योगासन

अनुलोम विलोम प्राणायाम : शरीर को स्वस्थ व शक्तिशाली बनाने के लिए करे प्राणायाम

अनुलोम विलोम प्राणायाम ~ Anulom Vilom Pranayam 

अनुलोम –विलोम प्रणायाम (alternate nostril breathing) में सांस लेने व छोड़ने की विधि को बार-बार दोहराया जाता है। इस प्राणायाम (pranayama) को ‘नाड़ी शोधक प्राणायाम’  (Nadi Shodhak Pranayama) भी कहते है।

नाड़ी शोधन प्राणायाम क्यों कहते है? 

नाड़ी = सूक्ष्म ऊर्जा चैनल; शोधन =सफाई, शुद्धि; प्राणायाम =साँस लेने की प्रक्रिया।

नाड़ियाँ मानव शरीर में सूक्ष्म ऊर्जा चैनल है जो विभिन्न कारणों से बंद हो सकती है। नाड़ी शोधन प्राणायाम साँस लेने की एक ऐसी प्रक्रिया है जो इन ऊर्जा चैनलों को साफ करने में मदद करती है और इस प्रकार मन शांत होता है। इस प्रक्रिया को अनुलोम विलोम प्राणायाम (Anulom Vilom) के रूप में भी जाना जाता है। इस प्राणायाम को हर उम्र के लोग कर सकते हैं।

अनुलोम-विलोम को रोज करने से शरीर की सभी नाड़ियों स्वस्थ व निरोग रहती है। इस प्राणायाम (pranayam) को हर उम्र के लोग कर सकते हैं। वृद्धावस्था में अनुलोम-विलोम प्राणायाम योगा करने से गठिया, जोड़ों का दर्द व सूजन आदि शिकायतें दूर होती हैं।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से ध्यान करने की शक्ति का अद्भुत  विकास होता है। इस गुणकारी प्राणायाम को करने के बाद शरीर में फुर्ती आती है और एक नयी ऊर्जा का संचार होता है। अनुलोम-विलोम करने से मन प्रफुल्लित हो जाता है तथा मन में अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं। यह व्यायाम व्यक्ति में सकारात्मक विचारों का सर्जन करके, उसे आत्मविश्वासी बनाता है।

इस प्राणायाम को करते समय मन में विचार करे की इड़ा व पिंगला नाड़ियो में श्वास का घर्षण व मंथन होने से सुशुमना नाड़ी जाग्रत हो रही है | अस्त्र चक्रो से लेकर सहस्तार चक्र पर्यन्त एक दिव्ये ज्योति का उद्धवस्फुरण हो रहा है | मेरा पूरा देह दिव्य अलोक से देदीप्यमान हो रहा है| यह विचार करे की विश्वसनीयन्ता परमेश्वर की दिव्य-शक्ति दिव्यज्ञान की वृष्टि चारो और से हो रही है | वह सर्वशक्तिमान परमात्मा अपनी दिव्यशक्ति से मुझे ओतप्रोत कर रहा है | “शक्तिपात” की दीक्षा से स्वयं को दीक्षित करे | शक्ति के लिए गुरु मात्र प्रेरक है, गुरु तो मात्र दिव्य संवेदनाओ से जोड़ता हे | वास्तव में शक्तिपात शक्ति के असीम सिंधु ओढ़ाकर परमेस्वर करते है | इस प्रकार दिव्य संवेदनाओ से ओतप्रोत होकर किये हुए इस अनुलोम – विलोम प्राणायाम से विशेष शारीरिक मानसिक व आध्यात्मिक लाभ देगा मूलाधार चक्र से स्वत: एक ज्योतिष स्फुरित होगी Kundalini Jagran होगा आप ऊर्ध्वरेता बनेगे और शक्तिपात की दीक्षा में स्वत : दीक्षित हो जाएगे |

अनुलोम-विलोम करने का समय : 

अनुलोम-विलोम प्राणायाम सुबह के समय  सूर्योदय के पहले करना अति गुणकारी होता है। इस व्यायाम को करने से पहले पेट साफ कर लेना चाहिए। अनुलोम-विलोम भोजन या नाश्ता करने से पहले ही करना चाहिए। अनुलोम-विलोम कर लेने के बाद करीब एक घंटे के बाद ही कुछ खाना चाहिए। अनुलोम-विलोम शाम के समय भोजन करने के पूर्व भी किया जा सकता है, लेकिन इस प्राणायाम को सुबह में करने से अधिक लाभ होता है।

अनुलोम-विलोम करने का आसन(Asana) :

अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास किसी शांत वातावरण में करना चाहिए। अनुलोम-विलोम स्वच्छ प्राकृतिक हवा में अधिक फलदायी साबित होता है। इसलिए सर्वप्रथम उत्तम स्थान का चुनाव कर के, वहाँ एक चटाई बिछा कर सामान्य मुद्रा में स्थान ग्रहण करना चाहिए। दरी व कंबल स्वच्छ जगह पर बिछाकर उस पर अपनी सुविधानुसार पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठ जाएं।

अनुलोम–विलोम प्रणायाम करने की विधि

सबसे पहले अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दाएं छिद्र को बंद कर लें और नासिका के बाएं छिद्र से सांस अंदर की ओर भरे और फिर बायीं नासिका को अंगूठे के बगल वाली दो अंगुलियों से बंद कर दें।

उसके बाद दाहिनी नासिका से अंगूठे को हटा दें और सांस को बाहर निकालें। अब दायीं नासिका से ही सांस अंदर की ओर भरे और दायीं नाक को बंद करके बायीं नासिका खोलकर सांस को 8 की गिनती में बाहर निकालें। इस क्रिया को पहले 3 मिनट तक और फिर धीरे-धीरे इसका अभ्यास बढ़ाते हुए 10 मिनट तक करें। 10 मिनट से अधिक समय तक इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। इस प्रणायाम को सुबह-सुबह खुली हवा में बैठकर करें।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते समय ये सावधानिया रखे : 

  • साँस पर जोर न दें और साँस की गति सरल और सहज रखें। मुँह से साँस नहीं लेना है या साँस लेते समय किसी भी प्रकार की ध्वनि ना निकाले।
  • उज्जयी साँस का उपयोग न करें।
  • उंगलियों को माथे और नाक पर बहुत हल्के से रखें। वहाँ किसी भी दबाव लागू करने की कोई जरूरत नहीं है।
  • नाड़ी शोधन प्राणायाम के पश्चात् यदि आप सुस्त व थका हुआ महसूस करते हैं तो अपने साँस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया पर ध्यान दे| साँस छोड़ने का समय साँस लेने से अधिक लंबा होना चाहिए.

कमजोर और एनीमिया से पीड़ित रोगियों को इस प्राणायाम के दौरान सांस भरने व छोड़ने में थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए।कुछ लोग समय की कमी के चलते जल्दी-जल्दी सांस भरने और निकालने लगते हैं। इससे वातावरण में फैला धूल, धुआं, जीवाणु और वायरस, सांस नली में पहुंचकर अनेक प्रकार के संक्रमण को पैदा कर सकते है। प्राणायाम के दौरान सांस की गति इतनी सहज होनी चाहिए। प्राणायाम करते समय स्वयं को भी सांस की आवाज नहीं सुनायी देनी चाहिए।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम की गति एंव अवधि :

व्यक्ति को अनुलोम-विलोम की शुरुआत हमेशा धीरे-धीरे सांस अंदर लेने और बाहर छोड़ने से करनी चाहिए। और जब इस प्राणायाम का अभ्यास सहज होने लगे तब इसकी गति थोड़ी थोड़ी कर के बढ़ानी होती है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते समय एक चीज़ का हमेशा ख्याल रखना चाहिए की जिस गति से सांस शरीर के अंदर भरें, उसी सामन गति से सांस शरीर से बाहर निकालनी चाहिए।

अनुलोम-विलोम करने की गति (Speed) :

अनुलोम-विलोम प्राणायाम की श्वासन गति अधिक तेज़ करने पर शरीर के प्राण की गति तेज़ हो जाती है। अनुलोम विलोम प्राणायाम में एक नासिका से पूर्ण रूप से श्वांस अन्दर लेने में 2.5 सेकण्ड और फिर श्वांस वापस बाहर निकलने में 2.5 सेकंड का समय लगता है| इस प्रकार अनुलोम विलोम की एक प्रक्रिया करीब 5 सेकंड में पूरी हो जाती है| इसी प्रकार एक मिनट में 12 बार अनुलोम विलोम किया जाता है|

दाएं छिद्र से ली हुई सांस बाएं छिद्र से मुक्त करना, और बाएं छिद्र से ली हुई सांस दाएं छिद्र से मुक्त करना। एक छिद्र बाधित, तब दूसरा छिद्र प्रवृत| दूसरा छिद्र प्रवृत तब प्रथम वाला बाधित। यह प्रक्रिया मानव शरीर में एक शुद्धिकरण व्यायाम साइकल की रचना करता है। और इस क्रिया को लगातार एक मिनिट करने से शरीर को थोड़ी थकावट महसूस होती है। थकावट महसूस होने पर अनुलोम-विलोम प्राणायाम से थोड़ा विश्राम लेना चाहिए। और जब फिर से शरीर सामान्य अवस्था में आ जाए तब फिर से अनुलोम-विलोम की शुरुआत करनी चाहिए।

अनुलोम विलोम के समय शिव संकल्प : 

प्राणायाम न केवल शरीर स्वस्थ बनाता है बल्कि मन को भी शुद्द करके सकारात्मकता और आत्मविश्वास प्रदान करता है| इसलिए प्राणायाम का पूर्ण रूप से लाभ लेने के लिए प्राणायाम करते समय सकारात्मक संकल्प लेने चाहिए| अनुलोम विलोम करते समय सांस अन्दर भरते हुए यह संकल्प लेना चाहिए कि मेरे भीतर सकारात्मक शक्ति का संचार हो रहा है और श्वांस बाहर छोड़ते समय यह संकल्प लेना चाहिए कि मेरे भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृतियां बाहर जा रही है|

अनुलोम–विलोम प्रणायाम करने के लाभ :

  1. अनुलोम-विलोम प्राणायाम के रोज़ाना अभ्यास से मानव शरीर की समस्त नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती है। एक इन्सान के देह में कुल मिला कर 72000 नाड़ियाँ होती हैं।
  2. शरीर की प्रत्येक नाड़ियाँ स्वस्थ और शुद्ध हो जाने से उनमे किसी भी प्रकार का संक्रमण या रोग नहीं उत्पन्न हो सकता है और इसलिए शरीर कभी रोग ग्रस्त नहीं बनता है।
  3. अनुलोम-विलोम प्राणायाम मानव शरीर की नाड़ियों को शुद्ध करने के साथ साथ उन्हे शक्ति भी प्रदान करता है। नाड़ियों के सशक्त बनने से चिंता और तनाव (depression) दूर रहेता है।
  4. प्रतिदिन सुबह में अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने से शरीर में bad cholesterol problem  नहीं होती है। और अगर किसी व्यक्ति को पहले से ही यह तकलीफ हों, तो अनुलोम-विलोम करने से दूर हो जाती है।
  5. अनुलोम-विलोम प्राणायाम से एच॰ डी॰ एल॰ और एल॰ डी॰ एल॰ की अनियमितता दूर हो जाती है। तथा Irregularity of triglycerides problem की भी दूर हो जाती है।
  6. अनुलोम-विलोम से मौसमी सर्दी और जुकाम दूर हो जाता है। लगातार नाक बहने की बीमारी और श्वसन क्रिया से जुड़ी कोई भी जटिल बीमारी हों उसे दूर करने के लिए अनुलोम-विलोम प्राणायाम एक सटीक इलाज है।
  7. गले में सुखी ख़ासी हों, या गले में गांठ (tonsil), अनुलोम-विलोम इन दोनों समस्याओं में लाभदायी होता है। पेट साफ ना आने की वजह से गले में या जीभ में छोटे छोटे दाने निकाल आते हों, या संक्रमण से गला दुखता रहता हो, या बार बार मुह में छाले पड़ जाते हों, अनुलोम-विलोम प्राणायाम इन सभी तकलीफ़ों से लड़ने में मददगार होता है।
  8. शास्त्रों में अनुलोम-विलोम प्राणायाम को त्रीदोष नाशक भी बताया गया है। पित्त रोग, वात रोग, और गले के कफ की समस्या, इन तीनों कष्टदायी रोगों के विकार अनुलोम-विलोम प्राणायाम के नित्य अभ्यास से दूर हो जाते हैं।
  9. अनुलोम-विलोम प्राणायाम heart blockage remove कर सकता है। यानी की heart disease से पीड़ित व्यक्ति भी इस प्राणायाम के नित्य अभ्यास से लाभ ले सकते हैं। (Note– हृदय रोग से पीड़ित व्यक्ति डॉक्टर की सलाह ले कर ही, अनुलोम-विलोम प्राणायाम का प्रयोग करें।)
  10. अनुलोम-विलोम प्राणायाम मूत्रमार्ग के सभी रोगों को दूर करने में सहायक होता है। अगर किसी पुरुष को शुक्राणुओं की कमी हो तो अनुलोम-विलोम व्यायाम से यह समस्या दूर हो सकती है।
  11. जोड़ों के दर्द, गठिया रोग, अमली पित्त, शीत पित्त और कम्पवात जैसी कष्टदायक बीमारियों में भी अनुलोम-विलोम प्राणायाम राहत प्रदान करता है। अगर रोगी इस प्राणायाम को सही तरीके से लंबे समय तक करता रहे ऊपर बताए जटिल रोग जड़-मूल से खत्म भी हो सकते हैं।
  12. अनुलोम-विलोम प्राणायाम से अस्थमा और साइनस नाम के रोग भी दूर हो सकते हैं। शरीर के स्नायुओं की दुर्बलता दूर करने के लिए भी अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना उत्तम होता है।
  13. संधिवात , आमवात , गढ़िया ,कंपवात .इस्त्रायु , – दुर्बलता आदि समस्त वात रोग ,मूत्र रोग, धतुरोग, शुक्रश्ये, अम्लपित्त ,शीतपित्त आदि समस्त पित रोग Cough-Cold, पुराण नजला , साइनस , Asthama ,Tussis, Tonsils , आदि समस्त कफ रोग दूर हो जाते है | त्रिदोस प्रशमन होता है |
  14. negative thoughts में परिवर्तन होकर positive thoughts बढ़ने लगते है आनंद , उत्साह व निर्भयता की प्राप्ति होने लगती है| संक्षेप में कह सकते है की इस प्राणायाम से तन, मन, विचार व संस्कार सब परिशुद होते है | देह के समस्त रोग नष्ट हो जाते हे तथा मन परिशुद्ध होकर ओमकार के ध्यान में लींन होने

About the author

Pandit Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

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