योग

Yoga in Hindi | Types of Yoga

yoga
परिभाषा : – 

योग का शाब्दिक अर्थ है – जोड़, सम्बन्ध या मिलन| प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी व्यक्ति, वस्तु, वौभव से योग होता ही है| पिता-पुत्र, पति-पत्नी का आपस में लौकिक सम्बन्ध भी एक योग ही होता है| जिस प्रकार अलग होने को  “वियोग” शब्द दिया जाता है इसी प्रकार मिलन को “योग” शब्द दिया जाता है| आत्मा का परमात्मा से मिलान ही योग है| योग संतुलित तरीके से एक व्यक्ति में निहित शक्ति में सुधार या उसका विकास करने का शास्त्र है। यह पूर्ण आत्मानुभूति पाने के लिए इच्छुक मनुष्यों के लिए साधन उपलब्ध कराता है। संस्कृत शब्द योग का शाब्दिक अर्थ ‘योक’ है। अतः योग को भगवान की सार्वभौमिक भावना के साथ व्यक्तिगत आत्मा को एकजुट करने के एक साधन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, योग मन के संशोधनों का दमन है।

योग एक सार्वभौमिक व्यावहारिक अनुशासन :

योग अभ्यास और अनुप्रयोग तो संस्कृति, राष्ट्रीयता, नस्ल, जाति, पंथ, लिंग, उम्र और शारीरिक अवस्था से परे, सार्वभौमिक है।यह न तो ग्रंथों को पढ़कर और न ही एक तपस्वी का वेश पहनकर एक सिद्ध योगी का स्थान प्राप्त किया जा सकता है। अभ्यास के बिना, कोई भी यौगिक तकनीकों की उपयोगिता का अनुभव नहीं कर सकता है और न ही उसकी अंतर्निहित क्षमता का एहसास कर सकते हैं। केवल नियमित अभ्यास (साधना) शरीर और मन में उनके उत्थान के लिए एक स्वरुप बनाते हैं। मन के प्रशिक्षण और सकल चेतना को परिष्कृत कर चेतना के उच्चतर स्तरों का अनुभव करने के लिए अभ्यासकर्ता में गहरी इच्छाशक्ति होनी चाहिए।

विकासोन्मुख प्रक्रिया के रूप में योग :

योग मानव चेतना के विकास में एक विकासवादी प्रक्रिया है। कुल चेतना का विकास किसी व्यक्ति विशेष में आवश्यक रूप से शुरू नहीं होता है बल्कि यह तभी शुरू होता है जब कोई इसे शुरू करना चुनता है। शराब और नशीली दवाओं के उपयोग, अत्यधिक काम करना, बहुत ज्यादा सेक्स और अन्य उत्तेजकों में लिप्त रहने से तरह-तरह के विस्मरण देखने को मिलते हैं, जो अचेतनावस्था की ओर ले जाता है। भारतीय योगी उस बिंदु से शुरुआत करते हैं जहां पश्चिमी मनोविज्ञान का अंत होता है। यदि फ्रॉयड का मनोविज्ञान रोग का मनोविज्ञान है और माश्लो का मनोविज्ञान स्वस्थ व्यक्ति का मनोविज्ञान है तो भारतीय मनोविज्ञान आत्मज्ञान का मनोविज्ञान है। योग में, प्रश्न व्यक्ति के मनोविज्ञान का नहीं होता है बल्कि यह उच्च चेतना का होता है। वह मानसिक स्वास्थ्य का सवाल भी नहीं होता है, बल्कि वह आध्यात्मिक विकास का प्रश्न होता है|

आत्मा की चिकित्सा के रूप में योग :

योग के सभी रास्तों (जप, कर्म, भक्ति आदि) में दर्द का प्रभाव बाहर करने के लिए उपचार की संभावना होती है। लेकिन अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक व्यक्ति को किसी ऐसे सिद्ध योगी से मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है जो पहले से ही समान रास्ते पर चलकर परम लक्ष्य को प्राप्त कर चुका हों। अपनी योग्यता को ध्यान में रखते हुए या तो एक सक्षम काउंसलर की मदद से या एक सिद्ध योगी से परामर्श कर विशेष पथ बहुत सावधानी से चुना जाता है।

योग के प्रकार :
  • कर्म योग
  • ज्ञान योग
  • भक्ति योग
  • राज योग
  • हठ योग
  • लय योग 
  • जप योग
कर्म योग :

इसमें कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की जाती है । श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है । गृहस्थ और कर्मठ व्यक्ति के लिए यह योग अधिक उपयुक्त है । हममें से प्रत्येक किसी न किसी कार्य में लगा हुआ है, पर हममें से अधिकांश अपनी शक्तियों का अधिकतर भाग व्यर्थ खो देते हैं, क्योंकि हम कर्म के रहस्य को नहीं जानते । जीवन की रक्षा के लिए, समाज की रक्षा के लिए, देश की रक्षा के लिए, विश्व की रक्षा के लिए कर्म करना आवश्यक है । किन्तु यह भी एक सत्य है कि दु:ख की उत्पत्ति कर्म से ही होती है । सारे दु:ख और कष्ट आसक्ति से उत्पन्न हुआ करते हैं । कोई व्यक्ति कर्म करना चाहता है, वह किसी मनुष्य की भलाई करना चाहता है और इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि उपकृत मनुष्य कृतघ्न निकलेगा और भलाई करने वाले के विरुद्ध कार्य करेगा । इस प्रकार सुकृत्य भी दु:ख देता है । फल यह होता है कि इस प्रकार की घटना मनुष्य को कर्म से दूर भगाती है । यह दु:ख या कष्ट का भय कर्म और शक्ति का बड़ा भाग नष्ट कर देता है । कर्मयोग सिखाता है कि कर्म के लिए कर्म करो, आसक्तिरहित होकर कर्म करो । कर्मयोगी इसीलिए कर्म करता है कि कर्म करना उसे अच्छा लगता है और इसके परे उसका कोई हेतु नहीं है । कर्मयोगी कर्म का त्याग नहीं करता वह केवल कर्मफल का त्याग करता है और कर्मजनित दु:खों से मुक्त हो जाता है । उसकी स्थिति इस संसार में एक दाता के समान है और वह कुछ पाने की कभी चिन्ता नहीं करता । वह जानता है कि वह दे रहा है, और बदले में कुछ माँगता नहीं और इसीलिए वह दु:ख के चंगुल में नहीं पड़ता । वह जानता है कि दु:ख का बन्धन ‘आसक्ति’ की प्रतिक्रिया का ही फल हुआ करता है ।

गीता में कहा गया है कि मन का समत्व भाव ही योग है जिसमें मनुष्य सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय, संयोग-वियोग को समान भाव से चित्त में ग्रहण करता है । कर्म-फल का त्याग कर धर्मनिरपेक्ष कार्य का सम्पादन भी पूजा के समान हो जाता है । संसार का कोई कार्य ब्रह्म से अलग नहीं है । इसलिए कार्य की प्रकृति कोई भी हो निष्काम कर्म सदा ईश्वर को ही समर्पित हो जाता है । पुनर्जन्म का कारण वासनाओं या अतृप्त कामनाओं का संचय है । कर्मयोगी कर्मफल के चक्कर में ही नहीं पड़ता, अत: वासनाओं का संचय भी नहीं होता । इस प्रकार कर्मयोगी पुनर्जन्म के बन्धन से भी मुक्त हो जाता है ।

जो पुरुष मन से इंद्रियों को वश में रखकर अनासक्त भाव से सभी इंद्रियों को कर्मयोग (निष्काम कर्म) में लगाता है, वही श्रेष्ठ है। जीवन को आनंदमय करने का सरल उपाय है- संसार के प्रति अपनी आसक्ति को कम करते जाना। जब हम अनासक्त भाव से कार्य करते हैं तो वह कर्मयोग कहलाता है और आसक्ति से करते हैं तो वह कर्मभोग होता है। कर्मयोग में हम कर्म करते हुए अपनी चेतना से जुड़े रहते हैं। इसके लिए अपने मन में थोड़ा भाव बदलना होता है कि मेरे द्वारा किए गए सभी कार्य प्रभु की

सेवा है। मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं, जो कार्य सामने आता है, वह करता हूं! इंद्रियों से कार्य लेता हूं, मन में उसका चिंतन नहीं करता।

असल में इंद्रियों की विषयों से आसक्ति नहीं होती, इंद्रियां तो माध्यम है। आसक्ति तो मन से होती है और मन उसको पूरा करने के लिए इंद्रियों का सहारा लेता है। इंद्रियों को वश करने के लिए मन को काबू में किया जाता है। मन के नियंत्रण में होने से इंद्रियां स्वयं काबू में आ जाती हैं। जैसे शुगर की बीमारी में व्यक्ति मन से जीभ को काबू कर मीठा नहीं खाता, वैसे ही सभी इंद्रियों को मन से वश में कर लिया जाता है!

कर्मयोगी हर कर्म परमात्मा की याद में करता है| वह अपनी जिम्मेदारियों को सम्भालते हुए, घर-गृहस्थी में रहकर स्वयं के जीवन को कमल के फूल सदृश्य रखता है| जिस प्रकार कमल का फूल कीचड़ में रहते हुए भी न्यारा रहता है, इसी प्रकार राजयोगी प्रतिकूल वातावरण में रहते हुए भी न्यारा रहता है, इसी प्रकार राजयोगी प्रतिकूल वातावरण में रहते हुए भी अपने आपको उससे न्यारा रखकर हर कर्म को परमात्मा की याद करते हूए उसे श्रेष्ठ बनाता जाता है|

कर्म योग हमें फल की किसी भी इच्छा के बिना सभी कार्य करना सिखाता है| इस साधना में, योगी अपने कर्तव्य को दिव्य कार्य के रूप में समझता है और उसे पूरे मन से समर्पण के साथ करता है लेकिन दूसरी सभी इच्छाओं से बचता है।

ज्ञान योग :

ज्ञानयोग से तात्पर्य है :- ‘विशुद्ध आत्मस्वरूप का ज्ञान’ या ‘आत्मचैतन्य की अनुभूति’ है। इसे उपनिषदों में ब्रह्मानुभूति भी कहा गया है। ज्ञानयोग के सन्दर्भ उपनिषदों में मिलते हैं जहाँ स्पष्टता पूर्वक कहा गये है कि ज्ञान के विना मुक्ति संभव नहीं है –“ऋते ज्ञानन्न मुक्तिः”ज्ञान योग की व्याख्या उपनिषदों में की गयी है । इसीलिए इस योग के तीन ही सोपान/विधि हैं-(१)श्रवण (उपनिषदों में कही गयी बातों को सुनना या पढ़ना); (२) मनन (श्रवण किये गये मन्तव्य पर चिन्तन करना (३) निदिध्यासन (सभी वस्तुओं से अपना ध्यान हटाकर साक्षी पक्षी की तरह बन जाना) । इसके अन्तर्गत ब्रह्मवाक्यों श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन को कहा गया है। ये ब्रह्म वाक्य प्रधान रूप से चार माने गये हैं –

  1. अयमात्मा ब्रह्म
  2. सर्वं खल्विदं ब्रह्म
  3. तत्त्वमसि
  4. अहं ब्रह्मस्मि

स्वयं को तथा संसार को ब्रह्ममय समझने से ब्रह्म से एकत्व स्थापित हो जाता है । ज्ञानयोग के साहित्य में उपनिषत्, गीता, तथा आचार्य शंकर के अद्वैत परक ग्रन्थ तथा उन पर भाष्यपरक ग्रन्थ हैं। इन्हीं से ज्ञान योग की परम्परा दृढ़ होती है। आधुनिक युग में विवेकानन्द आदि विचारकों के विचार भी इसमें समाहित होते हैं। ज्ञानयोग दो शब्दों से मिलकर बना है – “ज्ञान” तथा “योग”। ज्ञान शब्द के कई अर्थ किये जाते हैं – लौकिक ज्ञान – वैदिक ज्ञान | साधारण ज्ञान एवं असाधारण ज्ञान | प्रत्यक्ष ज्ञान – परोक्ष ज्ञान |

किन्तु ज्ञानयोग में उपरोक्त मन्तव्यों से हटकर अर्थ सन्निहित किया गया है। ज्ञान शब्द की उत्पत्ति “ज्ञ” धातु से हुयी है, जिससे तात्पर्य है – जानना। इस जानने में केवल वस्तु के आकार प्रकार का ज्ञान समाहित नहीं है, वरन् उसके वास्तविक स्वरूप की अनुभूति भी समाहित है। इसप्रकार ज्ञानयोग में यही अर्थ मुख्य रूप से लिया गया है।

ज्ञानयोग जिस दार्शनिक आधार को अपने में समाहित करता है, वह है ब्रह्म (चैतन्य) ही मूल तत्त्व है उसी की अभिव्यक्ति परक समस्त सृष्टि है। इस प्रकार मूल स्वरूप का बोध होना अर्थात् ब्रह्म की अनूभूति होना ही वास्तविक अनुभूति या वास्तविक ज्ञान है। एवं इस अनुभूति को कराने वाला ज्ञानयोग है। विवेकानन्द ज्ञान योग को स्पष्ट करते हुये कहते हैं कि आत्मा ऐसा वृत्त है जिसकी परिधि सर्वत्र है परन्तु जिसका केन्द्र कहीं नहीं है और ब्रह्म ऐसा वृत्त है जिसकी परिधि कहीं नहीं है, परन्तु जिसका केन्द्र सर्वत्र है। यही ज्ञान यथार्थ ज्ञान है। ज्ञानयोग में ज्ञान से आशय अधोलिखित किये जाते हैं –

आत्मस्वरूप की अनुभूति, ब्रह्म की अनूभूति, सच्चिदानन्द की अनुभूति, विशुद्ध चैतन्य की अवस्था |

ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गति विधियों पर-विचार धाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो। चाहे जिस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य-ही चिन्तन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।

जैसे गोताखोर मोती पाने के लिए समुद्र में डुबकी लगाता है वैसे ही दार्शनिक प्रकृति का व्यक्ति परमात्मा को ज्ञान मार्ग से पाना चाहता है । वह इस संसार की छोटी-छोटी वस्तुओं से सन्तुष्ट होने वाला मनुष्य नहीं है । अनेक ग्रन्थों के अवलोकन से भी उसे सन्तुष्टि नहीं मिलती । उसकी आत्मा सत्य को उसके

प्रकृत रूप में देखना चाहती है और उस सत्य-स्वरूप का अनुभव करके, तद्रूप होकर, उस सर्वव्यापी परमात्मा के साथ एक होकर सत्ता के अन्तराल में समा जाना चाहती है । ऐसे दार्शनिक के लिए तो ईश्वर उसके जीवन का जीवन है, उसकी आत्मा की आत्मा है । ईश्वर स्वयं उसी की आत्मा है । ऐसी कोई अन्य वस्तु शेष ही नहीं रह जाती, जो ईश्वर न हो ।

  • द्वा  सुपर्णा   सयुजा   सखाया   समानं  वृक्षं  परिषस्वजाते ।
  • तयोरन्य: पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाक शीति ।
  • समाने   वृक्षे  पुरुषो  निमग्नो  नीशया  शोचति   मुह्यमान: ।
  • जुष्टं  यदा  पश्यत्यन्यमीशमस्य  महिमानमिति   वीतशोक: । (कठोपनिषद् 3-1-1 व 2)

एक ही वृक्ष पर दो पक्षी हैं, एक चोटी पर दूसरा नीचे । चोटी पर रहने वाला पक्षी शान्त, मौन, महिमाशाली और अपने ही ऐश्वर्य में मग्न है । नीचे की शाखाओं पर रहने वाला पक्षी, बारी-बारी से, मधुर और कटु फल खाता हुआ सुखी और दु:खी होता रहता है । कुछ काल के पश्चात् अत्यन्त कटु फल खाकर वह त्रस्त हो जाता है और ऊपर बैठे स्वर्ण पंख वाले पक्षी को देखता है जो कोई फल नहीं खाता । नीचे वाला पक्षी ऊपर वाले पक्षी के समीप पहुँचने का प्रयत्न करता है । ऊपर वाले पक्षी के पास पहुँच कर नीचे वाले पक्षी को ज्ञात होता है कि वह केवल छाया मात्र है । वास्तविक पक्षी एक ही है । ऊपर वाला पक्षी इस विश्व का प्रभु ईश्वर है और नीचे वाला पक्षी इस संसार के मधुर और कटु फलों का भक्षक जीवात्मा है । इन्द्रिय सुखों से ऊपर उठकर जीवात्मा को पता चलता है कि वह भी स्वरूपत: ब्रह्म ही है ।

शरीर के द्वारा होने वाले कर्मों को चमड़े की आँखों से देखा जा सकता है पर उनकी भलाई बुराई स्वयं समझी जा सकती है अथवा दूसरे बताते रहते हैं। स्थूल शरीर का क्रिया-कलाप स्थूल दृष्टि से समझा जा सकता है पर मानसिक हलचलें अदृश्य होती है उन्हें देखने समझने के लिए सूक्ष्म दृष्टि विकसित करनी पड़ती है। यही ज्ञान-योग है। मोटे तौर से धर्म, अध्यात्म दर्शन जैसे विषयों का पठन पाठन-श्रवण स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है लोग इसी के लिए कथा, प्रवचन सुनते हैं। ग्रन्थ पाठ भी उसी पुण्य प्रयोजन के लिए किये जाते हैं पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब निर्देश संकेत मात्र हैं- आधार नहीं। मस्तिष्क पर नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए किस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया हो इसके लिए अवतारों के, ऋषियों के-महामानवों के चरित्रों, एवं निर्देशों का श्रवण स्वाध्याय करके हम अपनी मनः स्थिति सही करें-विचारणाओं में परिष्कृत तत्त्वों का समावेश करें इतना भर उद्देश्य इस सारे ज्ञानयोग कलेवर का है। उसका सार-तत्त्व व्यवहार में आया कि नहीं इसकी परख इस कसौटी पर होती है कि सूक्ष्म दृष्टि से अपनी मानसिक हलचलों का बारीकी से अध्ययन-उनके औचित्य का वर्गीकरण-अवांछनीय प्रवाह का दमन और दिव्य चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।

ज्ञान योग हमें आत्म और गैर – स्वयं के बीच भेद करना सिखाता है और शास्त्रों के अध्ययन, संन्यासियों के सान्निध्य व ध्यान के तरीकों के माध्यम से आध्यात्मिक अस्तित्व के ज्ञान को सिखाता है।

भक्ति योग :

यह योग भावनाप्रधान और प्रेमी प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी है । वह ईश्वर से प्रेम करना चाहता है और सभी प्रकार के क्रिया-अनुष्ठान, पुष्प, गन्ध-द्रव्य, सुन्दर मन्दिर और मूर्ति आदि का आश्रय लेता और उपयोग करता है । प्रेम एक आधारभूत एवं सार्वभौम संवेग है । यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से डरता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अपने जीवन से प्रेम है । यदि कोई व्यक्ति अधिक स्वार्थी है तो इसका तात्पर्य यह है कि उसे स्वार्थ से प्रेम है । किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी या पुत्र आदि से विशेष प्रेम हो सकता है । इस प्रकार के प्रेम से भय, घृणा अथवा शोक उत्पन्न होता है । यदि यही प्रेम परमात्मा से हो जाय तो वह मुक्तिदाता बन जाता है । ज्यों-ज्यों ईश्वर से लगाव बढ़ता है, नश्वर सांसारिक वस्तुओं से लगाव कम होने लगता है । जब तक मनुष्य स्वार्थयुक्त उद्देश्य लेकर ईश्वर का ध्यान करता है तब तक वह भक्तियोग की परिधि में नहीं आता । पराभक्ति ही भक्तियोग के अन्तर्गत आती है जिसमें मुक्ति को छोड़कर अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती । भक्तियोग शिक्षा देता है कि ईश्वर से, शुभ से प्रेम इसलिए करना चाहिए कि ऐसा करना अच्छी बात है, न कि स्वर्ग पाने के लिए अथवा सन्तति, सम्पत्ति या अन्य किसी कामना की पूर्ति के लिए । वह यह सिखाता है कि प्रेम का सबसे बढ़ कर पुरस्कार प्रेम ही है, और स्वयं ईश्वर प्रेम स्वरूप है । विष्णु पुराण(1-20-19) में भक्तियोग की सर्वोत्तम परिभाषा दी गयी है

या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी ।

त्वामनुस्मरत: सा मे हृदयान्मापसमर्पतु ॥

‘‘हे ईश्वर! अज्ञानी जनों की जैसी गाढ़ी प्रीति इन्द्रियों के भोग के नाशवान् पदार्थों पर रहती है, उसी प्रकार की प्रीति मेरी तुझमें हो और तेरा स्मरण करते हुए मेरे हृदय से वह कभी दूर न होवे ।’’ भक्तियोग सभी प्रकार के संबोधनों द्वारा ईश्वर को अपने हृदय का भक्ति-अर्घ्य प्रदान करना सिखाता है- जैसे, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी आदि । सबसे बढ़कर वाक्यांश जो ईश्वर का वर्णन कर सकता है, सबसे बढ़कर कल्पना जिसे मनुष्य का मन ईश्वर के बारे में ग्रहण कर सकता है,

वह यह है कि ‘ईश्वर प्रेम स्वरूप है’ । जहाँ कहीं प्रेम है, वह परमेश्वर ही है । जब पति पत्नी का चुम्बन करता है, तो वहाँ उस चुम्बन में वह ईश्वर है । जब माता बच्चे को दूध पिलाती है तो इस वात्सल्य में वह ईश्वर ही है । जब दो मित्र हाथ मिलाते हैं, तब वहाँ वह परमात्मा ही प्रेममय ईश्वर के रूप में विद्यमान है । मानव जाति की सहायता करने में भी ईश्वर के प्रति प्रेम प्रकट होता है । यही भक्तियोग की शिक्षा है ।

भक्तियोग भी आत्मसंयम, अहिंसा, ईमानदारी, निश्छलता आदि गुणों की अपेक्षा भक्त से करता है क्योंकि चित्त की निर्मलता के बिना नि:स्वार्थ प्रेम सम्भव ही नहीं है । प्रारम्भिक भक्ति के लिए ईश्वर के किसी स्वरूप की कल्पित प्रतिमा या मूर्ति (जैसे दुर्गा की मूर्ति, शिव की मूर्ति, राम की मूर्ति, कृष्ण की मूर्ति, गणेश की मूर्ति आदि) को श्रद्धा का आधार बनाया जाता है। किन्तु साधारण स्तर के लोगों को ही इसकी आवश्यकता पड़ती है ।

भक्ति से ही परमेश्वर को जाना जा सकता है, अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह पूर्ण रूप से भक्त बने | भगवान को प्राप्त करने के लिए वह अपने मन को भगवान में एकाग्र करे | भक्ति का यही आदर्श है  | भक्त भगवान को प्रसन्न करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहता | उसके जीवन का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना होता है और भगवान की तुष्टि के लिए वह सब कुछ उत्सर्ग कर सकता है | जो योगाभ्यास में बढ़े-चढ़े हैं, वे योग द्वारा आत्मा को इच्छानुसार किसी भी लोक में ले जाते हैं | भक्त के लिए स्पष्ट कहा गया है कि स्वयं भगवान ही उसे ले जाते हैं | भक्त को वैकुंठ जाने के पूर्व अनुभवी बनने के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती | वराह पुराण में कहा गया है- नयामि परमं स्थानमर्चिरादिगतिं बिना/गरुडस्कन्धमारोप्य यथेच्छमनिवारित: |

अर्थात वैकुंठलोक में आत्मा को ले जाने के लिए भक्त को अष्टांगयोग साधने की आवश्यकता नहीं है | उसका भार भगवान स्वयं अपने ऊपर लेते हैं | वे स्वयं उद्धारक बनते हैं | बालक माता-पिता द्वारा अपने आप रक्षित होता रहता है | इसी प्रकार भक्त को योगाभ्यास द्वारा अन्य लोकों में जाने के लिए प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती | भगवान अनुग्रहवश उसे स्वयं भवसागर से उबार लेते हैं | कोई कितना ही कुशल तैराक क्यों न हो, और कितना ही प्रयत्न क्यों न करे, किन्तु समुद्र में गिर जाने पर वह अपने को बचा नहीं सकता है किन्तु यदि कोई आकर उसे बाहर निकाल ले, तो वह बच जाता है | इसी प्रकार भगवान भक्त को इस भवसागर से निकाल लेते हैं | बस मनुष्य को केवल भगवानभावनामृत की सुगम विधि का अभ्यास करना होता है और अपने आपको अनन्य भक्ति में प्रवृत्त करना होता है | भक्ति योग, परमात्मा की इच्छा के पूर्ण समर्पण पर जोर देने के साथ तीव्र भक्ति की एक प्रणाली है। भक्ति योग का सच्चा अनुयायी अहं से मुक्त विनम्र और दुनिया की द्वैतता से अप्रभावित रहता है।

राज योग :

योग का आध्यात्मिक अर्थ है आत्मा का सम्बन्ध, मिलन का जोड़ परमात्मा के साथ | आत्मा और परमात्मा का मिलन सर्वश्रेष्ठ होने के कारण इसे राजयोग कहते है | राजयोग सभी योगों का राजा है | स्वयं परमात्मा ही अपना परिचय देकर आत्मा को अपने साथ योग लगाने की विधि बताते है | इस योग को “राजयोग“ इसलिए भी कहा गया है, क्यांकि इसका शिक्षक सर्वश्रेष्ठ योगेश्वर स्वयं परमात्मा ही है | इस योगद्वारा हमारे संस्कार उच्च अथवा “रॉयल“ बनते हैं इसलिए भी इसे राजयोग कहा जाता है | राजयोग ही वर्तमान जीवन में कर्मो में श्रेष्ठता लाकर हमें कर्मेन्द्रियों का राजा बनाता है और भविष्य सतयुगी नई दुनिया में विश्व का महाराजा बनाता है |

“अष्टांग योग” के रूप में लोकप्रिय राज योग मनुष्य के चौतरफा विकास के लिए है. ये हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि | राजयोग ही अविनाश सुख-शान्ति का एकमात्र उपाय है | आज मनुष्य परमात्मा के सामने जाकर प्रार्थना करता है कि “हे प्रभु ! मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ, गुलाम हूँ, चरणों की धूल है  .…. आदि-आदि | लेकिन वास्तविकता यही है कि वह अपनी इन्द्रियों का गुलाम बन चुका है क्योंकि जहाँ इन्द्रियाँ मनुष्य के मन को ले जाती है, वही मन चला जाता है, इसीलिए मन को नीच, पापी कपटी और चंचल घोड़े आदि की उपाधि दी जाती है, लेकिन परमात्मा कहते है कि मन एक अति प्रबल शक्ति है जिसको ईश्वर की तरफ ले जाना ही राजयोग है |

वैसे तो हर एक व्यक्ति परमात्मा को याद करता है, परन्तु उसकी सहा यही शिकायत बनी रहती है कि जब भी वह ईश्वर के ध्यान में बैठता है, तब उसका मन टिकता नहीं है | अब इसका मूल कारण क्या है ? सबसे पहले ईश्वर का ध्यान करने वाला “में स्वयं कौन हूँ “ – यही वह नहीं जानता है | वह यह भी नहीं जानता है कि ईश्वर का सही परिचय क्या है इसलिए मन की शक्ति काफ़ी हद तक अनेक व्यर्थ बातों में भटकने के कारण नष्ट हो जाती है | राजयोग वह मनोविज्ञान है जिसके द्वारा आत्मा और परमात्मा का सही परिचय प्राप्त कर मन को परमात्मा में लगाया जाता है, भगवान ने कहा है – “मन्मनाभव“ अर्थात “मन को मेरे में लगाओ“ मन को मारने की बजाए मन को ईश्वर की तरफ मोड़ना ही राजयोग है | जब मन परमात्मा में लगाया जाता है तब ही उसकी शक्ति व्यर्थ जाने के बजाए उसका संचय किया जा सकता है | राजयोग वह विधि है जिससे मन परमात्मा में लगाकर स्थायी रूप से उसके गुणों – सुख, शान्ति, आनन्द, प्रेम आदि का अनुभव किया जा सकता है |

परमात्मा के साथ आत्मा का सम्बन्ध जोड़ने के लिए किसी भी भौतिक शक्ति की आवश्यकता नहीं है | स्वयं की पहचान तथा परमात्मा की पहचान के आधार पर यह सम्बधन्ध जोडना सहज हो सकता है | राजयोग को सहजयोग या बुध्दियोग भी कह सकते हैं क्योंकि यह योग हरेक व्यक्ति कर सकता है | यह योग कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है क्योंकि इसमें किसी भी प्रकार के शारीरिक आसन की आवश्यकता नहीं है | बल्कि राजयोग में बुध्दि के द्वारा मन को नियन्त्रित कर, ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर उसको परमात्मा में लगाया जाता है |

राजयोगी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अशुध्द अहंकार आदि जो आत्मा के महावौरी और बड़े दुश्मन हैं, पर सहज रुप से विजय प्राप्त करता है या उनका संन्यास करता है | इसलिए राजयोग को संन्यास योग भी कह सकते है | भौतिक रीति से राजयोगी कुछ भी संन्यास नहीं करता है लेकिन मानसिक रीति से वह सारे भौतिक विश्व का संन्यास करता है और संन्यास भी उतना सहज बन जाता है

राजयोग के लिए नियमों का पालन :

संयम और नियम ही मनुष्य जीवन का मूल श्रृंगार हैं | बिना नियम के मनुष्य-जीवन पशु-जीवन से भी बदतर गिना जायेगा | ईश्वर में मन न लगने का यह भी एक कारण है | अगर मन में विकारों ने स्थान ले लिया है तो ईश्वर वहाँ स्थान कैसे ले सकता है ? परमात्मा की याद उसके मन में रह सकती है जिसका मन रूपी पात्र शुध्द हो | तो मन के शुध्दिकरण के लिए या राजयोग का श्रेष्ठ अनुभव करने के लिए कुछ नियमों का पालन आवश्यक हो जाता है जो निम्नलिखित है –

1)  ब्रह्मचर्य – ब्रह्मचर्य अर्थात् मन, वचन, कर्म की शुध्दि | काम विकासर योगी का सबसे बड़ा शुत्र है | राजयोग अर्थात आत्म-स्मृति के आधार पर है जिसकी तुलना अमृत से की जाती है जबकि काम विकार देह-अभिमान के आधार पर है जिसकी तुलना विष से की जाती है | तो”अमृत” और “विष” की भांति “योग” और “भोग” दो विरोधी बातें है जो साथ नहीं चल सकते है | अमृत के घड़े में एक बूंद भी जहर की पड़ जाने से अमृत जहर बन जाता है | एक म्यान में एक ही तलवार रह सकती है, दो नहीं | या तो जीवन राम हवाले है या काम हवाले है | जिस मन रूपी पात्र में काम विकार घूम रहा है, वहा परमात्मा स्थान कैसे ले सकता है ! शुध्द वस्तु को स्थान देने के लिए पात्र भी इतना योग्य और शुध्द होना चाहिए | उक्ति प्रसिध्द है – “शेरणी का दूध सोने के पात्र में ही रह सकता है ” राजा और राजनौतिक नेता ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों के आगे मस्तक झुकाते हैं | छोटी कुमारियों की पूजा भी इसीलिए होती है क्योंकि वे पवित्र हैं देवता भी तन-मन से पवित्र हैं, इसलिए वे पूज्य हैं |

2)  शुध्द अन्न – मनुष्य जौसा भोजन करता है, उसका गहरा प्रभाव उसके मन की स्थिती पर पड़ता है | कहावत भी है – “जौसा अन्न वौसा मन” अत: राजयोगी के लिए भोजन की पवित्रता का नियम पालन आवश्यक है | उसका भोजन सात्विक अर्थात् शाकाहारी, सादा, ताजा और शुध्द होता है | उसमें तमोगुणी, मांसाहारी और रजोगुणी नशीले एवं उत्तेजक पदार्थ नहीं होते है | भोजन बनाने वाला भी ब्रह्मचर्य का पालन वाला हो | भोजन शुरु करने से पूर्व योग उस परमात्मा के प्रति अर्पित करता है और फिर प्रसाद के रुप में ग्रहण करता है जिससे उसकी मानसिक शुध्दि होती है | राजयोगी खाने के लिए नहीं जीता है, वह जीने के लिए खाता है वह तम्बाकू, शराब आदि नशीले पदार्थो के सेवन से भी दूर रहता है |

3)  सत्संग – व्यक्ति की पहचान उसके संगी-साथियों से होती है | राजयोगी प्रतिदिन ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करता है | जौसे प्रात: स्नान करने के उपरान्त मनुष्य प्रफुल्लता का अनुभव करता है, वौसे ही आत्मा को बुरे संकल्पों से बचाये रखने एवं उमंग-उत्साह में रखने के लिए प्रतिदिन ज्ञानस्नान आवश्यक है | सत्संग का अर्थ है – सत्य का संग अर्थात् परमात्मा से मानसिक स्मृति द्वारा निरन्तर सम्पर्क बनाए रखना | पावन परमात्मा का संग करने से आत्मा पावन बन जाती है |

4)  दिव्य गुणों की धारणा – राजयोग का अन्तिम उद्देश्य देवत्व की प्राप्ति करना है | अत: राजयोगी अपने जीवन में सदगुणों की भी धारणा करता है | राजयोगी स्वयं को परमात्मा की सुयोग्य सन्तान समझकर अन्तर्मुखता, हर्षितमुखता, मधुरता, सहनशीलता, प्रसन्नता, सन्तुष्ठता, निर्भयता, धौर्य आदि गुणों की धारणा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है |

राजयोग द्वारा प्राप्ति :

राजयोग से अनेक उपलब्ध्यिों की सहज प्राप्ति होती है जो और किसी योग से प्राप्त नहीं हो सकती है | यह सभी दु:खों की एकमात्र औषधी है जिससे कड़े संस्कार रुपी रोग नष्ट हो जाते है | राजयोग द्वारा मनुष्य अधिक क्रियाशील, कार्य-कुशल और जागरुक बन जाता है, क्योंकि उसकी एकाग्रता की शक्ति बढ़ जाती हैं | राजयोग मनुष्य में जीवन के प्रति मूलभूत परिवर्तन ला देता है | वह संसारी होते हुए भी विदेही होता है | वह कार्यरत होते हूए भी कर्मबन्धनों से मुक्त रहता है | वह गृहस्थ और समाज के कार्यो में सक्रिय भाग लेते हूए भी निर्लिप्त रहता है अर्थात परिस्थितीयों में तटस्थ रहकर कमल-फूल समान न्यारा और प्यारा जीवन व्यतीत करता है | इसी कारण वह समाज का भी एक लाभदायक अंग बन जाता है | संक्षेप में राजयोग उसको वह सब कुछ प्रदान करता है जो जीवन मेंे प्रापत करने योग्य है और वह अनुभव करता है कि वह सब कुछ पा रहा है | यही जीवन की पूर्णत है |

राजयोग अभ्यास :

राजयोग के उपरान्त महत्व को देख हर मनुष्य में राजयोग अभ्यासी बनने के लिए रुची प्राप्त हो सकती है | अत: राजयोग की प्राथमिक अनूभूती हेतू निम्नलिखीत अभ्यास आवश्यक है | कुल समय के लिए परमात्म् याद – अखण्ड शान्ति की स्थिती में अपने – अपने ढ़ग से बौठेगे और प्रभू पिता के समक्ष राजयोग के अभ्यास निमित्त नियम पालन का श्रेष्ठ संकल्प रखेंगे ताकि वह मददगार बनकर हमें श्रेष्ठ प्राप्ति का अधिकारी बनाये |

हठ योग :

इससे ऐसा आभास होता है कि जो योग जबरदस्ती या बलपूर्वक किया जाए , उसे हठयोग कहते हैं। हठयोग जबर्दस्ती का योग नहीं, बल्कि सहजता से भरा है। इसमें अगर हठ करना है तो आलस से भरे जिद्दी मन से करना है। हठ का मतलब जबरदस्ती होता है लेकिन हठ के साथ जब योग जुड़ जाता है, तब उसका मतलब आध्यात्मिक हो जाता है। केवल ‘ हठ ‘ शब्द तो जबरदस्ती के लिए आता है , लेकिन जब हठ के साथ ‘ योग ‘ जुड़ जाए तो उसका अर्थ पूरी तरह से बदल जाता है। हठ शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है- ‘ ह ‘ हकार अर्थात् दायां नासिका स्वर , जिसको पिंगला नाड़ी भी कहते हैं और ‘ ठ ‘ ठकार अर्थात् बायां नासिका स्वर , जिसको इड़ा नाड़ी भी कहते हैं। इन दोनों ध्वनियों को मिलाना हठयोग कहलाता है। इनके मिलने से सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का आवागमन होता है और कुण्डलिनी चक्रों का जागरण होता है। इससे साधक अपने ही शरीर में ब्रह्माण्ड की प्रत्येक गतिविधि का अनुभव करने की सिद्धि प्राप्त करता है। हठयोग की परम्परा उतनी ही प्राचीन है , जितनी नाथयोग की परम्परा। नाथयोग के आदि प्रणेता भगवान शिव माने जाते हैं।

नाथयोग की साधना पद्धति हठयोग ही है। भारत के इतिहास में जितनी भी तान्त्रिक साधनाओं का प्रचलन रहा , उनमें हठयोग का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा। इसीलिए हठयोगियों को तान्त्रिक भी कहा जाता था। लेकिन यह तन्त्र साधना सात्विक साधना है , जिसका उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति रहा है। लेकिन मध्यकाल में ऐसे अनेक औघड़ हठयोगियों का वर्णन मिलता है , जिन्होंने अपने स्थूल शरीर को तपाकर घोर तप किया , जिसमें एक पैर पर खड़े होकर साधना करना , एक हाथ ऊपर उठाकर साधना करना , कीलों की खड़ाऊँ पहनना , तख्ते में कीलें गाड़ कर उस पर सोना , अग्नि को चारों ओर जलाकर बीच में बैठकर साधना करना , सिर के बल रहकर साधना करना , बिना खाए-पीए साधना करना आदि जैसी अनेक विधियाँ प्रचलित हुईं। इस प्रकार की साधनाएं फल प्राप्ति की इच्छा से या अपने को महा तपस्वी दिखाने के लिए या यश , धन , ऐश्वर्यादि की प्राप्ति की इच्छा से अपनी पूजा करवाने या सिद्ध कहलवाने के लिए की जाती थीं। लेकिन इससे उन लोगों को अनेक प्रकार की सिद्धियां भी प्राप्त हुईं। इस तरह , साधना की ये विधियाँ भी हठयोग का ही एक अंग थीं। लेकिन इस प्रकार की साधना से ही वे लोग हठी कहलाए और समाज में ऐसा प्रचार हो गया कि जो जबरदस्ती , हठपूर्वक किया जाए , वही हठयोग है। इससे हठयोग की साधना अपने मूल रूप और मूल उद्देश्यों से दूर हट गई। हठयोग की साधना के सात अंग हैं- षट्कर्म , आसन , मुद्रा , प्रत्याहार , प्राणायाम , ध्यान व समाधि। षट्कर्म की जितनी भी क्रियाएं प्रचलन में हैं- चाहे वो नेति , धौति , बस्ति , नौलि व त्राटक हों या कपालभांति- ये सभी हठयोग की क्रियाएं हैं और इनके साथ जितने भी आसन प्रचलित हैं , वे भी हठयोग के ही आसन हैं। यहाँ पर ऐसे चौरासी लाख आसन माने गए हैं। महाबंध , उड्डियानबंध , मूलबंध , जालन्धर बन्ध , अश्विनी आदि मुद्राएं और अनुलोम , विलोम , उज्जायी , भस्त्रिका , भ्रामरी आदि प्राणायाम , ध्यान की विभिन्न पद्धतियाँ- ये सभी हठयोग की साधना का ही अंग हैं। इस प्रकार जो योगाभ्यास आज समाज के विभिन्न आयुवर्ग के लोगों के बीच प्रचलित है , वह हठयोग ही है। लेकिन महर्षि पतंजलि की साधना एक ऊँची साधना है , जिसका अभ्यास हठयोग का पूरी तरह अभ्यास हो जाने के बाद ही सम्भव है। योग चिकित्सा पद्धति , जिसके द्वारा अनेक साध्य-असाध्य कहे जाने वाले रोगों का इलाज हो रहा है , वह भी हठयोग का ही अभ्यास है , क्योंकि हठयोग शरीर , प्राण , मन व इन्द्रियों को स्वस्थ बनाकर इनको रोगों से मुक्ति दिलाता है। योग की मान्यता है कि शरीर में कोई भी रोग शरीरस्थ प्राण के संचार की कमी से होता है , चाहे वह शरीर का रोग हो या मन का। और इसी प्राण के संचार को ठीक करने का कार्य हठयोग करता है। इस प्रकार हठयोग का अभ्यास अगर व्यक्ति करे , तो वह निरोग रह सकता है और अध्यात्म की ओर जाने की इच्छा हो तो सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का प्रवाह करा कर , कुण्डलिनी व चक्र जागरण कर , संचित कर्मों का नाश करता हुआ , ईश्वरीय शक्ति से अपना सम्पर्क स्थापित कर जीवन के अन्तिम लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।

लय योग :

ब्रह्मांड के मध्य स्थित है ब्रह्मलोक उसी तरह हमारे मस्तिष्क के मध्य में स्थित है ब्रह्मरंध। अपना संपूर्ण ध्यान ब्रह्मरंध पर केंद्रित करके ब्रह्म (ईश्वर) में लीन हो जाना ही लय योग कहलाता है। लय योग एक कला है स्वयं को शांत कर ईश्वर या ब्रह्मांड की शक्ति से जुड़कर शक्तिशाली बनने की। लययोग के 9 अंग माने जाते हैं जो इस प्रकार से है- यम, नियम, स्थूल क्रिया, सूक्ष्म क्रिया, प्रत्त्याहार, धारणा, ध्यान, लयक्रिया और समाधि। इसमें स्थूल क्रिया का मंत्र क्रिया से, सूक्ष्म क्रिया का स्वरोदय क्रिया से, प्रत्याहार का नादानुसंधान क्रिया से तथा धारणा का षट्चक्र भेदन क्रिया से सम्बंध रहता है। हालाँकि लय योग एक विस्त्रत विषय है लेकिन सामान्यजन यदि सिर्फ ब्रह्मरंध पर ही ध्यान देते रहें तो लय सध जाता है, क्योंकि यही शक्ति का केंद्र है।

लय योग का उद्देश्य : लय योग का उद्देश्य है कि मस्तिष्क शांत रहकर ब्रह्मलोक जैसा प्रकाशमान हो तथा मन निर्मल क्षीर सागर की तरह बनें। इसके लिए मस्तिष्क के ब्रह्मरंध पर ध्यान लगाकर चक्र और कुंडलिनी जागरण किया जाता है। लय योग की विधि : शांत स्थान पर ध्यानमुद्रा में बेठकर आँखें बंद कर ध्यान को मस्तिष्क के मध्य लगाएँ। मस्तिष्क के मध्य नजर आ रहे अंधेरे को देखते रहें और इसी में आनंद लें तथा साँसों के आवागमन को महसूस करें। पाँच से दस मिनट तक ऐसा करें।

लय योग के लाभ : उक्त ध्यान को निरंतर करते रहने से चित्त की चंचलता शांत होती है। ब्रह्मरंध (भ्रकूटी) पर निरंतर ध्यान देने से व्यक्ति ब्रह्मांड की शक्ति से जुड़कर स्वयं को सकारात्मक उर्जा का स्रोत बना लेता है। ईश्वर से जुड़ने का यही एक मात्र साधन है। इससे मस्तिष्क निरोगी, शक्तिशाली तथा निश्चिंत बनता है। सभी तरह की चिंता, थकान और तनाव से व्यक्ति दूर होता है।

जप योग :

बारंबार सस्वर पाठ दोहराकर या स्मरण कर परमात्मा के नाम या पवित्र शब्दांश ‘ओम’, ‘राम’, ‘अल्लाह’, ‘प्रभु’, ‘वाहे गुरु’ आदि पर ध्यान केंद्रित करना। जप योग अचेतन मन को जागृत करने की वैज्ञानिक विधि है। सद्गुणों के समुच्चय ईश्वर से अपनी अंतरात्मा को जोड़ने का यह एक महत्वपूर्ण साधन है। इसमें परमात्मा के, इष्ट के नाम का रूप स्मरण के साथ ही उसके गुण-कर्मों की भावभरी स्मृति उपासक के मन:पटल पर, अंत:करण पर सतत् छाई रहती है। इससे न केवल साधक का मनोबल दृढ़ होता है, आस्था परिपक्व होती है, वरन् विचारों में विवेकशीलता आती है। बुध्दि निर्मल व पवित्र बनती है तथा आत्मा में ईश्वर का प्रकाश अवतरित होता है। उससे मनुष्य अनेक प्रकार की ऋध्दि-सिध्दियों का स्वामी बन जाता है।

स्वाध्याय का अंग :

विश्व के समस्त धर्मों में जप को समुचित स्थान दिया गया है और इसे मनुष्य को उसका चरम उद्देश्य प्राप्त कराने वाला अमोघ के मंत्र जो भी हों, जप की आवश्यकता सर्वत्र ही बताई गई है। बौध्द एवं जैन मतावलंबियों ने भी इसे अपनाया है। उनके साधना विधान में इस पर बल दिया गया है। सूफी मत एवं कैथोलिक मत वाले इसे प्राचीन काल से अपनाए हुए हैं। योगियों ने क्रिया योग में इसे स्वाध्याय का एक अंग माना है।

जप यौगिक अभ्यास के अंतर्गत आता है, जिसका अर्थ होता है- ‘जप व्यक्तायां वाचि’ अर्थात् स्पष्ट बोलना। अत: मंत्र के बार-बार उच्चारण को ही जप कहते हैं। भगवान कृष्ण ने इसे सब यज्ञों में श्रेष्ठ कहा है और अपनी विभूति बताया है। गीता में दसवें अध्याय में 25वें श्लोक में कहा गया है- ‘यज्ञानां जपयज्ञोस्मि’ अर्थात् यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूं। इसका अवलंबन साधक के भयों का नाश करता है। नियत संख्या में नियमित रूप से गायत्री अथवा अन्य किसी इष्ट मंत्र का भाव प्रवण जप अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति करता है। उल्टा-सीधा जैसे भी बन पड़े भगवान के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए। वाल्मीकि को राम नाम का सीधा उच्चारण कहां आता था? फिर भी- उल्टा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।’

शरीर पर नित्य मैल चढ़ता है और उसे साफ करने के लिए रोज नहाना पड़ता है। इसी तरह मन पर भी नित्य वातावरण में उड़ने फिरने वाली दुष्प्रवृत्तियों की छाप पड़ती है। उस मलीनता को धोने के लिए नित्य ही उपासना करनी पड़ती है। यह कार्य जप द्वारा आसानी से पूर्ण हो जाता है। स्मरण से आह्वान, आह्वान से स्थापन और स्थापन से उपलब्धि का क्रम चल पड़ना शास्त्र सम्मत ही नहीं, विज्ञान सम्मत भी है।

सूक्ष्म शरीर के संशोधन में जप और ध्यान का प्रयोग करना पड़ता है। जप द्वारा अपने आप ही उस परमेश्वर को पुकारना है, जिसे हम एक प्रकार से भूल ही चुके हैं। जप की पुकार उसी को खोजने के लिए ही है। जप में भगवत नाम की रट पतन के गर्त में से हाथ पकड़कर ऊपर उबारने के लिए ही लगाई जाती है। मनुष्य अपनी आत्मा की खो बैठा है और गंवा वियोगी की तरह नाम की रट लगाता है। जप का एक उद्देश्य यह भी है। भगवान को नाम लेने न लेने से कोई वास्ता नहीं। वह दिव्यसत्ता तो केवल इतना ही देखती है कि जो काम सौंपे गए थे, वे पूरे किए गए या नहीं।

ईश्वर और जीव का संबंध सनातन है, पर वह माया में अत्यधिक प्रवृत्ति के कारण एक प्रकार से टूट ही गया है। इसे फिर से सोचने, सूत्र को नए सिरे से खोजने और टूटे संबंधों को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया ‘रीकॉल’ है। जप द्वारा यह उद्देश्य भी पूरा होता है। आत्मिक प्रगति के लिए चिंतन क्षेत्र की जुताई करनी पड़ती है। नाम जप को एक प्रकार से खेत की जुताई कह सकते हैं। भगवानमय जीवन बनाने की स्थिति आने तक नाम स्मरण करते रहना चाहिए। अंतरात्मा द्वारा एक मन और दस इंन्द्रियों को पढ़ाने के लिए खोली गई पाठशाला को उपासना कृत्य समझा जा सकता है, उसमें नाम जप की रटाई कराई जाती है। साधना का परिणाम सिध्द है। यह सिध्दियां भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।

सद्बुध्दि की कामना :

मंत्रों का चयन ध्वनि-विज्ञान को आधार मानकर किया गया है। अर्थ का समावेश गौण है। गायत्री मंत्र की सामर्थ्य अद्भुत है, पर उसका अर्थ अति सामान्य है। भगवान से सद्बुध्दि की कामना भर उसमें की गई है।इसी अर्थ प्रयोजन को व्यक्त करने वाले मंत्र और श्लोक हजारों हैं। हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में भी ऐसी कविताओं की कमी नहीं, जिनमें परमात्मा से सद्बुध्दि की प्रार्थना की गई है। मंत्र जप की दुहरी प्रतिक्रिया होती है। एक भीतर, दूसरी बाहर। सूक्ष्म शरीर में अवस्थित चक्रों और ग्रंथियों को जप ध्वनि का अनवरत प्रभाव अपने ढंग से प्रभावित करता है और उत्पन्न हुई हलचल उनकी मर्ूच्छा दूर करके जागृति का अभिनव दौर उत्पन्न करती हैं। ग्रंथि-भेदन तथा चक्र जागरण का सत्परिणाम जपकर्ता को प्राप्त होता है। जगे हुए यह दिव्य संस्थान साधन के आत्म-बल का नया संचार करते हैं। उसे ऐसा कुछ अपने भीतर जगा, उगा प्रतीत होता है, जो पहले नहीं था। इस नवीन उपलब्धि के लाभ भी उसे प्रत्यक्ष ही दृष्टिगोचर होते हैं।

जप प्रक्रिया में एक विशेषता यह है कि उससे न केवल समस्त संसार का वातावरण प्रभावित होता है, वरन् साधक का व्यक्तित्व भी झनझाने, जगमगाने लगता है। यद्यपि मंत्रों में शब्दों का गठन ध्वनि विज्ञान की विशेषताओं के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन मंत्र कोई भी हो, वह ब्रह्म का ही स्वरूप है। वेद में शब्द को ब्रह्म कहा गया है और इस बात की पूरी स्वतंत्रता दी गई है कि ब्रह्म का नाम व रूप कोई भी अपनी इच्छा से कुछ भी रख सकता है। आवश्यकता है किउस मंत्र अथवा नाम अथवा रूप में श्रध्दा प्रगाढ़ होनी चाहिए। श्रध्दा की प्रगाड़ता पर उपलब्धि निर्भर करेगी। कई किसी भी मंत्र का जप करे, लेकिन सभी धर्म, सम्प्रदाय, मत, मतांतरों को अपनाने वाले महानुभावों को धर्म के मौलिक एवं सार्वभौमिक सिध्दांतों को अवश्य अपने गुण, कर्म एवं स्वभाव में शामिल कर लेना चाहिए। दो आस्थाएं और प्रवीणताएं हर विचारशील मनुष्य में उत्पन्न की जानी चाहिए। एक यह कि वह अपने निजी जीवन में विवेकवान्, चरित्रवान, सुसंस्कृत और प्रतिभावान बने। सभ्य समुदाय में गिना जाने योग्य अपना स्तर बनाए। उसकी प्रामाणिकता और गरिमा अक्षुण्ण रहे।

दूसरा कार्य यह है कि समाजनिष्ठ उदारचेता बने। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना विकसित करे। दूसरों का दु:ख बंटाए और अपना सुख बांटे। वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता सुदृढ़ करें। अपने को समाज का एक अविच्छिन्न घटक माने और सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझे। संकीर्ण स्वार्थपरता से बचने का व्रत निबाहें और सम्पर्क क्षेत्र के पिछड़ों को उठाने, बढ़तों को बढ़ाने में अपना बढ़-चढ़कर योगदान करें। मनुष्य के यही दो प्रधानर् कत्तव्य और दायित्व हैं। उसका अंत:करण इसी सांचे में ढलना चाहिए।

 

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Aaditi Dave

Hello Every One, Jai Shree Krishna, as I Belong To Brahman Family I Got All The Properties of Hindu Spirituality From My Elders and Relatives & Decided To Spreading All The Stuff About Hindu Dharma's Devotional Facts at Only One Roof.

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