पौराणिक कथाएं

अन्नकूट पर्व व गोवर्धन पूजा

govardhan pooja

गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन की जाती है। दीपावली के पाँच दिन चलने वाले त्यौहार में धन तेरस , रूप चौदस और  दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा या अन्न कूट पूजा का दिन होता है। इसके अगले दिन भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा या अन्नकूट पूजा असल में गोवर्धन पर्वत की पूजा है। यह पर्वत बृज में स्थित है। इसे गिर्राज पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्वत को lord krishna ने अपनी अंगुलि पर उठाकर गांव वालों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। यह पूजा भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति व आराधना का ही एक जरिया है।

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वल्लभ सम्प्रदाय ( पुष्टिमार्गी ) , गौड़ीय सम्प्रदाय तथा स्वामीनारायण संप्रदाय के लोगों में इस दिन का विशेष महत्त्व होता है। वैष्णव  मंदिरों में छप्पन भोग बना कर भगवान को भोग लगाया जाता है। जिसमें छप्पन प्रकार खाने की वस्तुएँ बनाई जाती है। यह भोग गोवर्धन पूजा का ही प्रतीक होता है। यह अन्न कूट कहलाता है। भोग लगाने के बाद इसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। हजारों की संख्या में लोग इस प्रसाद को पाने के लिए मंदिर पहुँचते है। इस प्रसाद का एक अलग ही स्वाद होता है।

गोवर्धन पूजा कब करनी चाहिए

गोवर्धन पूजा सुविधानुसार सुबह या शाम के वक्त की जा सकती है। गोवर्धन पूजा की तारीख व शुभ मुहूर्त इस प्रकार है :

गोवर्धन पूजा की तारीख    –   ” 31 अक्टूबर 2016 “

 गोवर्धन पूजा का मुहूर्त      –    सुबह   ” 6 : 39 से 8 : 51 “

 गोवर्धन पूजा विधी    –   शाम   ” 3 : 28 से 5 : 40 “

– इस पूजा के लिए गाय के गोबर से  गोवर्धन पर्वत  बनायें।  इसे लेटे हुए पुरुष की आकृति में बनाया जाता है । नाभि के स्थान पर एक कटोरी जितना गड्डा बना लें।

– फूल , पत्तियों , टहनियों व गाय की आकृतियों से या अपनी सुविधानुसार सजायें ।

– शुभ मुहूर्त में पूजा शुरू करें ।

– इस पूजा के लिए lakshmi पूजन वाली थाली , बड़ा दीपक , कलश व बची हुई सामग्री काम में लेना शुभ मानते है। लक्ष्मी पूजन में रखे हुए गन्ने के आगे का हिस्सा तोड़कर गोवर्धन पूजा में काम लिया जाता है।

– पूजा के लिए  रोली ,  मौली , अक्षत चढ़ायें।

– फूल माला , पुष्प अर्पित करें।

– धूप , दीपक ,अगरबत्ती आदि जलाएँ।

– नैवेद्य के रूप में फल , मिठाई आदि अर्पित करें। गन्ना चढायें।

– एक कटोरी दही नाभि स्थान में डाल कर बिलोने से झेरते है और गोवर्धन के गीत गाते है।

– गोवर्धन की सात बार परिक्रमा लगाएं।

– पंचामृत अर्पित करें। पंचामृत  दूध, दही, शहद, घी और शक्कर मिलाकर बनाया जाता है।

– दक्षिणा चढ़ाएँ।

श्री कृष्ण भगवान का ध्यान करते हुए श्रद्धा पूर्वक नमन करें।

– श्री गोवर्धन महाराज की आरती गाएँ।

श्री गोवर्धन महाराज की आरती

श्री  गोवर्धन  महाराज  , ओ महाराज  ,   तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो ।

तोपे  पान चढ़े  तोपे फूल चढ़े , तोपे चढ़े दूध की धार । तेरे माथे…..

तेरे गले में कंठा  सोहे रह्यो , तेरी झांकी बनी विशाल । तेरे माथे ….

तेरे कानन कुंडल सोहे रह्यो ,तेरी ठोड़ी पे हीरा लाल  । तेरे माथे ….

तेरी सात कोस की परिकम्मा, चकलेश्वर  है  विश्राम  । तेरे माथे….

श्री  गोवर्धन  महाराज  , ओ महाराज  ,   तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो ।

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गोवर्धन पूजा कथा :   

गोवर्धन पर्वत की पूजा के बारे में एक कहानी कही जाती है। भगवान कृष्ण अपने गोपी और ग्वालों के साथ गाएं चराते हुए गोवर्धन पर्वत पर पहुंचे तो देखा कि वहां गोपियां 56 प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही हैं। श्रीकृष्ण के पूछने पर उन्होंने बताया कि आज वृत्रासुर को मारने वाले तथा मेघों व देवों के स्वामी इंद्र का पूजन होता है। इसे इंद्रोज यज्ञ कहते हैं। इससे प्रसन्न होकर ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इंद्र में क्या शक्ति है, उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसके कारण वर्षा होती है। हमें इंद्र की गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। श्रीकृष्ण की यह बात ब्रजवासियों ने मानी और गोवर्धन पूजा की तैयारियां शुरू हो गई।

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सभी गोप-ग्वाल अपने अपने घरों से पकवान लाकर गोवर्धन की तराई में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से पूजन करने लगे। नारद मुनि भी यहां इंद्रोज यज्ञ देखने पहुंच गए थे। इंद्रोज बंदकर के बलवान गोवर्धन की पूजा ब्रजवासी कर रहे हैं यह बात इंद्र तक नारद मुनि द्वारा पहुंच गई और इंद्र को नारद मुनि ने यह कहकर और डरा भी दिया कि उनके राज्य पर आक्रमण करके इंद्रासन पर भी अधिकार शायद श्रीकृष्ण कर लें। इंद्र गुस्सा गये और मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जा कर प्रलय पैदा कर दें। ब्रजभूमि में मूसलाधार बारिश होने लगी। सभी भयभीत हो उठे।

सभी ग्वाले श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचते ही उन्होंने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहा। वही सब की रक्षा करेंगे। जब सब गोवर्धन पर्वत की तराई मे पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्का अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दिया और सभी की मूसलाधार हो रही बारिश से बचाया। ब्रजवासियों पर एक बूंद भी जल नहीं गिरा। यह चमत्कार देखकर इंद्रदेव को अपनी की गलती का अहसास हुआ और वे श्रीकृष्ण से क्षमायाचना करने लगे। सात दिन बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजवासियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व मनाने को कहा। तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित है।

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छप्पन भोग :

chappn bhog

कुछ लोग घर पर ही छप्पन प्रकार की खाने की वस्तुएं बना कर भगवान को छप्पन भोग लगा कर पूजा करते है । भोग के बाद रिश्तेदार , पड़ोसी , मित्र आदि के साथ प्रसाद का आनंद उठाते है। कुछ घरों में इसमें साबुत अनाज की खिचड़ी , कढ़ी , तथा पालक , मेथी , मूली , बैगन , टमाटर , गोभी आदि सब्जियों को मिलाकर विशेष सब्जी बनाई जाती है जो राम भाजी या अन्य नामों से जानी  जाती है।

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महाराष्ट्र में यह  दिन बलि पड़वा के नाम से जाना जाता है। कहते है इस दिन राजा बलि ( जिसको  वामन अवतार के रूप में भगवान ने पाताल लोक में भेज दिया था  ) एक दिन के लिए पाताल लोक से निकलकर धरती लोक पर आता   है।

गोवर्धन पूजा प्रकृति के समीप रहने का सन्देश देती है। यह गाय से होने वाले लाभ के महत्त्व को समझने का समय होता है। इसीलिए इस दिन गाय बैल आदि की पूजा की जाती है । गाय बैल आदि को नहला कर साफ सुथरा करके लाल पीले कपड़े से सजाया जाता है। इनके सींग पर तेल और गेरू लगाया जाता है। घर पर बने भोजन में से पहले गाय को खिलाते है। घर में गाय नहीं हो तो बाहर जाकर गाय को खिलाते है। इस दिन चाँद नहीं देखना चाहिए। यह अशुभ माना जाता है।

कुछ जगह इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी की जाती है। विश्वकर्मा देव शिल्प माने जाते है जिनका जन्म समुद्र मंथन से हुआ था। इन्हें यांत्रिक विज्ञानं तथा वास्तु कला का  जनक कहा जाता है। कहा जाता है कि मुख्य  पौराणिक भवन व नगरी जैसे श्री कृष्ण की द्वारिका , लंका नगरी , हस्तिनापुर आदि का निर्माण विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। फैक्ट्री के मजदूर , मिस्त्री , कारीगर , शिल्पकार , फर्नीचर बनाने वाले , मशीनों पर काम करने वाले लोग इस दिन  मशीनों औजारों आदि की साफ सफाई करते है , उनकी पूजा करते है तथा भक्ति भाव और हर्षोल्लास से भगवान विश्कर्मा का पूजन किया जाता है।

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