यात्रा

दुर्गा मंदिर,ऐहोले

Durga Temple, Aihole

अगर आप आस्‍थावान है और पुरानी कलाओं के कद्रदान है तो ऐहोल घूमने जरूर जाएं। पुरातत्‍व प्रेमियों को सच में इस जगह से प्‍यार हो जाएगा। कर्नाटक राज्‍य के बंगलौर शहर से 483 किमी. दूर यह शहर मालाप्रभा नदी के किनारे पर बसा है। यहां के मंदिरों में चालुक्‍य राजवंश के दौर की वास्‍तुकला देखने  को मिलती है।

 

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सन् 550 ईसवी में निर्मित ऐहोल का दुर्गा मंदिर अर्द्धचृत्‍ताकार है जिसमें वास्‍तुकार ने अपने विगत प्रयासों की अपेक्षाकृत अनेक परिवर्तन किए हैं । इस मंदिर में एक ऊँचा मंच है और लड़खन मंदिर की भांति एक अंधेरे प्रदक्षिणा पथ के स्‍थान पर यहां पर स्‍तंभों पर टिका एक खुला बरामदा है जो कि प्रदक्षिणा पथ का काम करता है । छिद्रित जालियों के स्‍थान पर यहां मंदिर के इर्द-गिर्द स्‍तंभों वाला बरामदा है जो खुला, हवादार और रोशन है । विशाल प्रवेशद्वार की सीढि़यां ऊँचे आधार तक जाती हैं । छत की ऊँचाई लगभग दुगुनी है और इस इमारत में बुर्ज एक छोटे शिखर का आकार लेने लगा है जो आगामी शताब्दियों में एक ऊँचे शिखर में परिवर्तित हो गया | ये स्‍तंभ अत्‍यंत अरूचिकर लगते यदि शिल्‍पकारों को इनपर सुंदर प्रतिमाएं न उकेरने दी गई होतीं । स्‍तंभों की पंक्ति के नीचे भी नक्‍काशी की गई है और पहली बार हमें मंदिर के चौड़े प्रवेश के पार शहतीर को सहारा देने वाले ब्रैकेट दिखाई    पड़े । इसे देखकर हमें पुन: लकड़ी प्रयोग करने वालो वास्‍तुकार का आभास होता है जो कि बांस या लकड़ी के स्‍तंभों को खड़ा कर उनपर समस्‍तर पर कडि़यां डालता था ताकि छत अपने स्‍थान पर टिकी रहे । इस निर्माण को दुगुनी मज़बूती देने के लिए उसे ब्रैकेट बनाने का विचार आया जो कि भारत में हिंदू और बौद्ध वास्‍तुकला का एक प्रमुख अवयव है । इसे बहुत पहले चीन में प्रयोग किया जाता था जिसमें पत्‍थर का एक तिरछा टुकड़ा स्‍तंभों से निकलकर सरदल या कड़ी को मजबूती से पकड़ता था । इस प्रकार के निर्माण को वास्‍तुकला में क्षैतिज कहते हैं जो मेहराबदार से भिन्‍न है । क्षैतिज निर्माण पद्धति का बाद में मुसलमानों ने प्रयोग किया ।

ऐहोल, चालुक्‍यों की पहली राजधानी हुआ करती थी। किंवदंतियो के अनुसार, महान योद्धा ब्राह्मण परसुराम यहां रहते थे। एक बार कई क्षत्रियों की कुल्‍हाड़ी से हत्‍या करने के बाद उन्‍होने अपनी रक्‍तरंजित कुल्‍हाड़ी को मालाप्रभा नदी में धोया था इसी कारण यह नदी लाल है। ऐहोल का शाब्दिक अर्थ होता है-क्‍या नदी है।नाम के पीछे पौराणिक कथा

ऐहोल में चालुक्यों के 125 मंदिर इसे बहुत ही ख़ास बनाते हैं। यहां सबसे पुराना लद खान मंदिर है बताया जाता है कि ये मंदिर पांचवी शताब्दी का है। गौड़ा मंदिर, सूर्यनारायण मंदिर, दुर्गा मंदिर यहां के  एक अन्य प्रसिद्ध मंदिर है। यहां स्थित रावण फाडी गुफा देश का सबसे प्राचीन रॉक कट गुफा मंदिर है। ऐहोल एक शिलालेख के लिए भी प्रसिद्ध है जो यहां का इतिहास बताता है। ऐहोल, बैंगलोर से 483 किलोमीटर की दूरी पर है जहां सड़क मार्ग से आसानी के साथ पहुंचा जा सकता है। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन बादामी है।

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