् वे मुख से जो कहते हैं, काम भी वैसे ही करते हैं। लेकिन ऐसी संगति सोचने में और कर्म में नहीं होती। मनुष्य जब देवता में उन्नीत होता है, तब वह जैसा मन में सोचता है, वैसा ही मुख से भी कहता है, और जो मुख से कहता है, उसे ही वह कार्यरूप में भी परिणत करता है। उसके सोचने में, वचन में और कर्म में कहीं कोई असंगति नहीं रह जाती।

रहने का अनुभव करने का है। ध्यान करके ऐसा अनुमान लगाया जाए कि सर्वशक्तिमान सत्ता हमारे रोम-रोम में प्रवेश कर रही है। भाव साधना का अगला कदम मनन और चिंतन के रूप में जाना जाता है।

इसे आत्मबोध की साधना भी कहा जा सकता है। इस साधना में सोचना चाहिए कि हमारा जन्म शरीर के साथ आत्मा के संबंध की सही व्यवस्था करने के लिए हुआ है। प्रत्येक दिन जब सोकर उठें, तो यह मानें कि यह परमपिता द्वारा दिया गया हमारा एक दिवसीय जन्म है। रात को जब सोने जाएं, तो विचार करें कि आज का दिन कितना सार्थक रहा और कितना निरर्थक। अगर किसी व्यर्थ के काम में अपना वक्त जाया किया है, तो ईश्वर से इसके लिए क्षमा मांगें और भविष्य में वैसी गलती न करने का संकल्प लेकर सो जाएं। नित्य नया जन्म व नित्य मृत्यु ध्यान में रखते हुए दिनभर की गतिविधियों को व्यवस्थित करने की कोशिश की जा सकती है।

साधना के क्रियात्मक पक्ष में अपने इष्ट का मंत्र जाप, पूजा-पाठ व अन्य क्रियाकलाप आते हैं। गायत्री को सद्बुद्धि और भावना की अधिष्ठात्री के रूप में माना जाता है। इसके श्रद्धा भावना से किए गए जप से स्मरण शक्ति, बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, सूझबूझ आदि मस्तिष्कीय गुणों में वृद्धि होती है। अंतःकरण का विकास सद्भाव एवं सद्ज्ञान के विकास पर निर्भर करता है, जो गायत्री साधना से सहज ही होने लगता है। अतः गायत्री उपासना ही वह समग्र उपासना है, जिसे अपनाकर मानव पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

गायत्री मंत्र के जाप के आगे प्राणशक्ति संवर्धन साधना आती है, जिसे प्राणायाम के माध्यम से किया जाता और दूसरी लययोग की साधना है, जिसे ध्यान योग के द्वारा किया जाता है। ध्यान योग की भी अनेकों साधनाएं हैं। अशुभ संस्कारों के निष्कासन एवं शुभ संस्कारों के स्थापना के लिए विभिन्न प्रकार की तपश्चर्या का विशेष महत्व है। इन्हें साधक अपने मार्गदर्शक के कुशल मार्गदर्शन में करते हुए मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की धुलाई, सफाई करते रहते हैं।

Updated: May 26, 2021 — 11:32 am

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