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जानिए कैसे करें अक्षय तृतीया व्रत

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अक्षय तृतीया का व्रत क्यों?

शिव पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन आलस्य त्यागकर जो व्यक्ति इस व्रत को करता है और कमल आदि पुष्पों से शिव सहित भगवती पार्वती की अर्चना/ पूजा करता है, वह मनुष्य करोड़ों जन्म के मन, वचन और शरीर के महापापों को नष्ट कर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों का लाभ प्राप्त करता है। पुराणों के अनुसार इसी दिन से सत्ययुग और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। भगवान परशुराम का अवतरण भी इसी दिन होने के कारण उनकी जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है। भगवान बद्रीनाथ के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं । विष्णु धर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस व्रत को एक भी बार कर लेता है, वह सब तीर्थों का फल पा जाता है। उसे अत्यधिक पुण्य मिलता है और वह स्वर्गलोक को प्राप्त करता है

यह व्रत वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाता है। इस दिन उपवास करके विष्णु, लक्ष्मी एवं श्रीकृष्ण, वासुदेव का पूजन किया जान । व्रती को इस दिन प्रातःकालीन कर्मों से निवृत्त होकर विधिवत् भगवान का पूजन कर च की दाल का भोग लगाना चाहिए । इस दिन पितरों को तिल, जल से तर्पण और पिंडदान भी इसी विश्वास के साथ किया जाता है कि उसका फल अक्षय होगा। अनेक शुभ कार्य इसी दिन आरंभ किए जाते हैं, जिनसे सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। इसलिए नए व्यवसाय, भूमि का क्रय, भवन संस्था का उद्घाटन, विवाह, हवन आदि इसी तिथि में किए जाते हैं। जो मनुष्य इस दिन गंगास्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ।

अक्षय तृतीया व्रत विधि

* व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।
* घर की सफाई व नित्य कर्म से निवृत्त होकर पवित्र या शुद्ध जल से स्नान करें।
* घर में ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

निम्न मंत्र से संकल्प करें :-

ममाखिलपापक्षयपूर्वक सकल शुभ फल प्राप्तये
भगवत्प्रीतिकामनया देवत्रयपूजनमहं करिष्ये।

* संकल्प करके भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं।
* षोडशोपचार विधि से भगवान विष्णु का पूजन करें।
* भगवान विष्णु को सुगंधित पुष्पमाला पहनाएं।
* नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पण करें।
* अगर हो सके तो विष्णु सहस्रनाम का जप करें।
* अंत में तुलसी जल चढ़ा कर भक्तिपूर्वक आरती करनी चाहिए।
* इस दिन उपवास रखें।

पूजन से आती है घर में खुशहाली

गौर हो कि अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी पाप नाश होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है। अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम का भी जन्म हुआ था इसीलिए यह दिन भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। अक्षय तृतीया पर लोग सोने-चांदी की वस्तुएं खरीदते हैं। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व होता है और पूजा करने से मां लक्ष्मी की अक्षय कृपा हासिल होती है।

अक्षय तृतीया कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत के काल में जब पांडव वनवास में थे, तब एक दिन श्रीकृष्ण जो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है, ने उन्हें एक अक्षय पात्र उपहार स्वरुप दिया था। यह ऐसा पात्र था जो कभी भी खाली नहीं होता था और जिसके सहारे पांडवों को कभी भी भोजन की चिंता नहीं हुई और मांग करने पर इस पात्र से असीमित भोजन प्रकट होता था । श्रीकृष्ण से सम्बंधित एक और कथा अक्षय तृतीया के सन्दर्भ में प्रचलित है। कथानुसार श्रीकृष्ण के बालपन के मित्र सुदामा इसी दिन श्रीकृष्ण के द्वार उनसे अपने परिवार के लिए आर्थिक सहायता मांगने गए था। भेंट के रूप में सुदामा के पास केवल एक मुट्ठीभर पोहा ही था। श्रीकृष्ण से मिलने के उपरान्त अपना भेंट उन्हें देने में सुदामा को संकोच हो रहा था किन्तु भगवान कृष्ण ने मुट्ठीभर पोहा सुदामा के हाथ से लिया और बड़े ही चाव से खाया|

चूंकि सुदाम श्रीकृष्ण के अतिथि थे, श्रीकृष्ण ने उनका भव्य रूप से आदर-सत्कार किया। ऐसे सत्कार से सुदामा बहुत ही प्रसन्न हुए किन्तु आर्थिक सहायता के लिए श्रीकृष्ण ने कुछ भी कहना उन्होंने उचित नहीं समझा और वह बिना कुछ बोले अपने घर के लिए निकल पड़े। जब सुदामा अपने घर पहुंचें तो दंग रह गए | उनके टूटे-फूटे झोपड़े के स्थान पर एक भव्य महल था और उनकी गरीब पत्नी और बच्चें नए वस्त्राभूषण से सुसज्जित थे। सुदामा को यह समझते विलंब ना हुआ कि यह उनके मित्र और विष्णुःअवतार श्रीकृष्ण का ही आशीर्वाद है। यहीं कारण है कि अक्षय तृतीया को धन-संपत्ति की लाभ प्राप्ति से भी जोड़ा जाता है।

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