आध्यात्मिक गुरु

परम पूज्य स्वामी श्री अवधेशानंद गिरी जी

Avdheshanand-ji-maharaj

स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज पूर्ण रूप से आत्मा की ज्योति से पूरिपूर्ण हैं। आनंद, पवित्रता और पुण्य की आभा से परिपूर्ण स्वामी अवधेशानंद गिरी जी हिन्दू धर्म की साक्षात् मूर्ति हैं, श्री अवधेशानन्द गिरि महाराज , जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर , हजारों लोगों के लिए एक गुरु और लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा है

अवधेशानंद महाराज की संक्षिप्त जीवनी | Swami Avdheshanand Giri Ji Biography 

स्वामी अवधेशन्द गिरजी जिन्हें “स्वामीजी” कहा जाता है, उनका जन्म 24 नवंबर 1962 में खुर्जा, बुलंदशर, यूपी, भारत में हुआ था। स्वामी अवधेशानंद गिरी जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ। बालपन में उन्हें न खिलौनों में दिलचस्पी थी, न दोस्ती आदि में। अपने परिजनों से अकसर वह पूर्व जन्म की घटनाओं की चर्चा करते थे। ढाई साल की उम्र से उन्होंने बैराग धारण कर घर छोड़ दिया था, मगर परिवार के लोग समझा बुझाकर घर ले आये। जब वे हाई स्कूल की नौवीं कक्षा में थे तब योग के क्षेत्र में एक साधु की सिद्धियो का साक्षी बनने का  पहली बार अवसर मिला |

गर्मियों की छुट्टियों के दौरान उस वर्ष स्वामी जी आध्यात्मिक अध्ययन और योग का अभ्यास के लिए कुछ समय बिताने एक आश्रम का चले गए । एक रात के बीच में इस आश्रम में, उन्होंने  लगभग एक फुट जमीन के ऊपर हवा में उड़ते एक योगी देखा, आश्रम के अधिकारियों को जब इस युवा लड़के के बारे में पता चला की उसने सिद्ध योगी की साधना को देख लिया है तो उनको दुबारा ऐसा न करने को चेताया, परन्तु उस सिद्ध योगी ने कहा कि इस बच्चे ने क्या गलत किया है ? वैसे भी एक साधु बनने जा रहा है। इस तरह उन्होंने पहले ही बता दिया था की ये भी आगे चल कर सिद्ध गुरु ही बनेगे |

कालेज में उनकी सक्रियता वाद-विवाद, कविताओं अथवा प्रार्थना आदि में होती थी। सन् 1980  में हिमालय की कंदराओं में उन्होंने गहन साधना की और इसके साथ ही उन्होंने संन्यास जीवन में पूरी तरह से कदम रखा। हिमालय के निचले पर्वतमाला में महीनो भटक कर उन्होंने पाया की उन्हें मार्गदर्शन करने के लिए एक गुरु की आवश्यकता है । इसी दौरान उनका स्वामी अवधूत प्रकाश महाराज से मिलना हुआ जिन्होंने अपने आपको खोज लिया था और योग में विशेषज्ञ, और वेद और अन्य हिन्दू धर्म के बारे में ज्ञान में बहुमुखी हो चुके थे , अवधेशानन्द जी भगवन मिल गए हो मानो, वही से उनकी स्वयं से मिलान की यात्रा की शुरुआत हुई |

अवधेशानंद महाराज की मुख से निकले अमृत वचन | Swami Avdheshanand Giri Ji Message 

महाराज कहते है की मनुष्य की यात्रा ईश्वर होने तक की यात्रा है. हम अपने-अपने रास्तों में कुछ भी बनते चले जायें पर हमारी पूर्णता ईश्वर हो जाने में है और धरती पर आते ही हमें ईश्वर होने के सभी साधन भी मिल जाते हैं. उन साधनों को पहचाने बिना पूर्णता की यात्रा हमेशा अधूरी रह जाती है. स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने विविधता से भरी संस्कृति  को परिभाषित करते हुये कहा कि वह प्रत्येक वस्तु में वैभव को खोज लेती है. यह संस्कृति प्रत्येक पदार्थ को आदर देते हुये उसे प्रसाद बना लेती है ।

 

संसार के सभी नाम, रूप – दृश्य और पदार्थ परमात्मा का ही अंश है, इसलिए प्रत्येक प्राणी के प्रति आदर की भावना परमात्मा की सहज उपासना है…! सभी प्राणियों के प्रति आदर की भावना जो रखता है, वही परमात्मा को प्रिय है। प्रेम और मानवता का नाम ही ईश्वर है। वास्तव में प्रेम, दया, अहिंसा, निःस्वार्थ भाव से, सेवा, करुणा, क्षमा एवं मानवता इन सभी तत्वों से मिलकर ईश्वर का सृजन या निर्माण होता है। इस संपूर्ण जगत, ब्रह्माण्ड, पृथ्वी, आकाश, पाताल में जिस किसी भी जीवात्मा में प्रेम, दया, क्षमा, करुणा, अहिंसा, सेवा-भाव, जन-मानस की भलाई की भावना एवं मानवता ये सभी गुण विधमान है, वास्तव में एवं सच्चे अर्थों में वही जीवआत्मा ही परमात्मा या ईश्वर है। ईश्वर का कोई प्रतिरूप नहीं है वह तो निरंकार है, वह तो कण-कण में, सभी जीवों की आत्मा में निवास करता है। ईश्वर को खोजने के लिए कहीं भटकने की जरुरत नही है। असहायों की सहायता , दीनजनों की सेवा व दुखियों के आँसू पोछकर हम सच्चे सुख की अनुभूति पाकर ईश्वर को अनुभव कर सकते हैं…।

मानव इस सृष्टि की सबसे श्रेष्ठ कृति है। असीम क्षमतायें (बुद्धि-विवेक-बल) देकर इसे ईश्वर ने अपने सबसे निकट होने का वरदान दिया है। प्रेम, समर्पण और सेवा ईश्वर के सानिध्य में रहने के मार्ग है, इन्हीं मार्गो पर चलकर हमें जो आत्मिक सुख मिलता है, वह हमें ईश्वर की निकटता का अहसास देता है। गौतम बुद्ध को जब बौद्धित्व प्राप्त हुआ, उसके उपरांत एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि आपने क्या पाया…? तो बुद्ध ने कहा कि मैनें कुछ खोया ही नही था। मतलब सब कुछ अंर्तनिहित है, जरुरत है तो केवल उसे जानने व पहचान की।

यह सम्पूर्ण संसार परमात्म रूप है – “पुरुष सवेदं सर्वम् …” अर्थात्, हम अपने आस-पास जो कुछ देखते और पाते हैं, वह सब परमात्मा का ही तो रूप है। हम स्वयं परमात्मा के एक अंश हैं और दूसरे जीव भी उसी के अंश हैं। इस प्रकार संसार में ऐसा कौन रह जाता है, जिसमें हमारा आत्मीय सम्बन्ध न हो। किसी से विरोध करना अथवा बैर मानना अपनी आत्मा का ही विरोध करना है। आत्मा का विरोधी मनुष्य किसी भी श्रेय का अधिकारी नहीं हो सकता। परमपिता परमात्मा का दर्शन, उसकी अनुभूति तब ही प्राप्त हो सकती है, जब विवेक पर से संकीर्णता का आवरण उठा कर उसे व्यापक और विस्तृत बनाया जायेगा। अपने भीतर-बाहर और आस-पास एक परमात्मा को उपस्थित मानकर आचरण किया जायेगा…।

मानवता के बिना कोई भी मनुष्य ईश्वर प्राप्ति के साधनों को नहीं पा सकता। मानवता मानवी धर्म है। आत्मा का सात्विक भाव परमार्थ की चौखट है, जिसे कर्म द्वारा ईश्वर की पूजा भी कह सकते हैं। मानवता हमें ईश्वर की ओर जाने वाले रास्ते की और प्रेरित करती है, क्योंकि मानवता अपवित्र विचारों में नही है। सद्गुण तो मात्र सद् विचारों में है। दुखियों पर दया, प्राणी मात्र की भलाई, परस्पर का सहयोग, प्रेम और सदभाव पूर्ण वातावर्ण बनाये रखना मानवीय धर्म है। मानवता समाज के लिए समर्पण और सभ्यता की पराकाष्टा है। मानवता पाखंड और कुरीतियों में विश्वास नहीं रखती। मानवता सच्चाई की सृदृढ़ नींव है और वह दुष्कर्म दुर्गुणों को स्थान नहीं देती जो कि समाज के शत्रु है। मानवता मनुष्य को पशुत्व से हटाकर देवत्व की प्राप्ति कराती है। पूर्ण मानवता मनुष्य को निष्काम कर्म योगी बनाती है, जिसकी धुरी है – सत्य, प्रेम और अहिंसा; जो कि मानव को महापुरुष बनती है। जो व्यक्ति मानवता के निर्धारित मापदंडों के प्रति अपनी जिम्मेवारी, जवाबदेही एवं कर्तव्य समझते हुए इन मापदंडों का निर्वाह पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी एवं वफादारी के साथ करेगा; वही व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, क्योंकि मानवता ही वह एक मार्ग है जो सीधे ईश्वर तक पहुंचाता है…।

About the author

Niteen Mutha

नमस्कार मित्रो, भक्तिसंस्कार के जरिये मै आप सभी के साथ हमारे हिन्दू धर्म, ज्योतिष, आध्यात्म और उससे जुड़े कुछ रोचक और अनुकरणीय तथ्यों को आप से साझा करना चाहूंगा जो आज के परिवेश मे नितांत आवश्यक है, एक युवा होने के नाते देश की संस्कृति रूपी धरोहर को इस साइट के माध्यम से सजोए रखने और प्रचारित करने का प्रयास मात्र है भक्तिसंस्कार.कॉम

16 Comments

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  • Mene kabhi ishvar ko nahi dekha par muje avdheshanand girija Maharaj Mai ishvar ki chhabi dekhti hai…

  • पता नही मुझे ईश्वर कब नेक कामो के लिये चूनेगा!

  • dekhiye // biografi ka arth chmtkar nhi h. yha kisi k jeevn ki chamatkarik ghtna ko n bta kr uske jevn ke sanghrsh ko dikhaya jana chahiye .. un plon ka jikra hona chahiye jisse ver abhibhut huye ho. ye jo apne likha h ye to dnt ktha jaisa lg rha h

  • 08-02-2017 ko indore khel prashal me vagtigat mulakat hui apne aap ko dhany samjhne laga hu jivan ka najariya badalne laga he mukesh bharti indore

  • स्वामी अवधेशानंद जी तो अद्भुद प्रतिभा के धनी है।

  • Atulniye, bahot hi adbhut vyaktitwa hai swami ji ka. Hame unke bare me aur janki ki jigyasa hai. Kya hamara swami ji se mil pana sambhav ho sakta hai. Krapya hamara margdarshan kare swami ji ke sanidhye tak pahuchne ka.

    • हाँ वे मेरे दादाजी के पास आये थे 2013 में पर में नही मिल पाया आपकी तरह में भी उनसे मिलने के लिए बड़ा उत्सुक हूँ अमिता जी में आपके उस पवित्र संस्कारो को प्रणाम करता हूँ जिसने आपके मन में सन्त दर्शन की मुमुक्षा जागृत कर दी है।
      आप जब भी उनसे मिले तो कमेंट मुझे जरूर कीजिएगा ।
      nmshkaar

    • Ap kalji mile to muze bhataiye .me bhi unless Fatshan ka atut abhilashi hu mo no 9730703857 Madhya noise ahemednagar Maharashtra

  • Mai apne jivan se chhubd hun,Atah mai aap Santo ke saran me aana chahta hun,so kripya mujhe margdarshan krte , nhi to mai apne jivan ko kisivi anjam De sakta hun,Jai Hanuman ji, Namaskar

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