t>

जानें अनंत चतुर्दशी की कथा, महत्व और पूजा विधि

Share this

अनंत चतुर्दशी व्रत विधान क्यों?

पौराणिक मान्यता के अनुसार अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत महाभारत काल से हुई थी. यह भगवान विष्णु का दिन माना जाता है. ये व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है .

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी मनाई जाती है. अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस के नाम से भी जाना जाता है. इस व्रत में भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा होती है. इस दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है . इस दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है

अनंत चतुर्दशी पूर्ण रूप से काम्य व्रत है। इस प्रमुख-पुरुषार्थ के लिए रखा जाता है। अर्थ-पुरुषार्थ में जमीन-जायदाद, स्थावर मकान, वाहन, नौकरी में प्रमोशन तथा सोना, चांदी एवं जेवरात आदि वस्तुओं की प्राप्ति अभिप्रेत होती है। काम्य व्रत रखने की बात कुछ मर्यादित समय के लिए शास्त्रों में बताई गई है। इसमें से अनंत व्रत की कालावधि 14 वर्ष की है। 14 वर्षों बाद उसका पूर्णता प्रीत्यर्थ उद्यापन किया जाता है। यदि व्यक्ति अपरिहार्य कारणवश बाहर गया हो या बीमार हो तो उसका पुत्र अनंत पूजन करे।

अशौच रहने पर ब्रह्मचारी पुत्र, रिश्तेदार या पुरोहित द्वारा यह व्रत करवा लें। पिता के 14 वर्ष पूरे होने पर इच्छुक पुत्र यह व्रत रख सकता है। कुछ घरों में वंश परंपरागत यह व्रत शुरू रहता है। यदि इस व्रत के विषय में व्यक्ति के मन में अनिच्छा, भय, तिरस्कार या अनादर हो तो व्रत रखने की अपेक्षा उद्यापन करके समाप्त कर देना चाहिए।

अनंत चतुर्दशी व्रत और पूजा विधि (Anant Chaturdashi Vrat and Puja Vidhi)

अग्नि पुराण में व्रत के महत्व पर विशेष जोर दिया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के अनंत रूपों का स्मरण कराता है। यह पूजा दोपहर के समय होती है, नीचे इस पर्व के पूजन विधान जान सकते हैं।

1. अनंत चतुर्दशी के दिन उचित स्नान के बाद, व्रत की शपथ लें और पूजन वेदी पर एक कलश रखें।
2. कुश से बने अष्टदल कमल को ऊपर रखते हुए कलश की स्थापना करें।आप चाहें तो भगवान विष्णु के चित्र का भी उपयोग कर सकते हैं।
3. इसके बाद सिंदूर, केसर और हल्दी में डुबोकर एक धागा तैयार करें। इसमें 14 गांठें होनी चाहिए। इस धागे को भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने रखें। इन दिनों बाजार में इस तरह के बने हुए धागे भी मिलते हैं।
4. अब षोडशोपचार विधि से भगवान के धागे और मूर्ति की पूजा करें, साथ ही नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें।

अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।।

5. आप अपने हाथ के चारों ओर पवित्र धागा बांध लें। पुरुषों को इसे अपनी दाहिनी बांह पर बांधना चाहिए और महिलाओं को इसे अपनी बाईं बांह पर बांधना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपने पूरे परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

अनंत चतुर्दशी की पौराणिक कथा

अनंत चतुर्दशी को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है। एक बार युद्धिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। यज्ञ जिस मंडप में हो रहा था वह बेहद सुंदर था। यज्ञ मंडप जल में स्थल तथा स्थल में जल की तरह लग रहे थे। वैसे तो कई सावधानियां रखी गई थीं लेकिन फिर भी कई लोग उस मंडप को देख धोखा खा चुके थे। फिर दुर्योधन भी वहां आ गए जहां यज्ञ मंडप लगा था। वो तालाब को स्थल समझकर उसमें गिर गया। यह देख द्रौपदी की हंसी निकल गई। उसने दुर्योधन को अंधों की संतान अंधी कहा। वो जोर-जोर से हंसने लगी। यह देख दुर्योधन चिढ़ गया।

यह बात उसके दिल पर लग गई। इससे उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया। दुर्योधन ने पांडवों से बदला लेने का फैसला किया। इस द्वेष में उसने पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा दिया। पांडवों को पराजित होने पर 12 वर्षों का वनवास भोगना पड़ा। इस दौरान पांडवों ने कई कष्ट सहे। एक दिन कृष्ण जी उनसे मिलने गए। तब युधिष्ठिर ने कृष्ण जी से अपना दुख कहा। साथ ही इस परेशानी से उभरने का उपाय भी पूछा।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि इससे युधिष्ठिर के समस्त कष्ट दूर हो जाएंगे। साथ ही राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा। इस संदर्भ में कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को कथा सुनाई-

प्राचीन काल में एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था जिसका नाम सुमंत नाम था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उनकी एक बेटी भी थी जिसका नाम सुशीला था। उसकी पुत्री परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। सुशीला के बड़े होते-होते उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई। सुमंत की पत्नी की मृत्यु होने से उसने कर्कशा नामक स्त्री से दोबारा विवाह कर लिया। फिर उसने अपनी पुत्री सुशीला का विवाह भी करा दिया। सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि के साथ सम्पन्न हुआ। विदाई में कर्कशा

यह देख कौंडिन्य ऋषि बेहद दुखी हुए और अपनी पत्नी सुशीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। लेकिन आश्रम पहुंचते पहुंचते रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे। वहां पर सुशीला ने कुछ स्त्रियों को देखा। वो सभी स्त्रियां सुंदर वस्त्र पहने थीं और किसी देवता की पूजा कर रही थीं। जब सुशीला ने उनसे पूछा तब स्त्रियों ने उसे विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने उसी जगह व्रत का अनुष्ठान किया। उसने चौदह गांठों वाला डोर हाथ में बांध लिया और अपनी पति ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई।

जब कौंडिन्य ने सुशीला से उस डोर के बारे में पूछा तब उसने व्रत के बारे में बताया। लेकिन ऋषि ने उसे तोड़ दिया और अग्नि में डाल दिया। इससे अनंत भगवान का अपमान हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि ऋषि कौंडिन्य अत्यंत दुखी रहने लगे। उनके पास जो कुछ भी था वो सब नष्ट हो गया। उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि इस दरिद्रत का कारण क्या है। तब सुशीला ने उन्हें डोरा जलाने वाली याद दिलाई।

ऋषि को अपनी गलती समझ आई और वो वन चल दिए अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए। कई दिनों तक वो वहीं रहे लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। कई दिनों तक भटकने के बाद वो भूमि पर गिर पड़े। फिर अनंत भगवान प्रकट हुए। उन्होंने कहा तुमने मेरा तिरस्कार किया था। यही कारण है कि तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ रहा है। लेकिन तुम्हारा पश्चाताप हो गया है। तुम वापस जाओ और विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्ष के बाद तुम्हारे सभी दुख दूर हो जाएंगे। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। जैसा अनंत भगवान ने कहा था ठीक वैसा ही ऋषि ने कहा। श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया। इसके प्रभाव से ही पांडवों को महाभारत के युद्ध में जीत मिली और चिरकाल तक राज्य करते रहे।

Share this

Leave a Comment